Monday, 20 March 2023

कठोपनिषद - प्रथम अध्याय, द्वितीय वल्ली

प्रथम अध्याय – द्वितीय वल्ली   Part 1  Canto 2

 

अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेय-

    स्ते उभे नानार्थे पुरुषँ सिनीतः ।

तयोः श्रेय आददानस्य साधु

    भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १॥

 

कल्याण का साधन अलग है और प्रिय लगने वाले भोग का साधन अलग ही है। वे भिन्न-भिन्न फल देने वाले दोनों साधन मनुष्य को बाँधते हैं—अपनी-अपनी ओर आकर्षित करते हैं। उन दोनों में से कल्याण के साधन को ग्रहण करने वाले का कल्याण होता है परंतु जो सांसारिक भोगों के साधन को स्वीकार करता है वह यथार्थ लाभ से भ्रष्ट हो जाता है ॥ १ ॥

 

श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः

    तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।

श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते

    प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते ॥ २॥

 

श्रेय और प्रेय - ये दोनों ही मनुष्य के सामने आते हैं। धीर (बुद्धिमान् मनुष्य) उन दोनों के स्वरूप पर भलीभाँति विचार करके उनको पृथक्-पृथक् समझ लेता है और वह श्रेष्ठबुद्धिमनुष्य परम कल्याण के साधन को ही भोग-साधन की अपेक्षा श्रेष्ठ समझकर ग्रहण करता है परंतु मन्दबुद्धिवाला मनुष्य लौकिक योगक्षेम की इच्छा से भोगों के साधनरूप प्रेय को अपनाता है ॥ २ ॥

 

स त्वं प्रियान्प्रियरूपांश्च कामान्

    अभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ।

नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो

    यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३॥

 

सम्बन्ध— परमात्मा की प्राप्ति के साधनरूप श्रेय की प्रशंसा करके अब यमराज साधारण मनुष्यों को नचिकेता की विशेषता दिखलाते हुए उसके वैराग्य की प्रशंसा करते हैं-

 

हे नचिकेता! उन्हीं मनुष्यों में तुम ऐसे नि:स्पृह हो कि प्रिय लगने वाले और अत्यन्त सुन्दर रूप वाले इस लोक और परलोक के समस्त भोगों को भलीभाँति सोच-समझकर तुमने छोड़ दिया। इस सम्पत्तिरूप बेड़ी को तुम नहीं प्राप्त हुए अर्थात इसके बन्धन में नहीं फँसे, जिसमें बहुत-से मनुष्यः फँस जाते हैं ।। ३ ॥

 

दूरमेते विपरीते विषूची

    अविद्या या च विद्येति ज्ञाता ।

विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये

    न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४॥

 

जो कि अविद्या और विद्या नाम से विख्यात हैं, ये दोनों परस्पर अत्यन्त विपरीत और भिन्न-भिन्न फल देने वाली हैं। तुम नचिकेता को विद्या का ही अभिलाषी मानता हूँ क्योंकि तुमको बहुत-से भोग न किसी प्रकार भी नहीं लुभा सके ॥ ४ ॥

 

व्याख्या—ये अविद्या और विद्या नाम से प्रसिद्ध दो साधन पृथक्-पृथक् फल देने वाले हैं और परस्पर अत्यन्त विरुद्ध हैं। जिसकी भोगों में आसक्ति है, वह कल्याण-साधन में आगे नहीं बढ़ सकता और जो कल्याणमार्ग का पथिक हैं, वह भोगों की ओर दृष्टि नहीं डालता। वह सब प्रकार के भोगों को दुःखरूप मानकर उनका परित्याग कर देता है। हे नचिकेता ! मैं मानता हूँ कि तुम विद्या के ही अभिलाषी हो, क्योंकि बहुत-से बड़े-बड़े भोग भी तुम्हारे मन में किञ्चिन्मात्र भी लोभ नहीं उत्पन्न कर सके ॥ ४ ॥

 

अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः

    स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।

दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा

    अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५॥

 

अविद्या के भीतर रहते हुए (भी) अपने-आपको बुद्धिमान् और विद्वान् मानने वाले, भोग की इच्छा करने वाले वे मूर्ख लोग नाना योनियों में चारों ओर भटकते हुए अंधे मनुष्य की भाँति ही ठोकरें खाते रहते हैं। (अपने लक्ष्य तक न पहुँचकर इधर-उधर भटकते और कष्ट भोगते हैं) ॥ ५ ॥

 

न साम्परायः प्रतिभाति बालं

    प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।

अयं लोको नास्ति पर इति मानी

    पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६॥

 

