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Thursday, 19 October 2023

प्रश्नोपनिषद- द्वितीय प्रश्न

 द्वितीय प्रश्न

 

अथ हैनं भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ। भगवन्कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते कतर एतत्प्रकाशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥

 

इसके पश्चात् इन प्रसिद्ध (महात्मा पिप्पलाद) ऋषि से विदर्भदेशीय भार्गव ने पूछा; भगवन्! कुल कितने देवता प्रजा को धारण करते हैं; उनमें से कौन-कौन इसे प्रकाशित करते हैं फिर (यह भी बतलाइये कि ) इन सबमें कौन है; यही (मेरा प्रश्न है ) ॥ १ ॥

 

व्याख्या - इस मन्त्र में भार्गव ऋषि ने महर्षि पिप्पलादसे तीन बातें पूछी हैं-

(१) प्रजाको यानी प्राणियोंके शरीरको धारण करनेवाले कुल कितने देवता हैं?

(२) उनमें से कौन-कौन इसको प्रकाशित करनेवाले हैं?

(३) इन सबमें अत्यन्त श्रेष्ठ कौन है ? ॥ १ ॥

 

तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च । ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥

 

उन प्रसिद्ध महर्षि (पिप्पलाद) ने उन भार्गव से कहा; निश्चय ही वह प्रसिद्ध आकाश यह देवता है (तथा) वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, वाणी (कर्मेन्द्री), नेत्र और श्रोत्र (ज्ञानेन्द्री) तथा मन (अन्तःकरण) भी [देवता हैं]। वे सब अपनी-अपनी शक्ति प्रकट करते हुएअभिमानपूर्वक कहने लगे- हमने इस शरीर को आश्रय देकर धारण कर रखा है ॥ २ ॥

 

व्याख्या - यहाँ महर्षि पिप्पलाद दो प्रश्नों का उत्तर एक ही साथ दे दिया गया है। वे कहते हैं कि सबका आधार तो वैसे आकाशरूप देवता ही हैं; परन्तु उससे उत्पन्न होने वाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- ये चारों महाभूत भी शरीर को धारण किये रहते हैं। यह स्थूल शरीर इन्हीं से बना है। इसलिये ये धारक देवता हैं। वाणी आदि पाँच कर्मेन्द्रियाँ, नेत्र और कान आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन आदि चार अन्तःकरण-ये चौदह देवता इस शरीर के प्रकाशक हैं। ये देवता देह को धारण और प्रकाशित करते हैं, इसलिये ये धारक और प्रकाशक देवता कहलाते हैं। ये इस देह को प्रकाशित करके आपस में झगड़ पड़े और अभिमानपूर्वक परस्पर कहने लगे कि 'हमने शरीरको आश्रय देकर धारण कर रखा है' ॥ २ ॥

 

तान्वरिष्ठः प्राण उवाच। मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्चधाऽऽत्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामीति तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥ ३ ॥

 

उनसे वरिष्ठ प्राण बोला- (तुम लोग) मोह में न पड़ो; मैं ही अपने इस स्वरूप को पाँच भागों में विभक्त करके इस शरीर को आश्रय देकर धारण करता हूँ। यह (सुनकर भी) वे अविश्वासी ही बने रहे ॥ ३ ॥

 

सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिःश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रातिष्ठन्ते । तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्त एवं वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥ ४ ॥

 

वह प्राण अभिमानपूर्वक मानो (उस शरीर से) ऊपर की ओर बाहर निकलने लगा। उसके बाहर निकलने पर उसी के साथ-ही-साथ अन्य सब भी शरीर से बाहर निकलने लगे और उसके ठहर जाने पर दूसरे सब देवता भी ठहर गये- तब जैसे (मधु के छत्ते से) मधुमक्खियों के राजा के निकलने पर (उसी के साथ-साथ) सारी ही मक्षिका (मधुमक्खियाँ) बाहर निकल जाती हैं और उसके बैठ जाने पर सब-की-सब बैठ जाती हैं; ऐसी ही दशा ( इन सबकी हुई)- अतः वाणी, नेत्र, श्रोत्र और मन वे (सभी) प्राण की श्रेष्ठता का अनुभव करके प्रसन्न होकर प्राण की स्तुति करने लगे ॥ ४ ॥

