Friday, 20 October 2023

प्रश्नोपनिषद- चतुर्थ प्रश्न

 चतुर्थ प्रश्न

 

अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति कतर एष देवः स्वप्नान्पश्यति कस्यैतत्सुखं भवति कस्मिन्नु सर्वे सम्प्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥ १॥

 

तदनन्तर इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद मुनि) से गर्ग गोत्र में उत्पन्न सौर्यायणी ऋषि ने पूछा-भगवन् ! इस मनुष्य-शरीर में कौन-कौन सोते हैं; इसमें कौन-कौन जागते रहते हैं; यह कौन देवता स्वप्नों को देखता है, यह सुख किसको होता है (और) ये सब-के-सब किसमें निश्चितरूप से सम्पूर्णतया स्थित रहते हैं, यह (मेरा प्रश्न है) ॥ १ ॥

 

व्याख्या—यहाँ गार्ग्य मुनिने महात्मा पिप्पलाद से पाँच बातें पूछी हैं—

(१) गाढ़ी निद्रा के समय इस मनुष्य-शरीर में रहने वाले पूर्वोक्त देवताओं में से कौन-कौन सोते हैं?

(२) कौन-कौन जागते रहते हैं?

(३) स्वप्न अवस्था में इनमें से कौन देवता स्वप्न की घटनाओं को देखता रहता है ?

(४) निद्रा अवस्था में सुख का अनुभव किसको होता है? और

(५) ये सब-के-सब देवता सर्वभाव से किसमें स्थित हैं अर्थात् किसके आश्रित हैं?

इस प्रकार इस प्रश्न में गार्ग्य मुनि ने जीवात्मा और परमात्मा का पूरा-पूरा तत्त्व पूछ लिया॥ १ ॥

 

तस्मै स होवाच यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति । ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति। तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ २ ॥

 

उससे उन सुप्रसिद्ध महर्षि ने कहा, हे गार्ग्य ! जिस प्रकार अस्त होते हुए सूर्य सब-की-सब किरणें इस तेजोमण्डल में एक हो जाती हैं (फिर) उदय होनेपर वे (सब) पुनः-पुनः सब ओर फैलती रहती हैं, ठीक ऐसे ही (निद्रा के समय) वे सब इन्द्रियाँ (भी) परम देव मन में एक हो जाती हैं,  इस कारण उस समय यह जीवात्मा न (तो) सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न आनंदित होता है, न मल-मूत्रका त्याग करता है (और) न चलता है; उस समय 'वह सो रहा है' यों (लोग) कहते हैं ॥ २ ॥

 

सम्बन्ध - अब गार्ग्यके प्रश्नका संक्षेपमें उत्तर देकर दो मन्त्रोंद्वारा यह भी बतलाते हैं कि सब इन्द्रियोंके लय होनेपर मनकी कैसी स्थिति रहती है-

 

प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात् प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥

 

इस शरीर रूपी नगर में पाँच प्राणरूप अग्रियाँ ही जागती रहती हैं। यह प्रसिद्ध अपान ही गार्हपत्य अग्नि है, व्यान अन्वाहार्यपचन नामक अग्नि (दक्षिणाग्नि) है, गार्हपत्य अग्नि (householder’s fire) से जो उठाकर ले जायी जाती है (वह) आहवनीय अग्रि प्रणयन (उठाकर ले जाए जाने) के कारण ही प्राणरूप है ॥ ३ ॥

 

यहाँ निद्रा को यज्ञ का रूप देने के लिये पाँचों प्राणों को अग्रिरूप बतलाया है। शरीर में जो प्राण की अपान वृत्ति है, यही मानो उस यज्ञ की 'गार्हपत्य' अग्रि है; 'व्यान' दक्षिणाग्नि है, गार्हपत्य अग्निरूप अपान से प्राण उठते हैं, इस कारण मुख्य प्राण ही इस यज्ञ की कल्पना में आहवनीय अग्नि है; क्योंकि यज्ञ में आहवनीय अग्नि  गार्हपत्य से उठाकर लायी जाती है।

तीसरे प्रश्न के प्रसङ्ग में भी प्राण को 'अन्नरूप आहुति जिसमें हवन की जाती है' इस व्युत्पत्ति द्वारा आहवनीय अग्नि ही बताया है।

 

यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः । मनोह वाव यजमानः। इष्टफलमेवोदानः । स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥ ४ ॥

 

जो ऊर्ध्वश्वास और अधोश्वास हैं, ये दोनों मानो (अग्निहोत्र की) दो आहुतियाँ हैं। इनको जो समभाव से (सब ओर) पहुँचाता है इसलिये जो 'समान' कहलाता है, वही हवन करनेवाला ऋत्विक् है। यह प्रसिद्ध मन ही यजमान है, अभीष्ट फल ही उदान है। वह (उदान) ही इस यजमानम् मनरूप यजमान को प्रतिदिन (निद्रा के समय) ब्रह्मलोक में भेजता है अर्थात् हृदयगुहा में ले जाता है ॥ ४ ॥

 

उदानवायु मन को प्रतिदिन निद्राके समय उसके कर्मफलके भोगस्वरूप ब्रह्मलोक में परमात्मा के निवासस्थानरूप हृदयगुहा में ले जाता है। वहाँ इस मन के द्वारा जीवात्मा निद्राजनित विश्रामरूप सुख का अनुभव करता है।

 

सम्बन्ध - अब तीसरे प्रश्नका उत्तर देते हैं-

 

अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति । यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति । देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति ॥ ५ ॥

 

इस स्वप्न अवस्था में यह देव (जीवात्मा) अपनी विभूति का अनुभव करता है, जो बार-बार देखा हुआ है उसी को बार-बार देखता है, बार-बार सुनी हुई बातों को ही पुनः-पुनः सुनता है, नाना देश और दिशाओं में बार-बार अनुभव किये हुए विषयों को पुनः-पुनः अनुभव करता है, (इतना ही नहीं) देखे हुए और न देखे हुए को भी,सुने हुए और न सुने हुए को भी, अनुभव किये हुए और अनुभव न किये हुए को भी, विद्यमान और अविद्यमान को भी, (इस प्रकार) सारी घटनाओं को देखता है, (तथा) स्वयं सब कुछ बनकर देखता है ॥ ५ ॥

 

गार्ग्य मुनि ने जो यह तीसरा प्रश्न किया था कि कौन देवता स्वप्नों को देखता है? उसका उत्तर महर्षि पिप्पलाद यहाँ देते हैं। इस स्वप्न-अवस्था में जीवात्मा ही मन और सूक्ष्म इन्द्रियों द्वारा अपनी विभूति का अनुभव करता है। स्वप्न में यह स्वयं ही सब कुछ बनकर देखता है, उस समय जीवात्मा के अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं रहती ।

 

स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्शरीर एतत्सुखं भवति ॥ ६ ॥

 

वह (मन) जब तेज (उदान वायु) से अभिभूत हो जाता है अर्थात उस समय इन्द्रियों के सहित मन की किरणों का हृदयमें  उपसंहार हो जाता है, इस स्थिति में यह जीवात्मारूप देवता स्वप्नों को नहीं देखता। उस समय इस मनुष्य-शरीर में (जीवात्मा को) इस सुषुप्ति के सुख का अनुभव होता है ॥ ६ ॥

 

