Friday, 17 January 2025

भर्तृहरिकृत नीतिशतकं Nitishatak by Bhartrihari

 


भर्तृहरिकृत नीतिशतकं

Nitishatak by Bhartrihari

नीतिशतक (Nītiśatakam) भारतीय साहित्य का एक अनुपम रत्न है, जिसकी रचना महान कवि भर्तृहरि ने की है। यह संग्रह शतक (सौ श्लोकों) के रूप में नीतिशास्त्र, व्यावहारिक ज्ञान, और नैतिक शिक्षा को सरल परंतु प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत करता है।

इस ग्रंथ में मानवीय स्वभाव, जीवन के वास्तविक अनुभव, और व्यावहारिक बुद्धिमत्ता के गहन विचारों को अत्यंत रोचक और तीखे व्यंग्य के साथ व्यक्त किया गया है। नितीशतक में ऐसे श्लोक हैं जो हमें जीवन में धैर्य, सदाचार, ज्ञान, और सत्संगति का महत्त्व सिखाते हैं, साथ ही अज्ञान, मूर्खता, और अहंकार से दूर रहने की प्रेरणा देते हैं।

भर्तृहरि के इस काव्य में सरल शब्दों में गहरे दर्शन समाहित हैं, जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके रचयिता के समय में थे। यह ग्रंथ न केवल शिक्षाप्रद है, बल्कि जीवन जीने की कला का मार्गदर्शन भी करता है।

 

दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये।

स्वानुभूत्येकनामाय नमः शान्ताय तेजसे ॥१॥

 

Salutations to the one who is:

दिक्कालाद्यनवच्छिन्न: Beyond the limitations of space (directions) and time.

अनन्तचिन्मात्रमूर्तये: Of the infinite form that is pure consciousness.

स्वानुभूत्येकनामाय: Known only through one's own experience (self-realization).

शान्ताय तेजसे: Who is peaceful and self-effulgent.

 

यह श्लोक परम सत्य या ब्रह्म को प्रणाम करता है, जो अनन्त और शुद्ध चेतना है। यह समय, दिशा और किसी भी सीमा से परे है। इसे बाहरी साधनों से नहीं जाना जा सकता, बल्कि आत्म-अनुभव के द्वारा ही इसकी पहचान होती है। यह तेजस्वी और शांतिपूर्ण स्वरूप है, जो संसार के सारे बंधनों से मुक्त है।

 

यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता

साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः।

अस्मत्कृते च परिशुष्यति काचिदन्या

धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च ॥ २॥

 

The one whom I constantly think about is indifferent towards me.

She desires another person, but that person is attached to someone else.

Meanwhile, someone else pines for me, tormented by unrequited love.

"Curse her, curse him, curse Cupid (Kamdev), curse this situation, and curse myself!"

 

यह श्लोक प्रेम की विडम्बना (irony) को दर्शाता है। कवि यह बताता है कि प्रेम अक्सर एकतरफा होता है, जहाँ व्यक्ति जिसकी आकांक्षा करता है, वह उससे उदासीन रहता है। इस असमान प्रेम की श्रृंखला में सभी दुःखी होते हैं। कवि अंत में स्वयं, परिस्थिति और प्रेम देवता (कामदेव) को भी दोष देता है।

 

अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः ।

ज्ञानलवदुर्विग्धं ब्रह्मापि नरं न रञ्जयति ॥ ३॥

 

An ignorant person is easily pleased and easy to deal with.

A wise person is even easier to satisfy because of their contented nature.

However, a person with half-baked knowledge (ignorance mixed with superficial understanding) cannot be pleased even by Lord Brahma himself.

 

यह श्लोक अधूरे ज्ञान के खतरों की ओर इशारा करता है।

जो लोग अज्ञानी होते हैं, वे आसानी से संतुष्ट हो जाते हैं क्योंकि उन्हें ज्ञान का अभिमान नहीं होता। जो ज्ञानी होते हैं, वे सहज और निर्द्वंद्व होते हैं। लेकिन जो लोग अधूरे ज्ञान के साथ अहंकारी हो जाते हैं, वे स्वयं को बड़ा समझते हैं और उन्हें खुश करना असंभव होता है। यह हमें सिखाता है कि आधा ज्ञान विनाशकारी हो सकता है।

 

प्रसह्य मणिमुद्धरेन्मकरवक्त्रदंष्ट्राङ्कुरा -

त्समुद्रमपि संतरेत्प्रचलदुर्मिमालाकुलम् ॥

भुजङ्गमपि कोपितं शिरसि पुष्पवद्धारये -

न्न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ॥ ४॥

 

One may be able to forcibly snatch a jewel from the jaws of a crocodile.

One may even cross the turbulent ocean full of violent waves.

One may hold a furious snake on one’s head as though it were a garland.

But it is impossible to please a stubborn fool who is set in their ways.

 

यह श्लोक स्पष्ट करता है कि मूर्ख और हठी व्यक्ति से व्यवहार करना सबसे कठिन काम है। कवि कहता है कि व्यक्ति बड़े से बड़े असंभव कार्य कर सकता है, जैसे: मगरमच्छ के मुँह से रत्न निकालना,  तूफानी समुद्र पार करना, क्रोधित साँप को बिना डर के सिर पर रखना।

लेकिन एक मूर्ख व्यक्ति जो अपनी सोच में अड़ा हुआ है, उसे समझाना या प्रसन्न करना असंभव है। यह हमें सिखाता है कि मूर्खता और हठधर्मिता के सामने तर्क और प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं।

मुख्य बिन्दु :

श्लोक 1: परम सत्य (ब्रह्म) की स्तुति।

श्लोक 2: प्रेम की विडम्बना और एकतरफा प्रेम का दुःख।

श्लोक 3: अधूरे ज्ञान के साथ अहंकार का नुकसान।

श्लोक 4: मूर्ख व्यक्ति को समझाने की व्यर्थता।

नितीशतक में इन श्लोकों के माध्यम से जीवन के गहरे सत्य, मानवीय स्वभाव और ज्ञान की महत्ता का वर्णन किया गया है।

 

लभेत सिकतासु तैलमपि यत्नतः पीडयन्

पिबेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दितः ।

कदाचिदपि पर्यटन्शशविषाणमासादयेन्

न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ॥ ५॥

 

A person may extract oil from sand by pressing it hard,

He may drink water from a mirage in his extreme thirst,

Or even come across the horns of a rabbit while wandering (an impossibility),

But it is impossible to please a stubborn fool who is fixed in his ways.

 

यह श्लोक हमें यह समझाता है कि मूर्ख व्यक्ति, जो अपने विचारों में हठधर्मी होता है, उसे संतुष्ट करना या समझाना असंभव है। भर्तृहरि यहाँ अतिशयोक्ति का प्रयोग कर तीन असंभव कार्यों का वर्णन करते हैं: रेत से तेल निकालना,  मृगतृष्णा में पानी पीना, खरगोश के सींग ढूँढना ।

इन असंभव उदाहरणों के माध्यम से यह बताया गया है कि मूर्ख व्यक्ति के मन को जीतने का प्रयास व्यर्थ है। यह श्लोक हमें विवेकपूर्ण लोगों के साथ ही समय बिताने की शिक्षा देता है।

 

व्यालं बालमृणालतन्तुभिरसौ रोद्धुं समुज्जृम्भते

छेत्तुं वज्रमणीं शिरीषकुसुमप्रान्तेन सन्नह्यति ।

माधुर्यं मधुबिन्दुना रचयितुं क्षाराम्बुधेरीहते

नेतुं वाञ्छति यः खलान्पथि सतां सूक्तैः सुधास्यन्दिभिः ॥ ६॥

 

A person who tries to bind a furious serpent with soft lotus fibers,

Or who attempts to cut a diamond with the tip of a delicate silk-cotton flower,

Or who hopes to sweeten the salty ocean with a drop of honey,

Is like someone who tries to reform villains using the sweet words of the virtuous.

 

इस श्लोक में भर्तृहरि ने दुष्टों (खल) को सुधारने के प्रयास की निरर्थकता को उजागर किया है। यहाँ तीन असंभव कार्यों का वर्णन किया गया है:  बाल की डोरी से साँप को बाँधना, नाजुक फूल की नोक से वज्र (हीरा) काटना,  समुद्र के खारे जल को मधु की बूँद से मीठा बनाना।

इसी प्रकार, सज्जनों के मधुर वचनों से दुष्ट स्वभाव वाले व्यक्ति को सुधारने का प्रयास व्यर्थ है। यह श्लोक हमें यह शिक्षा देता है कि हमें अपनी ऊर्जा और प्रयास उन लोगों पर व्यर्थ नहीं करना चाहिए जो सुधार के योग्य नहीं हैं।

 

स्वायत्तमेकान्तगुणं विधात्रा

विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः ।

विशेषतः सर्वविदां समाजे

विभूषणं मौनमपण्डितानाम् ॥ ७॥

 

Silence is an excellent quality, completely under one’s control.

It is the most effective cover created by the Creator to hide one’s ignorance.

Especially in the assembly of the learned, silence serves as an ornament for the unwise.

 

यह श्लोक मौन के महत्त्व को दर्शाता है। मौन व्यक्ति के लिए आभूषण की तरह होता है, विशेषकर तब जब वह स्वयं अल्पज्ञ हो। विद्वानों की सभा में चुप रहना अज्ञानी व्यक्ति को मूर्ख साबित होने से बचाता है। यह हमें यह सिखाता है कि मौन कभी-कभी बोलने से अधिक प्रभावशाली होता है और अनावश्यक बातों से बचकर व्यक्ति सम्मान अर्जित कर सकता है।

 

यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं गज इव मदान्धः समभवम्

तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः ।

यदा किञ्चित्किञ्चिद्बुधजनसकाशादवगतम्तदा

मूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः ॥ ८॥

 

When I acquired a little knowledge, I became blind with pride, like a drunken elephant.

At that time, my mind was puffed up with the thought: “I know everything.”

But when I gained a little more knowledge from the wise,

I realized how ignorant I was, and my pride vanished like a fever subsiding.

 

यह श्लोक अहंकार के नाश और सच्चे ज्ञान के महत्व को बताता है। जब व्यक्ति को थोड़ा-सा ज्ञान प्राप्त होता है, तो वह अपने को सर्वज्ञ समझने की भूल कर बैठता है। लेकिन जब वह सच्चे विद्वानों के संपर्क में आता है और अधिक सीखता है, तब उसे अपनी मूर्खता का बोध होता है।

यह श्लोक यह सिखाता है कि सच्चे ज्ञान का पहला लक्षण विनम्रता है। ज्ञान जितना बढ़ता है, उतना ही व्यक्ति का अहंकार घटता है।

 

श्लोक 5: मूर्ख व्यक्ति को प्रसन्न करना असंभव है।

श्लोक 6: दुष्ट व्यक्ति को सुधारने का प्रयास व्यर्थ है।

श्लोक 7: मौन अज्ञानी के लिए आभूषण है।

श्लोक 8: सच्चा ज्ञान अहंकार को नष्ट करता है।

इन श्लोकों के माध्यम से भर्तृहरि जीवन में मूर्खता, अहंकार, और दुष्टता से दूर रहने तथा विनम्रता, मौन, और सच्चे ज्ञान को अपनाने की प्रेरणा देते हैं।

 

कृमिकुलचितं लालाक्लिन्नं विगन्धि जुगुप्सितं

निरूपमरसं प्रीत्या खादन्नरास्थि निरामिषम् ।

सुरपितमपि श्वा पार्श्वस्थं विलोक्य न शङ्कते

न हि गणयति क्षुद्रो जन्तुः परिग्रहफल्गुताम् ॥ ९॥

 

A dog lovingly chews a foul-smelling, saliva-soaked, worm-infested, tasteless bone,

Even when divine nectar is placed nearby, it remains undisturbed.

For lowly beings cannot comprehend the true worth of things.

 

भर्तृहरि ने इस श्लोक में नीच प्रवृत्ति के लोगों की मानसिकता पर व्यंग्य किया है। जैसे कुत्ता गंदी और घृणास्पद हड्डी को चबाने में तृप्ति पाता है और अमृत जैसी दिव्य चीज़ को अनदेखा करता है, वैसे ही अज्ञानी और तुच्छ स्वभाव के लोग श्रेष्ठ और सच्चे मूल्य को नहीं पहचान पाते।
यह हमें यह सिखाता है कि सार्थक और श्रेष्ठ चीज़ों का मूल्य केवल विवेकवान व्यक्ति ही जान पाता है।

 

शिरः शार्वं स्वर्गात्पशुपतिशिरस्तः क्षितिधरं

महीध्रादुत्तुङ्गादवनिमवनेश्चापि जलधिम् ।

अधोऽधो गङ्गेयं पदमुपगता स्तोकमथवा

विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः ॥ १०॥

 

The water of the Ganga descended from Lord Shiva’s head to the heavens, then to the mountains,

From the mountains, it fell to the earth and finally reached the ocean.

Similarly, when a person loses their wisdom, their downfall happens in countless ways.

 

यह श्लोक व्यक्तित्व के विवेक के महत्व को दर्शाता है।  जैसे गंगा का जल ऊँचाई से गिरते हुए नीचे की ओर बढ़ता है, उसी तरह विवेकहीन व्यक्ति का पतन भी अवरोही क्रम में होता है।
श्लोक हमें विवेक बनाए रखने की प्रेरणा देता है ताकि हम जीवन में उच्च स्तर पर बने रहें और पतन से बचें।

 

शक्यो वारयितुं जलेन हुतभुक्छत्रेण सूर्यातप्तो

नागेन्द्रो निशिताङ्कुशेन समदो दण्डेन गोगर्दभौ ।

व्याधिर्भेषजसङ्ग्रहैश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगैर्विषं

सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम् ॥ ११॥

 

Fire can be extinguished with water,

The heat of the sun can be shielded with an umbrella,

An intoxicated elephant can be controlled with a sharp goad,

Cattle and donkeys can be restrained with a stick,

Diseases can be cured with medicines, and poison with chants.