इस प्रकार सम्पत्ति के मोह से मोहित निरन्तर प्रमाद करने वाले अज्ञानी को परलोक नहीं सूझता। वह समझता है कि यह प्रत्यक्ष दीखने वाला लोक ही सत्य है इसके सिवा दूसरा कुछ भी नहीं है। इस प्रकार मानने वाला अभिमानी मनुष्य बार- बार मेरे (यमराज के) वश में आता है ॥ ६ ॥

 

श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः

    श‍ृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः ।

आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा

    आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७॥

 

अब यमराज विषयासक्त, प्रत्यक्षवादी मूर्खों की निंदा करके अब उस आत्मतत्व की और उसको जानने, समझने तथा वर्णन करने वाले पुरुषों की दुर्लभता का वर्णन करते हैं -

 

जो (आत्मतत्त्व) बहुतों को तो सुनने के लिये भी नहीं मिलता, जिसको बहुत-से लोग सुनकर भी नहीं समझ सकते; ऐसे इस गूढ़ आत्मतत्त्व का वर्णन करनेवाला महापुरुष आश्चर्यमय है (बड़ा दुर्लभ है)। उसे प्राप्त करने वाला भी बड़ा कुशल (सफल जीवन) कोई एक ही होता है और जिसे तत्त्वकी उपलब्धि हो गयी है, ऐसे ज्ञानी महापुरुष के द्वारा शिक्षा प्राप्त किया हुआ आत्मतत्त्व का ज्ञाता भी आश्चर्यमय है (परम दुर्लभ है) ॥ ७ ॥

 

न नरेणावरेण प्रोक्त एष

    सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः ।

अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति

    अणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥ ८॥

 

यमराज आत्मज्ञान की दुर्लभता का कारण बताते हैं -

अल्पज्ञ मनुष्य के द्वारा बतलाये जाने पर और बहुत प्रकार से चिन्तन किये जाने पर भी यह आत्मतत्त्व सहज ही समझ में आ जाय, ऐसा नहीं है। किसी दूसरे ज्ञानी पुरुष के द्वारा उपदेश न किये जाने पर इस विषय में मनुष्य का प्रवेश नहीं होता क्योंकि यह अत्यन्त सूक्ष्म वस्तु से भी अधिक सूक्ष्म है इसलिये तर्क से अतीत है ॥ ८ ॥

 

नैषा तर्केण मतिरापनेया

    प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ ।

यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि

    त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९॥

 

हे प्रियतम! जिसको तुमने पाया है, यह बुद्धि तर्क से नहीं मिल सकती (यह तो ) दूसरेके द्वारा कही हुई ही आत्मज्ञान में निमित्त होती है। सचमुच ही तुम उत्तम धैर्यवाले हो। हे नचिकेता! हम चाहते हैं कि तुम्हारे जैसे ही पूछने वाले हमें मिला करें ॥ ९ ॥

 

जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यं

    न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् ।

ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्निः

    अनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १०॥

 

संबंध - अब यमराज अपने स्वयं के उदाहरण से निष्काम भाव की प्रशंसा करते हुए कहते हैं -

मैं जानता हूँ कि कर्मफल रूपी निधि अनित्य है क्योंकि अनित्य (विनाशशील) वस्तुओं से वह नित्य पदार्थ (परमात्मा) नहीं मिल सकता। , इसलिये मेरे द्वारा (कर्तव्यबुद्धि से) अनित्य पदार्थों के द्वारा नाचिकेत नामक अग्नि का चयन किया गया (अनित्य भोगों की प्राप्ति के लिये नहीं), अतः उस निष्कामभाव की अपूर्व शक्ति से मैं नित्य वस्तु परमात्मा को प्राप्त हो गया हूँ ॥ १० ॥

(निष्काम भाव की महिमा यह है कि अनित्य पदार्थों के द्वारा कर्तव्य-पालनरूप ईश्वर-पूजा करके मैंने नित्य सुख-रूप परमात्मा को प्राप्त कर लिया है)

 

कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां

    क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारम् ।

स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा

    धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥ ११॥

 

सम्बन्ध – नचिकेतामें वह निष्कामभाव पूर्णरूपसे है, इसलिये यमराज उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं-

हे नचिकेता ! जिसमें सब प्रकार के भोग मिल सकते हैं, जो जगत्‌ का आधार, यज्ञ का चिरस्थायी फल, निर्भयता की अवधि (अभय करने वाला), स्तुति करने योग्य एवं महत्त्वपूर्ण है तथा वेदों में जिसके गुण नाना प्रकारसे गाये गये हैं; जो दीर्घकाल तक की स्थिति से सम्पन्न है, ऐसे स्वर्गलोक को देखकर भी तुमने धैर्यपूर्वक उसका त्याग कर दिया इसलिये मैं समझता हूँ कि तुम बहुत ही बुद्धिमान् हो ॥ ११ ॥

 

 

तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं

    गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् ।

अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं

    मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२॥

 