गार्ग्य मुनि ने चौथी बात यह पूछी थी कि 'निद्रा में सुखका अनुभव किसको होता है? उसका उत्तर महर्षि इस प्रकार देते हैं-जब निद्रा के समय यह मन उदानवायु के अधीन हो जाता है, अर्थात् जब उदान वायु इस मनको जीवात्मा के निवासस्थान हृदय में पहुँचाकर मोहित कर देता है, उस निद्रावस्था में यह जीवात्मा मन के द्वारा स्वप्न की घटनाओं को नहीं देखता । उस समय निद्राजनित सुखका अनुभव जीवात्मा को ही होता है। इस शरीर में सुख- दुःखों को भोगने वाला, प्रत्येक अवस्था में प्रकृतिस्थ पुरुष अर्थात् जीवात्मा ही है ।

 

स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं सम्प्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत् सर्वं पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥ ७ ॥

 

(पाँचवीं बात जो तुमने पूछी थी) वह (इस प्रकार समझनी चाहिये) हे सोम्य जिस प्रकार बहुत-से पक्षी (सायंकाल में) अपने निवासरूप वृक्ष पर (आकर) आराम से ठहरते हैं (बसेरा करते हैं)-ठीक वैसे ही वे (आगे बताये जाने वाले पृथिवी आदि तत्त्वों से लेकर प्राण तक) सब-के-सब परमात्मा में सुखपूर्वक आश्रय पाते हैं॥ ७ ॥

 

गार्ग्य मुनि ने जो यह पाँचवीं बात पूछी थी कि 'ये मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और प्राण - सब-के-सब किसमें स्थित हैं-किसके आश्रित हैं।' उसका उत्तर महर्षि इस प्रकार देते हैं- आकाश में उड़ने वाले पक्षीगण जिस प्रकार सायंकाल में लौटकर अपने निवास (वृक्ष) पर आराम से बसेरा लेते हैं, ठीक उसी प्रकार आगे बतलाये जाने वाले पृथ्वी से लेकर प्राण तक जितने तत्त्व हैं, वे सब-के-सब परब्रह्म पुरुषोत्तम में, जो कि सबके आत्मा हैं, आश्रय लेते हैं; क्योंकि वे ही इन सबके परम आश्रय हैं।

 

पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक्व स्पर्श- यितव्यं च वाक्च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च ॥ ८ ॥

 

पृथिवी और उसकी तन्मात्रा (सूक्ष्म गन्ध) भी, जल और रसतन्मात्रा भी, तेज और रूप- तन्मात्रा भी, वायु और स्पर्श - तन्मात्रा भी, आकाश और शब्द- तन्मात्रा भी, नेत्र-इन्द्रिय और देखने में आनेवाली वस्तु भी, श्रोत्र- इन्द्रिय और सुनने में आनेवाली वस्तु भी, घ्राणेन्द्रिय और सूँघने में आनेवाली वस्तु भी, रसना-इन्द्रिय और रसना के विषय भी, त्वक् - इन्द्रिय और स्पर्श में आने वाली वस्तु भी, वाक्-इन्द्रिय और बोलने में आनेवाला शब्द भी, दोनों हाथ और पकड़ने में आनेवाली वस्तु भी, उपस्थ-इन्द्रिय और उसका विषय भी, गुदा-इन्द्रिय और उसके द्वारा परित्यागयोग्य वस्तु भी, दोनों चरण और गन्तव्य स्थान भी, मन और मनन में आने वाली वस्तु भी, बुद्धि और जानने में आनेवाली वस्तु भी, अहंकार और उसका विषय भी, चित्त और चिन्तन में आनेवाली वस्तु भी, प्रभाव और उसका विषय भी, प्राण और प्राण के द्वारा धारण किये जाने वाले पदार्थ भी (ये सब-के-सब परमात्माके आश्रित हैं) ॥ ८ ॥

 

एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परेऽक्षर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥ ९ ॥

 

यह जो देखने वाला, स्पर्श करने वाला, सुननेवाला, सूँघनेवाला, स्वाद लेने वाला, मनन करने वाला, जानने वाला तथा कर्म करने वाला, विज्ञानस्वरूप पुरुष (जीवात्मा) है, वह भी अविनाशी परमात्मा में भलीभाँति स्थित है ॥ ९ ॥

 

परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य । स सर्वज्ञः सर्वो भवति । तदेष श्लोकः ॥ १० ॥

 

निश्चय ही जो कोई भी उस छायारहित, शरीररहित, लाल, पीले आदि रंगों से रहित, विशुद्ध अविनाशी पुरुष को जानता है, वह परम अविनाशी परमात्मा को ही प्राप्त हो जाता है। हे प्रिय ! जो कोई ऐसा है, वह सर्वज्ञ (और) सर्वरूप हो जाता है— उस विषयमें यह (अगला) श्लोक है ॥ १०॥

 

विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः

प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र ।

तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य

स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ ११ ॥

 

जिसमें समस्त प्राण (और पाँचों भूत) तथा सर्वैः देवैः सह सम्पूर्ण इन्द्रिय और अन्तः करण के सहित विज्ञानस्वरूप आत्मा आश्रय लेते हैं। हे प्रिय ! उस अविनाशी परमात्मा को जो कोई जान लेता है वह सर्वज्ञ है, (वह) सर्वस्वरूप परमेश्वर में प्रविष्ट हो जाता है —इस प्रकार (इस प्रश्नका उत्तर समाप्त हुआ) ॥ ११ ॥

 

॥ चतुर्थ प्रश्न समाप्त ४ ॥

 


 

 

चौथे प्रश्न का सारांश

 

इस अध्याय में, गार्ग्य मुनि ने महर्षि पिप्पलाद से मनुष्य शरीर में रहने वाले देवताओं के बारे में पाँच प्रश्न पूछे।

 

1.    गाढ़ी निद्रा के समय कौन-कौन सोते हैं?

2.     इसमें कौन-कौन जागते रहते हैं?

3.    यह कौन देवता स्वप्नों को देखता है?

4.    यह सुख किसको होता है?

5.    ये सब-के-सब किसमें निश्चितरूप से सम्पूर्णतया स्थित रहते हैं?

 

महर्षि पिप्पलाद ने इन सभी प्रश्नों का उत्तर दिया।

 

1.    गाढ़ी निद्रा के समय सभी इन्द्रियाँ मन में एक हो जाती हैं, इसलिए उस समय जीवात्मा न तो सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न आनंदित होता है, न मल-मूत्रका त्याग करता है, न चलता है।

2.    स्वप्न अवस्था में जीवात्मा ही मन और सूक्ष्म इन्द्रियों द्वारा अपनी विभूति का अनुभव करता है। जीवात्मा अपने पिछले अनुभवों या कल्पनाओं के आधार पर सपने देखता है।

3.    निद्राजनित सुख जीवात्मा को ही होता है। जागने की अवस्था में, सभी इंद्रियां और मन जीवात्मा को बाहरी दुनिया के साथ जोड़ती हैं। जीवात्मा सुख और दुख का अनुभव करता है।

4.    ये सभी देवता परमात्मा में स्थित हैं।

5.    महर्षि पिप्पलाद ने यह भी बताया कि परमात्मा ही सभी प्राणियों का आत्मा है। जो कोई भी परमात्मा को जान लेता है, वह सर्वज्ञ और सर्वरूप हो जाता है।

 

इस प्रकार, इस अध्याय में जीवात्मा और परमात्मा के संबंध के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है।

 

 

प्रश्नोपनिषद- तृतीय प्रश्न

 तृतीय प्रश्न

 

अथ हैनं कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ भगवन्कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्शरीर आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते केनोत्क्रमते कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति ॥ १ ॥

 

उसके बाद इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद) से कोसलदेशीय आश्वलायन ने भी पूछा-भगवन्! यह प्राण किससे उत्पन्न होता है; इस शरीर में कैसे आता है तथा अपने को विभाजित करके किस प्रकार स्थित होता है; किस ढंग से उत्क्रमण करता(शरीर से बाहर निकलता है); किस प्रकार बाह्य जगत को भलीभाँति धारण करता है और किस प्रकार मन और इन्द्रिय आदि शरीर के भीतर रहने वाले जगत को- यही (मेरा प्रश्न है) ॥ १ ॥

 

व्याख्या - इस मन्त्र में आश्वलायन मुनि ने महर्षि पिप्पलाद से कुल छः बातें पूछी हैं-

(१) जिस प्राण की महिमाका आपने वर्णन किया, वह प्राण किससे उत्पन्न होता है?

