Sunday, 8 October 2023

प्रश्नोपनिषद्- प्रथम प्रश्न

 ।। ॐ श्रीपरमात्मने नमः ।।

 

प्रश्नोपनिषद्

 

प्रश्नोपनिषद् अथर्ववेदके पिप्पलाद-शाखीय ब्राह्मणभागके अन्तर्गत है। इस उपनिषद्में पिप्पलाद ऋषिने सुकेशा आदि छः ऋषियोंके छः प्रश्नोंका क्रमसे उत्तर दिया है; इसलिये इसका नाम प्रश्नोपनिषद् हो गया।

 


शान्तिपाठ

 

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥* स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः !! शान्तिः !!!

 

हे देवगण! हम भगवान का यजन (आराधन) करते हुए कानों से कल्याणमय वचन सुनें, नेत्रों से कल्याण (ही) देखें, सुदृढ़ अङ्गों एवं शरीर से भगवान की स्तुति करते हुए हम लोग जो आयु देवहित में अर्थात परमात्मा के काम आ सके, उसका उपभोग करें। सब ओर फैले हुए सुयश वाले इन्द्र हमारे लिये कल्याण का पोषण करें। सम्पूर्ण विश्व का ज्ञान रखने वाले पूषा हमारे लिये स्वस्ति अर्थात कल्याण का पोषण करें। अरिष्टों को मिटाने के लिये चक्रसदृश शक्तिशाली गरुडदेव हमारे लिये कल्याण का पोषण करें तथा (बुद्धिके स्वामी) बृहस्पति भी हमारे लिये कल्याण की पुष्टि करें।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः- परमात्मन्! हमारे त्रिविध तापकी शान्ति हो ।

 

प्रथम प्रश्न

 

ॐ सुकेशा च भारद्वाजः शैव्यश्च सत्यकामः सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्यश्चाश्वलायनो भार्गवो वैदर्भिः कबन्धी कात्यायनस्ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ १ ॥

 

ॐ इस परमात्मा के नाम का स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ करते हैं।

 

भरद्वाज-पुत्र सुकेशा और शिविकुमार सत्यकाम तथा गर्गगोत्र में उत्पन्न सौर्यायणी एवं कोसलदेशीय आश्वलायन तथा विदर्भनिवासी भार्गव और कत्य ऋषि का प्रपौत्र कबन्धी -वे ये छः प्रसिद्ध ऋषि जो वेदपरायण (और) ब्रह्मनिष्ठ (वेद में निष्ठा रखने वाले) थे। वे सब-के-सब परम् ब्रह्म की खोज करते हुए; यह समझकर कि ये (पिप्पलाद ऋषि) निश्चय ही उस ब्रह्म के विषय में सारी बातें बतायेंगे; हाथ में समिधा लिये हुए भगवान् पिप्पलाद ऋषिके पास गये ॥ १ ॥

 

 

तान्ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान्पृच्छत यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥

 

उन सुकेशा आदि ऋषियों से वे (पिप्पलाद) ऋषि बोले- तुमलोग श्रद्धा के साथ ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, (और) तपस्यापूर्वक एक वर्ष तक (यहाँ) भलीभांति निवास करो। (उसके बाद) अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार प्रश्न पूछना। यदि (तुम्हारी पूछी हुई बातोंको) मैं जानता होऊँगा; तो निःसंदेह वे सब बातें - तुम लोगों को बताऊँगा ॥ २ ॥

 

सम्बन्ध – ऋषि के आज्ञानुसार सब ने श्रद्धा, ब्रह्मचर्य और तपस्या के साथ विधिपूर्वक एक वर्षतक वहाँ निवास किया।

 

कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ । भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ ३ ॥ अथ

 

उनमें से कत्य ऋषि के प्रपौत्र कबन्धी ने (पिप्पलाद ऋषि के) पास जाकर पूछा- भगवन्! किस प्रसिद्ध और सुनिश्चित कारण विशेष से यह सम्पूर्ण प्रजा नाना रूपों में उत्पन्न होती है- यह मेरा प्रश्न है ॥ ३ ॥

 

 

तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते। रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति ॥ ४ ॥

 

उससे वे प्रसिद्ध महर्षि बोले- निश्चय ही प्रजा उत्पन्न करने की इच्छावाला (जो) प्रजापति है, उसने तप किया। उसने तपस्या करके (जब सृष्टि का आरम्भ किया, उस समय पहले) उसने एक तो रयि तथा दूसरा प्राण भी -यह जोड़ा उत्पन्न किया। इन्हें उत्पन्न करने का उद्देश्य यह था कि ये दोनों मेरी नाना प्रकार की प्रजाओं को उत्पन्न करेंगे ॥ ४ ॥

 

 

आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत् सर्वं यन्मूर्त चामूर्त च तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥ ५ ॥

 