 

एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः । एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥ ५ ॥

 

यह प्राण अग्निरूप से तपता है; यही सूर्य है; यही मेघ है; यही इन्द्र है; यही वायु है (तथा) यह प्राण रूप देव ही पृथ्वी (एवं) रयि है (तथा) जो कुछ सत् और असत् है तथा जो अमृत (सत् और असत्  से भी श्रेष्ठ, परमात्मा) कहा जाता है (वह भी प्राण ही है) ॥ ५ ॥

 

व्याख्या- वे वाणी आदि सब देवता स्तुति करते हुए बोले- यह प्राण ही अग्रिरूप धारण करके तपता है और यही सूर्य है, यही मेघ, इन्द्र और वायु है। यही देव, पृथ्वी और रयि (भूतसमुदाय) है तथा सत् और असत् एवं उससे भी श्रेष्ठ जो अमृतस्वरूप परमात्मा है, वह भी यह प्राण ही है ॥ ५ ॥

 

अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् । ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च॥६॥

 

जिस प्रकार रथ के पहिये की नाभि में लगे हुए अरे नाभि के ही आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार ऋग्वेद की सब ऋचाएँ, यजुर्वेद के समस्त मन्त्र, सामवेद, उनके द्वारा सिद्ध होने वाले यज्ञादि शुभकर्म और यज्ञादि शुभकर्म करने वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि अधिकारी वर्ग-ये सभी प्राण के आधार पर ही टिके हुए हैं; सभी का आश्रय प्राण ही है ॥ ६ ॥

 

 सम्बन्ध - इस प्रकार प्राण का महत्त्व बताकर अब उसकी स्तुति की जाती है-

 

प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे। तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥ ७ ॥

 

हे प्राण ! तू ही प्रजापति है, तू ही गर्भ में विचरता है, (और तू ही) माता-पिता के अनुरूप होकर जन्म लेता है, निश्चय ही ये सब प्राणी तुझे भेंट समर्पण करते हैं ( अर्थात तुम्हारी तृप्तिके लिये ही अन्न भक्षण आदि कर रहे हैं)। तू ही अपानादि सब प्राणोंके सहित सबके शरीर में स्थित हो रहा है ॥ ७ ॥

 

देवानामसि वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा ।

ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥ ८ ॥

 

हे प्राण ! तू ही देवताओंके लिये हवि पहुँचानेवाला उत्तम अनि है । पितरोंके लिये पहली स्वधा है। अथर्वाङ्गिरस आदि ऋषियोंके द्वारा आचरित (अनुभूत) सत्य भी तू ही है ॥ ८ ॥

 

इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता । त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥ ९ ॥

 

हे प्राण! तू तेज से ( सम्पन्न) इन्द्र, रुद्र (और) रक्षा करने वाला है। तू ही अन्तरिक्ष में विचरता है (और) तू ही समस्त ज्योतिर्गणों का स्वामी सूर्य है ॥ ९ ॥

 

यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः । आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥ १० ॥

 

हे प्राण! जब तू भलीभाँति वर्षा करता है, उस समय तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा अन्न उत्पन्न होगा-यह समझकर आनन्दमय हो जाती है ॥ १० ॥

 

व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः । वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥ ११ ॥

 

हे प्राण ! तू संस्काररहित (होते हुए भी) एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है (तात्पर्य यह कि तू स्वभावसे ही शुद्ध है, अतः तुझे संस्कारद्वारा शुद्धिकी आवश्यकता नहीं है) तथा हम लोग (सभी इन्द्रियाँ और मन आदि) तेरे लिये भोजन को देनेवाले हैं और तू भोक्ता है। विश्व का स्वामी तू ही है। हे आकाश में विचरने वाले प्राण (मातरिश्व)! तू हमारा पिता है; क्योंकि तुझीसे हम सबकी उत्पत्ति हुई है  ११ 

 

या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि । या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥ १२ ॥

 

(हे प्राण!) जो तेरा स्वरूप वाचि वाणी में प्रतिष्ठित है तथा जो श्रोत्र में या  जो चक्षु में और जो मन में व्याप्त हैउसको कल्याणमय बना ले, (तू) उत्क्रमण न कर अर्थात शरीरसे उठकर बाहर  जा  १२ 