But there is no remedy for foolishness.

 

यह श्लोक मूर्खता की असाध्यता को स्पष्ट करता है। भर्तृहरि ने कई असाधारण समस्याओं का समाधान बताते हुए अंत में मूर्ख व्यक्ति की स्थिति को सबसे दयनीय बताया है। मूर्खता का इलाज संभव नहीं क्योंकि मूर्ख व्यक्ति स्वयं को सुधारने के लिए तैयार नहीं होता।
यह श्लोक हमें समझदारी और विवेकपूर्ण आचरण अपनाने की प्रेरणा देता है।

 

साहित्यसङ्गीतकलाविहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः ।

तृणं न खादन्नपि जीवमानः तद्भागधेयं परमं पशूनाम् ॥ १२॥

 

A person devoid of literature, music, and art

Is nothing but a beast, though without a tail or horns.

Unlike animals, such a person doesn’t even eat grass but merely exists.

Such a person’s existence is inferior even to that of animals.

 

यह श्लोक साहित्य, संगीत, और कला के महत्त्व को दर्शाता है। बिना इन गुणों के मनुष्य का जीवन पशुवत होता है, क्योंकि वह अपनी उच्चतम क्षमताओं का उपयोग नहीं कर रहा। पशु तो तृण (घास) खाकर भी उपयोगी होते हैं, लेकिन कला-विहीन व्यक्ति केवल बोझ बनकर जीवन व्यतीत करता है।

यह हमें प्रेरणा देता है कि हमें साहित्य, संगीत और कला जैसी श्रेष्ठ गतिविधियों से जुड़ना चाहिए ताकि हमारा जीवन सार्थक और उन्नत हो सके।

मुख्य संदेश:

श्लोक 9: नीच व्यक्ति कभी भी सच्चे मूल्य को नहीं समझ सकता।

श्लोक 10: विवेकहीन व्यक्ति का पतन अवश्यंभावी होता है।

श्लोक 11: मूर्खता का कोई इलाज नहीं है।

श्लोक 12: कला, संगीत और साहित्य के बिना मनुष्य का जीवन पशु से भी तुच्छ है।

 

येषां न विद्या न तपो न दानं

ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।

ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः

मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥ १३॥

 

Those devoid of wisdom, virtues, and knowledge

Are merely a burden on this earth.

Though appearing in human form, they roam like animals.

 

इस श्लोक में भर्तृहरि ने उन व्यक्तियों की तुलना जानवरों से की है, जो अपने मानवीय गुणों का विकास नहीं करते।

मनुष्य का जीवन केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित नहीं होना चाहिए; यह ज्ञान, विवेक, और सदाचार से परिपूर्ण होना चाहिए।

वरना वह धरती पर एक निरर्थक भार के सिवा कुछ नहीं।

 

वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरैः सह ।

न मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेष्वपि ॥ १४॥

 

It is better to wander in the mountains among wild animals,

Than to associate with fools, even if it’s in the palaces of gods.

 

यह श्लोक मूर्खों के संपर्क से बचने की सीख देता है।

जंगल के जानवर व्यक्ति को शारीरिक नुकसान पहुँचा सकते हैं, लेकिन मूर्खजन मानसिक शांति और जीवन के मूल्यों को नष्ट कर सकते हैं।

यह हमें संगति के चयन में सावधान रहने की प्रेरणा देता है।

 

शास्त्रोपस्कृतशब्दसुन्दरगिरः शिष्यप्रदेयागमा

विख्याताः कवयो वसन्ति विषये यस्य प्रभोर्निर्धनाः ।

तज्जाड्यं वसुधाधिपस्य कवयस्त्वर्थं विनापीश्वराः

कुत्स्याः स्युः कुपरीक्षका न मणयो यैरर्घतः पातिताः ॥ १५॥

 

In a kingdom where even the renowned poets and scholars remain poor,

Such a king’s foolishness is unparalleled.

Poets and scholars are like gods, even without wealth,

But those who fail to recognize their worth are poor judges.

 

यह श्लोक राजाओं और नेतृत्वकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देता है।

एक अच्छे राजा का कर्तव्य है कि वह विद्वानों और कवियों को सम्मान और सहयोग दे।

जो व्यक्ति योग्य जनों का सम्मान नहीं करते, वे स्वयं अयोग्य और मूर्ख होते हैं।

 

हर्तुर्याति न गोचरं किमपि शं पुष्णाति यत् सर्वदा -

ऽप्यर्थिभ्यः प्रतिपाद्यमानमनिषं प्राप्नोति वृद्धिं पराम् ।

कल्पान्तेष्वपि न प्रयाति निधनं विद्याख्यमन्तर्धनं

येषां तान् प्रति मानमुज्झत नृपाः कस्तैः सह स्पर्धते ॥ १६॥

 

Knowledge is a wealth that can neither be stolen nor lost.

It always brings prosperity and increases the more it is shared.

Even at the end of creation, it remains imperishable.

Kings who fail to honour those possessing such wealth, whom are they truly competing with?

 

यह श्लोक विद्या के महत्व और उसके गुणों का वर्णन करता है।

विद्या सबसे अमूल्य धन है क्योंकि इसे चुराया नहीं जा सकता और यह अनंत है।

जो राजा या नेता विद्या और विद्वानों का सम्मान नहीं करते, वे अज्ञानता के प्रतीक होते हैं।

यह श्लोक हमें विद्या की महत्ता और इसे अपनाने की प्रेरणा देता है।

 

मुख्य संदेश:

श्लोक 13: गुणहीन व्यक्ति धरती पर एक भार है।

श्लोक 14: मूर्खों का साथ सबसे बुरा है।

श्लोक 15: विद्वानों का सम्मान न करने वाला शासक अयोग्य है।

श्लोक 16: विद्या अमूल्य और अविनाशी धन है।

इन श्लोकों से हमें ज्ञान, विवेक, और विद्वानों के सम्मान की प्रेरणा मिलती है।

 

अधिगतपरमार्थान् पण्डितान् मावमंस्ता -

स्तृणमिव लघु लक्ष्मीर्नैव तान् संरुणद्धि ।

अभिनवमदलेखाश्यामगण्डस्थलानांन

भवति विषतन्तुर्वारणं वारणानाम् ॥ १७॥

 

Never consider the wise, who have realized the ultimate truth, as insignificant.

Wealth is light like grass; it cannot bind them.

Just as a spider’s web cannot restrain the mighty stride of young elephants intoxicated by their strength.

 

इस श्लोक में भर्तृहरि ने विद्वानों की महत्ता को दर्शाया है।

विद्वान व्यक्ति धन और भौतिक सुखों से परे होते हैं।

उन्हें धन की चकाचौंध और सांसारिक बंधन प्रभावित नहीं कर सकते।

जिस तरह हाथी की शक्ति के सामने मकड़ी का जाल नगण्य है, उसी तरह सच्चे ज्ञानियों को सांसारिक प्रलोभन बाँध नहीं सकते।

 

अम्भोजिनीवनविहारविलासमेवहंसस्य

हन्ति नितरां कुपितो विधाता ।

न त्वस्य दुग्धजलभेदविधौ प्रसिद्धां

वैदग्ध्यकीर्तिमपहर्तुमसौ समर्थः ॥ १८॥

 

The swan derives its delight from wandering in lotus-filled lakes, and even if fate is displeased with it,

Its well-known skill of separating milk from water

Cannot be taken away.

 

यह श्लोक हंस के गुणों के माध्यम से बताता है कि विद्वानों या गुणी लोगों की विशेषता कोई उनसे छीन नहीं सकता।

हंस की तरह, गुणी व्यक्ति की विशिष्टता और योग्यता उसकी पहचान होती है।

भले ही परिस्थितियाँ विपरीत हों, उसकी विद्या और कौशल कभी नष्ट नहीं होते।

 

केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वला

न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजाः ।

वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते

क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम् ॥ १९॥

 

Bracelets, jewels, radiant necklaces, bathing, perfumes, flowers, and styled hair

Do not truly adorn a person.

It is only refined speech (cultivated knowledge and words) that decorates a man.

Physical ornaments perish, but the ornament of speech remains eternal.

 

इस श्लोक में बताया गया है कि व्यक्ति की असली शोभा उसकी वाणी है।

भाषा, वाक्पटुता, और ज्ञानयुक्त संवाद ही किसी को वास्तविक रूप से सजाते हैं।

बाहरी आभूषण नष्ट हो जाते हैं, लेकिन संस्कारी वाणी व्यक्ति को अमर बना देती है

 

विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं

विद्या भोगकरी यशस्सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः ।

विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परा देवता

विद्या राजसु पूजिता न तु धनं विद्याविहीनः पशुः ॥ २०॥

 

Knowledge is the greatest form and hidden wealth of a person.

Knowledge brings enjoyment, fame, and happiness.

It is the teacher of all teachers.

In foreign lands, it acts like a friend, and it is the supreme deity.

Among kings, knowledge is worshipped, not wealth.

A man devoid of knowledge is no better than a beast.

 

यह श्लोक विद्या के महत्व को दर्शाता है।

विद्या व्यक्ति का सबसे बड़ा धन है, जो हमेशा उसके साथ रहती है।

विद्या से यश, सम्मान, और सुख मिलता है।

जहाँ धन समाप्त हो जाता है, वहाँ विद्या मित्र के समान सहायता करती है।

विद्या के बिना व्यक्ति का जीवन पशु के समान है।

 

मुख्य संदेश:

श्लोक 17: विद्वानों को हल्के में न लें; वे सांसारिक बंधनों से परे होते हैं।

श्लोक 18: गुणी व्यक्ति की विशेषता कोई छीन नहीं सकता।

श्लोक 19: वाणी का ज्ञान व्यक्ति का सबसे बड़ा आभूषण है।

श्लोक 20: विद्या ही सच्चा धन है, जो व्यक्ति को श्रेष्ठ और सम्मानित बनाती है।

 

क्षान्तिश्चेत् कवचेन किं किमरिभिः क्रोधोऽस्ति चेद्देहिनां

ज्ञातिश्चेदनलेन किं यदि सुहृद् दिव्यौषधैः किं फलम् ।

किं सर्पैर्यदि दुर्जनाः किमु धनैर्विद्या न वन्द्या यदि

व्रीडा चेत्किमु भूषणैः सुकविता यद्यस्ति राज्येन किम् ॥ २१॥

 

If patience is a shield, what need is there for enemies?

If anger resides in a person, why is fire necessary?

If friends are true, what is the use of divine medicines?

If wicked people are like serpents, what is the use of actual serpents?

If knowledge is not respected, what is the value of wealth?

If modesty is an ornament, why are other adornments needed?

If one possesses great poetry, what is the significance of a kingdom?

 

यह श्लोक नैतिक मूल्यों और गुणों की श्रेष्ठता को दर्शाता है। सच्चे गुण जैसे सहनशीलता, सच्चे मित्र, विद्या और लज्जा अन्य भौतिक वस्तुओं की आवश्यकता को कम कर देते हैं। यह आभास देता है कि मनुष्य को आंतरिक गुणों का विकास करना चाहिए।

 

दाक्षिण्यं स्वजने दया परजने शाठ्यं सदा दुर्जने

प्रीतिः साधुजने नयो नृपजने विद्वज्जने चार्जवम् ।

शौर्यं शत्रुजने क्षमा गुरुजने कान्ताजने धृष्टता

ये चैवं पुरुषाः कलासु कुशलास्तेष्वेव लोकस्थितिः ॥ २२॥

 

Be generous to your people.

Be compassionate to strangers.

Be cunning with the wicked.

Show affection to the virtuous.

Practice diplomacy with rulers.

Be straightforward with scholars.

Show bravery to enemies.

Show forgiveness to teachers.

Be bold with loved ones.
Those who master these qualities sustain the world.

 

यह श्लोक बताता है कि किस प्रकार अलग-अलग परिस्थितियों और लोगों के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए। गुणों और नीतियों का पालन कर ही समाज में संतुलन बनाया जा सकता है।

 

जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं

मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति ।

चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं

सत्सङ्गतिः कथय किं न करोति पुंसाम् ॥ २३॥

 

Noble company removes the lethargy of the mind.

It instills truth in speech.

It elevates one’s respect.

It eradicates sins.

It calms the mind.

It spreads fame in all directions.
What cannot noble company achieve for a person?

 

सत्संग (सज्जनों की संगति) का महत्व बताया गया है। यह श्लोक बताता है कि सत्संग से न केवल मानसिक शुद्धता बल्कि समाज में यश और सम्मान भी प्राप्त होता है।

 

जयन्ति ते सुकृतिनः रससिद्धाः कवीश्वराः ।

नास्ति येषां यशःकाये जरामरणजं भयम् ॥ २४॥

 

Great poets who master the art of expression and virtue are immortal.
Their fame knows no fear of aging or death.

 

यह श्लोक बताता है कि सच्ची महानता यशस्वी कार्यों और सृजनशीलता में होती है। कवि या सृजनशील व्यक्ति की कृतियां उसे अमर बना देती हैं।

 

मुख्य बिंदु:

सद्गुणों का महत्त्व: सहनशीलता, विद्या, दया, और लज्जा जैसे गुण जीवन में सफलता और सम्मान दिलाते हैं।

सत्संग का प्रभाव: सज्जनों की संगति से मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण होता है और यश फैलता है।

आंतरिक मूल्य बनाम बाहरी वैभव: बाहरी वस्तुओं और धन से अधिक महत्व सद्गुणों, ज्ञान और सच्ची मित्रता का है।

विद्या और काव्य की अमरता: विद्या और उत्तम काव्य मनुष्य को काल के बंधनों से मुक्त कर अमर बना देते हैं।

यह संदेश प्रेरित करता है कि मनुष्य को आत्मिक और मानसिक उन्नति के लिए प्रयासरत रहना चाहिए, जो भौतिक सुख-संपत्ति से अधिक मूल्यवान है।

 

 

सूनुः सच्चरितः सती प्रियतमा स्वामी प्रसादोन्मुखः

स्निग्धं मित्रमवञ्चकः परिजनो निष्क्लेशलेशं मनः ।

आकारो रुचिरः स्थिरश्च विभवो विद्यावदातं मुखं

तुष्टे विष्टपकष्टहारिणि हरौ सम्प्राप्यते देहिना ॥ २५॥

 

By the grace of God, one can obtain all desirable virtues and blessings: a virtuous son, a loving and devoted wife, a generous master, sincere friends, loyal servants, a peaceful mind, an appealing personality, wealth, and wisdom.