यह निश्चय है कि आदित्य (सूर्य) ही प्राण हैं (और) चन्द्रमा ही रयि है। जो कुछ मूर्त अर्थात आकार वाला है (पृथ्वी, जल और तेज) और जो अमूर्त अर्थात आकाररहित है (आकाश और वायु) यह सभी कुछ रयि है, इसलिये मूर्तमात्र ही अर्थात् देखने तथा जानने में आने वाली सभी वस्तुएँ रयि हैं॥५॥

 

अथादित्य उदयन्यत्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते । यद्दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत्सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥ ६ ॥

 

रात्रि के अनन्तर उदय होता हुआ सूर्य जो पूर्व दिशा में प्रवेश करता है, उससे पूर्व दिशा के प्राणों को अपनी किरणों में धारण करता है (उसी प्रकार) जो दक्षिण दिशा को; जो पश्चिम दिशा को; जो उत्तर दिशा को; जो नीचे के लोकों को; जो ऊपर के लोकों को; जो दिशाओं के बीच के भागों (कोणों) को (और) जो अन्य सबको प्रकाशित करता है, वह समस्त प्राणों को अर्थात् सम्पूर्ण जगत के प्राणों को अपनी किरणों में धारण करता है ॥६॥

 

इस मन्त्रमें सम्पूर्ण प्राणियों के शरीरों में जो जीवनी-शक्ति है, उसके साथ सूर्य का सम्बन्ध दिखलाया गया है। जिस समय जिस दिशा में जहाँ-जहाँ सूर्य अपना प्रकाश फैलाता है, वहाँ-वहाँ के प्राणियोंको स्फूर्ति देता रहता है; अतः सूर्य ही समस्त प्राणियों का प्राण है।

 

 

स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते । तदेतदृचाभ्युक्तम् ॥ ७ ॥

 

वह यह सूर्य ही उदय होता है (जो कि) वैश्वानर अग्नि (जठराग्नि) और विश्वरूप प्राण है, वही यह बात ऋचा द्वारा आगे कही गयी है ॥७॥

 

व्याख्या – प्राणियों के शरीर में जो वैश्वानर नाम से कही जाने वाली जठराग्नि है, जिससे अन्न का पाचन होता है, वह सूर्य का ही अंश है; अतः सूर्य ही है। तथा जो प्राण, अपान, समान,व्यान और उदान—इन पाँच रूपों में विभक्त प्राण है, वह भी इस उदय होनेवाले सूर्य का ही अंश है; अतः सूर्य ही है। यही बात अगली ऋचा द्वारा समझायी गयी है।

 

 

विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् । सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥ ८ ॥

 

सम्पूर्ण रूपों के केन्द्र सर्वज्ञ, सर्वाधार, प्रकाशमय तपते हुए किरणों वाले सूर्य को अद्वितीय (बतलाते हैं)। यह सहस्रों किरणों वाला सूर्य सैकड़ों प्रकार से बर्तता हुआ समस्त जीवों का प्राण (जीवनदाता) होकर उदयति-उदय होता है ॥ ८ ॥

 

*सम्पूर्ण सृष्टि का जीवन- दाता प्राण ही सूर्य के रूपमें उदित होता है*

 

सम्बन्ध— इस प्रकार यहाँ तक कात्यायन कबन्धी के प्रश्नानुसार संक्षेप में यह बताया गया कि उस सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वर से ही उसके सङ्कल्पद्वारा प्राण और रयि के संयोग से इस सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति आदि होती है। अब इस प्राण-शक्ति और रयि-शक्ति के सम्बन्ध से परमेश्वर की उपासना का प्रकार और उसका फल बतलाने के लिये दूसरा प्रकरण आरम्भ करते हैं-

 

संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च । तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते । त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेत ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते । एष ह वै रयिर्य: पितृयाणः ॥ ९ ॥

 

संवत्सर (बारह महीनों वाला काल) ही प्रजापति है, उसके दो अयन हैं- एक दक्षिण और दूसरा उत्तर। वहाँ मनुष्यों में जो लोग निश्चयपूर्वक (केवल) उन इष्ट और पूर्त कर्मों को ही करने योग्य कर्म मानकर (सकाम भाव से) उनकी उपासना करते हैं (उन्हीं के अनुष्ठान में लगे रहते हैं), वे चन्द्रमा के लोक को ही जीतते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं (और) वे ही पुनः (वहाँ से) लौटकर आते हैं, इसलिये ये संतान की कामना वाले ऋषिगण दक्षिण (मार्ग) को प्राप्त होते हैं। निस्सन्देह यही वह रयि है, जो 'पितृयान' नामक मार्ग है ॥ ९ ॥

 

 

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते । एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष श्लोकः ॥ १०॥

 

किंतु (जो) तपस्या के साथ ब्रह्मचर्यपूर्वक (और) श्रद्धा से युक्त होकर अध्यात्मविद्या के द्वारा (सूर्यरूप) परमात्मा की अन्विष्य खोज करके (जीवन सार्थक करते हैं) वे उत्तरायण-मार्ग से सूर्यलोक को जीत लेते हैं (प्राप्त करते हैं)। यह (सूर्य) ही प्राणों का केन्द्र है, यह अमृत (अविनाशी) और निर्भय पद है, यह परमगति है, इससे पुनः लौटकर नहीं आते।  इस प्रकार यह निरोध (पुनरावृत्ति का निवारक) है, इस बात को स्पष्ट करने वाला यह (अगला) श्लोक है ॥ १० ॥

