कठोपनिषद
कठोपनिषद के रचयिता कठ नाम के
तपस्वी आचार्य थे। वे मुनि वैशम्पायन के शिष्य तथा यजुर्वेद की कठशाखा के
प्रवृर्त्तक थे। इसमें दो अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में तीन-तीन वल्लियां हैं, जिनमें वाजश्रवा-पुत्र नचिकेता और यमराज के
बीच संवाद हैं।
ॐ
॥ अथ कठोपनिषद् ॥
ॐ सह नाववतु । सह
नौ भुनक्तु । सहवीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि
नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ॥
ॐ शान्तिः
शान्तिः शान्तिः ॥
पूर्णब्रह्म परमात्मन् आप हम
दोनों गुरु-शिष्य की साथ-साथ रक्षा करें, हम दोनों का साथ-साथ पालन करें, हम दोनों साथ-साथ ही
शक्ति प्राप्त करें। हम दोनों की पढ़ी हुई विद्या तेजोमयी हो, हम दोनों परस्पर द्वेष न करें।
प्रथम अध्याय, प्रथम
वल्ली Part I Canto I
ॐ उशन् ह वै
वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ ।
तस्य ह नचिकेता
नाम पुत्र आस ॥ १॥
ॐ- इस सच्चिदानन्दघन परमात्मा
के नाम का स्मरण करके उपनिषद् का आरम्भ करते हैं। प्रसिद्ध है कि यज्ञ का फल चाहने
वाले वाजश्रवा के पुत्र उद्दालक ने विश्वजित् यज्ञ में अपना सारा धन ब्राह्मणों को
दे दिया। उसका नचिकेता नाम से प्रसिद्ध एक पुत्र था ॥१॥
ग्रंथ का आरंभ ॐ कार का उच्चारण
(परमात्मा का स्मरण करके) किया गया है।
तँ ह कुमारँ
सन्तं दक्षिणासु
नीयमानासु
श्रद्धाविवेश सोऽमन्यत ॥ २॥
जिस समय ब्राह्मणों को दक्षिणा
के रूप में देने के लिये गौएँ लायी जा रही थीं, उस समय छोटा बालक होने पर भी उस नचिकेता में श्रद्धा आस्तिक बुद्धि का
आवेश हो गया और उन जराजीर्ण गायोंको देखकर वह विचार करने लगा ॥ २ ॥
पीतोदका जग्धतृणा
दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः ।
अनन्दा नाम ते
लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥ ३॥
जो अन्तिम बार जल पी चुकी हैं, जिनका घास खाना समाप्त हो गया है, जिनका दूध अन्तिम बार दुह लिया गया है, जिनकी
इन्द्रियाँ नष्ट हो चुकी हैं, ऐसी (निरर्थक, मरणासन्न) गौओं को देने वाला, वह दाता तो शूकर-
कूकरादि नीच योनियाँ और नरकादि जो सब प्रकार के सुखों से शून्य हैं, उनको प्राप्त होता है (अतः पिताजी को सावधान करना चाहिये) ॥ ३ ॥
स होवाच पितरं तत
कस्मै मां दास्यसीति ।
द्वितीयं तृतीयं
तँ होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥ ४॥
यह सोचकर वह अपने पिता से बोला
कि हे प्यारे पिताजी! आप मुझे किसको देंगे ? उत्तर न मिलने पर उसने वही बात दुबारा, तिबारा कही ।
तब पिता ने उससे क्रोधपूर्वक इस प्रकार कहा- तुझे मैं मृत्यु को देता हूँ ॥ ४ ॥
बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः ।
किँ स्विद्यमस्य
कर्तव्यं यन्मयाऽद्य करिष्यति ॥ ५॥
मैं बहुत-से शिष्यों में तो
प्रथम श्रेणी के आचरण पर चलता आया हूँ और बहुतों में मध्यम श्रेणी के आचार पर चलता
हूँ (कभी भी नीची श्रेणी के आचरण को मैंने नहीं अपनाया) फिर पिताजी ने ऐसा क्यों
कहा! यम का ऐसा कौन-सा कार्य हो सकता है जिसे आज मेरे द्वारा (मुझे देकर) पिताजी
पूरा करेंगे ॥ ५ ॥
व्याख्या - शिष्यों और पुत्रोंकी तीन श्रेणियाँ होती हैं—उत्तम, मध्यम और अधम । जो गुरु या पिताका मनोरथ
समझकर उनकी आज्ञाकी प्रतीक्षा किये बिना ही उनकी रुचिके अनुसार कार्य करने लगते
हैं, वे उत्तम हैं। जो आज्ञा पानेपर कार्य करते हैं, वे मध्यम हैं और जो मनोरथ जान लेने और स्पष्ट आदेश सुन लेनेपर भी तदनुसार
कार्य नहीं करते, वे अधम हैं। मैं बहुत-से शिष्यों में तो