 

ईश्वर की कृपा से जीवन के सभी सुख और शांति प्राप्त होती हैं। इसलिए जीवन में धर्म और सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए।

 

प्राणाघातान्निवृत्तिः परधनहरणे संयमः सत्यवाक्यं

काले शक्त्या प्रदानं युवतिजनकथामूकभावः परेषाम् ।

तृष्णास्रोतोविभङ्गो गुरुषु च विनयः सर्वभूतानुकम्पा

सामान्यः सर्वशास्त्रेष्वनुपहतविधिः श्रेयसामेष पन्थाः ॥ २६॥

 

The path to righteousness includes non-violence, honesty, truthfulness, generosity, control over desires, humility, and compassion for all beings.

 

धार्मिक और नैतिक जीवन जीने के लिए इन आदर्शों का पालन करना चाहिए। यह मार्ग मोक्ष और सुख का कारण बनता है।

 

प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः

प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः ॥

विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः

प्रारब्धमुत्तमगुणा न परित्यजन्ति ॥ २७॥

 

Weak people don’t start a task out of fear of obstacles. Average people begin but give up when faced with difficulties. Only the noble continue their efforts despite repeated challenges and never abandon their pursuits.

 

धैर्य और दृढ़ता से ही सफलता प्राप्त होती है। कठिनाइयों से घबराए बिना निरंतर प्रयास करना चाहिए।

 

असन्तो नाभ्यर्थ्याः सुहृदपि न याच्यः कृशधनः

प्रिया न्याय्या वृत्तिर्मलिनमसुभङ्गेऽप्यसुकरम् ।

विपद्युच्चैः स्थेयं पदमनुविधेयं च महतां

सतां केनोद्दिष्टं विषममसिधाराव्रतमिदम् ॥ २८॥

 

Do not depend on wicked people for help or ask for favors from impoverished friends. Live righteously, even in difficult circumstances. Hold your head high during adversity and follow the noble path, no matter how challenging.

 

महानता कठिनाइयों में अपने आदर्शों पर अडिग रहने में है। जीवन में नैतिकता और आत्मसम्मान सबसे महत्वपूर्ण हैं।

 

क्षुत्क्षामोऽपि जराकृशोऽपि शिथिलप्रायोऽपि कष्टां दशाम्

आपन्नोऽपि विपन्नदीधितिरपि प्राणेषु गच्छत्स्वपि ।

मत्तेभेन्द्रविभिन्नकुम्भकवलग्रासैकबद्धस्पृहः

किं जीर्णं तृणमत्ति मानमहतामग्रेसरः केसरिः ॥ २९॥

 

Even when weak, aged, or in desperate situations, noble beings never compromise their dignity. Like a lion that refuses to eat grass or settle for lesser prey, they maintain their honour.

 

सम्मानित लोग कभी अपनी गरिमा और आदर्शों से समझौता नहीं करते, चाहे कितनी ही कठिन परिस्थितियां क्यों न हों।

         

स्वल्पस्नायुवसावशेषमलिनं निर्मांसमप्यस्थिकं

श्वा लब्ध्वा परितोषमेति न तु तत्तस्य क्षुधाशान्तये ।

सिंहो जम्बुकमङ्कमागतमपि त्यक्त्वा निहन्ति द्विपं

सर्वः कृच्छ्रगतोऽपि वाञ्छति जनः सत्वानुरुपं फलम् ॥ ३०॥

 

A dog feels satisfied with a bone, but it cannot truly satiate its hunger. A lion, on the other hand, prefers to hunt worthy prey, even when hungry. Similarly, people should strive for achievements aligned with their capabilities.

 

महान लोग कठिनाई में भी अपने स्तर के अनुरूप ही लक्ष्य का चयन करते हैं। आदर्शों और महत्वाकांक्षाओं में कभी समझौता नहीं करना चाहिए।

 

मुख्य संदेश

श्लोक 25: ईश्वर की कृपा से ही जीवन में सच्चे सुख और शांति प्राप्त होती है।

श्लोक 26: धर्म और नैतिकता का पालन ही जीवन के सर्वोच्च मार्ग हैं।

श्लोक 27: कठिनाइयों के बावजूद, धैर्य और दृढ़ता से कार्य को पूरा करना चाहिए।

श्लोक 28: महानता कठिन परिस्थितियों में भी अपने आदर्शों को बनाए रखने में है।

श्लोक 29: सम्मानित लोग कठिनाइयों में भी अपने आदर्शों से समझौता नहीं करते।

श्लोक 30: सच्चा संतोष और सफलता अपनी योग्यता और आदर्शों के अनुसार ही होती है। 

 

लाङ्गुलचालनमधश्चरणावपातं

पिण्डदस्य कुरुते गजपुङ्गवस्तु

धीरं विलोकयति चाटुशतैश्च भुङ्क्ते ॥ ३१॥

 

An elephant wags its tail, bows down, and shows submission to the one who feeds it. However, when it sees a courageous person, it respects them without flattery.

 

यह श्लोक यह समझाता है कि निर्भरता या आवश्यकता के कारण विनम्रता दिखाने की तुलना में, साहस और आंतरिक शक्ति से सम्मान अर्जित करना अधिक मूल्यवान है। वीर और धीर व्यक्तियों को स्वाभाविक रूप से सम्मान मिलता है।

 

परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते ॥

स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम् ॥ ३२॥

 

In this ever-changing world, everyone is reborn after death. However, a true birth is one that uplifts and enhances the lineage.

 

यह श्लोक इस बात पर जोर देता है कि सिर्फ जन्म लेना ही पर्याप्त नहीं है। जीवन का वास्तविक अर्थ तब है जब कोई अपने कर्मों से अपने परिवार या समाज का नाम ऊंचा करे।

 

कुसुमस्तबकस्येव द्वयी वृत्तिर्मनस्विनः ।

मूर्ध्नि वा सर्वलोकस्य विशीर्येत वनेऽथवा ॥ ३३॥

 

Like a cluster of flowers, noble people have two paths: they either attain the pinnacle of society or perish unknown in obscurity.

 

यह श्लोक महान व्यक्तियों के जीवन को फूलों के गुच्छे से तुलना करता है। ये या तो सबसे ऊपर जाकर अपनी महानता को प्रदर्शित करते हैं, या एकांत में शांतिपूर्वक रहकर अपनी गरिमा बनाए रखते हैं।

 

सन्त्यन्येऽपि बृहस्पतिप्रभृतयः सम्भाविताः पञ्चषाः

तान् प्रत्येष विशेषविक्रमरुची राहुर्न वैरायते ।

द्वावेव ग्रसते दिवाकरनिशाप्राणेश्वरौ भास्वरौ

भ्रातः पर्वणि पश्य दानवपतिः शीर्षावशेषाकृतिः ॥ ३४॥

 

Many significant celestial bodies, like Jupiter, exist, but Rahu targets only the radiant Sun and Moon. He uses his power to overshadow the brightest.

 

यह श्लोक राहु के माध्यम से यह सिखाता है कि दुनिया में सबसे महान और चमकदार लोग ही अधिकतर ईर्ष्या और विरोध का सामना करते हैं।

 

वहति भुवनश्रेणिं शेषः फणाफलस्थितां

कमठपतिना मध्ये पृष्ठं सदा च धार्यते ।

तमपि कुरुते क्रोधाधीनं पयोधिरनादरा -

दहह महतां निःसीमानश्चरित्रविभूतयः ॥ ३५॥

 

Sheshnag holds the earth on his hood, and the tortoise supports Sheshnag. Yet, the ocean, driven by anger, attacks them. The greatness of noble beings lies in their boundless patience and character.

 

यह श्लोक महान लोगों के जीवन को दर्शाता है, जो बिना शिकायत के भारी जिम्मेदारियां उठाते हैं और दूसरों के अपमान और क्रोध को सहन करते हैं।

 

श्लोक 31: सच्चा सम्मान बहादुरी और धैर्य के लिए होता है, चाटुकारिता के लिए नहीं।

श्लोक 32: सार्थक जीवन वही है जो अपने वंश या समाज की उन्नति करे।

श्लोक 33: महान व्यक्ति या तो शिखर पर चमकते हैं या गरिमापूर्ण गुमनामी में रहते हैं।

श्लोक 34: महानता हमेशा विरोध और चुनौती को आकर्षित करती है।

श्लोक 35: महानता असीमित सहनशीलता और कर्तव्यनिष्ठा में निहित है।

 

वरं पक्षच्छेदः समदमघवन्मुक्तकुलिश -

प्रहारैरुद्गच्छद्बहुलदहनोद्गारगुरुभिः ।

तुषाराद्रेः सूनोरहह पितरि क्लेशविवशे

न चासौ सम्पातः पयसि पयसां पत्युरुचितः ॥ ३६॥

 

It is better for the daughter of the Himalayas (Ganga) to endure the pain of flowing down from the lofty mountains and face challenges rather than losing its dignity by merging with the waters of the ocean.

 

इस श्लोक में गंगा नदी का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि अपनी महानता और चरित्र को बनाए रखना आवश्यक है, भले ही इसके लिए कठिनाइयों का सामना करना पड़े। अपमानजनक परिस्थिति में समझौता करने की बजाय, संघर्ष करते हुए गरिमा बनाए रखना बेहतर है।

 

यदचेतनोऽपि पादैः स्पृष्टः प्रज्वलति सवितुरिनकान्तः ।

तत्तेजस्वी पुरुषः परकृतनिकृतिं कथं सहते ॥ ३७॥

 

Even an inanimate stone glows when touched by the sun’s rays. How, then, can a radiant and noble person tolerate deceit or insults from others?

 

यह श्लोक तेजस्वी और स्वाभिमानी व्यक्तियों के स्वभाव को दर्शाता है। जैसे सूर्य का प्रकाश निर्जीव पत्थर को भी प्रभावशाली बना देता है, उसी प्रकार महान व्यक्तियों में भी स्वाभिमान और क्रोध का स्वाभाविक गुण होता है।

 

सिंहःशिशुरपि निपतति मदमलिनकपोलभित्तिषु गजेषु ।

प्रकृतिरियं सत्ववतां न खलु वयसस्तेजसो हेतुः ॥ ३८॥

 

Even a lion cub, despite its young age, dares to attack a mighty elephant. This is because courage and valor are not dependent on age or size.

 

यह श्लोक बताता है कि वीरता और साहस उम्र का मोहताज नहीं है। जिनके पास स्वाभाविक रूप से गुण होते हैं, वे परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होते।

 

जातिर्यातु रसातलं गुणगणैस्तत्राप्यधो गम्यतां

शीलं शैलतटात्पतत्वभिजनः सन्दह्यतां वह्निना ।

शौर्ये वैरिणि वज्रमाशु निपतत्वर्थोऽस्तु नः केवलं

येनैकेन विना गुणास्तृणलवप्रायाः समस्ता इमे ॥ ३९॥

 

Let caste descend to the abyss, let virtues fall even below that, let character fall from the mountaintop, and let lineage burn in the fire. Yet, let valour strike the enemy like a thunderbolt. Wealth alone is the one essential thing without which all other qualities are as insignificant as straw.

 

यह श्लोक बताता है कि वीरता और धन ही व्यक्ति के गुणों को अर्थपूर्ण बनाते हैं। बाकी चीजें जैसे जाति, कुल या आचरण तब तक महत्वहीन हैं जब तक वे वास्तविक साहस और परिश्रम से जुड़ी न हों।

 

तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव नाम

सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव ।

अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः क्षणेन

सोऽप्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत् ॥ ४०॥

 

The senses remain the same, the name remains the same, the intellect remains unaltered, and the words remain the same. Yet, when a person loses wealth, their identity changes instantly. This is indeed strange.

 

यह श्लोक बताता है कि धन और वैभव व्यक्ति के जीवन में कितने महत्वपूर्ण होते हैं। धन के अभाव में व्यक्ति की पहचान और व्यक्तित्व बदल जाता है, भले ही उसके शारीरिक और मानसिक गुण वही हों।

 

श्लोक 36: आत्मसम्मान और गरिमा बनाए रखने के लिए कठिनाइयों का सामना करना श्रेष्ठ है।

श्लोक 37:  तेजस्वी व्यक्ति स्वाभिमान और न्याय का प्रतीक होता है।

श्लोक 38:  वीरता और साहस उम्र या आकार पर निर्भर नहीं करते।

श्लोक 39: साहस और धन से ही व्यक्ति के गुणों को सार्थकता मिलती है।

श्लोक 40: धन का प्रभाव व्यक्ति के व्यक्तित्व और सम्मान पर बहुत गहरा होता है।

 

यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः

स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः ।

स एव वक्ता स च दर्शनीयः

सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति ॥ ४१॥

 

The one who possesses wealth is deemed noble, wise, knowledgeable, virtuous, eloquent, and attractive. All virtues seem to depend on wealth.

 

जिसके पास धन होता है, वही कुलीन, विद्वान, गुणवान, श्रेष्ठ वक्ता और देखने में आकर्षक माना जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि सभी गुण धन पर आश्रित होते हैं।

 

दौर्मन्त्र्यान्नृपतिर्विनश्यति यतिः सङ्गात् सुतो लालनाद्

विप्रोऽनध्यनात् कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात् ।

ह्रीर्मद्यादनवेक्षणादपि कृषिः स्नेहः प्रवासाश्र -

यान्मैत्री चाप्रणयात् समृद्धिरनयात् त्यागः प्रमादाद्धनम् ॥ ४२॥

 

  A king is ruined by poor advice.