 

 

पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम् । अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितमिति ॥ ११ ॥

 

(कितने ही लोग तो इस सूर्य को ) पाँच चरणों वाला, सबका पिता, बारह आकृतियों वाला, जल का उत्पादक, (और) स्वर्गलोक से भी ऊपर के स्थान में (स्थित) बतलाते हैं। ये दूसरे कितने ही लोग सात पहियों वाले (और) अरों वाले (रथमें) बैठा हुआ (एवं) सबको भलीभाँति जाननेवाला है- ऐसा बतलाते हैं ॥ ११ ॥

 

 

मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुक्लः प्राणस्तस्मादेत ऋषयः शुक्ल इष्टं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥ १२ ॥

 

मास भी उसी प्रजापति की प्रतीक है, और इसके कृष्ण पक्ष को 'रयि' कहा जाता है और 'शुक्ल पक्ष' को 'प्राण' कहा जाता है।

जो कल्याणकामी ऋषि हैं, वे रयिस्थानीय भोग-पदार्थों से विरक्त होकर अपने समस्त शुभ कर्म शुक्लपक्षस्थानीय प्राणाधार परब्रह्म परमेश्वर को अर्पण करते हैं- स्वयं उसका कोई फल नहीं चाहते; यही गीतोक्त कर्मयोग है।

इनसे भिन्न जो भोगासक्त मनुष्य हैं, वे कृष्णपक्ष में अर्थात् कृष्णपक्षस्थानीय स्थूल पदार्थों की प्राप्ति के उद्देश्य से सब प्रकार के कर्म किया करते हैं। इनका वर्णन गीता में 'स्वर्गपरा:' के नाम से हुआ है (गीता २ । ४२ - ४४) ॥ १२ ॥

 

 

अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या ज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ १३ ॥

 

दिन और रात का जोड़ा भी उसी प्रजापति की प्रतीक है, इसमें रात्रि को 'रयि' और दिन को 'प्राण' कहा जाता है। दिन तो मानो प्राण अर्थात् सबको जीवन देने वाला प्रकाशमय विशुद्ध स्वरूप है और रात्रि ही भोगरूप रयि है। इंद्रिय आनंद में बिताया गया दिन जीवन को नष्ट कर देता है। जीवन शक्ति (प्राण) का उपयोग आत्म-नियंत्रण करके आध्यात्मिक प्राप्ति के लिए करना ही ब्रह्मचर्य है।

 

दिन और रात का जोड़ा ही प्रजापति है, उसका दिन ही प्राण है (और) रात्रि ही रयि है (अतः) जो दिन में स्त्री-वास करते हैं,  ये लोग सचमुच अपने प्राणों को ही क्षीण करते हैं तथा (मनुष्य) जो रात्रि में स्त्री-सहवास करते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है॥ १३ ॥

 

 

अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ १४ ॥

 

इस मन्त्र में अन्न को प्रजापति का स्वरूप बतलाते हुए कहा गया है कि सब प्राणियों का आहाररूप अन्न ही प्रजापति है, क्योंकि इसी से वीर्य (जीवन का बीज) उत्पन्न होता है और उससे सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न होती है।

 

सम्बन्ध—अब पहले बतलाये हुए दो प्रकार के साधकों को मिलने वाले पृथक्-पृथक् फल का वर्णन करते हैं-

 

तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते । तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम्॥ १५ ॥

 

प्रजापति व्रत (ऊपर के श्लोकों में वर्णित) का अनुष्ठान करने कुछ लोग संतति को उत्पन्न करते हैं, इनमें से जो पूरी तरह सत्य में प्रतिष्ठित होते हैं उन्हें ही ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।

 

तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्यमनृतं न माया चेति ।। १६ ।।

 

जिनमें न तो कुटिलता (और) झूठ (मिथ्या भाषण) है तथा न माया (कपट) ही है, उन्हीं को वह विशुद्ध, विकाररहित ब्रह्मलोक (मिलता है) ॥ १६ ॥

 

॥ प्रथम प्रश्न समाप्त ॥ १ ॥

 

 



 

Friday, 2 June 2023

कठोपनिषद - द्वितीय अध्याय, द्वितीय वल्ली

 

प्रथम अध्याय

तृतीय वल्ली

 

 

पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः ।

अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते । एतद्वै तत् ॥ १॥

 

सरल, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप अजन्मा परमेश्वर का ग्यारह द्वारों वाला (मनुष्य-शरीररूप) पुर (नगर) है (इसके रहते हुए ही) साधन करके (परमेश्वर का ध्यान आदि) मनुष्य कभी शोक नहीं करता और जीवन्मुक्त -वही है वह (परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा था ) ॥१॥