(२) वह इस मनुष्य-शरीर में कैसे प्रवेश करता है?

(३) अपने को विभाजित करके किस प्रकार शरीर में स्थित रहता है?

(४) एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में जाते समय पहले शरीर से किस प्रकार निकलता है ?

(५) इस बाह्य (पाञ्चभौतिक) जगत को किस प्रकार धारण करता है ?

(६) मन और इन्द्रिय आदि आध्यात्मिक (आन्तरिक) जगत्‌ को किस प्रकार धारण करता है?

यहाँ प्राण के विषय में वे ही बातें पूछी गयी हैं, जिनका वर्णन पहले उत्तर में नहीं आया है और जो पहले प्रश्न के उत्तर को सुनकर ही स्फुरित हुई हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रश्नोत्तर के समय सुकेशादि छहों ऋषि वहाँ साथ-साथ बैठे सुन रहे थे ॥ १ ॥

 

तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥ २ ॥

 

उससे उन प्रसिद्ध महर्षि ने कहा- तू बड़े कठिन प्रश्न पूछ रहा है (किंतु) तू वेदों में निष्णात है अत: मैं तेरे प्रश्नों का उत्तर देता हूँ ॥ २ ॥

 

आत्मन एष प्राणो जायते यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे ॥३॥

 

यह प्राण आत्मन (परमात्मा) से उत्पन्न होता है। जिस प्रकार यह छाया पुरुष के होने पर ही होती है उसी प्रकार यह (प्राण) इस (परमात्मा/आत्मन) के ही आश्रित है (और) इस शरीर में मनोकृतेन (मन के किये हुए संकल्प से) आता है॥ ३ ॥

 

यहाँ महर्षि पिप्पलाद ने क्रम से आश्वलायन ऋषिके दो प्रश्नोंका उत्तर दिया है। पहले प्रश्नका उत्तर तो यह है कि जिसका प्रकरण चल रहा है, वह सर्वश्रेष्ठ प्राण परमात्मा से उत्पन्न हुआ है।

इसकी स्थिति उस सर्वात्मा महेश्वर के अधीन एवं उसी के आश्रित है-ठीक उसी प्रकार जैसे किसी मनुष्यकी छाया उसके अधीन रहती है।

दूसरे प्रश्न का उत्तर यह है कि मन द्वारा किये हुए संकल्प से वह शरीर में प्रवेश करता है। ॥ ३ ॥

 

सम्बन्ध - अब आश्वलायन के तीसरे प्रश्नका उत्तर विस्तारपूर्वक आरम्भ किया जाता है-

 

यथा सम्राडेवाधिकृतान्विनियुङ्क्ते एतान्ग्रामानेता-

न्ग्रामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान्पृथक्पृथगेव संनिधत्ते ॥ ४ ॥

 

जिस प्रकार सम्राट् एव चक्रवर्ती महाराज स्वयं ही इन गाँवों में तुम रहो, इन गाँवों में तुम रहो - इस प्रकार अधिकारियों को अलग-अलग नियुक्त करता है; उसी प्रकार यह मुख्य प्राण दूसरे प्राणों को पृथक्-पृथक् ही स्थापित करता है ॥ ४ ॥

  

सम्बन्ध - अब मुख्य प्राण, अपान और समान-इन तीनों का वासस्थान और कार्य बतलाया जाता है-

 

पायूपस्थेऽपानं चक्षुः श्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते मध्ये तु समानः । एष ह्येतद्भुतमन्नं समं नयति तस्मादेताः सप्तार्चिषो भवन्ति ॥ ५ ॥

 

(वह) प्राण गुदा और उपस्थ में अपान को नियुक्त करता है (मल-मूत्रको शरीरके बाहर निकाल देना है; रज, वीर्य और गर्भको बाहर करना भी इसीका काम है।)। स्वयं मुख और नासिका द्वारा (विचरता हुआ) नेत्र और श्रोत्र में स्थित रहता है और शरीर के मध्यभाग में समान रहता है। यह (समान वायु) ही इस प्राणाग्नि में हवन किये हुए अन्न (उदर में डाले हुए अन्न) को समस्त शरीर में यथायोग्य समभाव से पहुँचाता है। उससे ये सात ज्वालाएँ (विषयों को प्रकाशित करने वाले ऊपर के द्वार- दो नेत्र, दो कान, दो नासिकाएँ और एक मुख अर्थात रसना) उत्पन्न होती हैं ॥ ५ ॥

 

संबंध – अब व्यान की गति का वर्णन किया जाता है।

 

हृदि ह्येष आत्मा अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्त्राणि भवन्त्यासु  व्यानश्चरति ॥ ६ ॥

 

यह प्रसिद्ध आत्मा (जीवात्मा) हृदय देश में रहता है; इस (हृदय) में मूलरूप से एक सौ नाडियों का समुदाय है; उनमें से एक-एक नाडी में एक-एक सौ (शाखाएँ) हैं (प्रत्येक शाखा-नाडी की) बहत्तर- बहत्तर हजार प्रतिशाखानाडियाँ होती हैं; इनमें व्यान वायु विचरण करता है ॥ ६ ॥

 

व्याख्या - इस शरीरमें जो हृदयप्रदेश है, जो जीवात्माका निवासस्थान है, उसमें एक सौ मूलभूत नाडियाँ हैं; उनमेंसे प्रत्येक नाडी की एक-एक सौ शाखा - नाडियाँ हैं और प्रत्येक शाखा नाडीकी बहत्तर बहत्तर हजार प्रतिशाखा- नाडियाँ हैं। इस प्रकार इस शरीरमें कुल बहत्तर करोड़ नाडियाँ हैं; इन सब में व्यानवायु विचरण करता है ॥ ६ ॥

 

सम्बन्ध - अब उदानका स्थान और कार्य बतलाते हैं, साथ ही आश्वलायनके चौथे प्रश्नका उत्तर भी देते हैं-

 

अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥ ७ ॥

 

तथा जो एक नाडी और है, उसके द्वारा उदान वायु ऊपर की ओर विचरता है। वह पुण्य कर्मों के द्वारा [ मनुष्यम् ]मनुष्य को पुण्यलोकों में ले जाता है; पापकर्मों के कारण (उसे) पापयोनियों में ले जाता है (तथा) पाप और पुण्य दोनों प्रकार के कर्मों द्वारा (जीव को) मनुष्यलोकम् अर्थात मनुष्य-शरीर में ले जाता है ॥ ७ ॥

 