 

प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम् । मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥ १३ ॥

यह प्रत्यक्ष दीखने वाला जगत् (और) जो कुछ त्रिदिव अर्थात स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित है, वह सब-का-सब प्राण के वश में है। (हे प्राण !) जैसे माता अपने पुत्रों की रक्षा करती है, उसी प्रकार (तू हमारी) रक्षा कर तथा हमें श्री अर्थात कान्ति और प्रज्ञा अर्थात बुद्धि प्रदान कर; इति- इस प्रकार यह दूसरा प्रश्न समाप्त हुआ  १३ 

 


सारांश - द्वितीय प्रश्न (गीता प्रेस की पुस्तक से) 

इस प्रकार इस प्रकरणमें भार्गव ऋषिद्वारा पूछे हुए तीन प्रश्नोंका उत्तर देते हुए महर्षि पिप्पलादने यह बात समझायी कि समस्त प्राणियोंके शरीरोंको अवकाश देकर बाहर और भीतरसे धारण करनेवाला आकाश-तत्त्व है। साथ ही इस शरीरके अवयवोंकी पूर्ति करनेवाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- ये चार तत्त्व हैं। दस इन्द्रियाँ और अन्तःकरण-ये इसको प्रकाश देकर क्रियाशील बनानेवाले हैं। इन सबसे श्रेष्ठ प्राण है। अतएव प्राण ही वास्तवमें इस शरीरको धारण करनेवाला है, प्राणके बिना शरीरको धारण करनेकी शक्ति किसीमें नहीं है। अन्य सब इन्द्रिय आदिमें इसीकी शक्ति अनुस्यूत है, इसीकी शक्ति पाकर वे शरीरको धारण करते हैं। इसी प्रकार प्राणकी श्रेष्ठताका वर्णन छान्दोग्य-उपनिषद्के पाँचवें अध्यायके आरम्भमें और बृहदारण्यक उपनिषद्के छठे अध्यायके आरम्भमें भी आया है। इस प्रकरणमें प्राणकी स्तुतिका प्रसङ्ग अधिक है ॥ १३ ॥

 

॥ द्वितीय प्रश्न समाप्त २ ॥

Sunday, 8 October 2023

प्रश्नोपनिषद्- प्रथम प्रश्न

 ।। ॐ श्रीपरमात्मने नमः ।।

 

प्रश्नोपनिषद्

 

प्रश्नोपनिषद् अथर्ववेदके पिप्पलाद-शाखीय ब्राह्मणभागके अन्तर्गत है। इस उपनिषद्में पिप्पलाद ऋषिने सुकेशा आदि छः ऋषियोंके छः प्रश्नोंका क्रमसे उत्तर दिया है; इसलिये इसका नाम प्रश्नोपनिषद् हो गया।

 


शान्तिपाठ

 

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥* स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः !! शान्तिः !!!

 

हे देवगण! हम भगवान का यजन (आराधन) करते हुए कानों से कल्याणमय वचन सुनें, नेत्रों से कल्याण (ही) देखें, सुदृढ़ अङ्गों एवं शरीर से भगवान की स्तुति करते हुए हम लोग जो आयु देवहित में अर्थात परमात्मा के काम आ सके, उसका उपभोग करें। सब ओर फैले हुए सुयश वाले इन्द्र हमारे लिये कल्याण का पोषण करें। सम्पूर्ण विश्व का ज्ञान रखने वाले पूषा हमारे लिये स्वस्ति अर्थात कल्याण का पोषण करें। अरिष्टों को मिटाने के लिये चक्रसदृश शक्तिशाली गरुडदेव हमारे लिये कल्याण का पोषण करें तथा (बुद्धिके स्वामी) बृहस्पति भी हमारे लिये कल्याण की पुष्टि करें।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः- परमात्मन्! हमारे त्रिविध तापकी शान्ति हो ।

 

प्रथम प्रश्न

 

ॐ सुकेशा च भारद्वाजः शैव्यश्च सत्यकामः सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्यश्चाश्वलायनो भार्गवो वैदर्भिः कबन्धी कात्यायनस्ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ १ ॥