प्रथम श्रेणीका हूँ, प्रथम श्रेणीके आचरणपर चलनेवाला हूँ;
क्योंकि उनसे पहले ही मनोरथ समझकर कार्य कर देता हूँ; बहुत-से शिष्योंसे मध्यम श्रेणीका भी हूँ, मध्यम
श्रेणीके आचारपर भी चलता आया हूँ, परंतु अधम श्रेणीका तो हूँ
ही नहीं। आज्ञा मिले और सेवा न करूँ, ऐसा तो मैंने कभी किया
ही नहीं। फिर, पता नहीं, पिताजीने मुझे
ऐसा क्यों कहा? मृत्युदेवताका भी ऐसा कौन-सा प्रयोजन हैं,
जिसको पिताजी आज मुझे उनको देकर पूरा करना चाहते हैं।
अनुपश्य यथा
पूर्वे प्रतिपश्य तथाऽपरे ।
सस्यमिव मर्त्यः
पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६॥
पूर्वज पितामह आदि जिस प्रकार का
आचरण करते आये हैं, उस पर विचार कीजिये और वर्तमान में भी
दूसरे श्रेष्ठ लोग जैसा आचरण कर रहे हैं तथा उस पर भी दृष्टिपात कर लीजिये (फिर आप
अपने कर्तव्यका निश्चय कीजिये)। यह मरणधर्मा मनुष्य अनाज की तरह पकता है अर्थात्
जराजीर्ण होकर मर जाता है तथा अनाज की भाँति ही फिर उत्पन्न हो जाता है ॥ ६ ॥
वैश्वानरः
प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् ।
तस्यैताँ शान्तिं
कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ७॥
यमराज के लौटने पर उनकी पत्नी ने कहा -
हे सूर्यपुत्र! स्वयं
अग्रिदेवता ही ब्राह्मण अतिथि के रूप में घरों में प्रवेश करते हैं। उनकी (ऐसे
साधु पुरुषों की) ऐसी (अर्घ्य-पाद्य-आसन आदि के द्वारा) शान्ति किया करते हैं। अतः
आप उनके पाद प्रक्षालनादि के लिये जल ले जाइये ॥ ७ ॥
आशाप्रतीक्षे
संगतँ सूनृतां
चेष्टापूर्ते पुत्रपशूँश्च सर्वान् ।
एतद्वृङ्क्ते
पुरुषस्याल्पमेधसो
यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ८॥
जिसके घर में ब्राह्मण अतिथि
बिना भोजन किये निवास करता है, उस मन्दबुद्धि
मनुष्य की नाना प्रकार की आशा और प्रतीक्षा उनकी पूर्ति से होने वाले सब प्रकार के
सुख, सुन्दर भाषण के फल एवं यज्ञ, दान
आदि शुभ कर्मों के और कुआँ, बगीचा, तालाब
आदि निर्माण कराने के फल तथा समस्त पुत्र और पशु, इन सबको
(वह) नष्ट कर देता है ॥८॥
तिस्रो
रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे-
ऽनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः ।
नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन्
स्वस्ति मेऽस्तु
तस्मात्प्रति त्रीन्वरान्वृणीष्व ॥ ९॥
पत्नी के वचन सुनकर धर्ममूर्ति यमराज नचिकेता के पास
गए और कहा -
हे ब्राह्मण देवता ! आप नमस्कार
करने योग्य अतिथि हैं। आपको नमस्कार है। हे ब्राह्मण! मेरा कल्याण हो। आपने जो तीन
रात्रियों तक मेरे घर पर बिना भोजन किये निवास किया है, इसलिये आप मुझसे प्रत्येक रात्रि के बदले
एक-एक करके तीन वरदान माँग लीजिये ॥ ९ ॥
शान्तसंकल्पः
सुमना यथा स्याद्
वीतमन्युर्गौतमो माऽभि मृत्यो ।
त्वत्प्रसृष्टं
माऽभिवदेत्प्रतीत
एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १०॥
पिता को सुख पहुँचाने की इच्छा से नचिकेता ने कहा-
हे मृत्युदेव जिस प्रकार मेरे
पिता गौतमवंशीय उद्दालक मेरे प्रति शान्त संकल्पवाले प्रसन्नचित्त और क्रोध एवं
खेद से रहित हो जायँ तथा आपके द्वारा वापस भेजा जाने पर जब मैं उनके पास जाऊँ तो, वे मुझ पर विश्वास करके (यह वही मेरा पुत्र
नचिकेता है, ऐसा भाव रखकर) मेरे साथ प्रेमपूर्वक बातचीत
करें। यह मैं अपने तीनों वरों में से पहला वर माँगता हूँ ॥ १० ॥
यथा पुरस्ताद्
भविता प्रतीत
औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।