व्याख्या – इन ऊपर बतलायी हुई बहत्तर करोड़ नाड़ियों से भिन्न एक नाडी और है जिसको 'सुषुम्णा' कहते हैं, जो हृदयसे निकलकर ऊपर मस्तक में गयी है। उसके द्वारा उदानवायु शरीर में ऊपर की ओर विचरण करता है। (इस प्रकार आश्वलायन के तीसरे प्रश्न का समाधान करके अब महर्षि उसके चौथे प्रश्न का उत्तर संक्षेप में देते हैं— ) जो मनुष्य पुण्यशील होता है, जिसके शुभकर्मों के भोग उदय हो जाते हैं, उसे यह उदानवायु ही अन्य सब प्राण और इन्द्रियों के सहित वर्तमान शरीर से निकालकर पुण्यलोकों में अर्थात् स्वर्गादि उच्च लोकों में ले जाता है। पापकर्मों से युक्त मनुष्य को शूकर- कूकर आदि पाप -योनियों में और रौरवादि नरकों में ले जाता है तथा जो पाप और पुण्य- दोनों प्रकार के कर्मों का मिश्रित फल भोगने के लिये अभिमुख हुए रहते हैं, उनको मनुष्य-शरीर में ले जाता है * ॥ ७ ॥

* एक शरीर से निकलकर जब मुख्य प्राण उदान को साथ लेकर उसके द्वारा दूसरे शरीर में जाता है, तब अपने अङ्गभूत समान आदि प्राणों को तथा इन्द्रिय और मन को तो साथ ले ही जाता है, इन सबका स्वामी जीवात्मा भी उसी के साथ जाता है-यह बात यहाँ कहनी थी; इसीलिये पूर्वमन्त्रमें  जीवात्मा का स्थान हृदय बतलाया गया है।

 

सम्बन्ध - अब दो मन्त्रों में आश्वलायन के पाँचवें और छठे प्रश्न का उत्तर देते हुए जीवात्माके प्राण और इन्द्रियों सहित एक शरीर से दूसरे शरीर में जानेकी बात भी स्पष्ट करते हैं-

 

आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः । पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः ॥ ८ ॥

 

यह निश्चय है कि सूर्य ही बाह्य प्राण है; यही इस नेत्र सम्बन्धी प्राण पर अनुग्रह करता हुआ उदित होता है। पृथ्वी में जो (अपानवायु की शक्तिरूप) देवता है वही यह मनुष्य के अपान वायु को स्थिर किये रहता है। पृथ्वी और स्वर्ग के बीच जो आकाश (अन्तरिक्षलोक) है; वह समान है, वायु ही व्यान है ॥ ८ ॥

 

व्याख्या - यह निश्चयपूर्वक समझना चाहिये कि सूर्य ही सबका बाह्य प्राण है। यह मुख्य प्राण सूर्यरूप से उदय होकर इस शरीर के बाह्य अङ्ग- प्रत्यङ्गों को पुष्ट करता है और नेत्र-इन्द्रिय रूप आध्यात्मिक शरीर पर अनुग्रह करता है-उसे देखनेकी शक्ति अर्थात् प्रकाश देता है। पृथ्वी में जो देवता अर्थात् अपानवायु की शक्ति है, वह मनुष्य के भीतर रहने वाले अपानवायु को आश्रय देती है-टिकाये रखती है। यह इस अपानवायु की शक्ति गुदा और उपस्थ इन्द्रियों की सहायक है तथा इनके बाहरी स्थूल आकार को धारण करती है। पृथ्वी और स्वर्गलोक के बीच का जो आकाश है, वही समानवायु का बाह्य स्वरूप है। वह इस शरीर के बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्गों को अवकाश देकर इसकी रक्षा करता है और शरीर के भीतर रहनेवाले समानवायु को विचरने के लिये शरीर में अवकाश देता है; इसी की सहायता से श्रोत्र- इन्द्रिय शब्द सुन सकती है। आकाश में विचरने वाला प्रत्यक्ष वायु ही व्यान का बाह्य स्वरूप है, यह इस शरीर के बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्ग को चेष्टाशील करता है और शान्ति प्रदान करता है; भीतरी व्यानवायु को नाडियों में संचारित करने तथा त्वचा इन्द्रिय को स्पर्श का ज्ञान कराने में भी यह सहायक है ॥ ८ ॥

 

तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥ ९ ॥

 

प्रसिद्ध तेज (गर्मी) ही उदान है इसीलिये जिसके शरीर का तेज शान्त हो जाता है, वह (जीवात्मा) मन में विलीन हुई इन्द्रियों के साथ पुनर्जन्म को (प्राप्त होता है) ॥ ९ ॥

 

व्याख्या- सूर्य और अग्रि का जो बाहरी तेज अर्थात् उष्णत्व है, वही उदान का बाह्य स्वरूप है। वह शरीर के बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्गों को ठंडा नहीं होने देता और शरीर के भीतर की ऊष्मा को भी स्थिर रखता है। जिसके शरीर से उदानवायु निकल जाता है, उसका शरीर गरम नहीं रहता अतः शरीर की गर्मी शान्त हो जाते ही उसमें रहने वाला जीवात्मा मन में विलीन हुई इन्द्रियों को साथ लेकर उदानवायु के साथ-साथ दूसरे शरीर में चला जाता है (गीता १५ । ८) ॥ ९ ॥

 

शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्यत्क्रामतीश्वरः।

गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥8॥

 

जिस प्रकार से वायु सुगंध को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है उसी प्रकार से देहधारी आत्मा जब पुराने शरीर का त्याग करती है और नये शरीर में प्रवेश करती है उस समय वह अपने साथ मन और इन्द्रियों को भी ले जाती है।

 

सम्बन्ध - अब आश्वलायन के चौथे प्रश्न में आयी हुई एक शरीर से निकलकर दूसरे शरीर में या लोकों में प्रवेश करने की बात का पुनः स्पष्टीकरण किया जाता है-

 

यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति ॥ १० ॥

 

यह (जीवात्मा) जिस संकल्प वाला (चित्त वाला) होता है; उस संकल्प के साथ मुख्य प्राण में स्थित हो जाता है। मुख्य प्राण तेज (उदान) से युक्त हो अपने सहित (मन, इन्द्रियों से युक्त जीवात्मा को) उसके संकल्पानुसार भिन्न-भिन्न लोक अथवा योनि में ले जाता है ॥ १० ॥

 

व्याख्या -मरते समय इस आत्मा का जैसा संकल्प होता है, इसका मन अन्तिम क्षण में जिस भाव का चिन्तन करता है (गीता ८। ६), उस संकल्प के सहित मन, इन्द्रियों को साथ लिये हुए यह मुख्य प्राण में स्थित हो जाता है। वह मुख्य प्राण उदानवायु से मिलकर अपने सहित मन और इन्द्रियों से युक्त जीवात्मा को उस अन्तिम संकल्प के अनुसार यथायोग्य भिन्न-भिन्न लोक अथवा योनि में ले जाता है। अतः मनुष्य को उचित है कि अपने मन में निरन्तर एक भगवान का ही चिन्तन रखे, दूसरा संकल्प न आने दे, क्योंकि जीवन अल्प और अनित्य है, न जाने कब अचानक इस शरीरका अन्त हो जाय। यदि उस समय भगवान्‌ का चिन्तन न होकर कोई दूसरा संकल्प आ गया तो सदा की भाँति पुनः चौरासी लाख योनियों में भटकना पड़ेगा ॥ १० ॥

 

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भ‍ावभावित: ॥८_६ ॥

 

हे कुन्तीपुत्र! शरीर त्यागते समय मनुष्य जिस-जिस भाव का स्मरण करता है, वह उस उस भाव को निश्चित रूप से प्राप्त होता है।

 

 सम्बन्ध - अब प्राणविषयक ज्ञान का सांसारिक और पारलौकिक फल बतलाते हैं-

 

य एवं विद्वान्प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ११ ॥

 