 

ॐ इस परमात्मा के नाम का स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ करते हैं।

 

भरद्वाज-पुत्र सुकेशा और शिविकुमार सत्यकाम तथा गर्गगोत्र में उत्पन्न सौर्यायणी एवं कोसलदेशीय आश्वलायन तथा विदर्भनिवासी भार्गव और कत्य ऋषि का प्रपौत्र कबन्धी -वे ये छः प्रसिद्ध ऋषि जो वेदपरायण (और) ब्रह्मनिष्ठ (वेद में निष्ठा रखने वाले) थे। वे सब-के-सब परम् ब्रह्म की खोज करते हुए; यह समझकर कि ये (पिप्पलाद ऋषि) निश्चय ही उस ब्रह्म के विषय में सारी बातें बतायेंगे; हाथ में समिधा लिये हुए भगवान् पिप्पलाद ऋषिके पास गये ॥ १ ॥

 

 

तान्ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान्पृच्छत यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥

 

उन सुकेशा आदि ऋषियों से वे (पिप्पलाद) ऋषि बोले- तुमलोग श्रद्धा के साथ ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, (और) तपस्यापूर्वक एक वर्ष तक (यहाँ) भलीभांति निवास करो। (उसके बाद) अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार प्रश्न पूछना। यदि (तुम्हारी पूछी हुई बातोंको) मैं जानता होऊँगा; तो निःसंदेह वे सब बातें - तुम लोगों को बताऊँगा ॥ २ ॥

 

सम्बन्ध – ऋषि के आज्ञानुसार सब ने श्रद्धा, ब्रह्मचर्य और तपस्या के साथ विधिपूर्वक एक वर्षतक वहाँ निवास किया।

 

कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ । भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ ३ ॥ अथ

 

उनमें से कत्य ऋषि के प्रपौत्र कबन्धी ने (पिप्पलाद ऋषि के) पास जाकर पूछा- भगवन्! किस प्रसिद्ध और सुनिश्चित कारण विशेष से यह सम्पूर्ण प्रजा नाना रूपों में उत्पन्न होती है- यह मेरा प्रश्न है ॥ ३ ॥

 

 

तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते। रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति ॥ ४ ॥

 

उससे वे प्रसिद्ध महर्षि बोले- निश्चय ही प्रजा उत्पन्न करने की इच्छावाला (जो) प्रजापति है, उसने तप किया। उसने तपस्या करके (जब सृष्टि का आरम्भ किया, उस समय पहले) उसने एक तो रयि तथा दूसरा प्राण भी -यह जोड़ा उत्पन्न किया। इन्हें उत्पन्न करने का उद्देश्य यह था कि ये दोनों मेरी नाना प्रकार की प्रजाओं को उत्पन्न करेंगे ॥ ४ ॥

 

 

आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत् सर्वं यन्मूर्त चामूर्त च तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥ ५ ॥

 

यह निश्चय है कि आदित्य (सूर्य) ही प्राण हैं (और) चन्द्रमा ही रयि है। जो कुछ मूर्त अर्थात आकार वाला है (पृथ्वी, जल और तेज) और जो अमूर्त अर्थात आकाररहित है (आकाश और वायु) यह सभी कुछ रयि है, इसलिये मूर्तमात्र ही अर्थात् देखने तथा जानने में आने वाली सभी वस्तुएँ रयि हैं॥५॥

 

अथादित्य उदयन्यत्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते । यद्दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत्सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥ ६ ॥

 

रात्रि के अनन्तर उदय होता हुआ सूर्य जो पूर्व दिशा में प्रवेश करता है, उससे पूर्व दिशा के प्राणों को अपनी किरणों में धारण करता है (उसी प्रकार) जो दक्षिण दिशा को; जो पश्चिम दिशा को; जो उत्तर दिशा को; जो नीचे के लोकों को; जो ऊपर के लोकों को; जो दिशाओं के बीच के भागों (कोणों) को (और) जो अन्य सबको प्रकाशित करता है, वह समस्त प्राणों को अर्थात् सम्पूर्ण जगत के प्राणों को अपनी किरणों में धारण करता है ॥६॥