सुखँ रात्रीः
शयिता वीतमन्युः
त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ॥ ११॥
यमराज ने कहा -
तुमको मृत्यु के मुख से छूटा
हुआ देखकर मुझसे प्रेरित तुम्हारे पिता अरुण-पुत्र उद्दालक पहले की भाँति ही - यह
मेरा पुत्र नचिकेता ही है, ऐसा विश्वास
करके दुःख और क्रोध रहित हो जायेंगे और वे अपनी आयु की शेष रात्रियों में
सुखपूर्वक शयन करेंगे ॥ ११ ॥
स्वर्गे लोके न
भयं किंचनास्ति
न तत्र त्वं न जरया बिभेति ।
उभे
तीर्त्वाऽशनायापिपासे
शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२॥
स्वर्गलोक में किंचिन्मात्र भी
भय नहीं है, वहाँ मृत्युरूप
स्वयं आप भी नहीं हैं। वहाँ कोई बुढ़ापे से भी भय नहीं करता। स्वर्ग लोक के निवासी
भूख और प्यास दोनों से पार होकर दु:खों से दूर रहकर आनन्द भोगते हैं ॥ १२ ॥
स त्वमग्निँ
स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो
प्रब्रूहि त्वँ श्रद्दधानाय मह्यम् ।
स्वर्गलोका
अमृतत्वं भजन्त
एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १३॥
नचिकेता ने कहा -
हे मृत्युदेव! वे आप उपर्युक्त
स्वर्गकी प्राप्ति के साधनरूप अग्रि को जानते हैं अतः आप मुझ श्रद्धालु को वह अग्निविद्या
भलीभाँति समझाकर कहिये, स्वर्गलोक के निवासी अमरत्व को
प्राप्त होते हैं इसलिये यह मैं दूसरे वर के रूप में माँगता हूँ ॥ १३॥
मर्त्यलोक में प्राणी भूख और
प्यास दोनों की ज्वाला से जलते हैं, वैसे स्वर्ग में नहीं जलना पड़ता। मेरी उस अग्निविद्या में श्रद्धा है अतः
मुझे उस विद्या का उपदेश दीजिए जिसे जानकर स्वर्गलोक के निवासी अमृतत्व भोगते हैं।
प्र ते ब्रवीमि
तदु मे निबोध
स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।
अनन्तलोकाप्तिमथो
प्रतिष्ठां
विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १४॥
तब यमराज बोले -
हे नचिकेता स्वर्गदायिनी
अग्निविद्या को अच्छी तरह जाननेवाला मैं तुम्हारे लिये उसे भलीभाँति बतलाता हूँ।
तुम उसे मुझसे भलीभाँति समझ लो, तुम इस विद्या
को अविनाशी लोक की प्राप्ति कराने वाली -उसकी आधारस्वरूपा और बुद्धिरूप गुफा में
छिपी हुई समझो ॥ १४ ॥
लोकादिमग्निं
तमुवाच तस्मै
या इष्टका यावतीर्वा यथा वा ।
स चापि
तत्प्रत्यवदद्यथोक्तं
अथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥ १५॥
उस स्वर्गलोक की कारणरूपा
अग्निविद्या का उस नचिकेता को उपदेश दिया। उसमें कुण्ड निर्माण आदि के लिये जो-जो
और जितनी ईंटें आदि आवश्यक होती हैं तथा जिस प्रकार उनका चयन किया जाता है, वे सब बातें भी बताई तथा उस नचिकेता ने भी
वह जैसा सुना था, ठीक उसी प्रकार समझकर यमराज को पुनः सुना
दिया। उसके बाद यमराज उस पर संतुष्ट होकर फिर बोले- ॥ १५ ॥
तमब्रवीत्
प्रीयमाणो महात्मा
वरं तवेहाद्य ददामि भूयः ।
तवैव नाम्ना
भविताऽयमग्निः
सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १६॥
उसकी अलौकिक बुद्धि देखकर
प्रसन्न हुए महात्मा यमराज उस नचिकेता से बोले- अब मैं तुमको यहाँ पुनः यह
अतिरिक्त वर देता हूँ कि यह अग्निविद्या तुम्हारे ही नाम से प्रसिद्ध होगी। इस
अनेक रूपोंवाली रत्नों की माला को भी तुम स्वीकार करो ॥ १६ ॥
त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य
सन्धिं
त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू ।
ब्रह्मजज्ञं
देवमीड्यं विदित्वा
निचाय्येमाँ शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १७॥
इस अग्रि का शास्त्रोक्त रीति
