Thursday, 1 June 2023

कठोपनिषद - द्वितीय अध्याय, प्रथम वल्ली

 

द्वितीय अध्याय, प्रथम वल्ली

 

 

पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू-

    स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् ।

कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष-

    दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १॥

 

सम्बन्ध - तृतीय वल्ली में यमराज कहते हैं कि परब्रह्म सभी प्राणियों में स्थित है, परंतु सभी उनको देख नहीं पाते। कोई विरला ही अपनी सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा उन्हें देख सकता है। अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि जब वे ब्रह्म अपने ही हृदय में विराजमान हैं तो उन्हें सभी लोग अपनी बुद्धिरूपी  नेत्रों से क्यों नहीं देख पाते? कोई विरला ही क्यों देख पाता है?  इस का उत्तर आगे मिलता हैं-

 

स्वयंभूः (स्वयं प्रकट होने वाले) परमेश्वर ने समस्त इन्द्रियों के द्वार बाहर की ओर जाने वाले ही बनाये हैं, इसलिये (मनुष्य इन्द्रियों के द्वारा प्रायः बाहर की वस्तुओं को ही; पश्यति देखता है; अन्तरात्मा को नहीं। किसी (भाग्यशाली) बुद्धिमान् मनुष्य ने ही  अमृतत्वम् को जानने की इच्छा करके चक्षु आदि इन्द्रियों को बाह्य विषयों की ओर से लौटाकर अन्तरात्मा को देखा है॥१॥

 

पराचः कामाननुयन्ति बाला-

    स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् ।

अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा

    ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २॥

 

जो मूर्ख बाह्य भोगों का अनुसरण करते हैं (उन्हीं में अनुरक्त रहते हैं), वे सर्वत्र फैले हुए

मृत्यु के बन्धन में पड़ते हैं किंतु बुद्धिमान् मनुष्य नित्य अमृतत्व को विवेक द्वारा जानकर

इस जगत में अनित्य भोगों में से किसी को (भी) नहीं चाहते ॥ २ ॥

 

येन रूपं रसं गन्धं शब्दान् स्पर्शाꣳश्च मैथुनान् ।

एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३॥

 

जिसके अनुग्रह से (मनुष्य) शब्दों को , स्पर्शो को, रूप-समुदाय को, रस-समुदाय को, गन्ध समुदाय को और मैथुन आदि के सुखों को अनुभव करता है उसी के अनुग्रह से (यह भी जानता है कि) यहाँ क्या शेष रह जाता है। यह ही हैं - वह परमात्मा (जिसके विषय में तुमने पूछा था ॥ ३ ॥

 

स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति ।

महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४॥

 

स्वप्न के दृश्यों को और जाग्रत्-अवस्था के दृश्यों को - इन दोनों अवस्थाओं के दृश्यों को (मनुष्य) जिससे बार-बार देखता है; उस सर्वश्रेष्ठ, सर्वव्यापी, सबके आत्मा को जानकर बुद्धिमान् मनुष्य शोक नहीं करता ॥ ४ ॥

 

य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात् ।

ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ ५॥

 

जो मनुष्य कर्मफलदाता, सबको जीवन प्रदान करनेवाले तथा भू (वर्तमान) और भविष्य का शासन करने वाले इस परमात्मा को (अपने) समीप जानता है, उसके बाद वह (कभी) किसी की निन्दा नहीं करता है। (नचिकेता !) यह ही (है)-वह (तुमने जिस ब्रह्म के विषय में पूछा था) ॥ ५ ॥

 

*यहाँ 'जीव' शब्द परमात्मा के लिये ही प्रयुक्त हुआ है; क्योंकि भूत, भविष्य और वर्तमान का शासक जीव नहीं हो सकता। प्रसंग भी यहाँ परमात्मा का है, जीव का नहीं ।

 


यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत ।

गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत । एतद्वै तत् ॥ ६॥

 

सम्बन्ध - अब यमराज यह बतलाते हैं कि ब्रह्मा से लेकर स्थावर पर्यन्त सृष्टि के समस्त प्राणी उन परब्रह्म परमेश्वर से ही उत्पन्न हुए हैं। अतः जो कुछ भी है, सब उन्हीं का रूप विशेष है। उनसे भिन्न यहाँ कुछ भी नहीं है; क्योंकि इस सम्पूर्ण जगत के अभिन्न निमित्तोपादान कारण एकमात्र परमेश्वर ही हैं, वे एक ही अनेक रूपों में स्थित हैं।

 