  An ascetic falls due to attachments.

  A son spoils due to excessive pampering.

  A Brahmin is ruined if he neglects study.

  A family deteriorates due to a bad son.

  Character is destroyed by bad company.

  Modesty is lost by drinking alcohol.

  Agriculture fails without care.

  Love fades with separation.

  Friendship suffers from lack of warmth.

  Prosperity is lost through mismanagement.

  Wealth vanishes due to carelessness.

 

  राजा बुरी सलाह से नष्ट होता है।

  सन्यासी आसक्ति से पतित होता है।

  पुत्र अधिक लाड़-प्यार से बिगड़ता है।

  ब्राह्मण अध्ययन न करने से नष्ट होता है।

  परिवार बुरे पुत्र से पतित होता है।

  चरित्र खराब संगति से नष्ट होता है।

  लज्जा मदिरापान से समाप्त होती है।

  कृषि देखभाल के बिना नष्ट होती है।

  प्रेम दूरी से क्षीण होता है।

  मित्रता अपनापन न मिलने से समाप्त हो जाती है।

  समृद्धि बुरी योजनाओं से नष्ट होती है।

  धन प्रमाद से समाप्त हो जाता है।

 

दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य ।

यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति ॥ ४३॥

 

Wealth has three destinies: charity, enjoyment, or destruction. The one who neither donates nor enjoys it will face its destruction.

         

मणिः शाणोल्लीढः समरविजयी हेतिदलितो

मदक्षीबो नागः शरदि सरितः श्यानपुलिनाः ।

कलाशेषश्चन्द्रः सुरतमृदिता बालवनिता

तनिम्ना शोभन्ते गलितविभवाश्चार्थिषु नराः ॥ ४४॥

 

  A gem shines brighter after being polished on a grinding stone.

  A victorious warrior becomes stronger after being tested in battle.

  A river becomes serene with its sandy banks in autumn.

  The crescent moon is beautiful in its incomplete state.

  A young woman appears graceful after moments of intimacy.

  Similarly, a person who has lost wealth and faced hardships becomes humble and radiant in front of others.

 

  मणि शाण पर घिसने से अधिक चमकदार हो जाती है।

  योद्धा युद्ध में विजय पाने के बाद और बलवान हो जाता है।

  शरद ऋतु में नदी शांत और सुंदर लगती है।

  अधूरी चंद्र कला भी मनोहारी लगती है।

  युवती प्रेम के बाद और आकर्षक लगती है।

  इसी प्रकार, कठिनाई झेलने वाले व्यक्ति दूसरों के सामने अधिक सौम्य और प्रभावशाली हो जाते हैं।

 

परिक्षीणः कश्चित्स्पृहयति यवानां प्रसृतये

स पश्चात् सम्पूर्णः कलयति धरित्रीं तृणसमाम् ।

अतश्चानैकान्त्याद्गुरुलघुतयाऽर्थेषु धनिना -

मवस्था वस्तूनि प्रथयति च सङ्कोचयति च ॥ ४५॥

 

When poor, a person desires even small grains of barley. When rich, they consider the whole earth as insignificant as grass. Wealth, therefore, greatly influences one’s perspective, causing the value of things to expand or contract based on one’s circumstances.

 

जब व्यक्ति गरीब होता है, तो उसे जौ का एक दाना भी मूल्यवान लगता है। जब वह धनी होता है, तो पूरी पृथ्वी भी उसे तिनके के समान लगती है। धन व्यक्ति के दृष्टिकोण को बहुत प्रभावित करता है और चीजों के महत्व को बड़ा या छोटा बना देता है।

 

मुख्य बिंदु:

 

श्लोक 41:  धन की उपस्थिति से व्यक्ति के गुण और प्रतिष्ठा बढ़ जाती है।

श्लोक 42: सावधानी और सही आचरण के बिना सब कुछ नष्ट हो सकता है।

श्लोक 43: धन को उचित रूप से उपयोग या दान करना आवश्यक है, अन्यथा यह नष्ट हो जाएगा।

श्लोक 44: संघर्ष और क्षति के बाद व्यक्ति में विनम्रता और सौंदर्य बढ़ता है।

श्लोक 45: धन के साथ व्यक्ति का दृष्टिकोण और मूल्यांकन बदल जाता है।

 

राजन् दुधुक्षसि यदि क्षितिधेनुमेतां

तेनाद्य वत्समिव लोकममुं पुषाण ।

तस्मिंश्च सम्यगनिशं परिपोष्यमाणे

नानाफलैः फलति कल्पलतेव भूमिः ॥ ४६॥

 

O king, if you wish to milk the cow of the Earth (prosperity), nurture the people like a calf. When the people are well-nourished and cared for, the Earth yields abundant fruits, just like a wish-fulfilling creeper.

 

हे राजन्, यदि आप इस पृथ्वी रूपी गाय का दूध प्राप्त करना चाहते हैं, तो प्रजा को बछड़े की तरह पोषण दें। जब प्रजा का भरण-पोषण ठीक प्रकार से होता है, तब पृथ्वी कल्पवृक्ष के समान अनेक प्रकार के फल प्रदान करती है।

         

सत्यानृता च परुषा प्रियवादिनी च

हिंस्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या ।

नित्यव्यया प्रचुरनित्यधनागमा च

वाराङ्गनेव नृपनीतिरनेकरुपा ॥ ४७॥

 

Royal policies are diverse and unpredictable, much like a courtesan. They can be truthful or deceitful, harsh or pleasing, cruel or compassionate, miserly or generous, extravagant or frugal, depending on circumstances.

 

राजनीति वेश्या के समान अनेक रूप धारण करती है। यह कभी सत्य और झूठ, कठोरता और मधुरता, हिंसा और दया, कंजूसी और उदारता के रूप में प्रकट होती है।        

         

आज्ञा कीर्तिः पालनं ब्राह्मणानां

दानं भोगः मित्रसंरक्षणं च ।

येषामेते षड्गुणा न प्रवृताः

कोऽर्थस्तेषां पार्थिवोपाश्रयेण ॥ ४८॥

 

A king must have these six virtues: authority, fame, protection of Brahmins, charity, enjoyment, and safeguarding friends. Without these, what is the use of seeking royal patronage?

 

राजा में ये छह गुण होने चाहिए: आज्ञा देना, कीर्ति प्राप्त करना, ब्राह्मणों का संरक्षण, दान देना, भोग करना, और मित्रों की रक्षा करना। यदि ये गुण न हों, तो राजा का आश्रय लेने का कोई अर्थ नहीं।

 

यद्धात्रा निजभालपट्टलिखितं स्तोकं महद्वा धनं

तत् प्राप्नोति मरुस्थलेऽपि नितरां मेरौ ततो नाधिकम् ।

तद्धीरो भव वित्तवत्सु कृपणां वृत्तिं वृथा मा कृथाः

कूपे पश्य पयोनिधावपि घटो गृह्णाति तुल्यं जलम् ॥ ४९॥

 

The wealth destined by fate, whether small or great, will come to a person even in a desert and not exceed the assigned limit even on a mountain. Be courageous and avoid behaving miserly. Remember, a pot collects the same amount of water, whether in a well or the ocean.

 

भाग्य में लिखा धन चाहे छोटा हो या बड़ा, वह मरुस्थल में भी मिल सकता है और पर्वत पर भी उससे अधिक नहीं होगा। अतः धैर्यवान बनें और कृपणता न करें। जैसे एक घड़ा चाहे कुंए में हो या सागर में, वह समान मात्रा में ही जल भरता है।

 

त्वमेव चातकाधार इति केषां न गोचरः ।

किमम्भोद वदास्माकं कार्पण्योक्तिं प्रतीक्षसे ॥ ५०॥

 

O rain-bearing cloud, you are the only source of water for the chataka bird. Why do you wait for us to plead miserably for it?

 

हे मेघ, चातक पक्षी के लिए तुम ही जल के एकमात्र स्रोत हो। तो क्या तुम यह चाहते हो कि हम अपने जल के लिए दीनता से याचना करें?

 

मुख्य बिंदु:

श्लोक 46: राजा को अपनी प्रजा का पालन-पोषण करना चाहिए ताकि राज्य में समृद्धि बनी रहे।   

श्लोक 47: राजनीति में विविधता और परिस्थितियों के अनुसार बदलने की प्रवृत्ति होती है।      

श्लोक 48: एक अच्छे राजा में इन छह गुणों का होना आवश्यक है।

श्लोक 49: धन का भाग्य पर निर्भर होना सिखाता है कि कृपणता का त्याग करें।

श्लोक 50: कर्तव्यपालन में देरी करना अनुचित है, विशेषकर जब दूसरों की आश्रितता स्पष्ट हो।

 

 

रे रे चातक सावधानमनसा मित्र क्षणं श्रूयताम्

अम्भोदा बहवो वसन्ति गगने सर्वेऽपि नैकादृशाः ।

केचिद्वृष्टिभिरार्द्रयन्ति धरणीं गर्जन्ति केचिद्वृथा

यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः ॥ ५१॥

 

O chataka bird, be cautious and listen carefully for a moment. There are many clouds in the sky, but they are not all the same. Some nourish the earth with rain, while others roar in vain. Do not plead pitifully in front of every cloud you see.

 

हे चातक पक्षी, सावधान रहो और ध्यान से सुनो। आकाश में बहुत से बादल हैं, लेकिन वे सब समान नहीं होते। कुछ बारिश करके पृथ्वी को भिगोते हैं, जबकि कुछ व्यर्थ में गरजते हैं। हर देखे गए बादल के सामने विनम्रता से याचना मत करो।

 

अकरुणत्वमकारणविग्रहः परधने परयोषिति च स्पृहा ।

सुजनबन्धुजनेष्वसहिष्णुता प्रकृतिसिद्धमिदं हि दुरात्मनाम् ॥ ५२॥

 

Lack of compassion, unnecessary conflicts, greed for others' wealth and spouses, and intolerance toward virtuous or close relatives are innate qualities of wicked people.

 

दया का अभाव, बिना कारण झगड़ा करना, दूसरों के धन और स्त्री पर लालसा, तथा सज्जन या संबंधियों के प्रति असहिष्णुता, ये सब दुष्ट व्यक्तियों के स्वाभाविक गुण हैं।

 

 

दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययालङ्कृतोऽपि सन् ।

मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयङ्करः ॥ ५३॥

 

A wicked person should be avoided, even if adorned with knowledge and virtues. Isn’t a snake, adorned with a jewel on its hood, still dangerous?

 

दुष्ट व्यक्ति को ज्ञान और गुणों से सुशोभित होने पर भी त्याग देना चाहिए। क्या मणि से सजा हुआ सर्प भी भयानक नहीं होता?

 

 

जाड्यं ह्रीमति गण्यते व्रतरुचौ दम्भः शुचौ कैतवं

शूरे निर्घृणता मुनौ विमतिता दैन्यं प्रियालापिनि । (निर्घ्ऱ्६इणता ऋजो )

तेजस्विन्यवलिप्तता मुखरता वक्तर्यशक्तिः स्थिरे

तत्को नाम गुणो भवेत्स गुणिनां यो दुर्जनैर्नाङ्कितः ॥५४॥ (भवेत्सुगुणिनां )

 

In the eyes of wicked people, modesty appears as stupidity, religious discipline as hypocrisy, purity as deceit, bravery as cruelty, asceticism as insensitivity, humility as weakness, eloquence as arrogance, and steadiness as dullness. What virtue remains that is not criticized by the wicked?

 

दुष्ट लोगों की दृष्टि में विनम्रता मूर्खता, धर्म कठोरता, पवित्रता छल, वीरता निर्दयता, तपस्या अहंकार, और स्थिरता जड़ता लगती है। ऐसा कौन सा गुण है जिसे दुष्ट लोग दोष नहीं मानते?

 

लोभश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः

सत्यं चेत्तपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम् ।

सौजन्यं यदि किं गुणैः सुमहिमा यद्यस्ति किं मण्डनैः

सद्विद्या यदि किं धनैरपयशो यद्यस्ति किं मृत्युना ॥ ५५॥

 

If there is greed, what need is there for other vices? If there is deceit, what use are sins? If one speaks the truth, what need is there for austerity? If the mind is pure, what is the need for pilgrimage? If one has kindness, what use are other virtues? If one has fame, what need is there for ornaments? If one possesses true knowledge, what use is wealth? If there is dishonor, what fear is there of death?

 

यदि लोभ है, तो अन्य दोषों की आवश्यकता क्या है? यदि छल है, तो पापों का क्या प्रयोजन? यदि सत्य है, तो तपस्या की आवश्यकता क्यों? यदि मन पवित्र है, तो तीर्थ का क्या महत्व? यदि सौजन्यता है, तो अन्य गुणों की आवश्यकता क्यों? यदि महिमा है, तो आभूषणों का क्या उपयोग? यदि सच्चा ज्ञान है, तो धन का क्या मूल्य? और यदि अपयश है, तो मृत्यु का क्या भय?

 

मुख्य बिंदु:

 

श्लोक 51: हर किसी से आशा नहीं करनी चाहिए; सही पात्र को पहचानकर अपनी बात रखनी चाहिए।

श्लोक 52: दुष्टों की प्रवृत्तियां पहचानकर उनसे दूर रहना चाहिए।

श्लोक 53: दुष्ट व्यक्तियों से उनकी विद्वता या बाहरी दिखावे के बावजूद सावधान रहना चाहिए।

श्लोक 54: दुष्ट व्यक्ति हर गुण में दोष निकालते हैं, इसलिए उनकी बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।

श्लोक 55:  सद्गुणों के महत्व और दोषों के प्रभाव को समझकर सही दिशा में जीवन जीना चाहिए।

 

 

शशी दिवसधूसरो गलितयौवना कामिनी

सरो विगतवारिजं मुखमनक्षरं स्वाकृतेः ।

प्रभुर्धनपरायणः सततदुर्गतः सज्जनो

नृपाङ्गणगतः खलो मनसि सप्त शल्यानि मे ॥ ५६॥

 

A moon dimmed by daylight, an aged woman bereft of youth, a lotusless lake, an illiterate face, a ruler obsessed with wealth, a virtuous man always in poverty, and a wicked person in the court of a king — these seven are the thorns in my heart.