से तीन बार अनुष्ठान करनेवाला तीनों (ऋक्, साम, यजुर्वेद) के साथ सम्बन्ध जोड़कर यज्ञ, दान और तपरूप तीनों कर्मों को निष्काम भाव से करता रहने वाला मनुष्य
जन्म-मृत्यु से तर जाता है। वह ब्रह्मा से उत्पन्न सृष्टि के जानने वाले इस अग्निदेव
को जानकर तथा इसका निष्कामभाव से चयन करके इस अनन्त शान्ति को पा जाता है (जो
मुझको प्राप्त है) ॥ १७ ॥
त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा
य एवं विद्वाँश्चिनुते नाचिकेतम् ।
स मृत्युपाशान्
पुरतः प्रणोद्य
शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८॥
ईंटों के स्वरूप, संख्या और अग्नि चयन-विधि-इन तीनों बातों
को जानकर तीन बार नाचिकेत-अग्निविद्या का अनुष्ठान करने वाला तथा जो कोई भी इस
प्रकार जानने वाला पुरुष (विद्वान) इस नाचिकेत अग्रि
का चयन करता है। वह मृत्यु के पाश को अपने सामने ही (मनुष्य-शरीर में ही) काटकर
शोक से पार होकर स्वर्गलोक में आनन्द का अनुभव करता है ।। १८ ।।
एष
तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो
यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण ।
एतमग्निं तवैव
प्रवक्ष्यन्ति जनासः
तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९॥
हे नचिकेता ! यह तुम्हें बतलायी
हुई स्वर्ग प्रदान करनेवाली अग्रिविद्या है, जिसको तुमने दूसरे वर से माँगा था। इस अग्नि
को (अब से) लोग तुम्हारे ही नाम से कहा करेंगे। हे नचिकेता! अब तुम तीसरा वर माँगो
॥ १९ ॥
येयं प्रेते
विचिकित्सा मनुष्ये-
ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाऽहं
वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ २०॥
नचिकेता तीसरा वर माँगता है -
मरे हुए मनुष्य के विषय में जो
यह संशय है - कोई तो यों कहते हैं कि मरने के बाद यह आत्मा रहता है और कोई ऐसा
कहते हैं कि नहीं रहता। आपके द्वारा उपदेश पाया हुआ मैं इसका निर्णय भलीभाँति समझ
लूँ- यही तीनों वरों में से तीसरा वर है ॥ २० ॥
देवैरत्रापि
विचिकित्सितं पुरा
न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः ।
अन्यं वरं
नचिकेतो वृणीष्व
मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥ २१॥
हे नचिकेता ! इस विषय में पहले
देवताओं ने भी संदेह किया था (परंतु उनकी भी समझ में नहीं आया) क्योंकि यह विषय
बड़ा सूक्ष्म है, सहज ही समझ में
आनेवाला नहीं है (इसलिये) तुम दूसरा वर माँग लो। मुझ पर दबाव मत डालो, इस आत्मज्ञानसम्बन्धी वर को मुझे लौटा दो ॥ २१ ॥
देवैरत्रापि
विचिकित्सितं किल
त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ ।
वक्ता चास्य
त्वादृगन्यो न लभ्यो
नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २२॥
नचिकेता ने दृढ़ता से कहा -
हे यमराज ! आपने जो यह कहा कि
सचमुच इस विषय पर देवताओं ने भी विचार किया था (परंतु वे निर्णय नहीं कर पाये) और
वह सुविज्ञेय भी नहीं है (इतना ही नहीं) इसके सिवा इस विषय का कहने वाला भी आपके
जैसा दूसरा नहीं मिल सकता अतः इसलिये मेरी समझ में तो इसके समान दूसरा कोई भी वर
नहीं है २२ ॥
शतायुषः
पुत्रपौत्रान्वृणीष्वा
बहून्पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान् ।
भूमेर्महदायतनं
वृणीष्व
स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २३॥
सैकड़ों वर्षों की आयु वाले
बेटे और पोतों को तथा बहुत-से गौ आदि पशुओं को एवं हाथी, सुवर्ण और घोड़ों को माँग लो। भूमि के बड़े
विस्तारवाले मण्डल (साम्राज्य) को माँग लो, तुम स्वयं भी
जितने वर्षों तक चाहो जीते रहो ॥ २३ ॥