जो योगमाया के पर्दे में छिपा हुआ, सर्वव्यापी, सबके हृदयरूप गुफा में स्थित (अतएव) संसाररूप गहन वन में रहने वाला, सनातन है। ऐसे उस कठिनता से देखे जाने वाले परमात्मदेव को शुद्ध-बुद्धि-युक्त साधक अध्यात्मयोग की प्राप्ति के द्वारा समझकर हर्ष और शोक को त्याग देता है ॥ १२ ॥

 

_नचिकेता के निष्काम भाव को देखकर यमराज ने निश्चय कर लिया कि यह परमात्मा के तत्वज्ञान का यथार्थ अधिकारी है; अत: उसके अंतःकरण में परब्रह्म पुरुषोत्तम के तत्व की जिज्ञासा उत्पन्न करने के लिए यमराज अब आगे के मंत्र में परब्रह्म परमात्मा की महिमा का वर्णन करते हैं_

 

एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः

    प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य ।

स मोदते मोदनीयँ हि लब्ध्वा

    विवृतँ सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३॥

 

मनुष्य जब इस धर्ममय (उपदेश) को सुनकर भलीभाँति ग्रहण करके और उस पर विवेकपूर्वक विचार करके इस सूक्ष्म आत्मतत्त्व को जानकर (अनुभव कर लेता है, तब) वह आनन्दस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तम को पाकर आनन्द में ही मग्र हो जाता है। तुम नचिकेता के लिये (मैं) परमधाम का द्वार खुला हुआ मानता हूँ ॥ १३ ॥

 

अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मा-

    दन्यत्रास्मात्कृताकृतात् ।

अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च

    यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥ १४॥

 

जिस उस परमेश्वर को, जो धर्म से अतीत, अधर्म से भी अतीत तथा इस कार्य और कारणरूप सम्पूर्ण जगत से भी अन्यत्र भिन्न और भूत, वर्तमान एवं भविष्यत् - तीनों कालों से तथा इनसे सम्बन्धित पदार्थों से भी अन्यत्र पृथक् (आप) जानते हैं; उसे बतलाइये ॥१४॥

 

सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति

    तपाꣳसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।

यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति

    तत्ते पदꣳ सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५॥

 

सम्बन्ध - नचिकेता के इस प्रकार पूछने पर यमराज उस ब्रह्मतत्त्व के वर्णन करने की प्रतिज्ञा करते हुए उपदेश आरम्भ करते हैं-

सम्पूर्ण वेद जिस परम पद का बारम्बार प्रतिपादन करते हैं और सम्पूर्ण तप जिस पद का लक्ष्य कराते हैं अर्थात् वे जिसके साधन है- जिसको चाहने वाले साधकगण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह पद तुम्हें (मैं) संक्षेप से बतलाता हूँ (वह है) ओम् - ऐसा यह (एक अक्षर) ॥ १५ ॥

 

एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् ।

एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६॥

 

सम्बन्ध - नामरहित होने पर भी परमात्मा अनेक नामों से पुकारे जाते हैं। उनके सब नामों में '' सर्वश्रेष्ठ माना गया है। अतः यहाँ नाम और नामी का अभेद मानकर 'प्रणव' को परब्रह्म पुरुषोत्तम के स्थान में वर्णन करते हुए यमराज कहते हैं-

 

यह अक्षर ही तो ब्रह्म है (और) यह अक्षर ही परब्रह्म है इसलिये इसी अक्षर को जानकर जो जिसको चाहता है, उसको तत्व ही (मिल जाता है) १६ ॥

 


एतदालम्बनँ श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।

एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७॥

 

यही अत्युत्तम आलम्बन है, यही (सबका) अन्तिम आत्रय है, इस आलम्बन को भलीभाँति जानकर (साधक) ब्रह्मलोक में महिमान्वित होता है ॥ १७ ॥

 

न जायते म्रियते वा विपश्चि-

    न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो

    न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८॥

 

सम्बन्ध - इस प्रकार ॐकार को ब्रह्म और परब्रह्म- इन दोनों का प्रतीक बताकर अब नचिकेता के प्रश्नानुसार यमराज पहले आत्मा के स्वरूप का वर्णन करते हैं-

 

नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा न तो जन्मता है और न मरता ही है। यह न तो स्वयं किसी से हुआ है, न इससे कोई भी हुआ है अर्थात् यह न तो किसी का कार्य है और न कारण ही है। यह अजन्मा नित्य सदा एकरस रहने वाला और पुरातन है अर्थात् क्षय और वृद्धि से रहित है। शरीर के नाश किये जाने पर भी (इसका) नाश नहीं किया जा सकता ॥ १८ ॥

 

हन्ता चेन्मन्यते हन्तुँ हतश्चेन्मन्यते हतम् ।

उभौ तौ न विजानीतो नायँ हन्ति न हन्यते ॥ १९॥

 

