प्रथम अध्याय तृतीय वल्ली
ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके
गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति
पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥
१॥
सम्बन्ध - द्वितीय
वल्ली में जीवात्मा और परमात्मा के स्वरूप का वर्णन किया गया है। संक्षिप्त में यह
भी बताया गया है कि जिसको परमात्मा स्वीकार करते हैं, वह ही उनको जान सकता है। अब परमात्मा को प्राप्त
करने के साधनों का वर्णन करने के लिये तृतीय वल्ली का आरम्भ करते हुए यमराज पहले
मन्त्र में जीवात्मा और परमात्मा का नित्य सम्बन्ध और निवास-स्थान बतलाते हैं-
शुभ कर्मों के
फलस्वरूप मनुष्य शरीर में परब्रह्म के उत्तम निवास स्थान (हृदय-आकाश) में
बुद्धिरूप गुफा में छिपे हुए सत्य का पान करनेवाले (दो हैं)। वे छाया और धूप की
भाँति परस्पर भिन्न हैं। (यह बात) ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महापुरुष कहते हैं तथा जो
तीन बार नाचिकेत-अग्नि का चयन कर लेने वाले (और) पञ्चाग्रि सम्पन्न गृहस्थ हैं]-वे
भी यही बात कहते हैं ॥ १ ॥
यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत् परम् ।
अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतँ शकेमहि ॥ २॥
सम्बन्ध -
परमात्मा को जानने और प्राप्त करने का जो सर्वोत्तम साधन ‘उन्हें जानने और पाने की
शक्ति प्रदान करने के लिये उन्हीं से प्रार्थना करना है’- इस बात को यमराज स्वयं प्रार्थना करते हुए
बताते हैं-
यज्ञ करनेवालोंके
लिये यः सेतु-जो दुःखसमुद्र पार पहुँचा देने योग्य सेतु है। उस नाचिकेत-अग्रि को
और संसार-समुद्र से पार होने की इच्छा वालों के लिये - जो भयरहित पद है, उस अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तम को जानने और
प्राप्त करने में भी हम समर्थ हों ॥ २ ॥
आत्मानँ रथितं विद्धि शरीरँ रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३॥
सम्बन्ध - अब,
उस परब्रह्म पुरुषोत्तम के परमधाम में
किन साधनों से सम्पन्न मनुष्य पहुँच सकता है, यह बात रथ और रथी के रूपक की कल्पना करके समझायी
जाती है-
हे नचिकेता ! तुम
जीवात्मा को तो रथ का स्वामी (उसमें बैठकर चलने वाला) समझो और शरीर को ही रथ समझो
तथा बुद्धि को सारथि (रथ को चलाने वाला) समझो और मन को ही लगाम समझो ॥ ३ ॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाँ स्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४॥
ज्ञानीजन (इस रूपक
में) इन्द्रियों को घोड़े बतलाते हैं और विषयों को उन घोड़ों के विचरने का मार्ग
बतलाते हैं तथा शरीर, इन्द्रिय
और मन–इन सबके साथ रहने वाला जीवात्मा ही भोक्ता है- यों कहते हैं ॥ ४ ॥
यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५॥
सम्बन्ध -
परमात्मा की ओर न जाकर उसकी इन्द्रियाँ लौकिक विषयों में क्यों लग गयीं, इसका कारण बतलाते हैं-
जो सदा विवेकहीन
बुद्धिवाला और अवशीभूत (चञ्चल) मन से (युक्त) रहता है, उसकी इन्द्रियाँ असावधान सारथि के दुष्ट घोड़ों की
भाँति वश में न रहनेवाली भवन्ति हो जाती हैं ॥ ५ ॥
यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६॥
सम्बन्ध - अब
स्वयं सावधान रहकर अपनी बुद्धि को विवेकशील बनाने का लाभ बतलाते हैं-
परंतु जो सदा
विवेकयुक्त बुद्धि वाला और वश में किये हुए मन से सम्पन्न रहता है उसकी इन्द्रियाँ
सावधान सारथि के अच्छे घोड़ों की भाँति वश में रहती हैं ॥ ६ ॥
यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः ।
न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥ ७॥
सम्बन्ध–पाँचवें
मन्त्र के अनुसार जिसके बुद्धि और मन आदि विवेक और संयम से हीन होते हैं, उसकी क्या गति होती है-इसे बतलाते हैं-
जो कोई सदा
विवेकहीन बुद्धिवाला असंयतचित्त और अपवित्र रहता है, वह उस परमपद को नहीं पा सकता, वह बार- बार जन्म - मृत्युरूप संसार-चक्र में ही
भटकता रहता है ॥ ७ ॥
यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः ।
स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८॥
परंतु जो सदा
विवेकशील बुद्धि से युक्त, संयतचित्त
और पवित्र रहता है। वह तो उस परमपद को प्राप्त कर लेता है। जहाँ से (लौटकर) जन्म
नहीं लेता ॥ ८ ॥
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः ।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९॥
सम्बन्ध - आठवें
मन्त्र में कही हुई बात को फिर से स्पष्ट करते हुए रथ के रूपक का उपसंहार करते
हैं-
जो कोई मनुष्य
विवेकशील बुद्धिरूप सारथि से सम्पन्न (और) मनरूप लगाम को वश में रखनेवाला है। वह
संसार मार्ग के पहुँचकर सर्वव्यापी परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान के -उस सुप्रसिद्ध
परमपद को प्राप्त हो जाता है ।।९।।
