तृतीय प्रश्न
अथ हैनं
कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ भगवन्कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्शरीर आत्मानं
वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते केनोत्क्रमते कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति ॥ १
॥
उसके बाद इन
प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद) से कोसलदेशीय आश्वलायन ने भी पूछा-भगवन्! यह प्राण किससे उत्पन्न होता है; इस शरीर में कैसे आता है तथा अपने को
विभाजित करके किस प्रकार स्थित होता है; किस ढंग से उत्क्रमण करता(शरीर से बाहर निकलता है); किस प्रकार बाह्य जगत को भलीभाँति धारण करता है और किस प्रकार मन और इन्द्रिय
आदि शरीर के भीतर रहने वाले जगत को-
यही (मेरा प्रश्न है) ॥ १ ॥
व्याख्या - इस
मन्त्र में आश्वलायन मुनि ने महर्षि पिप्पलाद से कुल छः बातें पूछी हैं-
(१) जिस प्राण की
महिमाका आपने वर्णन किया, वह
प्राण किससे उत्पन्न होता है?
(२) वह इस
मनुष्य-शरीर में कैसे प्रवेश करता है?
(३) अपने को
विभाजित करके किस प्रकार शरीर में स्थित रहता है?
(४) एक शरीर को
छोड़कर दूसरे शरीर में जाते समय पहले शरीर से किस प्रकार निकलता है ?
(५) इस बाह्य
(पाञ्चभौतिक) जगत को किस प्रकार धारण करता है ?
(६) मन और
इन्द्रिय आदि आध्यात्मिक (आन्तरिक) जगत् को किस प्रकार धारण करता है?
यहाँ प्राण के
विषय में वे ही बातें पूछी गयी हैं, जिनका वर्णन पहले उत्तर में नहीं आया है और जो पहले प्रश्न के उत्तर को सुनकर
ही स्फुरित हुई हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रश्नोत्तर के समय सुकेशादि
छहों ऋषि वहाँ साथ-साथ बैठे सुन रहे थे ॥ १ ॥
तस्मै स
होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥ २ ॥
उससे उन प्रसिद्ध
महर्षि ने कहा- तू बड़े
कठिन प्रश्न पूछ रहा है (किंतु) तू वेदों में निष्णात है अत: मैं तेरे प्रश्नों का
उत्तर देता हूँ ॥ २ ॥
आत्मन एष
प्राणो जायते यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे ॥३॥
यह प्राण आत्मन (परमात्मा)
से उत्पन्न होता है। जिस प्रकार यह छाया पुरुष के होने पर ही होती है उसी प्रकार यह
(प्राण) इस (परमात्मा/आत्मन) के ही आश्रित है (और) इस शरीर में मनोकृतेन (मन के किये
हुए संकल्प से) आता है॥ ३ ॥
यहाँ महर्षि
पिप्पलाद ने क्रम से आश्वलायन ऋषिके दो प्रश्नोंका उत्तर दिया है। पहले प्रश्नका
उत्तर तो यह है कि जिसका प्रकरण चल रहा है, वह सर्वश्रेष्ठ प्राण परमात्मा से उत्पन्न हुआ है।
इसकी स्थिति उस
सर्वात्मा महेश्वर के अधीन एवं उसी के आश्रित है-ठीक उसी प्रकार जैसे किसी
मनुष्यकी छाया उसके अधीन रहती है।
दूसरे प्रश्न का
उत्तर यह है कि मन द्वारा किये हुए संकल्प से वह शरीर में प्रवेश करता है। ॥ ३ ॥
सम्बन्ध - अब
आश्वलायन के तीसरे प्रश्नका उत्तर विस्तारपूर्वक आरम्भ किया जाता है-
यथा
सम्राडेवाधिकृतान्विनियुङ्क्ते एतान्ग्रामानेता-
न्ग्रामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष
प्राण इतरान् प्राणान्पृथक्पृथगेव संनिधत्ते ॥ ४ ॥
जिस प्रकार
सम्राट् एव चक्रवर्ती महाराज स्वयं ही इन गाँवों में तुम रहो, इन गाँवों में तुम रहो - इस प्रकार