 

चंद्रमा जो दिन के उजाले में फीका पड़ जाए, वृद्धा जो यौवन खो चुकी हो, कमल रहित सरोवर, निरक्षर चेहरा, धन का लोभी राजा, सदैव दरिद्र सज्जन, और राजा के दरबार में स्थित दुष्ट व्यक्ति — ये सात चीजें मन में पीड़ा उत्पन्न करती हैं।

 

 

न कश्चिच्चण्डकोपानामात्मीयो नाम भूभुजाम् ।

होतारमपि जुह्वानं स्पृष्टो दहति पावकः ॥ ५७॥

 

The wrath of a king who is extremely angry spares no one, not even those close to him. Just as fire burns the priest who offers sacrifices if he touches it, a ruler’s uncontrollable anger consumes even his allies.

This verse highlights the dangers of unchecked anger in leadership. A king’s temperament affects those around him, and excessive anger can alienate or harm even loyal followers.

 

चण्ड कोप (अत्यधिक क्रोध) वाले राजाओं का कोई अपना नहीं होता। जिस प्रकार अग्नि आहुति देने वाले पुरोहित को भी छूने पर जला देती है, उसी प्रकार क्रोधी राजा अपने करीबी को भी नहीं छोड़ता।

यह श्लोक राजा या सत्ता में बैठे व्यक्ति की क्रोधशीलता पर प्रकाश डालता है। यदि शासक स्वभाव से अत्यंत क्रोधी है, तो उसके निकटतम व्यक्ति भी उसकी विनाशक प्रवृत्ति से सुरक्षित नहीं रह सकते।

 

 

मौनान्मूकः प्रवचनपटुर्वातुलो जल्पको वा

धृष्टः पार्श्वे वसति च सदा दूरतश्चाप्रगल्भः ।

क्षान्त्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजातः

सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ॥ ५८॥

A servant remains silent and is mistaken for mute, or speaks well and is accused of being talkative. If bold, he is seen as insolent; if reserved, he is called timid. If forgiving, he is considered weak. Truly, the duty of service is profoundly complex and difficult to understand, even for sages.

 

सेवक यदि मौन रहे तो उसे गूंगा समझा जाता है, बोलने पर बकवादी कहा जाता है। यदि निर्भीक हो तो उसे धृष्ट समझते हैं, और यदि शांत रहे तो उसे डरपोक। क्षमा करने पर उसे कमजोर कहा जाता है। सेवा का धर्म बहुत ही गूढ़ है, जिसे ऋषि भी नहीं समझ सकते।

 

उद्भासिताखिलखलस्य विश्रुङ्खलस्य

प्राग्जातविस्तृतनिजाधमकर्मवृत्तेः ।

दैवादवाप्तविभवस्य गुणद्विषोऽस्य

नीचस्य गोचरगतैः सुखमाप्यते कैः ॥ ५९॥

 

A vile person, whose wicked deeds are notorious, and who has attained wealth by fate, becomes a hater of virtues. Such a person causes distress to those within his reach. Who can find peace near such a wicked individual?

 

दुष्ट व्यक्ति, जिसके नीच कर्म जगजाहिर हों और जो भाग्यवश धनवान बन गया हो, गुणों का शत्रु बन जाता है। उसके संपर्क में रहने वाले को कष्ट ही होता है। ऐसे दुष्ट व्यक्ति के समीप कौन सुखी रह सकता है?

 

आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण

लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात् ।

दिनस्य पूर्वार्धपरार्धभिन्नाछायेव

मैत्री खलसज्जनानाम् ॥ ६०॥

 

The friendship of the wicked starts heavy and diminishes over time, while the friendship of the noble begins modestly and grows stronger, much like the shadows in the first and second halves of the day.

 

दुष्ट की मित्रता आरंभ में भारी होती है और धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है, जबकि सज्जन की मित्रता पहले हल्की होती है और समय के साथ बढ़ती है। यह ठीक वैसे ही है जैसे दिन के पूर्वार्ध और उत्तरार्ध की छाया।

 

मुख्य बिंदु:

Summary

श्लोक 56: सद्गुणों और सुंदरता का उचित स्थान व समय पर न होना क्लेश का कारण बनता है।

श्लोक 57: सत्ता में बैठे व्यक्ति का स्वभाव संतुलित होना चाहिए।

श्लोक 58: सेवा का मार्ग जटिल है और उसमें सदा गलत समझे जाने की संभावना रहती है।

श्लोक 59: नीच व्यक्ति की संगति हमेशा दुख और कष्ट का कारण बनती है।

श्लोक 60: मित्रता की स्थिरता और वृद्धि व्यक्ति के स्वभाव पर निर्भर करती है।

 

मृगमीनसज्जनानां तृणजलसन्तोषविहितवृत्तिनाम् ।

लुब्धकधीवरपिशुना निष्कारणवैरिणो जगति ॥ ६१॥

 

Deer, fish, and virtuous people, who lead lives satisfied with simple necessities like grass, water, or virtuous conduct, still face needless enmity from hunters, fishermen, and wicked people.

 

मृग (हिरण), मीन (मछली), और सज्जन लोग अपनी आवश्यकताओं में संतोषी होते हैं। वे न किसी को कष्ट देते हैं और न ही किसी का अनिष्ट करते हैं। फिर भी, शिकारी, मछुआरे और दुष्ट लोग इनके पीछे पड़े रहते हैं। यह बताता है कि संसार में अच्छे और निर्दोष लोगों को भी बिना किसी कारण के दुर्जनों की शत्रुता का सामना करना पड़ता है।

 

वाञ्छा सज्जनसङ्गमे परगुणे प्रीतिर्गुरौ नम्रता

विद्यायां व्यसनं स्वयोषिति रतिर्लोकापवादाद्भयम् ।

भक्तिः शूलिनि शक्तिरात्मदमने संसर्गमुक्तिः खले

येष्वेते निवसन्ति निर्मलगुणास्तेभ्यो नरेभ्यो नमः ॥ ६२॥

 

A desire for the company of virtuous people, delight in others' qualities, humility toward the teacher, passion for learning, love for one’s spouse, fear of public disgrace, devotion to Lord Shiva, self-restraint, and avoidance of the wicked—these pure qualities define noble individuals.

 

इस श्लोक में सज्जनों के गुण बताए गए हैं। ऐसे व्यक्ति सच्चे लोगों की संगति की इच्छा रखते हैं, दूसरों के गुणों की सराहना करते हैं, गुरु के प्रति आदरपूर्ण होते हैं, और अपने मन पर संयम रखते हैं। साथ ही, वे खल (दुष्ट) लोगों से दूर रहते हैं। इन सभी गुणों वाले लोग सच्चे महापुरुष माने जाते हैं।

 

विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः ।

यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥ ६३॥

 

In adversity, courage; in prosperity, forgiveness; eloquence in assemblies; valor in battle; eagerness for fame; and devotion to learning—these qualities are naturally found in great souls.

 

इस श्लोक में महापुरुषों के स्वाभाविक गुणों को बताया गया है। विपत्ति में वे धैर्य बनाए रखते हैं, समृद्धि के समय क्षमाशील होते हैं, सभा में तार्किक और प्रभावशाली वक्ता होते हैं, और युद्ध में वीरता दिखाते हैं। वे ज्ञान के प्रति समर्पित रहते हैं और यश पाने में रुचि रखते हैं। ये गुण उनकी महानता की पहचान हैं।

 

प्रदानं प्रच्छन्नं गृहमुपगते सम्भ्रमविधिः

प्रियं कृत्वा मौनं सदसि कथनं चाप्युपकृते ।

अनुत्सेको लक्ष्म्यामनभिभवगन्धाः परकथाः

सतां केनोद्दिष्टं विषममसिधाराव्रतमिदम् ॥ ६४॥

 

Charity given secretly, a warm welcome to guests, silence after doing good deeds, acknowledgment of help in assemblies, humility despite wealth, and refraining from slandering others—these are the virtues of noble souls, challenging like walking on a razor’s edge.

 

सज्जनों का आचरण कठिन लेकिन अनुकरणीय होता है। वे गुप्त रूप से दान करते हैं, अतिथि का आदरपूर्वक स्वागत करते हैं, और उपकार करने के बाद मौन रहते हैं। उनकी विनम्रता और दूसरों के प्रति आदर ही उनके उच्च चरित्र को दर्शाते हैं। उनका जीवन कर्तव्यनिष्ठा और विनम्रता से परिपूर्ण होता है।

 

करे श्लाघ्यस्त्यागः शिरसि गुरुपादप्रणयिता

मुखे सत्या वाणी विजयिभुजयोर्वीर्यमतुलम् ।

हृदि स्वच्छा वृत्तिः श्रुतमधिगतं च श्रवणयो –

र्विनाप्यैश्वर्येण प्रकृतिमहतां मण्डनमिदम् ॥ ६५॥

 

Generosity in action, reverence for the teacher, truthfulness in speech, unparalleled bravery in battle, purity of heart, and profound knowledge—these qualities adorn great souls even in the absence of wealth or power.

 

इस श्लोक में बताया गया है कि त्याग, गुरु के प्रति समर्पण, सत्यवादिता, वीरता, स्वच्छ चरित्र, और गहन अध्ययन जैसे गुण ही महापुरुषों का वास्तविक आभूषण होते हैं। ऐश्वर्य या धन की उपस्थिति उनकी महानता को बढ़ाती नहीं, बल्कि उनके गुण ही उन्हें महान बनाते हैं।

 

मुख्य बिंदु:

 

श्लोक 61: मृग, मछली और सज्जन व्यक्ति जो तृण, जल और सरल जीवन से संतुष्ट रहते हैं, फिर भी उन्हें लोभियों और दुष्ट व्यक्तियों द्वारा अनावश्यक कष्ट सहना पड़ता है।

श्लोक 62: सज्जन लोगों के साथ संगति, दूसरों के गुणों में आनंद, गुरु के प्रति विनम्रता, और आत्मसंयम जैसे गुण सच्चे महापुरुषों में पाये जाते हैं।

श्लोक 63: महात्मा विपत्ति में धैर्य, समृद्धि में क्षमा, सभा में वाक्पटुता और युद्ध में साहस का प्रदर्शन करते हैं।

श्लोक 64: सज्जन लोग गुप्त रूप से दान देते हैं, अतिथि का सत्कार करते हैं, अपने उपकार का बखान नहीं करते, और दूसरे के गुणों की प्रशंसा करते हैं।

श्लोक 65: सच्चे महापुरुष त्याग, सत्य, गुरु भक्ति, और स्वच्छ चरित्र से शोभित होते हैं। ऐश्वर्य न होते हुए भी ये गुण उनकी महानता को दर्शाते हैं।

 

 

सम्पत्सु महतां चित्तं भवत्युत्पलकोमलम् ।

आपत्सु च महाशैलशिलासङ्घातकर्कशम् ॥ ६६॥

 

In times of prosperity, the minds of great individuals remain as soft as a lotus petal, but in adversity, they become as hard as a massive rock.

 

यह श्लोक महान व्यक्तियों की विशेषता बताता है। वे समृद्धि में दयालु और विनम्र होते हैं, परंतु विपत्ति के समय उनके अंदर दृढ़ता और अदम्य साहस उत्पन्न हो जाता है।

 

सन्तप्तायसि संस्थितस्य पयसो नामापि न ज्ञायते

मुक्ताकारतया तदेव नलिनीपत्रस्थितं राजते ।

स्वात्यां सागरशुक्तिमध्यपतितं तन्मौक्तिकं जायते

प्रायेणाधममध्यमोत्तमगुणः संसर्गतो जायते ॥ ६७॥

 

When water falls on hot iron, it disappears; on a lotus leaf, it shines like a pearl; and in an ocean pearl shell during the Swati constellation, it transforms into a pearl. Similarly, a person’s qualities are often shaped by their association.

 

यह श्लोक संगति के प्रभाव को दर्शाता है। मनुष्य की योग्यता और गुण उसके आस-पास के वातावरण और लोगों पर निर्भर करते हैं। जैसे जल का स्वरूप भिन्न परिस्थितियों में बदलता है, वैसे ही व्यक्ति की विशेषताएँ संगति से प्रभावित होती हैं।

 

प्रीणाति यः सुचरितः पितरं स पुत्रो

यद्भर्तुरेव हितमिच्छति तत् कलत्रम् ।

तन्मित्रमापदि सुखे च समक्रियं यद्

एतत् त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते ॥ ६८॥

 

A son who brings joy through virtuous deeds, a wife who desires her husband’s welfare, and a friend who remains the same in happiness and adversity—these three are blessings earned by the virtuous.

 

यह श्लोक सच्चे रिश्तों के महत्व को बताता है। अच्छे पुत्र, समर्पित पत्नी और सच्चे मित्र का साथ मिलना सौभाग्य और पुण्य का परिणाम है।

 

एको देवः केशवो वा शिवो वा

ह्येकं मित्रं भूपतिर्वा यतिर्वा ।

एको वासः पत्तने वा वने वा

ह्येका भार्या सुन्दरी वा दरी वा ॥ ६९॥

 

There is only one God, be it Vishnu or Shiva; one true friend, a king or a sage; one abode, whether a city or forest; and one wife, either a beautiful woman or a supportive companion.