 

हँसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्-

    होता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् ।

नृषद्वरसदृतसद्व्योमसद्

    अब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २॥

 

सम्बन्ध - अब उस परमेश्वरकी सर्वरूपता का स्पष्टीकरण करते हैं-

 

जो विशुद्ध परमधाम में रहनेवाला हंस अर्थात स्वयं प्रकाश (पुरुषोत्तम) है (वही) अन्तरिक्ष में निवास करने वाला वसु है, घरों में उपस्थित होने वाला अतिथि है (और) यज्ञ की वेदी पर स्थापित अग्निस्वरूप तथा उसमें आहुति डालनेवाला 'होता' है (तथा) समस्त मनुष्यों में रहने वाला, मनुष्यों से श्रेष्ठ देवताओं में रहने वाला सत्य में रहने वाला (और) आकाश में रहने वाला (है तथा) जलों में नाना रूपों से प्रकट होने वाला, पृथिवी में नाना रूपों से प्रकट होने वाला, सत्कर्मों में प्रकट होने वाला (और), पर्वतों में नाना रूप से प्रकट होने वाला (है), वही सबसे बड़ा परम सत्य है ॥ २ ॥

 

ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति ।

मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३॥

 

(जो) प्राण को ऊपर की ओर उठाता है (और) अपान को नीचे ढकेलता है; शरीर के मध्य (हृदय) में बैठे हुए (उस) सर्वश्रेष्ठ भजने योग्य परमात्मा की सभी देवता उपासना करते हैं ॥ ३ ॥

 

अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः ।

देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ४॥

 

इस शरीर में स्थित, एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने वाले, जीवात्मा के शरीर से निकल जाने पर यहाँ (इस शरीर में) क्या शेष रहता है यही हैं वह (परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा था ) ॥ ४ ॥

 

सम्बन्ध - अब निम्राङ्कित दो मन्त्रों में यमराज नचिकेता के पूछे हुए तत्त्व को पुनः दूसरे प्रकार से वर्णन करने की प्रतिज्ञा करते हैं -

 

न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन ।

इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५॥

 

कोई भी न मरणशील प्राणी न प्राण से, न अपान से जीवित रहता है किन्तु जिसमें ये दोनों (वास्तव में पाँचों प्राणवायु) उपाश्रित हैं, अन्य से ही जीवित रहते हैं।

 

हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ।

यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ ६॥

 

हे गौतमवंशीय नचिकेता! (वह) रहस्यमय सनातन ब्रह्म और जीवात्मा मरण को प्राप्त करके जैसे होता है- यह तुम्हें निश्चय ही बताऊँगा।

 

 

योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः ।

स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७॥

 

जिसका जैसा कर्म होता है और शास्त्रादि के श्रवण द्वारा जिसको जैसा भाव प्राप्त हुआ है (उन्ही के अनुसार) शरीर धारण करने के लिए कितने ही जीवात्मा तो (नाना प्रकार की जङ्गम ) योनियों को प्राप्त हो जाते हैं और दूसरे (कितने ही) स्थाणु (स्थावर) भाव का अनुसरण करते हैं ||||

 

सम्बन्ध - यमराज ने जीवात्मा की गति और परमात्मा का स्वरूप- इन दो को बतलाने की प्रतिज्ञा की थी; इनमें मरने के बाद जीवात्मा की क्या गति होती है, बतलाकर अब वे दूसरी बात बतलाते हैं-

 

य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः ।

तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥

तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन ।

एतद् वै तत् ॥ ८ ॥

 

जो यह (जीवोंके कर्मानुसार) नाना प्रकार के भोगों का निर्माण करनेवाला, परमपुरुष परमेश्वर (प्रलयकाल में सब के सो जाने पर भी जागता रहता है, वही परम विशुद्ध तत्त्व है। वही ब्रह्म है। वही अमृत कहलाता है (तथा) उसी में सम्पूर्ण लोक आश्रय पाये हुए हैं। उसे कोई भी अतिक्रमण नहीं कर सकता। यही है वह (परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा था) ॥ ८ ॥

 

ये श्लोक मनुष्य के सोते हुए स्वरूप में जाग्रत अस्तित्व करने वाली अनन्त चेतना, जिसे परमात्मा या ब्रह्म कहा जाता है, के बारे में बताते हैं। इसका महत्वपूर्ण संकेत है कि यह अनन्त चेतना सभी इच्छाओं से परे होती है और सभी प्राणियों में स्थित होती है। यह श्लोक भी दर्शाता है कि यही सत्यता अमरत्व की स्रोत है और परम तत्व है।

 

सम्बन्ध- अब अग्नि के दृष्टान्त से उस परब्रह्म परमेश्वर की व्यापकता और निर्लेपता का वर्णन करते हैं-

 

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो

    रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा

    रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९॥

 