यदि कोई मारने वाला व्यक्ति अपने को मारने में समर्थ मानता है (और) यदि (कोई) मारा जाने वाला व्यक्ति अपने को मारा गया समझता है (तो) वे दोनों ही (आत्मस्वरूप को) नहीं जानते (क्योंकि) यह आत्मा न तो (किसी को) मारता है (और) न मारा ही जाता है| ॥ १९ ॥

 

साधक को शरीर और भोगों की अनित्यता और अपने आत्मा की नित्यता पर विचार करके, इन अनित्य भोगों से सुख की आशा का त्याग करके सदा अपने साथ रहने वाले नित्य सुखस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तम को प्राप्त करने का अभिलाषी बनना चाहिये ॥ १८-१९ ॥

 

अणोरणीयान्महतो महीया-

    नात्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ।

तमक्रतुः पश्यति वीतशोको

    धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २०॥

 

सम्बन्ध - इस प्रकार आत्मतत्त्व के वर्णन द्वारा नचिकेता के अन्तःकरण में परब्रह्म पुरुषोत्तम के तत्त्व की जिज्ञासा उत्पन्न करके यमराज अब परमात्मा के स्वरूप का वर्णन करते हैं-

इस जीवात्मा के हृदयरूप गुफा में निहित रहने वाला आत्मा (परमात्मा) सूक्ष्म से अतिसूक्ष्म (और) महान् से भी महान् है। परमात्मा की उस महिमा को कामना रहित, चिन्तारहित (कोई विरला साधक) सर्वाधार और परब्रह्म परमेश्वर की कृपा से ही देख पाता है ॥ २० ॥

 

आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः ।

कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१॥

 

वह परमेश्वर बैठा हुआ ही दूर पहुँच जाता है, सोता हुआ भी सब ओर चलता रहता है, उस ऐश्वर्य के मद से उन्मत्त न होने वाले देव को मुझसे भिन्न दूसरा कौन जानने में समर्थ है ॥ २१ ॥

 

अशरीरँ शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् ।

महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२॥

 

सम्बन्ध - अब इस प्रकार उन परमेश्वरकी महिमाको समझानेवाले पुरुषकी पहचान बताते हैं-

जो स्थिर न रहनेवाले (विनाशशील) शरीरों में शरीररहित (एवं) अविचलभाव से स्थित है, उस महान् सर्वव्यापी परमात्मा को जानकर बुद्धिमान् महापुरुष (कभी किसी भी कारण से) शोक नहीं करता ॥ २२ ॥

 

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो

    न मेधया न बहुना श्रुतेन ।

यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः

    तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूꣳ स्वाम् ॥ २३॥

 

सम्बन्ध - अब यह बतलाते हैं कि वे परमात्मा अपने पुरुषार्थसे नहीं मिलते, वरं उसीको मिलते हैं, जिसको वे स्वीकार कर लेते हैं-

 

यह परब्रह्म परमात्मा न तो प्रवचन से, न बुद्धिसे (और) न बहुत सुनने से ही प्राप्त हो सकता है। जिसको यह स्वीकार कर लेता है, उसके द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है (क्योंकि) यह परमात्मा उसके लिये अपने यथार्थ स्वरूप को प्रकट कर देता है ॥ २३ ॥

 

नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः ।

नाशान्तमानसो वाऽपि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २४॥

 

सम्बन्ध - अब यह बतलाते हैं कि परमात्मा किसको प्राप्त नहीं होते-

सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा भी इस परमात्मा को न तो वह मनुष्य प्राप्त कर सकता है, जो बुरे आचरणों से निवृत्त नहीं हुआ है, न वह प्राप्त कर सकता है, जो अशान्त है, न वह कि जिसके मन, इन्द्रियाँ संयत नहीं हैं और न वही प्राप्त करता है, जिसका मन शान्त नहीं है ॥ २४ ॥

 

यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः ।

मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५॥

 

सम्बन्ध — उस परब्रह्म परमेश्वरके तत्त्व को सुनकर और बुद्धि द्वारा विचार करके भी मनुष्य उसे क्यों नहीं जान सकता ? इस जिज्ञासा पर कहते हैं-

(संहारकाल में) जिस परमेश्वर के ब्राह्मण और क्षत्रिय - ये दोनों ही अर्थात् सम्पूर्ण प्राणिमात्र भोजन बन जाते हैं (तथा) सबका संहार करने वाली मृत्यु (भी) जिसका उपसेचन (भोज्य वस्तु के साथ लगाकर खाने का व्यञ्जन, तरकारी आदि) बन जाता है। वह परमेश्वर जहाँ (और) जैसा है, यह ठीक-ठीक कौन जानता है ॥ २५ ॥

 

 इति काठकोपनिषदि प्रथमाध्याये द्वितीया वल्ली ॥

 


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