एतत्तुल्यं यदि
मन्यसे वरं
वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च ।
महाभूमौ
नचिकेतस्त्वमेधि
कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४॥
हे नचिकेता ! धन, सम्पत्ति और अनन्तकाल तक जीने के साधनों को
यदि तुम इस आत्मज्ञान विषयक वरदान के समान वर मानते हो तो माँग लो और तुम इस
पृथ्वीलोक में बड़े भारी सम्राट् बन जाओ। मैं तुम्हें सम्पूर्ण भोगों में से अति
उत्तम भोगों को भोगनेवाला बना देता हूँ ॥ २४ ॥
ये ये कामा
दुर्लभा मर्त्यलोके
सर्वान् कामाँश्छन्दतः प्रार्थयस्व ।
इमा रामाः सरथाः
सतूर्या
न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः ।
आभिर्मत्प्रत्ताभिः
परिचारयस्व
नचिकेतो मरणं माऽनुप्राक्षीः ॥ २५॥
ये जो-जो भोग मनुष्यलोक में
दुर्लभ हैं, उन सम्पूर्ण
भोगों को इच्छानुसार माँग लो और नाना प्रकार के बाजों के सहित इन स्वर्ग की
अप्सराओं को (अपने साथ ले जाओ)। मनुष्यों को ऐसी स्त्रियाँ नि:संदेह अलभ्य हैं।
मेरे द्वारा दी हुई इन स्त्रियों से तुम अपनी सेवा कराओ। हे नचिकेता ! मरने के बाद
आत्मा का क्या होता है, इस बात को मत पूछो ॥ २५ ॥
श्वोभावा
मर्त्यस्य यदन्तकैतत्
सर्वेंद्रियाणां जरयन्ति तेजः ।
अपि सर्वं
जीवितमल्पमेव
तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६॥
नचिकेता ने कहा -
हे यमराज! (जिनका आपने वर्णन
किया, वे ) क्षणभङ्गुर भोग (और उनसे
प्राप्त होनेवाले सुख) मनुष्य के अन्तःकरण सहित सम्पूर्ण इन्द्रियों का जो तेज
है, उसको क्षीण कर डालते हैं। इसके सिवा समस्त आयु (चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो) अल्प ही है
इसलिये ये आपके रथ आदि वाहन और ये अप्सराओं के नाच-गानआपके ही पास रहें (मुझे नहीं
चाहिये) ॥ २६ ॥
न वित्तेन
तर्पणीयो मनुष्यो
लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा ।
जीविष्यामो
यावदीशिष्यसि त्वं
वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७॥
मनुष्य धन से कभी भी तृप्त नहीं
किया जा सकता है। जब कि (हमने) आपके दर्शन पा लिये हैं (तब) धन को (तो हम) पा ही
लेंगे (और) आप जब तक शासन करते रहेंगे (तब तक तो) हम जीते ही रहेंगे (इन सबको भी
क्या माँगना है अतः) मेरे माँगने लायक वर तो वह (आत्मज्ञान) ही है ॥ २७ ॥
अजीर्यताममृतानामुपेत्य
जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् ।
अभिध्यायन्
वर्णरतिप्रमोदान्
अतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८॥
यह मनुष्य जीर्ण होने वाला और
मरणधर्मा है -इस तत्त्व को भलीभाँति समझने वाला मनुष्यलोक का निवासी कौन ऐसा
मनुष्य है जो कि बुढ़ापे से रहित न मरने वाले (आप-सदृश) महात्माओं का सङ्ग पाकर भी
स्त्रियों के सौन्दर्य, क्रीडा और
आमोद-प्रमोद का बार-बार चिन्तन करता हुआ, बहुत काल तक जीवित
रहने में प्रेम करेगा ?॥२८॥
यस्मिन्निदं
विचिकित्सन्ति मृत्यो
यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।
योऽयं वरो
गूढमनुप्रविष्टो
नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २९॥
हे यमराज ! जिस महान् आश्चर्यमय
परलोक सम्बन्धी आत्मज्ञान के विषय में लोग यह शङ्का करते हैं कि यह आत्मा मरने के
बाद रहता है या नहीं -उसमें जो निर्णय है, वह आप हमें बतलाइये - जो यह अत्यन्त गम्भीरता को प्राप्त हुआ वर है,
इससे दूसरा वर नचिकेता नहीं माँगता ॥ २९ ॥
॥ इति
काठकोपनिषदि प्रथमाध्याये प्रथमा वल्ली ॥

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