 

इस मन्त्रमें सम्पूर्ण प्राणियों के शरीरों में जो जीवनी-शक्ति है, उसके साथ सूर्य का सम्बन्ध दिखलाया गया है। जिस समय जिस दिशा में जहाँ-जहाँ सूर्य अपना प्रकाश फैलाता है, वहाँ-वहाँ के प्राणियोंको स्फूर्ति देता रहता है; अतः सूर्य ही समस्त प्राणियों का प्राण है।

 

 

स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते । तदेतदृचाभ्युक्तम् ॥ ७ ॥

 

वह यह सूर्य ही उदय होता है (जो कि) वैश्वानर अग्नि (जठराग्नि) और विश्वरूप प्राण है, वही यह बात ऋचा द्वारा आगे कही गयी है ॥७॥

 

व्याख्या – प्राणियों के शरीर में जो वैश्वानर नाम से कही जाने वाली जठराग्नि है, जिससे अन्न का पाचन होता है, वह सूर्य का ही अंश है; अतः सूर्य ही है। तथा जो प्राण, अपान, समान,व्यान और उदान—इन पाँच रूपों में विभक्त प्राण है, वह भी इस उदय होनेवाले सूर्य का ही अंश है; अतः सूर्य ही है। यही बात अगली ऋचा द्वारा समझायी गयी है।

 

 

विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् । सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥ ८ ॥

 

सम्पूर्ण रूपों के केन्द्र सर्वज्ञ, सर्वाधार, प्रकाशमय तपते हुए किरणों वाले सूर्य को अद्वितीय (बतलाते हैं)। यह सहस्रों किरणों वाला सूर्य सैकड़ों प्रकार से बर्तता हुआ समस्त जीवों का प्राण (जीवनदाता) होकर उदयति-उदय होता है ॥ ८ ॥

 

*सम्पूर्ण सृष्टि का जीवन- दाता प्राण ही सूर्य के रूपमें उदित होता है*

 

सम्बन्ध— इस प्रकार यहाँ तक कात्यायन कबन्धी के प्रश्नानुसार संक्षेप में यह बताया गया कि उस सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वर से ही उसके सङ्कल्पद्वारा प्राण और रयि के संयोग से इस सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति आदि होती है। अब इस प्राण-शक्ति और रयि-शक्ति के सम्बन्ध से परमेश्वर की उपासना का प्रकार और उसका फल बतलाने के लिये दूसरा प्रकरण आरम्भ करते हैं-

 

संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च । तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते । त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेत ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते । एष ह वै रयिर्य: पितृयाणः ॥ ९ ॥

 

संवत्सर (बारह महीनों वाला काल) ही प्रजापति है, उसके दो अयन हैं- एक दक्षिण और दूसरा उत्तर। वहाँ मनुष्यों में जो लोग निश्चयपूर्वक (केवल) उन इष्ट और पूर्त कर्मों को ही करने योग्य कर्म मानकर (सकाम भाव से) उनकी उपासना करते हैं (उन्हीं के अनुष्ठान में लगे रहते हैं), वे चन्द्रमा के लोक को ही जीतते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं (और) वे ही पुनः (वहाँ से) लौटकर आते हैं, इसलिये ये संतान की कामना वाले ऋषिगण दक्षिण (मार्ग) को प्राप्त होते हैं। निस्सन्देह यही वह रयि है, जो 'पितृयान' नामक मार्ग है ॥ ९ ॥

 

 

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते । एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष श्लोकः ॥ १०॥

 

किंतु (जो) तपस्या के साथ ब्रह्मचर्यपूर्वक (और) श्रद्धा से युक्त होकर अध्यात्मविद्या के द्वारा (सूर्यरूप) परमात्मा की अन्विष्य खोज करके (जीवन सार्थक करते हैं) वे उत्तरायण-मार्ग से सूर्यलोक को जीत लेते हैं (प्राप्त करते हैं)। यह (सूर्य) ही प्राणों का केन्द्र है, यह अमृत (अविनाशी) और निर्भय पद है, यह परमगति है, इससे पुनः लौटकर नहीं आते।  इस प्रकार यह निरोध (पुनरावृत्ति का निवारक) है, इस बात को स्पष्ट करने वाला यह (अगला) श्लोक है ॥ १० ॥