 

यह श्लोक संतोष और एकनिष्ठता का संदेश देता है। जीवन में ईश्वर, मित्र, निवास और पत्नी के प्रति संतुष्ट रहना सच्चे सुख का आधार है।

 

नम्रत्वेनोन्नमन्तः परगुणकथनैः स्वान् गुणान् ख्यापयन्तः

स्वार्थान् सम्पादयन्तो विततपृथुतरारम्भयत्नाः परार्थे ।

क्षान्त्यैवाक्षेपरुक्षाक्षरमुखरमुखान् दुर्जनान् दूषयन्तः

सन्तः साश्चर्यचर्या जगति बहुमताः कस्य नाभ्यर्चनीयाः ॥ ७०॥

 

The virtuous rise through humility, glorify their qualities by appreciating others, achieve personal goals while benefiting others, and silence harsh critics through patience. Such noble people, with their astonishing qualities, are admired and revered by everyone.

 

यह श्लोक सज्जनों की महानता का वर्णन करता है। वे नम्रता, परोपकार और सहनशीलता के गुणों से युक्त होते हैं। उनके आदर्श आचरण से समाज प्रेरणा लेता है।

 

मुख्य बिंदु:

 

श्लोक 66:   महान व्यक्तियों की कोमलता और कठोरता, परिस्थितियों के अनुसार उनका व्यवहार।

श्लोक 67: संगति का महत्व, व्यक्तित्व का विकास बाहरी प्रभावों से।

श्लोक 68: आदर्श पुत्र, पत्नी और मित्र के गुण। अच्छे रिश्ते पुण्य कर्मों से प्राप्त होते हैं।

श्लोक 69: संतोष का महत्व, ईश्वर और रिश्तों में एकनिष्ठता।

श्लोक 70: सज्जनों के गुण, सहनशीलता और परोपकार की महत्ता 

 

भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमै -

र्नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः ।

अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः

स्वभाव एवैष परोपकारिणाम् ॥ ७१॥

 

Trees laden with fruits bend low, rain-filled clouds hover close to the earth, and virtuous people remain humble even in prosperity. This is the natural characteristic of those inclined toward selfless service.

 

फल से लदे हुए वृक्ष झुक जाते हैं, जल से भरे हुए बादल धरती के पास आ जाते हैं, और सत्पुरुष अपनी समृद्धि के समय भी नम्र रहते हैं। यह परोपकारी व्यक्तियों का स्वाभाविक गुण है।

 

श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुण्डलेन

दानेन पाणिर्न तु कङ्कणेन ।

विभाति कायः करुणापराणां (विभाति कायः खलु सज्जनानां )

परोपकारैर्न तु चन्दनेन ॥ ७२॥

 

Ears shine through knowledge, not earrings. Hands are adorned by generosity, not by bangles. The body of compassionate people radiates through their selfless deeds, not through sandalwood paste.

 

कान सुनाई से सुशोभित होते हैं, न कि कुंडलों से। हाथ दान से शोभित होते हैं, न कि कंगनों से। करुणा और परोपकार करने वालों का शरीर उनके सत्कर्मों से सुशोभित होता है, न कि चंदन से।

 

पापान्निवारयति योजयते हिताय

गुह्यं निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति ।

आपद्गतं च न जहाति ददाति काले

सन्मित्रलक्षणमिदं निगदन्ति सन्तः ॥ ७३॥

 

A true friend prevents you from committing sins, guides you toward good, conceals your flaws, highlights your virtues, supports you during adversity, and helps you at the right time. Saints describe these as the qualities of a good friend.

 

सच्चा मित्र पापों से रोकता है, हित के कार्यों में प्रेरित करता है, आपके दोषों को छिपाता है, आपके गुणों को उजागर करता है, संकट में साथ नहीं छोड़ता और समय पर सहायता प्रदान करता है। संतजन इसे सच्चे मित्र का लक्षण मानते हैं।

 

पद्माकरं दिनकरो विकचीकरोति

चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम् ।

नाभ्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति

सन्तः स्वयं परहिते विहिताभियोगाः ॥ ७४॥

 

The sun blooms the lotus, the moon opens the white lilies, and clouds give rain without being asked. Similarly, virtuous people naturally work for the welfare of others.

 

सूर्य कमल को खिलाता है, चंद्रमा कुमुदिनी को प्रस्फुटित करता है, और मेघ बिना किसी आग्रह के जल देते हैं। इसी प्रकार, सज्जन व्यक्ति स्वाभाव से ही परोपकार में लगे रहते हैं।

 

एते सत्पुरुषाः परार्थघटकाः स्वार्थं परित्यज्य ये

सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाविरोधेन ये ।

तेऽमी मानवराक्षसाः परहितं स्वार्थाय विघ्नन्ति ये

ये विघ्नन्ति निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे ॥ ७५॥

 

The truly noble people dedicate themselves entirely to the welfare of others, forsaking their own interests. Ordinary people serve others without harming their own benefits. Those who hinder selfless acts for personal gain are akin to human demons, while those who disrupt them without reason are beyond comprehension.

 

सच्चे सज्जन वे हैं जो अपना स्वार्थ त्यागकर पूरी तरह दूसरों के कल्याण में जुट जाते हैं। साधारण लोग ऐसे होते हैं जो दूसरों का हित करते हैं, लेकिन अपने स्वार्थ को हानि नहीं पहुंचने देते। जो लोग अपने स्वार्थ के लिए परोपकार में बाधा डालते हैं, वे मानव-राक्षस हैं। और जो लोग बिना कारण ही परोपकार में बाधा डालते हैं, वे समझ से परे हैं।

 

मुख्य बिन्दु

श्लोक 71- विनम्रता परोपकारियों की स्वाभाविक विशेषता है।

श्लोक 72- बाहरी आभूषणों की तुलना में आचरण और गुण ही वास्तविक सुंदरता प्रदान करते हैं।

श्लोक 73- सच्चा मित्र संकट में साथ देता है और सदैव कल्याण की बात करता है।

श्लोक 74- परोपकार करना सज्जन व्यक्तियों का स्वाभाविक गुण है।

श्लोक 75- सज्जन, साधारण, स्वार्थी और बाधक प्रवृत्तियों का वर्गीकरण। परोपकार को सर्वोच्च गुण बताया गया है।

 

क्षीरेणात्मगतोदकाय हि गुणा दत्ताः पुरा तेऽखिलाः

क्षीरोत्तापमवेक्ष्य तेन पयसा स्वात्मा कृशाणौ हुतः ।

गन्तुं पावकमुन्मनस्तदभवद् दृष्ट्वा तु मित्रापदं

युक्तं तेन जलेन शाम्यति सतां मैत्री पुनस्त्वीदृशी ॥ ७६॥

 

Milk gives all its qualities to water when mixed with it, making the water like itself. When the milk is heated, it sacrifices itself to the flame, taking the water with it. However, the water, witnessing the suffering of its companion (milk), extinguishes the flame with its cooling nature. Such is the friendship of virtuous people—they are willing to sacrifice themselves for their companions in distress.

 

दूध अपने साथ मिले हुए पानी को अपने सारे गुण प्रदान कर देता है। जब दूध को गर्म किया जाता है, तो वह खुद को आग में समर्पित कर देता है और पानी को भी साथ ले जाता है। लेकिन पानी, अपने मित्र (दूध) की पीड़ा देखकर, अपनी ठंडी प्रकृति से आग को शांत कर देता है। यही सज्जनों की मित्रता है, जो संकट में भी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ते।

 

इतः स्वपिति केशवः कुलमितस्तदीयद्वीषा -

मितश्च शरणार्थिनां शिखरिणां गणाः शेरते ।

इतोऽपि वडवानलः सह समस्तसंवर्तकै -

रहो विततमूर्जितं भारसहं च सिन्धोर्वपुः ॥ ७७॥

 

In this vast ocean, Lord Vishnu (Keshava) resides on one side, while his enemies and the mountains seeking refuge sleep on another. At another corner lies the subterranean fire (Vadava), along with the destructive forces of dissolution (Samvartaka). The ocean, with its immense and stable form, bears the weight of all these contrasts.

 

इस विशाल समुद्र में एक ओर भगवान केशव (विष्णु) विश्राम कर रहे हैं, दूसरी ओर उनके शत्रु और शरण लेने वाले पर्वत भी विश्राम कर रहे हैं। एक और कोने में समुद्र के गर्भ में वडवानल (अग्नि) और संहारक शक्तियां हैं। समुद्र अपने विशाल और स्थिर रूप से इन सभी विरोधाभासों को सहन करता है।

 

तृष्णां छिन्धि भज क्षमां जहि मदं पापे रतिं मा कृथाः

सत्यं ब्रूह्यनुयाहि साधुपदवीं सेवस्व विद्वज्जनम् ।

मान्यान् मानय विद्विषोऽप्यनुनय प्रख्यापय प्रश्रयं

कीर्तिं पालय दुःखिते कुरु दयामेतत् सतां चेष्टितम् ॥ ७८॥

 

Cut off desires, cultivate patience, abandon pride, and refrain from sinful actions. Speak the truth, follow the path of virtue, and serve the wise. Respect the respected, even appease enemies, display humility, uphold your reputation, and show compassion to those in distress. These are the practices of the virtuous.

 

लोभ को समाप्त करो, सहनशीलता को अपनाओ, अहंकार को त्यागो और पाप में रुझान मत रखो। सत्य बोलो, सज्जनों के मार्ग का अनुसरण करो, विद्वानों की सेवा करो। सम्माननीय लोगों को सम्मान दो, शत्रुओं को भी शांत करने का प्रयास करो, नम्रता को प्रकट करो, अपनी कीर्ति को बनाए रखो और दुखियों पर दया करो। यही सज्जनों का आचरण है।

 

मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णाः

त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः ।

परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यं

निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः ॥ ७९॥

 

There are few virtuous individuals whose thoughts, words, and actions are filled with the nectar of righteousness. They spread joy in the three worlds through their deeds of kindness, magnify even the smallest virtues in others, and let these virtues blossom in their own hearts.

 

वे सज्जन दुर्लभ हैं, जिनके मन, वचन और शरीर पुण्य के अमृत से भरे होते हैं। वे अपने परोपकारों से तीनों लोकों को संतुष्ट करते हैं, दूसरों के छोटे-छोटे गुणों को पर्वत के समान महान बनाते हैं और अपने हृदय में उन गुणों को पुष्पित करते हैं।

 

किं तेन हेमगिरिणा रजताद्रिणा वा

यत्राश्रिताश्च तरवस्तरवन्त एव ।

मन्यामहे मलयमेव यदाश्रयेण

कङ्कोलनिम्बकुटजा अपि चन्दनाः स्युः ॥ ८०॥

 

What value does a mountain of gold or silver hold if the trees growing on it remain ordinary? We revere the Malaya Mountain, for even ordinary trees like Kankola and Neem, when growing there, transform into sandalwood.

 

सोने या चांदी के पर्वत का क्या मूल्य है, यदि वहां उगने वाले पेड़ साधारण ही रहें? हम मलयगिरि का आदर करते हैं, क्योंकि उसके प्रभाव से साधारण पेड़ जैसे कंकोल, नीम और कुटज भी चंदन के समान मूल्यवान हो जाते हैं।

 

मुख्य बिन्दु-

श्लोक 76 - सज्जनों की मित्रता त्याग, सहयोग, और परस्पर रक्षा पर आधारित होती है।

श्लोक 77 - समुद्र की भांति सज्जन लोग भी विरोधाभासों को सहन करने में सक्षम होते हैं।

श्लोक 78 - सत्पुरुषों के आदर्श व्यवहार के निर्देश।

श्लोक 79 - सत्पुरुष दूसरों के गुणों को सम्मान देते हुए स्वयं को श्रेष्ठ बनाते हैं।

श्लोक 80 - श्रेष्ठ संगति साधारण को भी असाधारण बना देती है।

 

रत्नैर्महार्हैस्तुतुषुर्न देवा

न भेजिरे भीमविषेण भीतिम् ।

सुधां विना न प्रययुर्विरामं

न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः ॥ ८१॥

 

The gods were not satisfied by the most precious gems, nor were they terrified by the dreadful poison. They only ceased their efforts after obtaining nectar (amrita). Similarly, the resolute do not rest until they achieve their determined goal.

 

देवता बहुमूल्य रत्नों से संतुष्ट नहीं हुए, न ही उन्होंने भयंकर विष से भय खाया। वे तभी रुके जब उन्हें अमृत प्राप्त हुआ। उसी प्रकार, धीर पुरुष निश्चित लक्ष्य को प्राप्त किए बिना विश्राम नहीं करते।

 

 

क्वचित् पृथ्वीशय्यः क्वचिदपि च पर्यङ्कशयनः

क्वचिच्छाकाहारः क्वचिदपि च शाल्योदनरुचिः ।

क्वचित् कण्ठाधारी क्वचिदपि च दिव्याम्बरधरो

मनस्वी कार्यार्थी न गणयति च दुःखं न च सुखम् ॥ ८२॥

 

Sometimes, the noble-minded sleep on the ground, and at other times, on luxurious beds. Sometimes, they live on simple vegetables, and at other times, they enjoy sumptuous meals. Sometimes, they wear plain clothes, and at other times, they are adorned in fine garments. A person with a strong will and purpose does not care for pleasure or pain in their quest to achieve their goal.

 

कभी मनस्वी व्यक्ति पृथ्वी पर सोते हैं, तो कभी सुसज्जित शैय्या पर। कभी सादा शाकाहार करते हैं, तो कभी स्वादिष्ट भोजन का आनंद लेते हैं। कभी साधारण वस्त्र धारण करते हैं, तो कभी दिव्य वस्त्रों में सजते हैं। लेकिन कार्य के प्रति समर्पित व्यक्ति सुख-दुख की परवाह नहीं करते।

 

ऐश्वर्यस्य विभूषणं सुजनता शौर्यस्य वाक्संयमो

ज्ञानस्योपशमः श्रुतस्य विनयो वित्तस्य पात्रे व्ययः ।

अक्रोधस्तपसः क्षमा प्रभवितुर्धर्मस्य निर्व्याजता

सर्वेषामपि सर्वकारणमिदं शीलं परं भूषणम् ॥ ८३॥

 

The true ornament of wealth is nobility, of valor is self-restraint in speech, of knowledge is tranquility, of learning is humility, and of wealth is its proper use. Patience is the ornament of asceticism, forgiveness of power, and sincerity of righteousness. Above all, the supreme adornment of all virtues is character.