जिस प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट एक ही अग्नि नाना रूपों में, उनके समान रूपवाला हो रहा है, वैसे (ही); समस्त प्राणियों का अन्तरात्मा परब्रह्म एक होते हुए भी नाना रूपों में उन्हीं के जैसे रूपवाला (हो रहा है) और उनके बाहर भी है ॥ ९ ॥

 

यह श्लोक बताता है कि जैसे एक ही अग्नि एक ही भूमि में प्रविष्ट होकर अनेक रूपों में प्रकट होती है, उसी प्रकार एक ही चेतना सब भूतों के आंतरिक आत्मा में स्थित होकर अपने रूप को अनेक रूपों में प्रकट करती है। इससे यह समझना चाहिए कि सभी भूत और वस्तुएं स्वयं में एक ही आंतरिक आत्मा को धारण करती हैं, जिसे अनेक रूपों में प्रकट किया जाता है।

 


सम्बन्ध-वही बात वायु के दृष्टान्त से कहते हैं-

 

वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो

    रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा

    रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १०॥

 

जिस प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट एक (ही) वायु नाना रूपों में, उनके समान रूपवाला हो रहा है, वैसे (ही) सब प्राणियों का अन्तरात्मा परब्रह्म एक होते हुए भी नाना रूपों में उन्हीं के जैसे रूपवाला (हो रहा है) और उनके बाहर भी है ॥ १०॥

 

यह श्लोक बताता है कि जैसे एक ही वायु एक ही भूमि में प्रविष्ट होकर अनेक रूपों में प्रकट होती है, उसी प्रकार एक ही चेतना सब भूतों के आंतरिक आत्मा में स्थित होकर अपने रूप को अनेक रूपों में प्रकट करती है। इससे यह समझना चाहिए कि सभी भूत और वस्तुएं स्वयं में एक ही आंतरिक आत्मा को धारण करती हैं, जिसे अनेक रूपों में प्रकट किया जाता है।

 

सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुः

    न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा

    न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११॥

 

सम्बन्ध - इस मन्त्र में सूर्य के दृष्टान्त से परमात्मा की निर्लेपता दिखलाते हैं-

 

जिस प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड का प्रकाशक सूर्य (लोगों की) आँखों से होने वाले बाहर के दोषों से लिप्त नहीं होता तथा उसी प्रकार सब प्राणियों का एक अंतरात्मा (परब्रह्म परमात्मा) लोगों के दुःखों से लिप्त नहीं होता क्योंकि सब में रहता हुआ भी वह सबसे अलग है ॥ ११ ॥

 

इससे यह समझना चाहिए कि चेतना सर्वत्र स्थित होती है और उसे बाह्य दोषों या लोक के दुःख से प्रभावित नहीं किया जा सकता है।

 

एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा

    एकं रूपं बहुधा यः करोति ।

तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीराः

    तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२॥

 

सर्वभूतान्तरात्मा सब प्राणियों का अन्तर्यामी अद्वितीय एवं सबको वश में रखने वाला (परमात्मा) अपने एक ही रूप को बहुत प्रकार से बना लेता है, उस अपने अंदर रहने वाले (परमात्मा) को जो ज्ञानी पुरुष निरन्तर देखते रहते हैं, उन्हीं को सदा अटल रहने वाला परमानन्दस्वरूप वास्तविक सुख (मिलता है) दूसरों को नहीं ।। १२ ।।

 

इस श्लोक में कहा गया है कि वह चेतना एक ही है और सभी भूतों के आंतरिक आत्मा है, जो एक रूप को अनेक रूपों में प्रकट करती है। धीर पुरुषों को जो उसमे स्थित होते हैं, उनका शाश्वत सुख होता है, दूसरों का नहीं। यह श्लोक एकता के सिद्धांत को संकेत करता है और सुख का आधार अपने आत्मा में ढूंढने की प्रेरणा देता है।

 

नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानाम्

    एको बहूनां यो विदधाति कामान्।

तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीराः

    तेषां शान्तिः  शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १३॥

 

जो नित्यों का (भी) नित्य (है), चेतनों का (भी) चेतन है (और) अकेला ही इन अनेक (जीवों) के कर्मफलभोगों का विधान करता है उस अपने अंदर रहनेवाले (पुरुषोत्तम) को जो ज्ञानी निरन्तर देखते रहते हैं, उन्हीं को सदा अटल रहने वाली शान्ति (प्राप्त होती है), दूसरों को नहीं ॥१३॥

 

यह श्लोक बताता है कि जो नित्य, चेतन एकमात्र सत्ता है, वह एक ही है और बहुतों को उनके इच्छित भोगों का प्रदान करता है। धीर पुरुषों को जो उसमे स्थित होते हैं, उनकी शांति होती है, दूसरों की नहीं।

 

सम्बन्ध—जिज्ञासु नचिकेता इस प्रकार उस ब्रह्मप्राप्ति के आनन्द और शान्ति की महिमा सुनकर मन-ही-मन विचार करने लगा-

 

तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् ।

कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ॥ १४॥

 

वह अनिर्वचनीय परम सुख, यह (परमात्मा) ही है- यों (ज्ञानीजन) मानते हैं, उसको किस प्रकार से मैं भलीभाँति समझूँ? क्या (वह) प्रकाशित होता है या अनुभव में आता है? ॥१४॥

 

यह श्लोक उक्त ज्ञान की अद्वितीयता और प्रकट होने के सम्बन्ध में संदेह को प्रकट करता है।

 

सम्बन्ध – नचिकेता के आन्तरिक भाव को समझकर यमराज ने कहा-

 

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं

    नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।

तमेव भान्तमनुभाति सर्वं

    तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १५॥

 

वहाँ न (तो) सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा और तारों का समुदाय (ही प्रकाशित होता है) और न ये बिजलियाँ ही (वहाँ) प्रकाशित होती हैं। फिर यह (लौकिक) अग्नि कैसे (प्रकाशित हो सकता है क्योंकि) उसके प्रकाशित होने पर ही (उसी के प्रकाश से), (ऊपर बतलाये हुए सूर्यादि) सब प्रकाशित होते हैं। उसी के प्रकाश सेयह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है ॥ १५ ॥

 

  ॥ इति काठकोपनिषदि द्वितीयाध्याये द्वितीया वल्ली ॥

Thursday, 1 June 2023

कठोपनिषद - द्वितीय अध्याय, प्रथम वल्ली

 

द्वितीय अध्याय, प्रथम वल्ली

 

 

पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू-

    स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् ।

कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष-

    दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १॥

 

सम्बन्ध - तृतीय वल्ली में यमराज कहते हैं कि परब्रह्म सभी प्राणियों में स्थित है, परंतु सभी उनको देख नहीं पाते। कोई विरला ही अपनी सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा उन्हें देख सकता है। अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि जब वे ब्रह्म अपने ही हृदय में विराजमान हैं तो उन्हें सभी लोग अपनी बुद्धिरूपी  नेत्रों से क्यों नहीं देख पाते? कोई विरला ही क्यों देख पाता है?  इस का उत्तर आगे मिलता हैं-

 

स्वयंभूः (स्वयं प्रकट होने वाले) परमेश्वर ने समस्त इन्द्रियों के द्वार बाहर की ओर जाने वाले ही बनाये हैं, इसलिये (मनुष्य इन्द्रियों के द्वारा प्रायः बाहर की वस्तुओं को ही; पश्यति देखता है; अन्तरात्मा को नहीं। किसी (भाग्यशाली) बुद्धिमान् मनुष्य ने ही  अमृतत्वम् को जानने की इच्छा करके चक्षु आदि इन्द्रियों को बाह्य विषयों की ओर से लौटाकर अन्तरात्मा को देखा है॥१॥

 

पराचः कामाननुयन्ति बाला-

    स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् ।

अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा

    ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २॥

 

जो मूर्ख बाह्य भोगों का अनुसरण करते हैं (उन्हीं में अनुरक्त रहते हैं), वे सर्वत्र फैले हुए

मृत्यु के बन्धन में पड़ते हैं किंतु बुद्धिमान् मनुष्य नित्य अमृतत्व को विवेक द्वारा जानकर

इस जगत में अनित्य भोगों में से किसी को (भी) नहीं चाहते ॥ २ ॥

 

येन रूपं रसं गन्धं शब्दान् स्पर्शाꣳश्च मैथुनान् ।

एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३॥

 

जिसके अनुग्रह से (मनुष्य) शब्दों को , स्पर्शो को, रूप-समुदाय को, रस-समुदाय को, गन्ध समुदाय को और मैथुन आदि के सुखों को अनुभव करता है उसी के अनुग्रह से (यह भी जानता है कि) यहाँ क्या शेष रह जाता है। यह ही हैं - वह परमात्मा (जिसके विषय में तुमने पूछा था ॥ ३ ॥

 

स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति ।

महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४॥

 

स्वप्न के दृश्यों को और जाग्रत्-अवस्था के दृश्यों को - इन दोनों अवस्थाओं के दृश्यों को (मनुष्य) जिससे बार-बार देखता है; उस सर्वश्रेष्ठ, सर्वव्यापी, सबके आत्मा को जानकर बुद्धिमान् मनुष्य शोक नहीं करता ॥ ४ ॥

 

य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात् ।

ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ ५॥

 

जो मनुष्य कर्मफलदाता, सबको जीवन प्रदान करनेवाले तथा भू (वर्तमान) और भविष्य का शासन करने वाले इस परमात्मा को (अपने) समीप जानता है, उसके बाद वह (कभी) किसी की निन्दा नहीं करता है। (नचिकेता !) यह ही (है)-वह (तुमने जिस ब्रह्म के विषय में पूछा था) ॥ ५ ॥

 