अधिकारियों को अलग-अलग नियुक्त करता है; उसी प्रकार यह मुख्य प्राण दूसरे प्राणों को पृथक्-पृथक् ही स्थापित
करता है ॥ ४ ॥
सम्बन्ध - अब
मुख्य प्राण, अपान और समान-इन
तीनों का वासस्थान और कार्य बतलाया जाता है-
पायूपस्थेऽपानं
चक्षुः श्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते मध्ये तु समानः । एष
ह्येतद्भुतमन्नं समं नयति तस्मादेताः सप्तार्चिषो भवन्ति ॥ ५ ॥
(वह) प्राण गुदा
और उपस्थ में अपान को नियुक्त करता है (मल-मूत्रको शरीरके बाहर निकाल देना है;
रज, वीर्य और गर्भको बाहर करना भी इसीका काम है।)। स्वयं
मुख और नासिका द्वारा (विचरता हुआ) नेत्र और श्रोत्र में स्थित रहता है और शरीर के
मध्यभाग में समान रहता है। यह (समान वायु) ही इस प्राणाग्नि में हवन किये हुए अन्न
(उदर में डाले हुए अन्न) को समस्त शरीर में यथायोग्य समभाव से पहुँचाता है। उससे ये
सात ज्वालाएँ (विषयों को प्रकाशित करने वाले ऊपर के द्वार- दो नेत्र, दो कान, दो नासिकाएँ और एक मुख अर्थात रसना) उत्पन्न होती
हैं ॥ ५ ॥
संबंध – अब व्यान
की गति का वर्णन किया जाता है।
हृदि ह्येष
आत्मा अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्त्राणि
भवन्त्यासु व्यानश्चरति ॥ ६ ॥
यह प्रसिद्ध आत्मा (जीवात्मा) हृदय देश में रहता है; इस
(हृदय) में मूलरूप से एक सौ नाडियों का समुदाय है; उनमें से एक-एक नाडी में एक-एक सौ (शाखाएँ) हैं
(प्रत्येक शाखा-नाडी की) बहत्तर- बहत्तर हजार प्रतिशाखानाडियाँ होती हैं; इनमें व्यान वायु विचरण करता है ॥ ६ ॥
व्याख्या - इस
शरीरमें जो हृदयप्रदेश है, जो
जीवात्माका निवासस्थान है, उसमें
एक सौ मूलभूत नाडियाँ हैं; उनमेंसे
प्रत्येक नाडी की एक-एक सौ शाखा - नाडियाँ हैं और प्रत्येक शाखा नाडीकी बहत्तर
बहत्तर हजार प्रतिशाखा- नाडियाँ हैं। इस प्रकार इस शरीरमें कुल बहत्तर करोड़
नाडियाँ हैं; इन सब में
व्यानवायु विचरण करता है ॥ ६ ॥
सम्बन्ध - अब
उदानका स्थान और कार्य बतलाते हैं, साथ ही आश्वलायनके चौथे प्रश्नका उत्तर भी देते हैं-
अथैकयोर्ध्व
उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥ ७ ॥
तथा जो एक नाडी और
है, उसके द्वारा उदान वायु ऊपर
की ओर विचरता है। वह पुण्य कर्मों के द्वारा [ मनुष्यम् ]मनुष्य को पुण्यलोकों में ले जाता है;
पापकर्मों के कारण (उसे) पापयोनियों में
ले जाता है (तथा) पाप और पुण्य दोनों प्रकार के कर्मों द्वारा (जीव को) मनुष्यलोकम्
अर्थात मनुष्य-शरीर में ले जाता है ॥ ७ ॥
व्याख्या – इन ऊपर
बतलायी हुई बहत्तर करोड़ नाड़ियों से भिन्न एक नाडी और है जिसको 'सुषुम्णा' कहते हैं, जो हृदयसे निकलकर ऊपर मस्तक में गयी है। उसके द्वारा उदानवायु शरीर में ऊपर की
ओर विचरण करता है। (इस प्रकार आश्वलायन के तीसरे प्रश्न का समाधान करके अब महर्षि
उसके चौथे प्रश्न का उत्तर संक्षेप में देते हैं— ) जो मनुष्य पुण्यशील होता है,
जिसके शुभकर्मों के भोग उदय हो जाते
हैं, उसे यह उदानवायु ही अन्य
सब प्राण और इन्द्रियों के सहित वर्तमान शरीर से निकालकर पुण्यलोकों में अर्थात्
स्वर्गादि उच्च लोकों में ले जाता है। पापकर्मों से युक्त मनुष्य को शूकर- कूकर