जो कोई विद्वान् इस प्रकार प्राण (के रहस्य) को जानता है उसकी प्रजा (संतान परम्परा) कदापि नष्ट नहीं होती (वह) अमर हो जाता है- इस विषय का यह (अगला) श्लोक (है) ॥ ११ ॥

 

व्याख्या-जो कोई विद्वान् इस प्रकार इस प्राण के रहस्य को समझ लेता है, प्राण के महत्त्व को समझकर हर प्रकार से उसे सुरक्षित रखता है, उसकी अवहेलना नहीं करता, उसकी संतानपरम्परा कभी नष्ट नहीं होती, क्योंकि उसका वीर्य अमोघ और अद्भुत शक्तिसम्पन्न हो जाता है। और वह यदि उसके आध्यात्मिक रहस्य को समझकर अपने जीवन को सार्थक बना लेता है, एक क्षण भी भगवान् के चिन्तन से शून्य नहीं रहने देता, तो सदा के लिये अमर हो जाता है अर्थात् जन्म-मरणरूप संसार से मुक्त हो जाता है। इस विषय पर निम्नलिखित ऋचा है - ॥ ११ ॥

 

उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा ।

अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते विज्ञायामृतमश्नुत इति ॥ १२ ॥

 

प्राण की उत्पत्ति आगम स्थान और व्यापकता को भी तथा बाह्य एवं आध्यात्मिक पाँच भेदों को भी भलीभाँति जानकर (मनुष्य) अमृतका अनुभव करता है, जानकर अमृत का अनुभव करता है। यह पुनरुक्ति प्रश्न की समाप्ति सूचित करने के लिये है ॥ १२ ॥

 

व्याख्या - उपर्युक्त विवेचन के अनुसार जो मनुष्य प्राण की उत्पत्ति को अर्थात् यह जिससे और जिस प्रकार उत्पन्न होता है-इस रहस्य को जानता है, शरीर में उसके प्रवेश करने की प्रक्रिया का तथा इसकी व्यापकता का ज्ञान रखता है तथा जो प्राण की स्थिति को अर्थात् बाहर और भीतर-कहाँ-कहाँ वह रहता है, इस रहस्य को तथा इसके बाहरी और भीतरी अर्थात् आधिभौतिक और आध्यात्मिक पाँचों भेदों के रहस्य को भलीभाँति समझ लेता है, वह अमृतस्वरूप परमानन्दमय परब्रह्म परमेश्वर को प्राप्त कर लेता है तथा उस आनन्दमय के संयोग-सुख का निरन्तर अनुभव करता है ॥ १२ ॥

 

॥ तृतीय प्रश्न समाप्त ३ ॥


 

तीसरे प्रश्न का सारांश

यह अध्याय  महर्षि आश्वलायन और महर्षि पिप्पलाद के बीच एक वाद-विवाद है, जहाँ आश्वलायन प्राण के प्रकृति को समझने का प्रयास करते हैं। इस वाद में कुछ मुख्य बिंदुओं को खोलते हैं:

1.    प्राण का उत्पत्ति स्थान: यह प्राण परमात्मा या आत्मा (परमात्मा) से उत्पन्न होता है और इस परमात्मा के आश्रित होता है, जैसे कि एक व्यक्ति की छाया उसके परमात्मा के आश्रित होती है।

2.    शरीर में प्राण का प्रवेश: प्राण मानसिक संकल्प के माध्यम से शारीरिक शरीर में प्रवेश करता है और विभिन्न शारीरिक क्रियाओं के लिए जिम्मेदार होता है।

3.    प्राण की कार्य: प्राण शरीर में विभिन्न कार्यों को नियंत्रित करता है, जैसे श्वास की चालन, पाचन (अपान), और ऊर्जा का शरीर में प्रसारण। यह मन और इंद्रियों का भी निग्रह करता है।

4.    नाडियों की भूमिका: अध्याय  में शरीर में अनगिनत नाडियों की मौजूदगी का वर्णन है, जिनमें से एक मुख्य नाडी को 'सुषुम्णा' कहा जाता है। प्राण इन नाडियों के माध्यम से घूमता है, और सुषुम्णा हृदय से मस्तक तक जुड़ती है।

5.    कर्म और पुनर्जन्म: प्राण कर्म और पुनर्जन्म के चक्र में भी एक भूमिका निभाता है। यह कर्मों के आधार पर आत्मा को विभिन्न लोकों में ले जाता है, जिससे विभिन्न जीवन रूपों का अनुभव होता है।

6.    विभिन्न प्राणों की भूमिका: शरीर में विभिन्न प्राणों, जैसे कि उदान और व्यान, की विशेष भूमिकाएँ होती हैं, और इन्हें शरीर की विभिन्न भौतिकी प्रक्रियाओं में योगदान करने का काम होता है।

7.    प्राकृतिक तत्वों से संबंध: अध्याय  में प्राण और प्राकृतिक तत्वों, जैसे कि सूर्य, पृथ्वी, और आकाश के बीच संबंध का वर्णन भी है।

8.    मोक्ष: अध्याय यह बताता है कि जो व्यक्ति प्राण और इसके कार्यों के रहस्य को समझते हैं, वे मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं और अमर बन सकते हैं।

संक्षेप में, यह अध्याय  प्राण, उसकी उत्पत्ति, कार्यों, और जीवन और मृत्यु के चक्र में इसकी भूमिका को अन्वेषण करता है। इस अध्याय ने आध्यात्मिक विकास और अंतिम मोक्ष के लिए प्राण को समझने के महत्व को महत्वपूर्ण बताया है।

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Thursday, 19 October 2023

प्रश्नोपनिषद- द्वितीय प्रश्न

 द्वितीय प्रश्न

 

अथ हैनं भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ। भगवन्कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते कतर एतत्प्रकाशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥

 

इसके पश्चात् इन प्रसिद्ध (महात्मा पिप्पलाद) ऋषि से विदर्भदेशीय भार्गव ने पूछा; भगवन्! कुल कितने देवता प्रजा को धारण करते हैं; उनमें से कौन-कौन इसे प्रकाशित करते हैं फिर (यह भी बतलाइये कि ) इन सबमें कौन है; यही (मेरा प्रश्न है ) ॥ १ ॥

 

व्याख्या - इस मन्त्र में भार्गव ऋषि ने महर्षि पिप्पलादसे तीन बातें पूछी हैं-

(१) प्रजाको यानी प्राणियोंके शरीरको धारण करनेवाले कुल कितने देवता हैं?

(२) उनमें से कौन-कौन इसको प्रकाशित करनेवाले हैं?