*यहाँ 'जीव' शब्द परमात्मा के लिये ही प्रयुक्त हुआ है; क्योंकि भूत, भविष्य और वर्तमान का शासक जीव नहीं हो सकता। प्रसंग भी यहाँ परमात्मा का है, जीव का नहीं ।

 


यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत ।

गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत । एतद्वै तत् ॥ ६॥

 

सम्बन्ध - अब यमराज यह बतलाते हैं कि ब्रह्मा से लेकर स्थावर पर्यन्त सृष्टि के समस्त प्राणी उन परब्रह्म परमेश्वर से ही उत्पन्न हुए हैं। अतः जो कुछ भी है, सब उन्हीं का रूप विशेष है। उनसे भिन्न यहाँ कुछ भी नहीं है; क्योंकि इस सम्पूर्ण जगत के अभिन्न निमित्तोपादान कारण एकमात्र परमेश्वर ही हैं, वे एक ही अनेक रूपों में स्थित हैं।

 

जो पहले जल से (हिरण्यगर्भ ब्रह्मा) रूप में प्रकट हुआ था, उस सबसे पहले तप से उत्पन्न हृदय-गुफा में प्रवेश करके जीवात्माओं के साथ स्थित रहने वाले परमेश्वर को जो पुरुष देखता है (वही ठीक देखता है), -यह ही है वह (परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा था) ॥ ६ ॥

 

 

या प्राणेन संभवत्यदितिर्देवतामयी ।

गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत । एतद्वै तत् ॥ ७॥

 

सम्बन्ध - उन्हीं परब्रह्म का अब अदितिदेवी के रूप से वर्णन करते हैं-

 

जो देवतामयी अदिति प्राणों के सहित उत्पन्न होती है या जो प्राणियों के सहित उत्पन्न हुई है (तथा जो ) हृदयरूपी गुफा में प्रवेश करके वहीं रहनेवाली है उसे (जो पुरुष देखता है वही यथार्थ देखता है) -यही है -वह (परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा था ) ॥ ७ ॥

 

जननीरूपमें  समस्त देवताओं का सृजन करने वाली होने के कारण जो सर्वदेवतामयी हैं, शब्दादि समस्त भोगसमूह का अदन-भक्षण करने वाली होने से भी जिनका नाम अदिति है, जो हिरण्यगर्भरूप प्राणों के सहित प्रकट होती हैं और समस्त भूतप्राणियों के साथ ही जिनका प्रादुर्भाव होता है तथा जो सम्पूर्ण भूतप्राणियों की हृदय-गुफा में प्रविष्ट होकर वहाँ स्थित रहती हैं, वे परमेश्वर की महाशक्ति वस्तुतः उनका प्रतीक ही हैं। स्वयं परमेश्वर ही इसरूप में अपने को प्रकट करते हैं। ये ही वह ब्रह्म हैं, जिनके सम्बन्ध में  नचिकेता ! तुमने पूछा था ॥ ७ ॥

 

अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः ।

दिवे दिवे ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः । एतद्वै तत् ॥ ८॥

 

जो सर्वज्ञ अग्रिदेवता गर्भिणी स्त्रियों द्वारा भली प्रकार धारण किये हुए गर्भ की भाँति दो अरणियों में सुरक्षित है अर्थात छिपा है (तथा जो) सावधान (और) हवन करने योग्य सामग्रियों से युक्त मनुष्यों द्वारा प्रतिदिन स्तुति करने योग्य (है) - यही है वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था ॥ ८ ॥

 

 

यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति ।

तं देवाः सर्वेऽर्पितास्तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ ९॥

 

जिन परमेश्वर से सूर्यदेव प्रकट होते हैं और जिनमें जाकर विलीन हो जाते हैं, जिनकी महिमा में ही यह सूर्यदेवता की उदय-अस्तलीला नियमपूर्वक चलती है; उन परब्रह्म में ही सम्पूर्ण देवता प्रविष्ट हैं-सब उन्हीं में ठहरे हैं। उस परमेश्वर को कोई नहीं लाँघ सकता अर्थात उनकी महिमा और व्यवस्था का उल्लंघन नहीं कर सकता -यही है वह (परमात्मा, जिनके विषय में तुमने पूछा था ॥ ९॥

 

यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह ।

मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १०॥

 

जो परब्रह्म यहाँ (है) वही वहाँ (परलोक में भी है), जो वहाँ (है) वही यहाँ (इस लोक में) भी है। वह मनुष्य मृत्यु से मृत्यु को (अर्थात् बारंबार जन्म-मरण को) प्राप्त होता है, जो इस जगत्‌ में (उस परमात्मा को) अनेक की भाँति देखता है ॥ १० ॥

 

जो उन एक ही परब्रह्म को लीला से नाना नामों और रूपों में प्रकाशित देखकर मोहवश उनमें नानात्व की कल्पना करता है, उसे पुनः-पुनः मृत्यु के अधीन होना पड़ता है, उसके जन्म- मरण का चक्र सहज ही नहीं छूटता। अतः दृढ़तापूर्वक यही समझना चाहिये कि वे एक ही परब्रह्म परमेश्वर अपनी अचिन्त्य शक्ति के सहित नाना रूपों में प्रकट हैं और यह सारा जगत् बाहर-भीतर उन एक परमात्मा से ही व्याप्त होने के कारण उन्हीं का स्वरूप है।

