द्वितीय प्रश्न
अथ हैनं भार्गवो
वैदर्भिः पप्रच्छ। भगवन्कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते कतर एतत्प्रकाशयन्ते कः
पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥
इसके पश्चात् इन
प्रसिद्ध (महात्मा पिप्पलाद) ऋषि से विदर्भदेशीय भार्गव ने पूछा; भगवन्! कुल कितने देवता प्रजा को धारण करते
हैं; उनमें से कौन-कौन इसे प्रकाशित
करते हैं फिर (यह भी बतलाइये कि ) इन सबमें कौन है; यही (मेरा प्रश्न है ) ॥ १ ॥
व्याख्या - इस
मन्त्र में भार्गव ऋषि ने महर्षि पिप्पलादसे तीन बातें पूछी हैं-
(१) प्रजाको यानी
प्राणियोंके शरीरको धारण करनेवाले कुल कितने देवता हैं?
(२) उनमें से
कौन-कौन इसको प्रकाशित करनेवाले हैं?
(३) इन सबमें
अत्यन्त श्रेष्ठ कौन है ? ॥ १
॥
तस्मै स
होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च । ते
प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥
उन प्रसिद्ध
महर्षि (पिप्पलाद) ने उन भार्गव से कहा; निश्चय ही वह प्रसिद्ध आकाश यह देवता है (तथा) वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, वाणी (कर्मेन्द्री), नेत्र और श्रोत्र
(ज्ञानेन्द्री) तथा मन (अन्तःकरण) भी [देवता हैं]। वे सब अपनी-अपनी शक्ति प्रकट
करते हुएअभिमानपूर्वक कहने लगे- हमने इस शरीर को आश्रय देकर धारण कर रखा है ॥ २ ॥
व्याख्या - यहाँ महर्षि
पिप्पलाद दो प्रश्नों का उत्तर एक ही साथ दे दिया गया है। वे कहते हैं कि सबका
आधार तो वैसे आकाशरूप देवता ही हैं; परन्तु उससे उत्पन्न होने वाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- ये
चारों महाभूत भी शरीर को धारण किये रहते हैं। यह स्थूल शरीर इन्हीं से बना है।
इसलिये ये धारक देवता हैं। वाणी आदि पाँच कर्मेन्द्रियाँ, नेत्र और कान आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन आदि
चार अन्तःकरण-ये चौदह देवता इस शरीर के प्रकाशक हैं। ये देवता देह को धारण और
प्रकाशित करते हैं, इसलिये ये
धारक और प्रकाशक देवता कहलाते हैं। ये इस देह को प्रकाशित करके आपस में झगड़ पड़े
और अभिमानपूर्वक परस्पर कहने लगे कि 'हमने शरीरको आश्रय देकर धारण कर रखा है' ॥ २ ॥
तान्वरिष्ठः प्राण
उवाच। मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्चधाऽऽत्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामीति
तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥ ३ ॥
उनसे वरिष्ठ प्राण
बोला- (तुम लोग) मोह में न पड़ो; मैं ही अपने इस स्वरूप को पाँच भागों में विभक्त करके इस शरीर को आश्रय देकर धारण
करता हूँ। यह (सुनकर भी) वे अविश्वासी ही बने रहे ॥ ३ ॥
सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत
इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिःश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव
प्रातिष्ठन्ते । तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते
तस्मिश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्त एवं वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ते
प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥ ४ ॥
वह प्राण अभिमानपूर्वक
मानो (उस शरीर से) ऊपर की ओर बाहर निकलने लगा। उसके बाहर निकलने पर उसी के
साथ-ही-साथ अन्य सब भी शरीर से बाहर निकलने लगे और उसके ठहर जाने पर दूसरे सब
देवता भी ठहर गये- तब जैसे (मधु के छत्ते से) मधुमक्खियों के राजा के निकलने पर
(उसी के साथ-साथ) सारी ही मक्षिका (मधुमक्खियाँ) बाहर निकल जाती हैं और उसके बैठ
जाने पर सब-की-सब बैठ जाती हैं; ऐसी ही दशा ( इन सबकी हुई)- अतः वाणी, नेत्र, श्रोत्र और मन वे
(सभी) प्राण की श्रेष्ठता का अनुभव करके प्रसन्न होकर प्राण की स्तुति करने लगे ॥
४ ॥
एषोऽग्निस्तपत्येष
सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः । एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥ ५ ॥
यह प्राण अग्निरूप
से तपता है; यही सूर्य है;
यही मेघ है; यही इन्द्र है; यही वायु है (तथा) यह प्राण रूप देव ही पृथ्वी (एवं)
रयि है (तथा) जो कुछ सत् और असत् है तथा जो अमृत (सत् और असत् से भी श्रेष्ठ, परमात्मा) कहा जाता है (वह भी
प्राण ही है) ॥ ५ ॥
व्याख्या- वे वाणी
आदि सब देवता स्तुति करते हुए बोले- यह प्राण ही अग्रिरूप धारण करके तपता है और
यही सूर्य है, यही मेघ,
इन्द्र और वायु है। यही देव, पृथ्वी और रयि (भूतसमुदाय) है तथा सत् और
असत् एवं उससे भी श्रेष्ठ जो अमृतस्वरूप परमात्मा है, वह भी यह प्राण ही है ॥ ५ ॥
अरा इव रथनाभौ
प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् । ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च॥६॥
जिस प्रकार रथ के