आदि पाप -योनियों में और रौरवादि नरकों में ले जाता है तथा जो पाप और पुण्य- दोनों
प्रकार के कर्मों का मिश्रित फल भोगने के लिये अभिमुख हुए रहते हैं, उनको मनुष्य-शरीर में ले जाता है * ॥ ७ ॥
* एक शरीर से
निकलकर जब मुख्य प्राण उदान को साथ लेकर उसके द्वारा दूसरे शरीर में जाता है,
तब अपने अङ्गभूत समान आदि प्राणों को
तथा इन्द्रिय और मन को तो साथ ले ही जाता है, इन सबका स्वामी जीवात्मा भी उसी के साथ जाता है-यह
बात यहाँ कहनी थी; इसीलिये
पूर्वमन्त्रमें जीवात्मा का स्थान हृदय बतलाया गया है।
सम्बन्ध - अब दो
मन्त्रों में आश्वलायन के पाँचवें और छठे प्रश्न का उत्तर देते हुए जीवात्माके
प्राण और इन्द्रियों सहित एक शरीर से दूसरे शरीर में जानेकी बात भी स्पष्ट करते हैं-
आदित्यो ह वै
बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः । पृथिव्यां या देवता
सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः ॥ ८ ॥
यह निश्चय है कि सूर्य
ही बाह्य प्राण है; यही इस
नेत्र सम्बन्धी प्राण पर अनुग्रह करता हुआ उदित होता है। पृथ्वी में जो (अपानवायु की
शक्तिरूप) देवता है वही यह मनुष्य के अपान वायु को स्थिर किये रहता है। पृथ्वी और
स्वर्ग के बीच जो आकाश (अन्तरिक्षलोक) है; वह समान है, वायु ही व्यान है ॥ ८ ॥
व्याख्या - यह
निश्चयपूर्वक समझना चाहिये कि सूर्य ही सबका बाह्य प्राण है। यह मुख्य प्राण
सूर्यरूप से उदय होकर इस शरीर के बाह्य अङ्ग- प्रत्यङ्गों को पुष्ट करता है और
नेत्र-इन्द्रिय रूप आध्यात्मिक शरीर पर अनुग्रह करता है-उसे देखनेकी शक्ति अर्थात्
प्रकाश देता है। पृथ्वी में जो देवता अर्थात् अपानवायु की शक्ति है, वह मनुष्य के भीतर रहने वाले अपानवायु को
आश्रय देती है-टिकाये रखती है। यह इस अपानवायु की शक्ति गुदा और उपस्थ इन्द्रियों की
सहायक है तथा इनके बाहरी स्थूल आकार को धारण करती है। पृथ्वी और स्वर्गलोक के बीच का
जो आकाश है, वही समानवायु का
बाह्य स्वरूप है। वह इस शरीर के बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्गों को अवकाश देकर इसकी रक्षा
करता है और शरीर के भीतर रहनेवाले समानवायु को विचरने के लिये शरीर में अवकाश देता
है; इसी की सहायता से श्रोत्र-
इन्द्रिय शब्द सुन सकती है। आकाश में विचरने वाला प्रत्यक्ष वायु ही व्यान का
बाह्य स्वरूप है, यह इस शरीर
के बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्ग को चेष्टाशील करता है और शान्ति प्रदान करता है; भीतरी व्यानवायु को नाडियों में संचारित
करने तथा त्वचा इन्द्रिय को स्पर्श का ज्ञान कराने में भी यह सहायक है ॥ ८ ॥
तेजो ह वा
उदानस्तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥ ९ ॥
प्रसिद्ध तेज
(गर्मी) ही उदान है इसीलिये जिसके शरीर का तेज शान्त हो जाता है, वह (जीवात्मा) मन में विलीन हुई इन्द्रियों के
साथ पुनर्जन्म को (प्राप्त होता है) ॥ ९ ॥
व्याख्या- सूर्य
और अग्रि का जो बाहरी तेज अर्थात् उष्णत्व है, वही उदान का बाह्य स्वरूप है। वह शरीर के बाहरी
अङ्ग-प्रत्यङ्गों को ठंडा नहीं होने देता और शरीर के भीतर की ऊष्मा को भी स्थिर
रखता है। जिसके शरीर से उदानवायु निकल जाता है, उसका शरीर गरम नहीं रहता अतः शरीर की गर्मी शान्त हो