 

धन का सच्चा आभूषण सज्जनता है, वीरता का वाणी पर संयम, ज्ञान का शांति, शिक्षा का विनम्रता, और संपत्ति का सदुपयोग। तप का आभूषण क्रोध न करना है, शक्ति का क्षमा, और धर्म का सच्चाई। इन सबका आधार उत्तम चरित्र है।

 

निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु

लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु व यथेष्टम् ।

अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा

न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः ॥ ८४॥

 

Let the wise criticize or praise, let wealth come or go as it pleases. Let death arrive today or after an age. The resolute do not deviate even a step from the path of righteousness.

 

चाहे नीति-विशारद लोग निंदा करें या स्तुति, चाहे लक्ष्मी आए या जाए, चाहे मृत्यु आज हो या युगों बाद—धीर पुरुष कभी भी न्याय के मार्ग से विचलित नहीं होते।

 

पातितोऽपि कराघातैरुत्पतत्येव कन्दुकः ।

प्रायेण साधुवृत्तनामस्थायिन्यो विपत्तयः ॥ ८५॥

 

Just as a ball rebounds higher when struck harder, virtuous people often rise stronger from adversities.

 

जिस प्रकार गेंद पर प्रहार करने से वह और ऊंचा उछलती है, उसी प्रकार सज्जन लोग विपत्तियों से और अधिक सशक्त होकर उभरते हैं।

 

मुख्य बिन्दु

श्लोक 81: लक्ष्य के प्रति दृढ़ संकल्प और अनवरत प्रयास।

श्लोक 82: मनस्वी व्यक्ति की सहनशीलता और उद्देश्य के प्रति समर्पण।

श्लोक 83: श्रेष्ठ चरित्र सभी गुणों का आधार और सर्वश्रेष्ठ आभूषण है।

श्लोक 84: धीर पुरुष का न्याय और धर्म के प्रति अडिग रहना।

श्लोक 85: सज्जन व्यक्तियों की विपत्तियों से उबरने और और अधिक ऊंचाई प्राप्त करने की क्षमता।

 

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महारिपुः ।

नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कुर्वाणो नावसीदति ॥ ८६॥

 

Laziness is the greatest enemy residing in the human body. No ally is greater than hard work, for those who labor diligently never face despair.

 

आलस्य मनुष्य के शरीर में रहने वाला सबसे बड़ा शत्रु है। परिश्रम से बढ़कर कोई मित्र नहीं होता, क्योंकि जो परिश्रम करता है, वह कभी कष्ट में नहीं पड़ता।

 

छिन्नोऽपि रोहति तरुश्चन्द्रः क्षीणोऽपि वर्धते लोके ।

इति विमृशन्तः सन्तः सन्तप्यन्ते न लोकेऽस्मिन् ॥ ८७॥

 

A felled tree regrows, and the waning moon waxes again. Reflecting on such truths, virtuous individuals do not despair amidst worldly sorrows.

 

कटा हुआ वृक्ष फिर से पनप जाता है और घटा हुआ चंद्रमा पुनः बढ़ता है। इन तथ्यों पर विचार करने वाले सज्जन संसार के दुःखों से कभी विचलित नहीं होते।

 

नेता यस्य बृहस्पतिः प्रहरणं वज्रं सुराः सैनिकाः

स्वर्गो दुर्गमनुग्रहः खलु हरेरैरावतो वारणः ।

इत्यैश्वर्यबलान्वितोऽपि बलभिद्भग्नः परैः सङ्गरे

तद्व्यक्तं ननु दैवमेव शरणं धिग्धिग्वृथा पौरुषम् ॥ ८८॥

 

Even though Indra had Bhaspati as his guide, the thunderbolt as his weapon, gods as his warriors, heaven as his fortress, and the mighty elephant Airāvata, he was defeated in battle. This shows that success depends not only on effort but also on destiny.

 

जिसका नेता बृहस्पति है, हथियार वज्र है, सैनिक देवता हैं, और दुर्ग स्वर्ग है, फिर भी इंद्र राक्षसों से युद्ध में पराजित हो गया। इससे स्पष्ट है कि केवल पुरुषार्थ नहीं, दैव (भाग्य) भी आवश्यक है।

 

भग्नाशस्य करण्डपिण्डिततनोर्म्लानेन्द्रियस्य क्षुधा

कृत्वाखुर्विवरं स्वयं निपतितो नक्तं मुखे भोगिनः ।

तृप्तस्तत्पिशितेन सत्वरमसौ तेनैव यातः पथा

लोकाः पश्यत दैवमेव हि नृणां वृद्धौ क्षये कारणम् ॥ ८९॥

 

A rat, weakened by hunger, digs a burrow only to fall into the mouth of a snake at night. The snake, satisfied with the rat's flesh, departs quickly. This illustrates how fate governs human success and failure.

 

जो चूहे से भूख के कारण बिल बनाता है और रात में उसमें सांप का शिकार बन जाता है, वह सांप चूहे का मांस खाकर तृप्त होकर उसी रास्ते चला जाता है। इससे स्पष्ट है कि मनुष्यों की उन्नति और पतन में दैव का भी हाथ होता है।

 

कर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी ।

तथापि सुधिया भाव्यं सुविचार्यैव कुर्वता ॥ ९०॥

 

The results of human actions depend on their deeds, and their intellect follows the course of their actions. Still, wise individuals should always think carefully before acting.

 

मनुष्यों को अपने कर्मों के अनुसार फल मिलता है और उनकी बुद्धि कर्मों के आधार पर ही कार्य करती है। फिर भी बुद्धिमान व्यक्ति को सोच-समझकर ही कार्य करना चाहिए।

 

मुख्य बिन्दु

श्लोक 86 - आलस्य का त्याग और परिश्रम का महत्व।

श्लोक 87 - सज्जनों की विपत्तियों में धैर्य और आत्मविश्वास।

श्लोक 88 - भाग्य और पुरुषार्थ का संतुलन।

श्लोक 89 - दैव (भाग्य) का जीवन में प्रभाव।

श्लोक 90 - विवेकपूर्ण निर्णय और कर्म का महत्व।

 

खल्वाटो दिवसेश्वरस्य किरणैः सन्तापितो मस्तके

वाञ्छन्देशमनातपं विधिवशात्तालस्य मूलं गतः ।

तत्रोच्चैर्महता फलेन पतता भग्नं सशब्दं शिरः

प्रायो गच्छति यत्र भाग्यरहितस्तत्रापदां भाजनम् ॥ ९१॥

A bald man, scorched by the sun’s rays, sought shade under a palm tree. By destiny, a large fruit fell from the tree and struck his head, causing a loud injury. Misfortune often follows the unlucky wherever they go.


एक क्रोधित व्यक्ति दिन के समय सूर्य की किरणों से पीड़ित होकर अपने सिर पर दुख झेलता है। नियति की मजबूरी में, ताड़ के पेड़ की जड़ क्षतिग्रस्त हो जाती है। वहाँ भारी फल गिरते हैं और सिर टूट जाता है। आमतौर पर, जहाँ किसी का भाग्य अनुकूली नहीं होता, वहाँ दुर्भाग्य उनका पीछा करता है।

यह श्लोक यह दर्शाता है कि जिनका भाग्य अनुकूली नहीं होता, उन्हें अक्सर नियति के दुष्कर्मों का सामना करना पड़ता है। चाहे वे कितने भी शक्तिशाली या सम्मानित क्यों न हों, भाग्यरहित होने के कारण उन्हें दुर्भाग्य चपेट में आता है। यह जीवन में भाग्य और नियति की भूमिका को उजागर करता है, जो कुछ लोगों को हमेशा कठिनाइयों में डालती है।

 

रविनिशाकरयोर्ग्रहपीडनं गजभुजङ्गमयोरपि बन्धनम् ।

मतिमतां च विलोक्य दरिद्रतां विधिरहो बलवानिति मे मतिः ॥ ९२॥

The sun and moon are eclipsed; elephants and serpents are captured and bound; and even the wise face poverty. This shows that destiny is immensely powerful.

 

सूर्य और चंद्रमा पर ग्रहों के प्रभाव से पीड़ा होती है, और हाथी तथा सर्प जैसे शक्तिशाली प्राणी भी उनके प्रभाव में बंधे रहते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति को देखकर, मेरे विचार में, नियति दरिद्रता को भी शक्तिशाली मानती है।

यह श्लोक बताता है कि शक्तिशाली ग्रहों का प्रभाव भी सूर्य और चंद्रमा जैसे देवताओं पर पड़ता है, और हाथी तथा सर्प जैसे जानवर भी उनके प्रभाव में बंधे रहते हैं। इसी प्रकार, बुद्धिमान व्यक्ति भी नियति की शक्ति से दरिद्रता में फंस सकते हैं। यह जीवन में नियति की अप्रत्याशितता और उसकी शक्ति को दर्शाता है।

 

सृजति तावदशेषगुणाकरं पुरुषरत्नमलङ्करणं भुवः ।

तदपि तत्क्षणभङ्गि करोति चेदहह कष्टमपण्डितता विधेः ॥ ९३॥

Fate creates a flawless gem of a human, an ornament to the earth, endowed with all virtues, yet destroys it in an instant. Alas! Such foolishness of destiny is lamentable.

 

नियति एक व्यक्ति को सभी गुणों से सुसज्जित, रत्न के समान मनुष्य का निर्माण करती है। फिर भी, नियति अचानक ही उसे कठिनाइयों से बर्बाद कर देती है, जिससे विद्वान व्यक्ति की कष्टदायक स्थिति उत्पन्न होती है।

यह श्लोक बताता है कि नियति द्वारा मनुष्य को सर्वोत्तम गुणों से सम्पन्न किया जाता है, लेकिन एक क्षण में वही नियति उसे विनाश की ओर ले जाती है। यह दिखाता है कि जीवन में नियति की अनियमितता और उसकी अप्रत्याशितता कितनी बड़ी होती है, जिससे सर्वोत्तम गुणों वाले भी कष्टों का सामना करते हैं।

 

पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किं

नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम् ।

धारा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणं

यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः ॥ ९४॥

 

If a desert tree does not sprout leaves, is it spring's fault? If the owl cannot see in daylight, is the sun to blame? If raindrops miss the chataka bird’s mouth, is the cloud at fault? That which is written by destiny on one’s forehead cannot be erased.


जब वृक्ष पत्ते नहीं उगता है, तो क्या यह वसंत ऋतु की गड़बड़ी है? जब उल्लू दिन में नहीं देख पाता, तो क्या यह सूर्य का दोष है? जब बादल की धाराएँ चातक पक्षी के मुंह पर नहीं गिरतीं, तो क्या यह बादल की खामी है? जो नियति ने किसी के माथे पर लिखा है, उसे कौन मिटा सकता है?

यह श्लोक यह बताता है कि जीवन में जो कुछ भी होता है, चाहे वह अच्छी चीजें हों या बुरी, सब कुछ नियति के अनुसार ही होता है। व्यक्ति के ऊपर नियति ने जो कुछ भी तय किया है, उसे कोई नहीं बदल सकता। इसलिए, दूसरों की दोषारोपण की जगह अपने भाग्य को स्वीकार करना चाहिए।

 

नमस्यामो देवान्ननु हतविधेस्तेऽपि वशगा

विधिर्वन्द्यः सोऽपि प्रतिनियतकर्मैकफलदः ।

फलं कर्मायत्तं यदि किममरैः किञ्च विधिना

नमस्तत्कर्मभ्यो विधिरपि न येभ्यः प्रभवति ॥ ९५॥

We worship gods, yet they are bound by destiny. We revere destiny, but it merely dispenses the fruits of karma. If results are determined by actions, why worship gods or fate? Instead, we should bow to our deeds, for even fate cannot overpower them.

 

हम देवताओं की पूजा करते हैं, लेकिन वे भी नियति के अधीन हैं। नियति की भी पूजा की जाती है, पर यह केवल कर्मों के परिणामों को निर्धारित करती है। अगर फल कर्मों पर निर्भर करते हैं, तो फिर देवताओं या नियति की पूजा का क्या महत्व? इसके बजाय, हमें अपने कर्मों का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि नियति और देवताओं से भी हमारे कर्म ही ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

यह श्लोक बताता है कि हम देवताओं और नियति की पूजा करते हैं, परंतु वास्तव में हमारे कर्मों के फल ही हमारे जीवन को निर्धारित करते हैं। इसलिए, हमें कर्मों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और अपने कर्मों का सदुपयोग करना चाहिए, क्योंकि नियति और देवताओं से भी हमारे कर्म ही ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

 

मुख्य बिन्दु

श्लोक 91 : भाग्यरहित व्यक्ति पर नियति की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ अक्सर प्रभाव डालती हैं।

श्लोक 92 : नियति की शक्ति सभी के लिए समान होती है, चाहे वे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों।

श्लोक 93: नियति की अनियमितता और उसकी अप्रत्याशित शक्ति।

श्लोक 94: नियति के प्रति स्वीकृति और दूसरों की दोषारोपण से बचना।

श्लोक 95: कर्मों का महत्व और देवताओं या नियति पर अत्यधिक निर्भरता से बचना।

 

ब्रह्मा येन कुलालवन्नियमितो ब्रह्माण्डभाण्डोदरे

विष्णुर्येन दशावतारगहने क्षिप्तो महासङ्कटे ।

रुद्रो येन कपालपाणिपुटके भिक्षाटनं कारितः

सूर्यो भ्राम्यति नित्यमेव गगने तस्मै नमः कर्मणे ॥ ९६॥

 

I bow to the force of karma, by which:

Brahma, like a potter, shapes the universe within the cosmic pot.