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥ १०॥
सम्बन्ध-
उपर्युक्त वर्णन में रथ के रूपक की कल्पना करके भगवत्प्राप्ति के लिये जो साधन
बतलाया गया, उसमें विवेकशील
बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके, इन्द्रियों को विपरीत मार्ग से हटाकर, भगवत्प्राप्ति के मार्ग में लगाने की बात कही गयी। इस पर यह जिज्ञासा होती है
कि स्वभाव से ही दुष्ट और बलवान् इन्द्रियों को उनके प्रिय और अभ्यस्त असत्-मार्ग
से किस प्रकार हटाया जाय अतः इस बात का तात्त्विक विवेचन करके इन्द्रियों को
असत्-मार्ग से रोककर भगवान् की ओर लगाने का प्रकार बतलाते हैं-
क्योंकि
इन्द्रियों से शब्दादि विषय बलवान् हैं और शब्दादि विषयों से मन प्रबल है और मन से
भी बुद्धि बलवती है तथा बुद्धि से महान् आत्मा (उन सब का स्वामी होने के कारण)
अत्यन्त श्रेष्ठ और बलवान् है ॥ १० ॥
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः ।
पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११॥
उस जीवात्मा से
बलवती है भगवान् की अव्यक्त माया शक्ति। अव्यक्त माया से भी श्रेष्ठ है परमपुरुष
(स्वयं परमेश्वर)। परमपुरुष भगवान् से श्रेष्ठ और बलवान् किञ्चित् कुछ भी नहीं
है। वही सबकी परम अवधि (और) वही परम गति है ॥ ११ ॥
एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽऽत्मा न प्रकाशते ।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२॥
सम्बन्ध - यही भाव
अगले मन्त्रमें स्पष्ट करते हैं-
आत्मा- यह सबका
आत्मरूप समस्त प्राणियों में रहता हुआ भी माया के परदे में छिपा रहने के कारण सबके
प्रत्यक्ष नहीं होता, केवल
सूक्ष्मतत्त्वों को समझने वाले पुरुषों द्वारा ही अति सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धि से
दृश्यते देखा जाता है ॥ १२ ॥
यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३॥
सम्बन्ध -
विवेकशील मनुष्य को भगवान् के शरण होकर किस प्रकार भगवान की प्राप्ति के लिये
साधन करना चाहिये ? - इस
जिज्ञासा पर कहते हैं-
बुद्धिमान् साधक
को चाहिये कि (पहले) वाक् आदि (समस्त इन्द्रियों) को मन में निरुद्ध करे। उस मन को
ज्ञानस्वरूप बुद्धि में विलीन करे। ज्ञानस्वरूप बुद्धि को महान् आत्मा में विलीन
करे (और) उसको शान्तस्वरूप परमपुरुष परमात्मा में विलीन करे ॥ १३ ॥
उत्तिष्ठत जाग्रत
प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया
दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४॥
सम्बन्ध — इस
प्रकार परमात्मा के स्वरूप का वर्णन करके तथा उसकी प्राप्ति का महत्त्व और साधन
बतलाकर अब श्रुति मनुष्यों को सावधान करती हुई कहती है-
(हे मनुष्यो!) उठो,
(सावधान हो जाओ और) श्रेष्ठ
महापुरुषों को पाकर उनके पास जाकर (उनके द्वारा) उस परब्रह्म परमेश्वरको जान लो
(क्योंकि) त्रिकालज्ञ ज्ञानीजन उस तत्त्वज्ञान के मार्ग को छूरे की तीक्ष्ण की हुई
दुस्तर धार के सदृश दुर्गम (अत्यन्त कठिन)बतलाते हैं॥ १४ ॥
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं
तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं
निचाय्य तन्मृत्युमुखात्
प्रमुच्यते ॥ १५॥
सम्बन्ध -
ब्रह्मप्राप्ति का मार्ग इतना दुस्तर क्यों है ? इस जिज्ञासा पर परमात्मा के स्वरूप का वर्णन करते
हुए उसको जानने का फल बतलाते हैं-
जो शब्दरहित,
स्पर्शरहित, रूपरहित, रसरहित और बिना गन्धवाला है तथा (जो) अविनाशी, नित्य, अनादि, अनंत (असीम),
महान् आत्मा से श्रेष्ठ (एवं) ध्रुव
(सर्वथा सत्य तत्त्व) है, उस
परमात्मा को जानकर (मनुष्य) मृत्यु के मुखसे सदा के लिये छूट जाता है ॥ १५ ॥
नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तँ सनातनम् ।
उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६॥
सम्बन्ध - यहाँ तक
एक अध्यायके उपदेशको पूर्ण करके अब इस आख्यानके श्रवण और वर्णनका माहात्म्य बतलाते
हैं-
बुद्धिमान् मनुष्य
यमराज के द्वारा कहे हुए नचिकेता के (इस) सनातन उपाख्यान का वर्णन करके और श्रवण
करके ब्रहालोक में महिमान्वित होता है (प्रतिष्ठित होता है) ।। १६ ।।
य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि ।
प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते ।
तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७॥
जो मनुष्य सर्वथा
शुद्ध होकर इस परम गुह्य रहस्यमय प्रसङ्ग को ब्राह्मणों की सभा में सुनाता है अथवा
श्राद्धकाल में (भोजन करने वालों को) सुनाता है (उसका) वह श्रवण करानारूप कर्म
अनन्त होने में (अविनाशी फल देने में) समर्थ होता है, वह अनन्त होनेमें समर्थ होता है ॥ १७ ॥
॥ इति काठकोपनिषदि प्रथमाध्याये तृतीया वल्ली ॥

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