जो पहले जल से (हिरण्यगर्भ ब्रह्मा) रूप में प्रकट हुआ था, उस सबसे पहले तप से उत्पन्न हृदय-गुफा में प्रवेश करके जीवात्माओं के साथ स्थित रहने वाले परमेश्वर को जो पुरुष देखता है (वही ठीक देखता है), -यह ही है वह (परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा था) ॥ ६ ॥

 

 

या प्राणेन संभवत्यदितिर्देवतामयी ।

गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत । एतद्वै तत् ॥ ७॥

 

सम्बन्ध - उन्हीं परब्रह्म का अब अदितिदेवी के रूप से वर्णन करते हैं-

 

जो देवतामयी अदिति प्राणों के सहित उत्पन्न होती है या जो प्राणियों के सहित उत्पन्न हुई है (तथा जो ) हृदयरूपी गुफा में प्रवेश करके वहीं रहनेवाली है उसे (जो पुरुष देखता है वही यथार्थ देखता है) -यही है -वह (परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा था ) ॥ ७ ॥

 

जननीरूपमें  समस्त देवताओं का सृजन करने वाली होने के कारण जो सर्वदेवतामयी हैं, शब्दादि समस्त भोगसमूह का अदन-भक्षण करने वाली होने से भी जिनका नाम अदिति है, जो हिरण्यगर्भरूप प्राणों के सहित प्रकट होती हैं और समस्त भूतप्राणियों के साथ ही जिनका प्रादुर्भाव होता है तथा जो सम्पूर्ण भूतप्राणियों की हृदय-गुफा में प्रविष्ट होकर वहाँ स्थित रहती हैं, वे परमेश्वर की महाशक्ति वस्तुतः उनका प्रतीक ही हैं। स्वयं परमेश्वर ही इसरूप में अपने को प्रकट करते हैं। ये ही वह ब्रह्म हैं, जिनके सम्बन्ध में  नचिकेता ! तुमने पूछा था ॥ ७ ॥

 

अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः ।

दिवे दिवे ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः । एतद्वै तत् ॥ ८॥

 

जो सर्वज्ञ अग्रिदेवता गर्भिणी स्त्रियों द्वारा भली प्रकार धारण किये हुए गर्भ की भाँति दो अरणियों में सुरक्षित है अर्थात छिपा है (तथा जो) सावधान (और) हवन करने योग्य सामग्रियों से युक्त मनुष्यों द्वारा प्रतिदिन स्तुति करने योग्य (है) - यही है वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था ॥ ८ ॥

 

 

यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति ।

तं देवाः सर्वेऽर्पितास्तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ ९॥

 

जिन परमेश्वर से सूर्यदेव प्रकट होते हैं और जिनमें जाकर विलीन हो जाते हैं, जिनकी महिमा में ही यह सूर्यदेवता की उदय-अस्तलीला नियमपूर्वक चलती है; उन परब्रह्म में ही सम्पूर्ण देवता प्रविष्ट हैं-सब उन्हीं में ठहरे हैं। उस परमेश्वर को कोई नहीं लाँघ सकता अर्थात उनकी महिमा और व्यवस्था का उल्लंघन नहीं कर सकता -यही है वह (परमात्मा, जिनके विषय में तुमने पूछा था ॥ ९॥

 

यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह ।

मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १०॥

 

जो परब्रह्म यहाँ (है) वही वहाँ (परलोक में भी है), जो वहाँ (है) वही यहाँ (इस लोक में) भी है। वह मनुष्य मृत्यु से मृत्यु को (अर्थात् बारंबार जन्म-मरण को) प्राप्त होता है, जो इस जगत्‌ में (उस परमात्मा को) अनेक की भाँति देखता है ॥ १० ॥

 

जो उन एक ही परब्रह्म को लीला से नाना नामों और रूपों में प्रकाशित देखकर मोहवश उनमें नानात्व की कल्पना करता है, उसे पुनः-पुनः मृत्यु के अधीन होना पड़ता है, उसके जन्म- मरण का चक्र सहज ही नहीं छूटता। अतः दृढ़तापूर्वक यही समझना चाहिये कि वे एक ही परब्रह्म परमेश्वर अपनी अचिन्त्य शक्ति के सहित नाना रूपों में प्रकट हैं और यह सारा जगत् बाहर-भीतर उन एक परमात्मा से ही व्याप्त होने के कारण उन्हीं का स्वरूप है।

 

मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानाऽस्ति किंचन ।

मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११॥

 