 

मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानाऽस्ति किंचन ।

मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११॥

 

शुद्ध मन से ही यह परमात्मतत्त्व प्राप्त किये जाने योग्य है। इस जगत में (एक परमात्मा के अतिरिक्त) नाना (भिन्न-भिन्न भाव) कुछ भी नहीं है (इसलिये) जो इस जगत में नाना की भाँति देखता है वह मनुष्य मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है अर्थात् बार-बार जन्मता-मरता रहता है ॥ ११ ॥

 

व्याख्या – यह जगत् में एकमात्र पूर्णब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण हैं। सब कुछ उन्हीं का स्वरूप है। यहाँ परमात्मा से भिन्न कुछ भी नहीं है। जो यहाँ विभिन्नता की झलक देखता वह मनुष्य मृत्यु से मृत्युको प्राप्त होता है अर्थात् बार-बार जन्मता-मरता रहता है ॥ ११ ॥

 

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ।

ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ १२॥

 

अङ्गुष्ठमात्र (परिमाणवाला) परम पुरुष (परमात्मा) शरीर के मध्यभाग- हृदयाकाश में स्थित है,  जो कि भूत, (वर्तमान) और भविष्य का शासन करनेवाला (है), उसे जान लेने के बाद (वह) वह किसी भी प्रकार से छिपाने या अपहरण करने को नहीं जाता है। - यही है -वह परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा था ॥ १२ ॥

 

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ।

ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः । एतद्वै तत् ॥ १३॥

 

अङ्गुष्ठमात्र परिमाण वाला परमपुरुष परमात्मा धूमरहित ज्योति की भाँति है। भूत, (वर्तमान और) भविष्य पर शासन करने वाला वह परमात्मा ही आज है; वही कल भी है (अर्थात् वह नित्य सनातन है)- वही है वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ १३ ॥

 

 

यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।

एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥ १४॥

 

जिस प्रकार ऊँचे शिखर पर बरसा हुआ जल पहाड़ के नाना स्थलों में चारों ओर चला जाता है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न धर्मों (स्वभावों) से युक्त देव, असुर, मनुष्य आदि को परमात्मा से पृथक् देखकर (उनका सेवन करने वाला मनुष्य) उन्हीं के पीछे दौड़ता रहता है (उन्हीं के शुभाशुभ लोकों में और नाना उच्च-नीच योनियों में भटकता रहता है) ॥१४॥

 

व्याख्या–वर्षा का जल एक ही है; पर वह जब ऊँचे पर्वत की ऊबड़खाबड़ चोटी पर बरसता है तो वहाँ ठहरता नहीं, तुरंत ही नीचे की ओर बहकर विभिन्न वर्ण, आकार और गन्ध को धारण करके पर्वत में चारों ओर बिखर जाता है। इसी प्रकार एक ही परमात्मा से उत्पन्न हुए विभिन्न स्वभाववाले देव- असुर – मनुष्यादि को जो परमात्मा से पृथक् मानता है और पृथक् मानकर ही उनकी उपासना, पूजा आदि करता है, उसे भी बिखरे हुए जल की भाँति ही विभिन्न देव-असुरादि के लोकों में एवं नाना प्रकार की योनियों में भटकना पड़ता है (गीता ९ । २३ - २५ ) । वह ब्रह्म को प्राप्त नहीं हो सकता ॥ १४ ॥

 

यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।

एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ १५॥

 

(परंतु) जिस प्रकार निर्मल जल में (मेघोंद्वारा) सब ओर से बरसाया हुआ निर्मल जल वैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार हे गौतमवंशी नचिकेता (एकमात्र परब्रह्म पुरुषोत्तम ही सब कुछ है, इस प्रकार) जानने वाले मुनि का (संसार से उपरत हुए महापुरुष का) आत्मा

(ब्रह्म को प्राप्त) हो जाता है ॥ १५ ॥

 

व्याख्या- परंतु वर्षा का निर्मल जल यदि निर्मल जल में ही बरसता है तो वह उसी क्षण निर्मल जल ही हो जाता है। उसमें न तो कोई विकार उत्पन्न होता है और न वह कहीं बिखरता ही है। इसी प्रकार, हे गौतमवंशीय नचिकेता! जो इस बातको भलीभाँति जान गया है कि जो कुछ है, वह सब परब्रह्म पुरुषोत्तम ही है, उस मननशील-संसार के बाहरी स्वरूप से उपरत पुरुष का आत्मा परब्रह्म में मिलकर उसके साथ तादात्म्यभाव को प्राप्त हो जाता है ॥ १५ ॥

  

॥ इति काठकोपनिषदि द्वितीयाध्याये प्रथमा वल्ली ॥

 

 

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