Friday, 20 October 2023

प्रश्नोपनिषद- चतुर्थ प्रश्न

 चतुर्थ प्रश्न

 

अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति कतर एष देवः स्वप्नान्पश्यति कस्यैतत्सुखं भवति कस्मिन्नु सर्वे सम्प्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥ १॥

 

तदनन्तर इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद मुनि) से गर्ग गोत्र में उत्पन्न सौर्यायणी ऋषि ने पूछा-भगवन् ! इस मनुष्य-शरीर में कौन-कौन सोते हैं; इसमें कौन-कौन जागते रहते हैं; यह कौन देवता स्वप्नों को देखता है, यह सुख किसको होता है (और) ये सब-के-सब किसमें निश्चितरूप से सम्पूर्णतया स्थित रहते हैं, यह (मेरा प्रश्न है) ॥ १ ॥

 

व्याख्या—यहाँ गार्ग्य मुनिने महात्मा पिप्पलाद से पाँच बातें पूछी हैं—

(१) गाढ़ी निद्रा के समय इस मनुष्य-शरीर में रहने वाले पूर्वोक्त देवताओं में से कौन-कौन सोते हैं?

(२) कौन-कौन जागते रहते हैं?

(३) स्वप्न अवस्था में इनमें से कौन देवता स्वप्न की घटनाओं को देखता रहता है ?

(४) निद्रा अवस्था में सुख का अनुभव किसको होता है? और

(५) ये सब-के-सब देवता सर्वभाव से किसमें स्थित हैं अर्थात् किसके आश्रित हैं?

इस प्रकार इस प्रश्न में गार्ग्य मुनि ने जीवात्मा और परमात्मा का पूरा-पूरा तत्त्व पूछ लिया॥ १ ॥

 

तस्मै स होवाच यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति । ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति। तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ २ ॥

 

उससे उन सुप्रसिद्ध महर्षि ने कहा, हे गार्ग्य ! जिस प्रकार अस्त होते हुए सूर्य सब-की-सब किरणें इस तेजोमण्डल में एक हो जाती हैं (फिर) उदय होनेपर वे (सब) पुनः-पुनः सब ओर फैलती रहती हैं, ठीक ऐसे ही (निद्रा के समय) वे सब इन्द्रियाँ (भी) परम देव मन में एक हो जाती हैं,  इस कारण उस समय यह जीवात्मा न (तो) सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न आनंदित होता है, न मल-मूत्रका त्याग करता है (और) न चलता है; उस समय 'वह सो रहा है' यों (लोग) कहते हैं ॥ २ ॥

 

सम्बन्ध - अब गार्ग्यके प्रश्नका संक्षेपमें उत्तर देकर दो मन्त्रोंद्वारा यह भी बतलाते हैं कि सब इन्द्रियोंके लय होनेपर मनकी कैसी स्थिति रहती है-

 

प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात् प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥

 

इस शरीर रूपी नगर में पाँच प्राणरूप अग्रियाँ ही जागती रहती हैं। यह प्रसिद्ध अपान ही गार्हपत्य अग्नि है, व्यान अन्वाहार्यपचन नामक अग्नि (दक्षिणाग्नि) है, गार्हपत्य अग्नि (householder’s fire) से जो उठाकर ले जायी जाती है (वह) आहवनीय अग्रि प्रणयन (उठाकर ले जाए जाने) के कारण ही प्राणरूप है ॥ ३ ॥

 

यहाँ निद्रा को यज्ञ का रूप देने के लिये पाँचों प्राणों को अग्रिरूप बतलाया है। शरीर में जो प्राण की अपान वृत्ति है, यही मानो उस यज्ञ की 'गार्हपत्य' अग्रि है; 'व्यान' दक्षिणाग्नि है, गार्हपत्य अग्निरूप अपान से प्राण उठते हैं, इस कारण मुख्य प्राण ही इस यज्ञ की कल्पना में आहवनीय अग्नि है; क्योंकि यज्ञ में आहवनीय अग्नि  गार्हपत्य से उठाकर लायी जाती है।

तीसरे प्रश्न के प्रसङ्ग में भी प्राण को 'अन्नरूप आहुति जिसमें हवन की जाती है' इस व्युत्पत्ति द्वारा आहवनीय अग्नि ही बताया है।

 

यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः । मनोह वाव यजमानः। इष्टफलमेवोदानः । स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥ ४ ॥

 

जो ऊर्ध्वश्वास और अधोश्वास हैं, ये दोनों मानो (अग्निहोत्र की) दो आहुतियाँ हैं। इनको जो समभाव से (सब ओर) पहुँचाता है इसलिये जो 'समान' कहलाता है, वही हवन करनेवाला ऋत्विक् है। यह प्रसिद्ध मन ही यजमान है, अभीष्ट फल ही उदान है। वह (उदान) ही इस यजमानम् मनरूप यजमान को प्रतिदिन (निद्रा के समय) ब्रह्मलोक में भेजता है अर्थात् हृदयगुहा में ले जाता है ॥ ४ ॥