पहिये की नाभि में लगे हुए अरे नाभि के ही आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार ऋग्वेद की सब ऋचाएँ, यजुर्वेद के समस्त मन्त्र, सामवेद, उनके द्वारा सिद्ध होने वाले यज्ञादि शुभकर्म और
यज्ञादि शुभकर्म करने वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि अधिकारी वर्ग-ये सभी प्राण के आधार पर ही टिके हुए हैं; सभी का आश्रय प्राण ही है ॥ ६ ॥
सम्बन्ध - इस प्रकार प्राण का महत्त्व बताकर अब
उसकी स्तुति की जाती है-
प्रजापतिश्चरसि
गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे। तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः
प्रतितिष्ठसि ॥ ७ ॥
हे प्राण ! तू ही प्रजापति
है, तू ही गर्भ में विचरता है, (और तू ही) माता-पिता के अनुरूप होकर जन्म लेता है,
निश्चय ही ये सब प्राणी तुझे भेंट समर्पण करते हैं ( अर्थात तुम्हारी तृप्तिके
लिये ही अन्न भक्षण आदि कर रहे हैं)। तू ही अपानादि सब प्राणोंके सहित सबके शरीर में
स्थित हो रहा है ॥ ७ ॥
देवानामसि
वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा ।
ऋषीणां चरितं
सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥ ८ ॥
हे प्राण ! तू ही
देवताओंके लिये हवि पहुँचानेवाला उत्तम अनि है । पितरोंके लिये पहली स्वधा है।
अथर्वाङ्गिरस आदि ऋषियोंके द्वारा आचरित (अनुभूत) सत्य भी तू ही है ॥ ८ ॥
इन्द्रस्त्वं
प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता । त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां
पतिः ॥ ९ ॥
हे प्राण! तू तेज से
( सम्पन्न) इन्द्र, रुद्र (और) रक्षा करने वाला है। तू ही अन्तरिक्ष में विचरता है
(और) तू ही समस्त ज्योतिर्गणों का स्वामी सूर्य है ॥ ९ ॥
यदा
त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः । आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति
॥ १० ॥
हे प्राण! जब तू
भलीभाँति वर्षा करता है, उस समय तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा अन्न उत्पन्न होगा-यह
समझकर आनन्दमय हो जाती है ॥ १० ॥
व्रात्यस्त्वं
प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः । वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥
११ ॥
हे प्राण ! तू
संस्काररहित (होते हुए भी) एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है (तात्पर्य यह कि तू
स्वभावसे ही शुद्ध है, अतः
तुझे संस्कारद्वारा शुद्धिकी आवश्यकता नहीं है) तथा हम लोग (सभी इन्द्रियाँ और मन
आदि) तेरे लिये भोजन को देनेवाले हैं और तू भोक्ता है। विश्व का स्वामी तू ही है।
हे आकाश में विचरने वाले प्राण (मातरिश्व)! तू हमारा पिता है; क्योंकि तुझीसे हम सबकी उत्पत्ति हुई है ॥ ११ ॥
या ते
तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि । या च मनसि सन्तता शिवां तां
कुरु मोत्क्रमीः ॥ १२ ॥
(हे प्राण!) जो
तेरा स्वरूप वाचि वाणी में प्रतिष्ठित है तथा जो श्रोत्र में या जो चक्षु में और जो मन में व्याप्त है; उसको
कल्याणमय बना ले, (तू)
उत्क्रमण न कर अर्थात शरीरसे उठकर बाहर न जा ॥ १२ ॥
प्राणस्येदं
वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम् । मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च
विधेहि न इति ॥ १३ ॥
यह प्रत्यक्ष
दीखने वाला जगत् (और) जो कुछ त्रिदिव अर्थात स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित है, वह सब-का-सब प्राण के वश में है। (हे प्राण
!) जैसे माता अपने पुत्रों की रक्षा करती है, उसी प्रकार (तू हमारी) रक्षा कर तथा हमें श्री
अर्थात कान्ति और प्रज्ञा अर्थात बुद्धि प्रदान कर; इति- इस प्रकार यह दूसरा प्रश्न समाप्त हुआ ॥ १३ ॥
सारांश - द्वितीय
प्रश्न (गीता प्रेस की पुस्तक से)
इस प्रकार इस
प्रकरणमें भार्गव ऋषिद्वारा पूछे हुए तीन प्रश्नोंका उत्तर देते हुए महर्षि
पिप्पलादने यह बात समझायी कि समस्त प्राणियोंके शरीरोंको अवकाश देकर बाहर और
भीतरसे धारण करनेवाला आकाश-तत्त्व है। साथ ही इस शरीरके अवयवोंकी पूर्ति करनेवाले
वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- ये चार तत्त्व हैं। दस
इन्द्रियाँ और अन्तःकरण-ये इसको प्रकाश देकर क्रियाशील बनानेवाले हैं। इन सबसे
श्रेष्ठ प्राण है। अतएव प्राण ही वास्तवमें इस शरीरको धारण करनेवाला है, प्राणके बिना शरीरको धारण करनेकी शक्ति
किसीमें नहीं है। अन्य सब इन्द्रिय आदिमें इसीकी शक्ति अनुस्यूत है, इसीकी शक्ति पाकर वे शरीरको धारण करते हैं।
इसी प्रकार प्राणकी श्रेष्ठताका वर्णन छान्दोग्य-उपनिषद्के पाँचवें अध्यायके
आरम्भमें और बृहदारण्यक उपनिषद्के छठे अध्यायके आरम्भमें भी आया है। इस प्रकरणमें
प्राणकी स्तुतिका प्रसङ्ग अधिक है ॥ १३ ॥
॥ द्वितीय प्रश्न
समाप्त २ ॥

