आज की तथाकथित हीलिंग और मैनिफेस्टेशन इंडस्ट्री ने एक नया नियम बनाया है— “ तुम्हें हर हाल में, हर समय सिर्फ सकारात्मक (Positive) सोचना है। यदि तुम उदास हो, रो रहे हो या जीवन की परिस्थितियों से निराश हो, तो तुम 'लो-वाइब्रेशन में हो और अपने जीवन में नकारात्मकता को आकर्षित कर रहे हो।"
इसे आज की मनोवैज्ञानिक भाषा में 'टॉक्सिक पॉजिटिविटी' कहा जाता है। यह एक ऐसी बनावटी मुस्कान का मुखौटा है, जो इंसान को अंदर से खोखला कर देता है। जब हम अपनी स्वाभाविक उदासी, डर या शोक को दबाने लगते हैं, तो वह मानसिक बीमारी का रूप ले लेती है। संतों ने इस संसार के इस भ्रामक और क्षणभंगुर रूप को बहुत पहले पहचान लिया था। संत कबीर दास जी कहते हैं:
सुखिया सब संसार है, खावै औरु सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागै औरु रोवै॥
यह संसार भौतिक सुखों में डूबा हुआ है, जो केवल खाने और सोने को ही जीवन मानकर निश्चिंत है। परंतु जो जागृत है, जो सत्य की खोज में है, वह संसार के दुखों को देखकर रोता है, तड़पता है। यहाँ रोना संवेदनशीलता और सत्य के प्रति तड़प का प्रतीक है, कमजोरी का नहीं।
आइए, हमारी टाइमलेस विजडम (शाश्वत ज्ञान) की ओर लौटें और देखें कि जब जीवन में घोर अवसाद और निराशा घेर ले, तो हमारी सनातन संस्कृति हमें क्या सिखाती है।
अर्जुन का विषाद: जब प्रभु ने दुख को दी मान्यता
श्रीमद्भगवद्गीता की शुरुआत कहाँ से होती है? किसी जादुई मंत्र या तुरंत अमीर बनने के टोटके से नहीं। गीता का पहला अध्याय ही है—’अर्जुनविषादयोग'।
कुरुक्षेत्र के मैदान में जब अर्जुन अपनों के सामने खड़े होते हैं, तो वे घोर अवसाद से घिर जाते हैं। उनके हाथ से गांडीव धनुष छूट जाता है, त्वचा में जलन होने लगती है, मन भ्रमित हो जाता है और वे रथ के पीछे बैठ कर रोने लगते हैं। अर्जुन की इस वास्तविक शारीरिक और मानसिक व्याकुलता का सजीव चित्रण गीता में इस प्रकार मिलता है:
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥1.29॥
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥1.30॥
(अर्जुन कहते हैं—हे कृष्ण! मेरे शरीर में कम्प हो रहा है और रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और त्वचा में बहुत जलन हो रही है। मेरा मन मानो भ्रमित सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा रहने में भी असमर्थ हूँ और मुझे केवल विपरीत लक्षण ही दिखाई दे रहे हैं।)
यदि वहाँ आज का कोई 'अबंडेंस कोच' या 'मैनिफेस्टेशन इन्फ्लुएंसर' होता, तो वह अर्जुन से कहता—अर्जुन! तुम यह क्या रोना लेकर बैठ गए? पॉजिटिव सोचो! अपनी वाइब्रेशन ठीक करो, नहीं तो तुम युद्ध हार ओगे।
लेकिन जगतगुरु भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने अर्जुन की उस उदासी, उस छटपटाहट और उन आंसुओं को पूरी मान्यता दी। उन्होंने अर्जुन को डांटा नहीं, बल्कि उनके पूरे दुख को शांत होकर सुना। संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं:
सञ्जय उवाच |
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् |
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदन: || 1||
(अर्थ: उस समय करुणा से व्याप्त, आंसुओं से पूर्ण और व्याकुल नेत्रों वाले, शोकयुक्त अर्जुन से भगवान मधुसूदन ने यह गंभीर वचन कहे।)
हमारे शास्त्र हमें सिखाते हैं कि “दुख से भागना नहीं है, दुख को स्वीकार करना है”, क्योंकि जब तक हम स्थिति को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक उससे पार कैसे पाएंगे?
'सुख-दुखे समे कृत्वा': गीता का वास्तविक संतुलन
भगवान कृष्ण अर्जुन को यह दिलासा नहीं देते कि जीवन में कभी दुख नहीं आएगा। वे तो स्पष्ट शब्दों में जीवन की वास्तविकता बताते हैं कि यह संसार दुखों का घर है:
मामुपेत्य पुनर्जन्म दु:खालयमशाश्र्वतम् |
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः || १५ ||
(अर्थ: मुझ परमेश्वर को प्राप्त होकर वे महापुरुष दुखों के घर तथा क्षणभंगुर इस पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते, बल्कि परम सिद्धि को प्राप्त कर लेते हैं।)
जब स्वयं भगवान कह रहे हैं कि यह संसार'दुःखालयम्' (दुखों का घर) है, तो यह मैनिफेस्टेशन इंडस्ट्री हमें चौबीस घंटे कृत्रिम सुख के सपने क्यों बेच रही है? कृष्ण हमें नकली मुस्कान पहनना नहीं सिखाते, बल्कि वे हमें सुख और दुख दोनों को जीवन का अभिन्न हिस्सा मानकर, दोनों में शांत रहने का व्यावहारिक समाधान देते हैं:
योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय |
सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते || 48||
(अर्थ: हे धनंजय! तुम आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि (सफलता और असफलता) में समान भाव रखकर योग में स्थित होकर अपने कर्तव्य कर्मों को करो, क्योंकि यह 'समत्व' (समान रहने का भाव) ही योग कहलाता है।)
जब बुद्धि में यह स्पष्टता आ जाती है कि अनुकूल और प्रतिकूल समय केवल आने-जाने वाली परछाइयाँ हैं, तब मनुष्य 'टॉक्सिक पॉजिटिविटी' के पाखंड से मुक्त होकर वास्तविक मानसिक शांति को प्राप्त करता है।
आज का समाधान
यदि आज आप उदास हैं, थके हुए हैं या किसी असफलता से टूट चुके हैं, तो खुद को दोष मत दीजिए। 'लो-वाइब्रेशन' के डर से अपनी स्वाभाविक भावनाओं को अंदर मत दबाइए। इसका वास्तविक समाधान 3 चरणों में है:
सहज स्वीकार्यता : जो परिस्थिति है और जो आपके मन का भाव है, उसे पूरी ईमानदारी से स्वीकार करें। रोना आए, तो बह जाने दें। अर्जुन के उन्हीं आंसुओं के बीच से गीता प्रकट हुई थी।
समभाव का अभ्यास : स्वयं को याद दिलाएं कि यह समय भी स्थायी नहीं है, बदल जाएगा।
स्वधर्म का पालन : फल की चिंता और मानसिक कल्पनाओं के चक्रव्यूह से बाहर निकलकर, इस समय आपके हाथ में जो छोटा सा भी कर्तव्य कर्म है, उसे पूरी निष्ठा से करना शुरू करें। कर्म ही अवसाद की सबसे बड़ी दवा है।
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