 

उदानवायु मन को प्रतिदिन निद्राके समय उसके कर्मफलके भोगस्वरूप ब्रह्मलोक में परमात्मा के निवासस्थानरूप हृदयगुहा में ले जाता है। वहाँ इस मन के द्वारा जीवात्मा निद्राजनित विश्रामरूप सुख का अनुभव करता है।

 

सम्बन्ध - अब तीसरे प्रश्नका उत्तर देते हैं-

 

अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति । यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति । देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति ॥ ५ ॥

 

इस स्वप्न अवस्था में यह देव (जीवात्मा) अपनी विभूति का अनुभव करता है, जो बार-बार देखा हुआ है उसी को बार-बार देखता है, बार-बार सुनी हुई बातों को ही पुनः-पुनः सुनता है, नाना देश और दिशाओं में बार-बार अनुभव किये हुए विषयों को पुनः-पुनः अनुभव करता है, (इतना ही नहीं) देखे हुए और न देखे हुए को भी,सुने हुए और न सुने हुए को भी, अनुभव किये हुए और अनुभव न किये हुए को भी, विद्यमान और अविद्यमान को भी, (इस प्रकार) सारी घटनाओं को देखता है, (तथा) स्वयं सब कुछ बनकर देखता है ॥ ५ ॥

 

गार्ग्य मुनि ने जो यह तीसरा प्रश्न किया था कि कौन देवता स्वप्नों को देखता है? उसका उत्तर महर्षि पिप्पलाद यहाँ देते हैं। इस स्वप्न-अवस्था में जीवात्मा ही मन और सूक्ष्म इन्द्रियों द्वारा अपनी विभूति का अनुभव करता है। स्वप्न में यह स्वयं ही सब कुछ बनकर देखता है, उस समय जीवात्मा के अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं रहती ।

 

स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्शरीर एतत्सुखं भवति ॥ ६ ॥

 

वह (मन) जब तेज (उदान वायु) से अभिभूत हो जाता है अर्थात उस समय इन्द्रियों के सहित मन की किरणों का हृदयमें  उपसंहार हो जाता है, इस स्थिति में यह जीवात्मारूप देवता स्वप्नों को नहीं देखता। उस समय इस मनुष्य-शरीर में (जीवात्मा को) इस सुषुप्ति के सुख का अनुभव होता है ॥ ६ ॥

 

गार्ग्य मुनि ने चौथी बात यह पूछी थी कि 'निद्रा में सुखका अनुभव किसको होता है? उसका उत्तर महर्षि इस प्रकार देते हैं-जब निद्रा के समय यह मन उदानवायु के अधीन हो जाता है, अर्थात् जब उदान वायु इस मनको जीवात्मा के निवासस्थान हृदय में पहुँचाकर मोहित कर देता है, उस निद्रावस्था में यह जीवात्मा मन के द्वारा स्वप्न की घटनाओं को नहीं देखता । उस समय निद्राजनित सुखका अनुभव जीवात्मा को ही होता है। इस शरीर में सुख- दुःखों को भोगने वाला, प्रत्येक अवस्था में प्रकृतिस्थ पुरुष अर्थात् जीवात्मा ही है ।

 

स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं सम्प्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत् सर्वं पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥ ७ ॥

 

(पाँचवीं बात जो तुमने पूछी थी) वह (इस प्रकार समझनी चाहिये) हे सोम्य जिस प्रकार बहुत-से पक्षी (सायंकाल में) अपने निवासरूप वृक्ष पर (आकर) आराम से ठहरते हैं (बसेरा करते हैं)-ठीक वैसे ही वे (आगे बताये जाने वाले पृथिवी आदि तत्त्वों से लेकर प्राण तक) सब-के-सब परमात्मा में सुखपूर्वक आश्रय पाते हैं॥ ७ ॥

 

गार्ग्य मुनि ने जो यह पाँचवीं बात पूछी थी कि 'ये मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और प्राण - सब-के-सब किसमें स्थित हैं-किसके आश्रित हैं।' उसका उत्तर महर्षि इस प्रकार देते हैं- आकाश में उड़ने वाले पक्षीगण जिस प्रकार सायंकाल में लौटकर अपने निवास (वृक्ष) पर आराम से बसेरा लेते हैं, ठीक उसी प्रकार आगे बतलाये जाने वाले पृथ्वी से लेकर प्राण तक जितने तत्त्व हैं, वे सब-के-सब परब्रह्म पुरुषोत्तम में, जो कि सबके आत्मा हैं, आश्रय लेते हैं; क्योंकि वे ही इन सबके परम आश्रय हैं।

 

पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक्व स्पर्श- यितव्यं च वाक्च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च ॥ ८ ॥

 