जाते ही उसमें रहने वाला जीवात्मा मन में विलीन हुई इन्द्रियों को साथ लेकर
उदानवायु के साथ-साथ दूसरे शरीर में चला जाता है (गीता १५ । ८) ॥ ९ ॥
|
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्यत्क्रामतीश्वरः। गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥8॥
जिस प्रकार से वायु सुगंध
को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है उसी प्रकार से देहधारी आत्मा जब
पुराने शरीर का त्याग करती है और नये शरीर में प्रवेश करती है उस समय वह अपने
साथ मन और इन्द्रियों को भी ले जाती है। |
सम्बन्ध - अब
आश्वलायन के चौथे प्रश्न में आयी हुई एक शरीर से निकलकर दूसरे शरीर में या लोकों में
प्रवेश करने की बात का पुनः स्पष्टीकरण किया जाता है-
यच्चित्तस्तेनैष
प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति ॥ १० ॥
यह (जीवात्मा) जिस
संकल्प वाला (चित्त वाला) होता है; उस संकल्प के साथ मुख्य प्राण में स्थित हो जाता है। मुख्य प्राण तेज (उदान)
से युक्त हो अपने सहित (मन, इन्द्रियों
से युक्त जीवात्मा को) उसके संकल्पानुसार भिन्न-भिन्न लोक अथवा योनि में ले जाता
है ॥ १० ॥
व्याख्या -मरते
समय इस आत्मा का जैसा संकल्प होता है, इसका मन अन्तिम क्षण में जिस भाव का चिन्तन करता है (गीता ८। ६), उस संकल्प के सहित मन, इन्द्रियों को साथ लिये हुए यह मुख्य प्राण में
स्थित हो जाता है। वह मुख्य प्राण उदानवायु से मिलकर अपने सहित मन और इन्द्रियों से
युक्त जीवात्मा को उस अन्तिम संकल्प के अनुसार यथायोग्य भिन्न-भिन्न लोक अथवा योनि
में ले जाता है। अतः मनुष्य को उचित है कि अपने मन में निरन्तर एक भगवान का ही
चिन्तन रखे, दूसरा संकल्प न
आने दे, क्योंकि जीवन अल्प और
अनित्य है, न जाने कब अचानक इस
शरीरका अन्त हो जाय। यदि उस समय भगवान् का चिन्तन न होकर कोई दूसरा संकल्प आ गया
तो सदा की भाँति पुनः चौरासी लाख योनियों में भटकना पड़ेगा ॥ १० ॥
|
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित: ॥८_६ ॥ हे कुन्तीपुत्र! शरीर
त्यागते समय मनुष्य जिस-जिस भाव का स्मरण करता है, वह उस उस भाव को निश्चित रूप से प्राप्त होता है। |
य एवं
विद्वान्प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ११ ॥
जो कोई विद्वान् इस
प्रकार प्राण (के रहस्य) को जानता है उसकी प्रजा (संतान परम्परा) कदापि नष्ट नहीं
होती (वह) अमर हो जाता है- इस विषय का यह (अगला) श्लोक (है) ॥ ११ ॥
व्याख्या-जो कोई
विद्वान् इस प्रकार इस प्राण के रहस्य को समझ लेता है, प्राण के महत्त्व को समझकर हर प्रकार से उसे
सुरक्षित रखता है, उसकी
अवहेलना नहीं करता, उसकी
संतानपरम्परा कभी नष्ट नहीं होती, क्योंकि उसका वीर्य अमोघ और अद्भुत शक्तिसम्पन्न हो जाता है। और वह यदि उसके
आध्यात्मिक रहस्य को समझकर अपने जीवन को सार्थक बना लेता है, एक क्षण भी भगवान् के चिन्तन से शून्य नहीं
रहने देता, तो सदा के लिये अमर
हो जाता है अर्थात् जन्म-मरणरूप संसार से मुक्त हो जाता है। इस विषय पर निम्नलिखित
ऋचा है - ॥ ११ ॥
उत्पत्तिमायतिं
स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा ।