शुद्ध मन से ही यह परमात्मतत्त्व प्राप्त किये जाने योग्य है। इस जगत में (एक परमात्मा के अतिरिक्त) नाना (भिन्न-भिन्न भाव) कुछ भी नहीं है (इसलिये) जो इस जगत में नाना की भाँति देखता है वह मनुष्य मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है अर्थात् बार-बार जन्मता-मरता रहता है ॥ ११ ॥

 

व्याख्या – यह जगत् में एकमात्र पूर्णब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण हैं। सब कुछ उन्हीं का स्वरूप है। यहाँ परमात्मा से भिन्न कुछ भी नहीं है। जो यहाँ विभिन्नता की झलक देखता वह मनुष्य मृत्यु से मृत्युको प्राप्त होता है अर्थात् बार-बार जन्मता-मरता रहता है ॥ ११ ॥

 

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ।

ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ १२॥

 

अङ्गुष्ठमात्र (परिमाणवाला) परम पुरुष (परमात्मा) शरीर के मध्यभाग- हृदयाकाश में स्थित है,  जो कि भूत, (वर्तमान) और भविष्य का शासन करनेवाला (है), उसे जान लेने के बाद (वह) वह किसी भी प्रकार से छिपाने या अपहरण करने को नहीं जाता है। - यही है -वह परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा था ॥ १२ ॥

 

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ।

ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः । एतद्वै तत् ॥ १३॥

 

अङ्गुष्ठमात्र परिमाण वाला परमपुरुष परमात्मा धूमरहित ज्योति की भाँति है। भूत, (वर्तमान और) भविष्य पर शासन करने वाला वह परमात्मा ही आज है; वही कल भी है (अर्थात् वह नित्य सनातन है)- वही है वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ १३ ॥

 

 

यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।

एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥ १४॥

 

जिस प्रकार ऊँचे शिखर पर बरसा हुआ जल पहाड़ के नाना स्थलों में चारों ओर चला जाता है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न धर्मों (स्वभावों) से युक्त देव, असुर, मनुष्य आदि को परमात्मा से पृथक् देखकर (उनका सेवन करने वाला मनुष्य) उन्हीं के पीछे दौड़ता रहता है (उन्हीं के शुभाशुभ लोकों में और नाना उच्च-नीच योनियों में भटकता रहता है) ॥१४॥

 

व्याख्या–वर्षा का जल एक ही है; पर वह जब ऊँचे पर्वत की ऊबड़खाबड़ चोटी पर बरसता है तो वहाँ ठहरता नहीं, तुरंत ही नीचे की ओर बहकर विभिन्न वर्ण, आकार और गन्ध को धारण करके पर्वत में चारों ओर बिखर जाता है। इसी प्रकार एक ही परमात्मा से उत्पन्न हुए विभिन्न स्वभाववाले देव- असुर – मनुष्यादि को जो परमात्मा से पृथक् मानता है और पृथक् मानकर ही उनकी उपासना, पूजा आदि करता है, उसे भी बिखरे हुए जल की भाँति ही विभिन्न देव-असुरादि के लोकों में एवं नाना प्रकार की योनियों में भटकना पड़ता है (गीता ९ । २३ - २५ ) । वह ब्रह्म को प्राप्त नहीं हो सकता ॥ १४ ॥

 

यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।

एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ १५॥

 

(परंतु) जिस प्रकार निर्मल जल में (मेघोंद्वारा) सब ओर से बरसाया हुआ निर्मल जल वैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार हे गौतमवंशी नचिकेता (एकमात्र परब्रह्म पुरुषोत्तम ही सब कुछ है, इस प्रकार) जानने वाले मुनि का (संसार से उपरत हुए महापुरुष का) आत्मा

(ब्रह्म को प्राप्त) हो जाता है ॥ १५ ॥

 

व्याख्या- परंतु वर्षा का निर्मल जल यदि निर्मल जल में ही बरसता है तो वह उसी क्षण निर्मल जल ही हो जाता है। उसमें न तो कोई विकार उत्पन्न होता है और न वह कहीं बिखरता ही है। इसी प्रकार, हे गौतमवंशीय नचिकेता! जो इस बातको भलीभाँति जान गया है कि जो कुछ है, वह सब परब्रह्म पुरुषोत्तम ही है, उस मननशील-संसार के बाहरी स्वरूप से उपरत पुरुष का आत्मा परब्रह्म में मिलकर उसके साथ तादात्म्यभाव को प्राप्त हो जाता है ॥ १५ ॥

  

॥ इति काठकोपनिषदि द्वितीयाध्याये प्रथमा वल्ली ॥

 

 

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