(३) इन सबमें अत्यन्त श्रेष्ठ कौन है ? ॥ १ ॥

 

तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च । ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥

 

उन प्रसिद्ध महर्षि (पिप्पलाद) ने उन भार्गव से कहा; निश्चय ही वह प्रसिद्ध आकाश यह देवता है (तथा) वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, वाणी (कर्मेन्द्री), नेत्र और श्रोत्र (ज्ञानेन्द्री) तथा मन (अन्तःकरण) भी [देवता हैं]। वे सब अपनी-अपनी शक्ति प्रकट करते हुएअभिमानपूर्वक कहने लगे- हमने इस शरीर को आश्रय देकर धारण कर रखा है ॥ २ ॥

 

व्याख्या - यहाँ महर्षि पिप्पलाद दो प्रश्नों का उत्तर एक ही साथ दे दिया गया है। वे कहते हैं कि सबका आधार तो वैसे आकाशरूप देवता ही हैं; परन्तु उससे उत्पन्न होने वाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- ये चारों महाभूत भी शरीर को धारण किये रहते हैं। यह स्थूल शरीर इन्हीं से बना है। इसलिये ये धारक देवता हैं। वाणी आदि पाँच कर्मेन्द्रियाँ, नेत्र और कान आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन आदि चार अन्तःकरण-ये चौदह देवता इस शरीर के प्रकाशक हैं। ये देवता देह को धारण और प्रकाशित करते हैं, इसलिये ये धारक और प्रकाशक देवता कहलाते हैं। ये इस देह को प्रकाशित करके आपस में झगड़ पड़े और अभिमानपूर्वक परस्पर कहने लगे कि 'हमने शरीरको आश्रय देकर धारण कर रखा है' ॥ २ ॥

 

तान्वरिष्ठः प्राण उवाच। मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्चधाऽऽत्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामीति तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥ ३ ॥

 

उनसे वरिष्ठ प्राण बोला- (तुम लोग) मोह में न पड़ो; मैं ही अपने इस स्वरूप को पाँच भागों में विभक्त करके इस शरीर को आश्रय देकर धारण करता हूँ। यह (सुनकर भी) वे अविश्वासी ही बने रहे ॥ ३ ॥

 

सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिःश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रातिष्ठन्ते । तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्त एवं वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥ ४ ॥

 

वह प्राण अभिमानपूर्वक मानो (उस शरीर से) ऊपर की ओर बाहर निकलने लगा। उसके बाहर निकलने पर उसी के साथ-ही-साथ अन्य सब भी शरीर से बाहर निकलने लगे और उसके ठहर जाने पर दूसरे सब देवता भी ठहर गये- तब जैसे (मधु के छत्ते से) मधुमक्खियों के राजा के निकलने पर (उसी के साथ-साथ) सारी ही मक्षिका (मधुमक्खियाँ) बाहर निकल जाती हैं और उसके बैठ जाने पर सब-की-सब बैठ जाती हैं; ऐसी ही दशा ( इन सबकी हुई)- अतः वाणी, नेत्र, श्रोत्र और मन वे (सभी) प्राण की श्रेष्ठता का अनुभव करके प्रसन्न होकर प्राण की स्तुति करने लगे ॥ ४ ॥

 

एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः । एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥ ५ ॥

 

यह प्राण अग्निरूप से तपता है; यही सूर्य है; यही मेघ है; यही इन्द्र है; यही वायु है (तथा) यह प्राण रूप देव ही पृथ्वी (एवं) रयि है (तथा) जो कुछ सत् और असत् है तथा जो अमृत (सत् और असत्  से भी श्रेष्ठ, परमात्मा) कहा जाता है (वह भी प्राण ही है) ॥ ५ ॥

 

व्याख्या- वे वाणी आदि सब देवता स्तुति करते हुए बोले- यह प्राण ही अग्रिरूप धारण करके तपता है और यही सूर्य है, यही मेघ, इन्द्र और वायु है। यही देव, पृथ्वी और रयि (भूतसमुदाय) है तथा सत् और असत् एवं उससे भी श्रेष्ठ जो अमृतस्वरूप परमात्मा है, वह भी यह प्राण ही है ॥ ५ ॥

 

अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् । ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च॥६॥

 

जिस प्रकार रथ के पहिये की नाभि में लगे हुए अरे नाभि के ही आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार ऋग्वेद की सब ऋचाएँ, यजुर्वेद के समस्त मन्त्र, सामवेद, उनके द्वारा सिद्ध होने वाले यज्ञादि शुभकर्म और यज्ञादि शुभकर्म करने वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि अधिकारी वर्ग-ये सभी प्राण के आधार पर ही टिके हुए हैं; सभी का आश्रय प्राण ही है ॥ ६ ॥

 

 सम्बन्ध - इस प्रकार प्राण का महत्त्व बताकर अब उसकी स्तुति की जाती है-

 

प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे। तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥ ७ ॥

 

हे प्राण ! तू ही प्रजापति है, तू ही गर्भ में विचरता है, (और तू ही) माता-पिता के अनुरूप होकर जन्म लेता है, निश्चय ही ये सब प्राणी तुझे भेंट समर्पण करते हैं ( अर्थात तुम्हारी तृप्तिके लिये ही अन्न भक्षण आदि कर रहे हैं)। तू ही अपानादि सब प्राणोंके सहित सबके शरीर में स्थित हो रहा है ॥ ७ ॥

 

देवानामसि वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा ।

ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥ ८ ॥

 

हे प्राण ! तू ही देवताओंके लिये हवि पहुँचानेवाला उत्तम अनि है । पितरोंके लिये पहली स्वधा है। अथर्वाङ्गिरस आदि ऋषियोंके द्वारा आचरित (अनुभूत) सत्य भी तू ही है ॥ ८ ॥

 

इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता । त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥ ९ ॥

 

हे प्राण! तू तेज से ( सम्पन्न) इन्द्र, रुद्र (और) रक्षा करने वाला है। तू ही अन्तरिक्ष में विचरता है (और) तू ही समस्त ज्योतिर्गणों का स्वामी सूर्य है ॥ ९ ॥

 

यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः । आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥ १० ॥

 

हे प्राण! जब तू भलीभाँति वर्षा करता है, उस समय तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा अन्न उत्पन्न होगा-यह समझकर आनन्दमय हो जाती है ॥ १० ॥

 

व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः । वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥ ११ ॥

 

हे प्राण ! तू संस्काररहित (होते हुए भी) एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है (तात्पर्य यह कि तू स्वभावसे ही शुद्ध है, अतः तुझे संस्कारद्वारा शुद्धिकी आवश्यकता नहीं है) तथा हम लोग (सभी इन्द्रियाँ और मन आदि) तेरे लिये भोजन को देनेवाले हैं और तू भोक्ता है। विश्व का स्वामी तू ही है। हे आकाश में विचरने वाले प्राण (मातरिश्व)! तू हमारा पिता है; क्योंकि तुझीसे हम सबकी उत्पत्ति हुई है  ११ 

 

या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि । या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥ १२ ॥

 

(हे प्राण!) जो तेरा स्वरूप वाचि वाणी में प्रतिष्ठित है तथा जो श्रोत्र में या  जो चक्षु में और जो मन में व्याप्त हैउसको कल्याणमय बना ले, (तू) उत्क्रमण न कर अर्थात शरीरसे उठकर बाहर  जा  १२ 

 

प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम् । मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥ १३ ॥

यह प्रत्यक्ष दीखने वाला जगत् (और) जो कुछ त्रिदिव अर्थात स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित है, वह सब-का-सब प्राण के वश में है। (हे प्राण !) जैसे माता अपने पुत्रों की रक्षा करती है, उसी प्रकार (तू हमारी) रक्षा कर तथा हमें श्री अर्थात कान्ति और प्रज्ञा अर्थात बुद्धि प्रदान कर; इति- इस प्रकार यह दूसरा प्रश्न समाप्त हुआ  १३ 

 


सारांश - द्वितीय प्रश्न (गीता प्रेस की पुस्तक से) 