अध्यात्मं चैव
प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते विज्ञायामृतमश्नुत इति ॥ १२ ॥
प्राण की उत्पत्ति
आगम स्थान और व्यापकता को भी तथा बाह्य एवं आध्यात्मिक पाँच भेदों को भी भलीभाँति
जानकर (मनुष्य) अमृतका अनुभव करता है, जानकर अमृत का अनुभव करता है। यह पुनरुक्ति प्रश्न की समाप्ति सूचित करने
के लिये है ॥ १२ ॥
व्याख्या -
उपर्युक्त विवेचन के अनुसार जो मनुष्य प्राण की उत्पत्ति को अर्थात् यह जिससे और
जिस प्रकार उत्पन्न होता है-इस रहस्य को जानता है, शरीर में उसके प्रवेश करने की प्रक्रिया का तथा इसकी
व्यापकता का ज्ञान रखता है तथा जो प्राण की स्थिति को अर्थात् बाहर और
भीतर-कहाँ-कहाँ वह रहता है, इस
रहस्य को तथा इसके बाहरी और भीतरी अर्थात् आधिभौतिक और आध्यात्मिक पाँचों भेदों के
रहस्य को भलीभाँति समझ लेता है, वह अमृतस्वरूप परमानन्दमय परब्रह्म परमेश्वर को प्राप्त कर लेता है तथा उस
आनन्दमय के संयोग-सुख का निरन्तर अनुभव करता है ॥ १२ ॥
॥ तृतीय प्रश्न समाप्त ३ ॥
तीसरे प्रश्न का सारांश
यह अध्याय महर्षि आश्वलायन और महर्षि पिप्पलाद के बीच एक
वाद-विवाद है, जहाँ आश्वलायन
प्राण के प्रकृति को समझने का प्रयास करते हैं। इस वाद में कुछ मुख्य बिंदुओं को
खोलते हैं:
1.
प्राण
का उत्पत्ति स्थान: यह प्राण परमात्मा या आत्मा (परमात्मा) से उत्पन्न होता है और
इस परमात्मा के आश्रित होता है, जैसे कि एक व्यक्ति की छाया उसके परमात्मा के आश्रित होती है।
2.
शरीर
में प्राण का प्रवेश: प्राण मानसिक संकल्प के माध्यम से शारीरिक शरीर में प्रवेश
करता है और विभिन्न शारीरिक क्रियाओं के लिए जिम्मेदार होता है।
3.
प्राण
की कार्य: प्राण शरीर में विभिन्न कार्यों को नियंत्रित करता है, जैसे श्वास की चालन, पाचन (अपान), और ऊर्जा का शरीर में प्रसारण। यह मन और इंद्रियों
का भी निग्रह करता है।
4.
नाडियों
की भूमिका: अध्याय में शरीर में अनगिनत
नाडियों की मौजूदगी का वर्णन है, जिनमें से एक मुख्य नाडी को 'सुषुम्णा' कहा जाता है।
प्राण इन नाडियों के माध्यम से घूमता है, और सुषुम्णा हृदय से मस्तक तक जुड़ती है।
5.
कर्म
और पुनर्जन्म: प्राण कर्म और पुनर्जन्म के चक्र में भी एक भूमिका निभाता है। यह
कर्मों के आधार पर आत्मा को विभिन्न लोकों में ले जाता है, जिससे विभिन्न जीवन रूपों का अनुभव होता है।
6.
विभिन्न
प्राणों की भूमिका: शरीर में विभिन्न प्राणों, जैसे कि उदान और व्यान, की विशेष भूमिकाएँ होती हैं, और इन्हें शरीर की विभिन्न भौतिकी प्रक्रियाओं में
योगदान करने का काम होता है।
7.
प्राकृतिक
तत्वों से संबंध: अध्याय में प्राण और
प्राकृतिक तत्वों, जैसे कि
सूर्य, पृथ्वी, और आकाश के बीच संबंध का वर्णन भी है।
8.
मोक्ष:
अध्याय यह बताता है कि जो व्यक्ति प्राण और इसके कार्यों के रहस्य को समझते हैं,
वे मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं और अमर
बन सकते हैं।
संक्षेप में,
यह अध्याय प्राण, उसकी उत्पत्ति, कार्यों,
और जीवन और मृत्यु के चक्र में इसकी
भूमिका को अन्वेषण करता है। इस अध्याय ने आध्यात्मिक विकास और अंतिम मोक्ष के लिए
प्राण को समझने के महत्व को महत्वपूर्ण बताया है।