पृथिवी और उसकी तन्मात्रा (सूक्ष्म गन्ध) भी, जल और रसतन्मात्रा भी, तेज और रूप- तन्मात्रा भी, वायु और स्पर्श - तन्मात्रा भी, आकाश और शब्द- तन्मात्रा भी, नेत्र-इन्द्रिय और देखने में आनेवाली वस्तु भी, श्रोत्र- इन्द्रिय और सुनने में आनेवाली वस्तु भी, घ्राणेन्द्रिय और सूँघने में आनेवाली वस्तु भी, रसना-इन्द्रिय और रसना के विषय भी, त्वक् - इन्द्रिय और स्पर्श में आने वाली वस्तु भी, वाक्-इन्द्रिय और बोलने में आनेवाला शब्द भी, दोनों हाथ और पकड़ने में आनेवाली वस्तु भी, उपस्थ-इन्द्रिय और उसका विषय भी, गुदा-इन्द्रिय और उसके द्वारा परित्यागयोग्य वस्तु भी, दोनों चरण और गन्तव्य स्थान भी, मन और मनन में आने वाली वस्तु भी, बुद्धि और जानने में आनेवाली वस्तु भी, अहंकार और उसका विषय भी, चित्त और चिन्तन में आनेवाली वस्तु भी, प्रभाव और उसका विषय भी, प्राण और प्राण के द्वारा धारण किये जाने वाले पदार्थ भी (ये सब-के-सब परमात्माके आश्रित हैं) ॥ ८ ॥

 

एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परेऽक्षर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥ ९ ॥

 

यह जो देखने वाला, स्पर्श करने वाला, सुननेवाला, सूँघनेवाला, स्वाद लेने वाला, मनन करने वाला, जानने वाला तथा कर्म करने वाला, विज्ञानस्वरूप पुरुष (जीवात्मा) है, वह भी अविनाशी परमात्मा में भलीभाँति स्थित है ॥ ९ ॥

 

परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य । स सर्वज्ञः सर्वो भवति । तदेष श्लोकः ॥ १० ॥

 

निश्चय ही जो कोई भी उस छायारहित, शरीररहित, लाल, पीले आदि रंगों से रहित, विशुद्ध अविनाशी पुरुष को जानता है, वह परम अविनाशी परमात्मा को ही प्राप्त हो जाता है। हे प्रिय ! जो कोई ऐसा है, वह सर्वज्ञ (और) सर्वरूप हो जाता है— उस विषयमें यह (अगला) श्लोक है ॥ १०॥

 

विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः

प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र ।

तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य

स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ ११ ॥

 

जिसमें समस्त प्राण (और पाँचों भूत) तथा सर्वैः देवैः सह सम्पूर्ण इन्द्रिय और अन्तः करण के सहित विज्ञानस्वरूप आत्मा आश्रय लेते हैं। हे प्रिय ! उस अविनाशी परमात्मा को जो कोई जान लेता है वह सर्वज्ञ है, (वह) सर्वस्वरूप परमेश्वर में प्रविष्ट हो जाता है —इस प्रकार (इस प्रश्नका उत्तर समाप्त हुआ) ॥ ११ ॥

 

॥ चतुर्थ प्रश्न समाप्त ४ ॥

 


 

 

चौथे प्रश्न का सारांश

 

इस अध्याय में, गार्ग्य मुनि ने महर्षि पिप्पलाद से मनुष्य शरीर में रहने वाले देवताओं के बारे में पाँच प्रश्न पूछे।

 

1.    गाढ़ी निद्रा के समय कौन-कौन सोते हैं?

2.     इसमें कौन-कौन जागते रहते हैं?

3.    यह कौन देवता स्वप्नों को देखता है?

4.    यह सुख किसको होता है?

5.    ये सब-के-सब किसमें निश्चितरूप से सम्पूर्णतया स्थित रहते हैं?

 

महर्षि पिप्पलाद ने इन सभी प्रश्नों का उत्तर दिया।

 

1.    गाढ़ी निद्रा के समय सभी इन्द्रियाँ मन में एक हो जाती हैं, इसलिए उस समय जीवात्मा न तो सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न आनंदित होता है, न मल-मूत्रका त्याग करता है, न चलता है।

2.    स्वप्न अवस्था में जीवात्मा ही मन और सूक्ष्म इन्द्रियों द्वारा अपनी विभूति का अनुभव करता है। जीवात्मा अपने पिछले अनुभवों या कल्पनाओं के आधार पर सपने देखता है।

3.    निद्राजनित सुख जीवात्मा को ही होता है। जागने की अवस्था में, सभी इंद्रियां और मन जीवात्मा को बाहरी दुनिया के साथ जोड़ती हैं। जीवात्मा सुख और दुख का अनुभव करता है।

4.    ये सभी देवता परमात्मा में स्थित हैं।

5.    महर्षि पिप्पलाद ने यह भी बताया कि परमात्मा ही सभी प्राणियों का आत्मा है। जो कोई भी परमात्मा को जान लेता है, वह सर्वज्ञ और सर्वरूप हो जाता है।

 

इस प्रकार, इस अध्याय में जीवात्मा और परमात्मा के संबंध के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है।

 

 

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