 

 

पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम् । अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितमिति ॥ ११ ॥

 

(कितने ही लोग तो इस सूर्य को ) पाँच चरणों वाला, सबका पिता, बारह आकृतियों वाला, जल का उत्पादक, (और) स्वर्गलोक से भी ऊपर के स्थान में (स्थित) बतलाते हैं। ये दूसरे कितने ही लोग सात पहियों वाले (और) अरों वाले (रथमें) बैठा हुआ (एवं) सबको भलीभाँति जाननेवाला है- ऐसा बतलाते हैं ॥ ११ ॥

 

 

मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुक्लः प्राणस्तस्मादेत ऋषयः शुक्ल इष्टं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥ १२ ॥

 

मास भी उसी प्रजापति की प्रतीक है, और इसके कृष्ण पक्ष को 'रयि' कहा जाता है और 'शुक्ल पक्ष' को 'प्राण' कहा जाता है।

जो कल्याणकामी ऋषि हैं, वे रयिस्थानीय भोग-पदार्थों से विरक्त होकर अपने समस्त शुभ कर्म शुक्लपक्षस्थानीय प्राणाधार परब्रह्म परमेश्वर को अर्पण करते हैं- स्वयं उसका कोई फल नहीं चाहते; यही गीतोक्त कर्मयोग है।

इनसे भिन्न जो भोगासक्त मनुष्य हैं, वे कृष्णपक्ष में अर्थात् कृष्णपक्षस्थानीय स्थूल पदार्थों की प्राप्ति के उद्देश्य से सब प्रकार के कर्म किया करते हैं। इनका वर्णन गीता में 'स्वर्गपरा:' के नाम से हुआ है (गीता २ । ४२ - ४४) ॥ १२ ॥

 

 

अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या ज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ १३ ॥

 

दिन और रात का जोड़ा भी उसी प्रजापति की प्रतीक है, इसमें रात्रि को 'रयि' और दिन को 'प्राण' कहा जाता है। दिन तो मानो प्राण अर्थात् सबको जीवन देने वाला प्रकाशमय विशुद्ध स्वरूप है और रात्रि ही भोगरूप रयि है। इंद्रिय आनंद में बिताया गया दिन जीवन को नष्ट कर देता है। जीवन शक्ति (प्राण) का उपयोग आत्म-नियंत्रण करके आध्यात्मिक प्राप्ति के लिए करना ही ब्रह्मचर्य है।

 

दिन और रात का जोड़ा ही प्रजापति है, उसका दिन ही प्राण है (और) रात्रि ही रयि है (अतः) जो दिन में स्त्री-वास करते हैं,  ये लोग सचमुच अपने प्राणों को ही क्षीण करते हैं तथा (मनुष्य) जो रात्रि में स्त्री-सहवास करते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है॥ १३ ॥

 

 

अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ १४ ॥

 

इस मन्त्र में अन्न को प्रजापति का स्वरूप बतलाते हुए कहा गया है कि सब प्राणियों का आहाररूप अन्न ही प्रजापति है, क्योंकि इसी से वीर्य (जीवन का बीज) उत्पन्न होता है और उससे सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न होती है।

 

सम्बन्ध—अब पहले बतलाये हुए दो प्रकार के साधकों को मिलने वाले पृथक्-पृथक् फल का वर्णन करते हैं-

 

तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते । तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम्॥ १५ ॥

 

प्रजापति व्रत (ऊपर के श्लोकों में वर्णित) का अनुष्ठान करने कुछ लोग संतति को उत्पन्न करते हैं, इनमें से जो पूरी तरह सत्य में प्रतिष्ठित होते हैं उन्हें ही ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।

 

तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्यमनृतं न माया चेति ।। १६ ।।

 

जिनमें न तो कुटिलता (और) झूठ (मिथ्या भाषण) है तथा न माया (कपट) ही है, उन्हीं को वह विशुद्ध, विकाररहित ब्रह्मलोक (मिलता है) ॥ १६ ॥

 

॥ प्रथम प्रश्न समाप्त ॥ १ ॥

 

 



 

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