इस प्रकार इस प्रकरणमें भार्गव ऋषिद्वारा पूछे हुए तीन प्रश्नोंका उत्तर देते हुए महर्षि पिप्पलादने यह बात समझायी कि समस्त प्राणियोंके शरीरोंको अवकाश देकर बाहर और भीतरसे धारण करनेवाला आकाश-तत्त्व है। साथ ही इस शरीरके अवयवोंकी पूर्ति करनेवाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- ये चार तत्त्व हैं। दस इन्द्रियाँ और अन्तःकरण-ये इसको प्रकाश देकर क्रियाशील बनानेवाले हैं। इन सबसे श्रेष्ठ प्राण है। अतएव प्राण ही वास्तवमें इस शरीरको धारण करनेवाला है, प्राणके बिना शरीरको धारण करनेकी शक्ति किसीमें नहीं है। अन्य सब इन्द्रिय आदिमें इसीकी शक्ति अनुस्यूत है, इसीकी शक्ति पाकर वे शरीरको धारण करते हैं। इसी प्रकार प्राणकी श्रेष्ठताका वर्णन छान्दोग्य-उपनिषद्के पाँचवें अध्यायके आरम्भमें और बृहदारण्यक उपनिषद्के छठे अध्यायके आरम्भमें भी आया है। इस प्रकरणमें प्राणकी स्तुतिका प्रसङ्ग अधिक है ॥ १३ ॥

 

॥ द्वितीय प्रश्न समाप्त २ ॥

Sunday, 8 October 2023

प्रश्नोपनिषद्- प्रथम प्रश्न

 ।। ॐ श्रीपरमात्मने नमः ।।

 

प्रश्नोपनिषद्

 

प्रश्नोपनिषद् अथर्ववेदके पिप्पलाद-शाखीय ब्राह्मणभागके अन्तर्गत है। इस उपनिषद्में पिप्पलाद ऋषिने सुकेशा आदि छः ऋषियोंके छः प्रश्नोंका क्रमसे उत्तर दिया है; इसलिये इसका नाम प्रश्नोपनिषद् हो गया।

 


शान्तिपाठ

 

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥* स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः !! शान्तिः !!!

 

हे देवगण! हम भगवान का यजन (आराधन) करते हुए कानों से कल्याणमय वचन सुनें, नेत्रों से कल्याण (ही) देखें, सुदृढ़ अङ्गों एवं शरीर से भगवान की स्तुति करते हुए हम लोग जो आयु देवहित में अर्थात परमात्मा के काम आ सके, उसका उपभोग करें। सब ओर फैले हुए सुयश वाले इन्द्र हमारे लिये कल्याण का पोषण करें। सम्पूर्ण विश्व का ज्ञान रखने वाले पूषा हमारे लिये स्वस्ति अर्थात कल्याण का पोषण करें। अरिष्टों को मिटाने के लिये चक्रसदृश शक्तिशाली गरुडदेव हमारे लिये कल्याण का पोषण करें तथा (बुद्धिके स्वामी) बृहस्पति भी हमारे लिये कल्याण की पुष्टि करें।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः- परमात्मन्! हमारे त्रिविध तापकी शान्ति हो ।

 

प्रथम प्रश्न

 

ॐ सुकेशा च भारद्वाजः शैव्यश्च सत्यकामः सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्यश्चाश्वलायनो भार्गवो वैदर्भिः कबन्धी कात्यायनस्ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ १ ॥

 

ॐ इस परमात्मा के नाम का स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ करते हैं।

 

भरद्वाज-पुत्र सुकेशा और शिविकुमार सत्यकाम तथा गर्गगोत्र में उत्पन्न सौर्यायणी एवं कोसलदेशीय आश्वलायन तथा विदर्भनिवासी भार्गव और कत्य ऋषि का प्रपौत्र कबन्धी -वे ये छः प्रसिद्ध ऋषि जो वेदपरायण (और) ब्रह्मनिष्ठ (वेद में निष्ठा रखने वाले) थे। वे सब-के-सब परम् ब्रह्म की खोज करते हुए; यह समझकर कि ये (पिप्पलाद ऋषि) निश्चय ही उस ब्रह्म के विषय में सारी बातें बतायेंगे; हाथ में समिधा लिये हुए भगवान् पिप्पलाद ऋषिके पास गये ॥ १ ॥

 

 

तान्ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान्पृच्छत यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥

 

उन सुकेशा आदि ऋषियों से वे (पिप्पलाद) ऋषि बोले- तुमलोग श्रद्धा के साथ ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, (और) तपस्यापूर्वक एक वर्ष तक (यहाँ) भलीभांति निवास करो। (उसके बाद) अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार प्रश्न पूछना। यदि (तुम्हारी पूछी हुई बातोंको) मैं जानता होऊँगा; तो निःसंदेह वे सब बातें - तुम लोगों को बताऊँगा ॥ २ ॥

 

सम्बन्ध – ऋषि के आज्ञानुसार सब ने श्रद्धा, ब्रह्मचर्य और तपस्या के साथ विधिपूर्वक एक वर्षतक वहाँ निवास किया।

 

कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ । भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ ३ ॥ अथ

 

उनमें से कत्य ऋषि के प्रपौत्र कबन्धी ने (पिप्पलाद ऋषि के) पास जाकर पूछा- भगवन्! किस प्रसिद्ध और सुनिश्चित कारण विशेष से यह सम्पूर्ण प्रजा नाना रूपों में उत्पन्न होती है- यह मेरा प्रश्न है ॥ ३ ॥

 

 

तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते। रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति ॥ ४ ॥

 

उससे वे प्रसिद्ध महर्षि बोले- निश्चय ही प्रजा उत्पन्न करने की इच्छावाला (जो) प्रजापति है, उसने तप किया। उसने तपस्या करके (जब सृष्टि का आरम्भ किया, उस समय पहले) उसने एक तो रयि तथा दूसरा प्राण भी -यह जोड़ा उत्पन्न किया। इन्हें उत्पन्न करने का उद्देश्य यह था कि ये दोनों मेरी नाना प्रकार की प्रजाओं को उत्पन्न करेंगे ॥ ४ ॥

 

 

आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत् सर्वं यन्मूर्त चामूर्त च तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥ ५ ॥

 

यह निश्चय है कि आदित्य (सूर्य) ही प्राण हैं (और) चन्द्रमा ही रयि है। जो कुछ मूर्त अर्थात आकार वाला है (पृथ्वी, जल और तेज) और जो अमूर्त अर्थात आकाररहित है (आकाश और वायु) यह सभी कुछ रयि है, इसलिये मूर्तमात्र ही अर्थात् देखने तथा जानने में आने वाली सभी वस्तुएँ रयि हैं॥५॥

 

अथादित्य उदयन्यत्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते । यद्दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत्सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥ ६ ॥

 

रात्रि के अनन्तर उदय होता हुआ सूर्य जो पूर्व दिशा में प्रवेश करता है, उससे पूर्व दिशा के प्राणों को अपनी किरणों में धारण करता है (उसी प्रकार) जो दक्षिण दिशा को; जो पश्चिम दिशा को; जो उत्तर दिशा को; जो नीचे के लोकों को; जो ऊपर के लोकों को; जो दिशाओं के बीच के भागों (कोणों) को (और) जो अन्य सबको प्रकाशित करता है, वह समस्त प्राणों को अर्थात् सम्पूर्ण जगत के प्राणों को अपनी किरणों में धारण करता है ॥६॥

 

इस मन्त्रमें सम्पूर्ण प्राणियों के शरीरों में जो जीवनी-शक्ति है, उसके साथ सूर्य का सम्बन्ध दिखलाया गया है। जिस समय जिस दिशा में जहाँ-जहाँ सूर्य अपना प्रकाश फैलाता है, वहाँ-वहाँ के प्राणियोंको स्फूर्ति देता रहता है; अतः सूर्य ही समस्त प्राणियों का प्राण है।

 

 

स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते । तदेतदृचाभ्युक्तम् ॥ ७ ॥

 

वह यह सूर्य ही उदय होता है (जो कि) वैश्वानर अग्नि (जठराग्नि) और विश्वरूप प्राण है, वही यह बात ऋचा द्वारा आगे कही गयी है ॥७॥

 

व्याख्या – प्राणियों के शरीर में जो वैश्वानर नाम से कही जाने वाली जठराग्नि है, जिससे अन्न का पाचन होता है, वह सूर्य का ही अंश है; अतः सूर्य ही है। तथा जो प्राण, अपान, समान,व्यान और उदान—इन पाँच रूपों में विभक्त प्राण है, वह भी इस उदय होनेवाले सूर्य का ही अंश है; अतः सूर्य ही है। यही बात अगली ऋचा द्वारा समझायी गयी है।

 

 

विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् । सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥ ८ ॥

 

सम्पूर्ण रूपों के केन्द्र सर्वज्ञ, सर्वाधार, प्रकाशमय तपते हुए किरणों वाले सूर्य को अद्वितीय (बतलाते हैं)। यह सहस्रों किरणों वाला सूर्य सैकड़ों प्रकार से बर्तता हुआ समस्त जीवों का प्राण (जीवनदाता) होकर उदयति-उदय होता है ॥ ८ ॥

 

*सम्पूर्ण सृष्टि का जीवन- दाता प्राण ही सूर्य के रूपमें उदित होता है*

 

सम्बन्ध— इस प्रकार यहाँ तक कात्यायन कबन्धी के प्रश्नानुसार संक्षेप में यह बताया गया कि उस सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वर से ही उसके सङ्कल्पद्वारा प्राण और रयि के संयोग से इस सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति आदि होती है। अब इस प्राण-शक्ति और रयि-शक्ति के सम्बन्ध से परमेश्वर की उपासना का प्रकार और उसका फल बतलाने के लिये दूसरा प्रकरण आरम्भ करते हैं-

 

संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च । तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते । त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेत ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते । एष ह वै रयिर्य: पितृयाणः ॥ ९ ॥

 

संवत्सर (बारह महीनों वाला काल) ही प्रजापति है, उसके दो अयन हैं- एक दक्षिण और दूसरा उत्तर। वहाँ मनुष्यों में जो लोग निश्चयपूर्वक (केवल) उन इष्ट और पूर्त कर्मों को ही करने योग्य कर्म मानकर (सकाम भाव से) उनकी उपासना करते हैं (उन्हीं के अनुष्ठान में लगे रहते हैं), वे चन्द्रमा के लोक को ही जीतते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं (और) वे ही पुनः (वहाँ से) लौटकर आते हैं, इसलिये ये संतान की कामना वाले ऋषिगण दक्षिण (मार्ग) को प्राप्त होते हैं। निस्सन्देह यही वह रयि है, जो 'पितृयान' नामक मार्ग है ॥ ९ ॥

 

 

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते । एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष श्लोकः ॥ १०॥

 

किंतु (जो) तपस्या के साथ ब्रह्मचर्यपूर्वक (और) श्रद्धा से युक्त होकर अध्यात्मविद्या के द्वारा (सूर्यरूप) परमात्मा की अन्विष्य खोज करके (जीवन सार्थक करते हैं) वे उत्तरायण-मार्ग से सूर्यलोक को जीत लेते हैं (प्राप्त करते हैं)। यह (सूर्य) ही प्राणों का केन्द्र है, यह अमृत (अविनाशी) और निर्भय पद है, यह परमगति है, इससे पुनः लौटकर नहीं आते।  इस प्रकार यह निरोध (पुनरावृत्ति का निवारक) है, इस बात को स्पष्ट करने वाला यह (अगला) श्लोक है ॥ १० ॥

 

 

पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम् । अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितमिति ॥ ११ ॥

 

(कितने ही लोग तो इस सूर्य को ) पाँच चरणों वाला, सबका पिता, बारह आकृतियों वाला, जल का उत्पादक, (और) स्वर्गलोक से भी ऊपर के स्थान में (स्थित) बतलाते हैं। ये दूसरे कितने ही लोग सात पहियों वाले (और) अरों वाले (रथमें) बैठा हुआ (एवं) सबको भलीभाँति जाननेवाला है- ऐसा बतलाते हैं ॥ ११ ॥

 

 

मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुक्लः प्राणस्तस्मादेत ऋषयः शुक्ल इष्टं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥ १२ ॥

 

मास भी उसी प्रजापति की प्रतीक है, और इसके कृष्ण पक्ष को 'रयि' कहा जाता है और 'शुक्ल पक्ष' को 'प्राण' कहा जाता है।

जो कल्याणकामी ऋषि हैं, वे रयिस्थानीय भोग-पदार्थों से विरक्त होकर अपने समस्त शुभ कर्म शुक्लपक्षस्थानीय प्राणाधार परब्रह्म परमेश्वर को अर्पण करते हैं- स्वयं उसका कोई फल नहीं चाहते; यही गीतोक्त कर्मयोग है।

इनसे भिन्न जो भोगासक्त मनुष्य हैं, वे कृष्णपक्ष में अर्थात् कृष्णपक्षस्थानीय स्थूल पदार्थों की प्राप्ति के उद्देश्य से सब प्रकार के कर्म किया करते हैं। इनका वर्णन गीता में 'स्वर्गपरा:' के नाम से हुआ है (गीता २ । ४२ - ४४) ॥ १२ ॥

 

 

अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या ज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ १३ ॥

 

दिन और रात का जोड़ा भी उसी प्रजापति की प्रतीक है, इसमें रात्रि को 'रयि' और दिन को 'प्राण' कहा जाता है। दिन तो मानो प्राण अर्थात् सबको जीवन देने वाला प्रकाशमय विशुद्ध स्वरूप है और रात्रि ही भोगरूप रयि है। इंद्रिय आनंद में बिताया गया दिन जीवन को नष्ट कर देता है। जीवन शक्ति (प्राण) का उपयोग आत्म-नियंत्रण करके आध्यात्मिक प्राप्ति के लिए करना ही ब्रह्मचर्य है।

 

दिन और रात का जोड़ा ही प्रजापति है, उसका दिन ही प्राण है (और) रात्रि ही रयि है (अतः) जो दिन में स्त्री-वास करते हैं,  ये लोग सचमुच अपने प्राणों को ही क्षीण करते हैं तथा (मनुष्य) जो रात्रि में स्त्री-सहवास करते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है॥ १३ ॥

 

 

अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ १४ ॥

 

इस मन्त्र में अन्न को प्रजापति का स्वरूप बतलाते हुए कहा गया है कि सब प्राणियों का आहाररूप अन्न ही प्रजापति है, क्योंकि इसी से वीर्य (जीवन का बीज) उत्पन्न होता है और उससे सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न होती है।

 

सम्बन्ध—अब पहले बतलाये हुए दो प्रकार के साधकों को मिलने वाले पृथक्-पृथक् फल का वर्णन करते हैं-

 

तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते । तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम्॥ १५ ॥

 

प्रजापति व्रत (ऊपर के श्लोकों में वर्णित) का अनुष्ठान करने कुछ लोग संतति को उत्पन्न करते हैं, इनमें से जो पूरी तरह सत्य में प्रतिष्ठित होते हैं उन्हें ही ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।

 

तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्यमनृतं न माया चेति ।। १६ ।।

 

जिनमें न तो कुटिलता (और) झूठ (मिथ्या भाषण) है तथा न माया (कपट) ही है, उन्हीं को वह विशुद्ध, विकाररहित ब्रह्मलोक (मिलता है) ॥ १६ ॥

 

॥ प्रथम प्रश्न समाप्त ॥ १ ॥

 

 



 

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