Vishnu is bound to take ten incarnations to resolve crises.

Shiva, the supreme ascetic, is made to beg with a skull in hand.

The Sun tirelessly moves across the sky.
Karma is supreme, and even the divine cannot escape it.

 

जिस कर्म के नियम से ब्रह्मा कुम्हार की तरह ब्रह्माण्ड का निर्माण करते हैं, विष्णु को दशावतारों के संकटपूर्ण कार्यों में लगाया गया है, रुद्र (शिव) को कपाल हाथ में लेकर भिक्षा मांगने के लिए विवश किया गया है, और सूर्य को नित्य आकाश में भ्रमण करना पड़ता है—उस कर्म को नमस्कार है।

यह श्लोक कर्म की महत्ता और इसकी अपरिहार्यता को दर्शाता है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव जैसे त्रिदेव भी कर्म के बंधन में बंधे हुए हैं और अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं। यह श्लोक प्रेरित करता है कि हम अपने कर्मों का आदर करें और उन्हें पूरी निष्ठा से निभाएँ।

 

नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलं

विद्यापि नैव न च यत्नकृतापि सेवा ।

भाग्यानि पूर्वतपसा खलु सञ्चितानि

काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः ॥ ९७॥

 

Neither beauty, noble lineage, character, education, nor sincere effort guarantees success.
Only the destiny accrued from past deeds bears fruit at the right time, just as a tree yields its harvest in due season.


न तो किसी की आकृति (सुंदरता), न कुल, न शील, न विद्या, और न ही परिश्रम से की गई सेवा का फल तुरंत मिलता है। केवल पूर्वजन्म के पुण्य (भाग्य) ही समय आने पर फलित होते हैं, जैसे वृक्ष अपने समय पर फल देते हैं।

यह श्लोक भाग्य और पूर्वजन्म के कर्मों की महत्ता को बताता है। चाहे वर्तमान में कितना ही परिश्रम क्यों न किया जाए, पूर्वजन्म के संचित पुण्य ही समय आने पर जीवन में फलदायी होते हैं।

 

वने रणे शत्रुजलाग्निमध्ये

महार्णवे पर्वतमस्तके वा ।

सुप्तं प्रमत्तं विषमस्थितं वा

रक्षन्ति पुण्यानि पुरा कृतानि ॥ ९८॥

 

In forests, battlefields, amidst enemies, fire, deep oceans, or high mountain peaks, even when one is asleep, careless, or in a precarious situation, past good deeds protect and provide safety.

 

जंगल में, युद्धभूमि में, शत्रु के बीच, जल या अग्नि के मध्य, महासागर में, पर्वत की चोटी पर, या जब व्यक्ति सो रहा हो, असावधान हो, या किसी संकट में हो—उसके पूर्वजन्म के पुण्य उसे हर स्थिति में रक्षा प्रदान करते हैं।

यह श्लोक यह बताता है कि पूर्वजन्म के पुण्य संकट की हर स्थिति में व्यक्ति की रक्षा करते हैं। चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, संचित पुण्य जीवन को सुरक्षित रखते हैं।

 

या साधूंश्च खलान् करोति विदुषो मूर्खान् हितान् द्वेषिणः

प्रत्यक्षं कुरुते परोक्षममृतं हालाहलं तत्क्षणात् ।

तामाराधय सत्क्रियां भगवतीं भोक्तुं फलं वाञ्छितं

हे साधो व्यसनैर्गुणेषु विपुलेष्वास्थां वृथा मा कृथाः ॥ ९९॥

 

Virtuous actions can:

Transform sinners into saints, fools into wise, and enemies into friends.

Turn poison into nectar or nectar into poison instantly.
Worship the goddess of virtuous deeds to attain desired outcomes. Avoid indulging in vices or overestimating one’s merits.

 

जो सत्क्रिया साधुओं को खल, विद्वानों को मूर्ख, और हितैषियों को शत्रु बना देती है, और अमृत को विष और विष को अमृत बना देती है, उस सत्क्रिया को ही आराध्य मानो। हे साधु! व्यर्थ में दुर्गुणों और विषय-वासना में आसक्ति मत रखो, बल्कि सत्कर्मों को अपनाओ।

यह श्लोक सत्कर्मों की महत्ता को बताता है। यह प्रेरित करता है कि हमें दुर्गुणों, लोभ, और कामनाओं से बचकर सत्कर्मों और सदाचार में लीन रहना चाहिए। यही सच्चा पुण्य है, जो व्यक्ति को सही दिशा में ले जाता है।

 

गुणवदगुणवद्वा कुर्वता कार्यजातं

परिणतिरवधार्या यत्नतः पण्डितेन ।

अतिरभसकृतानां कर्मणामाविपत्ते -

र्भवति हृदयदाही शल्यतुल्यो विपाकः ॥ १००॥

 

Whether a task is noble or otherwise, its potential outcomes must be carefully evaluated by the wise.
Hastily undertaken actions often result in adverse consequences, akin to painful thorns that cause suffering.


चाहे कार्य अच्छा हो या बुरा, पंडित व्यक्ति को उसका परिणाम सोच-समझकर करना चाहिए। अत्यधिक आवेग में किए गए कार्यों का परिणाम असफलता होता है, जो शल्य (तीर) की तरह हृदय को पीड़ा देता है।

यह श्लोक व्यक्ति को आवेग में आकर कोई भी कार्य करने से रोकता है। विवेकपूर्ण और सोच-समझकर किए गए कार्य ही जीवन में सफलता प्रदान करते हैं। आवेग और जल्दबाजी में किया गया कार्य अक्सर दुःखदायी परिणाम लाता है।

 

मुख्य बिन्दु

श्लोक 96: कर्म की अपरिहार्यता और उसकी महत्ता- ब्रह्मा, विष्णु, और शिव जैसे देवता भी कर्म के बंधन में बंधे हैं। सूर्य भी अपने कर्म से बंधा हुआ नित्य चलता है। कर्म करना सभी का धर्म है।

श्लोक 97: भाग्य का महत्व- व्यक्ति के गुण, कुल, या प्रयास से पहले उसके पूर्वजन्म के पुण्य (भाग्य) समय आने पर फलित होते हैं। कर्म और भाग्य दोनों का संतुलन जरूरी है।

श्लोक 98: पूर्वजन्म के पुण्य संकट में रक्षा करते हैं- अच्छे कर्म करना ही सच्ची सुरक्षा है।

श्लोक 99: सत्कर्मों की महिमा - सद्गुण और सत्कर्म जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं।

श्लोक 100: आवेग में किए गए कार्यों के नकारात्मक परिणाम। विवेक और धैर्य से कार्य करना चाहिए।

 

स्थाल्यां वैदूर्यमय्यां पचति तिलकणांश्चान्दनैरिन्धनौघैः

सौवर्णैर्लाङ्गलाग्रैर्विलिखति वसुधामर्कमूलस्य हेतोः ।

कृत्वा कर्पूरखण्डान् वृतिमिह कुरुते को द्रवाणां समन्तात्

प्राप्येमां कर्मभूमिं न चरति मनुजो यस्तपो मन्दभाग्यः ॥ १०१॥

 

Who would cook sesame seeds in a lapis lazuli pot with sandalwood as fuel? Who would plow the land with a golden plow for trivial gains?
This verse mocks the misuse of valuable resources for insignificant purposes. It calls a person unfortunate who, having been blessed with the opportunity of human life on this karmic earth, does not engage in penance or meaningful pursuits.

 

यह संसार कर्मभूमि है, जहां तपस्या और परिश्रम का महत्व है। जो व्यक्ति दुर्भाग्यवश इस भूमि पर जन्म लेकर भी तपस्या नहीं करता, वह ऐसा ही है जैसे कोई अद्भुत साधनों (वैदूर्यमयी थाली, चंदन की लकड़ी) का उपयोग करके व्यर्थ कर्म करे। यह श्लोक जीवन में परिश्रम और तप की महत्ता को समझाता है।

 

मज्जत्वम्भसि यातु मेरुशिखरं शत्रून् जयत्वावहे

वाणिज्यं कृषिसेवने च सकला विद्याः कलाः शिक्षताम् ।

आकाशं विपुलं प्रयातु खगवत्कृत्वा प्रयत्नं परं

नाभाव्यं भवतीह कर्मवशतो भाव्यस्य नाशः कुतः ॥ १०२॥

 

Let one dive into the ocean, scale Mount Meru, defeat enemies in war, engage in trade or agriculture, and master all arts and sciences.
However, despite all efforts, what is not destined will not happen, while what is fated cannot be erased. The verse emphasizes the inevitability of destiny governed by karma.

 

मनुष्य को अपने कर्म में जुटे रहना चाहिए। चाहे वह समुद्र में गोता लगाए, पर्वत शिखर पर जाए, शत्रु को जीते, या विद्या और कला सीखे, जो भाग्य में नहीं है वह नहीं होगा। कर्म का फल निश्चित है और उसे कोई रोक नहीं सकता।

 

भीमं वनं भवति तस्य पुरं प्रधानं

सर्वो जनः स्वजनतामुपयाति तस्य ।

कृत्स्ना च भूर्भवति सन्निधिरत्नपूर्णा

यस्यास्ति पूर्वसुकृतं विपुलं नरस्य ॥ १०३॥

 

For a person endowed with abundant good deeds from the past:

A dense forest transforms into a prosperous city.

Strangers become close family.

The entire earth becomes a treasury filled with precious gems.
This verse celebrates the power of past virtuous actions in transforming life positively.

 

जिस व्यक्ति ने पूर्वजन्मों में अच्छे कर्म किए हैं, उसके लिए भीषण जंगल भी सुरक्षित नगर बन जाता है। सभी लोग उसके अपने हो जाते हैं और पृथ्वी खजाने से भर जाती है। अच्छे कर्मों का फल हर परिस्थिति को अनुकूल बना देता है।

 

को लाभो गुणिसङ्गमः किमसुखं प्राज्ञेतरैः सङ्गतिः

का हानिः समयच्युतिर्निपुणता का धर्मतत्त्वे रतिः ।

कः शूरो विजितेन्द्रियः प्रियतमा कानुव्रता किं धनं

विद्या किं सुखमप्रवासगमनं राज्यं किमाज्ञाफलम् ॥ १०४॥

 

This verse outlines questions about values and virtues:

What is the greatest gain? Association with the virtuous.

What is the greatest discomfort? Company of the unwise.

What is the greatest loss? Losing the right opportunity.

What is true courage? Mastery over one’s senses.

What is the best wealth? Knowledge.

What is the ultimate joy? Staying in one’s homeland.

What is the true fruit of ruling? Obedience to one’s commands.
This verse reflects on the essence of a virtuous life.

 

यह श्लोक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है:

 

सबसे बड़ा लाभ गुणी व्यक्तियों की संगति है।

सबसे बड़ा दुःख मूर्खों की संगति है।

समय की बर्बादी सबसे बड़ी हानि है।

इंद्रियों को जीतने वाला ही सच्चा वीर है।

सच्चा धन विद्या है, सुख अपनों के साथ रहना है, और राज्य का लाभ उसकी आज्ञा का पालन है।

 

अप्रियवचनदरिद्रैः प्रियवचनाढ्यैः स्वदारपरितुष्टैः ।

परपरिवादनिवृत्तैः क्वचित्क्वचिन्मण्डिता वसुधा ॥ १०५॥

 

The world is beautified in parts by:

Those who speak sweet words despite being poor.

Those who are satisfied with their spouses.

Those who refrain from criticizing others.
The verse portrays the harmonious qualities that bring peace and prosperity to the earth.

This verse outlines questions about values and virtues:

What is the greatest gain? Association with the virtuous.

What is the greatest discomfort? Company of the unwise.

What is the greatest loss? Losing the right opportunity.

What is true courage? Mastery over one’s senses.

What is the best wealth? Knowledge.

What is the ultimate joy? Staying in one’s homeland.

What is the true fruit of ruling? Obedience to one’s commands.
This verse reflects on the essence of a virtuous life.

यह संसार प्रिय और अप्रिय वचनों से भरा हुआ है।

जो व्यक्ति प्रिय वचन बोलते हैं और अपने जीवनसाथी से संतुष्ट रहते हैं, वे धरती को सुंदर बनाते हैं।

जो दूसरों की निंदा से बचते हैं, वे जीवन में शांति लाते हैं।

 

मुख्य बिन्दु

श्लोक 101: कर्मभूमि पर जन्म लेकर तप और परिश्रम करना आवश्यक है।

श्लोक 102: कर्म के बिना भाग्य का फल नहीं मिलता।

श्लोक 103: पूर्वजन्म के अच्छे कर्म जीवन को अनुकूल बनाते हैं।

श्लोक 104: समय, संगति, और आत्मसंयम का महत्व।

श्लोक 105:  प्रिय वचन और संतोष जीवन में शांति लाते हैं।

 

कदर्थितस्यापि हि धैर्यवृत्तेर्न शक्यते धैर्यगुणः प्रमार्ष्टुम् ।

अधोमुखस्यापि कृतस्य वन्हेर्नाधः शिखा याति कदाचिदेव ॥ १०६॥

 

Even when ridiculed or oppressed, the quality of patience and courage in a steadfast person cannot be erased.
Just as the flame of a fire never moves downward, the virtue of resilience remains unshaken.

 

धैर्यवान व्यक्ति का धैर्य, चाहे वह कितनी भी उपेक्षा या अपमान सह ले, समाप्त नहीं होता।
जैसे आग की लौ नीचे की ओर कभी नहीं जाती, वैसे ही धैर्यवान का साहस और धैर्य अडिग रहता है।

 

कान्ताकटाक्षविशिखा न लुनन्ति यस्य

चित्तं न निर्दहति कोपकृशानितापः ।

कर्षन्ति भूरिविषयाश्च न लोभपाशै -

र्लोकत्रयं जयति कृत्स्नमिदं स धीरः ॥ १०७॥

 

He who is unaffected by:

The seductive glances of a beloved,

The heat of anger,

The temptations of material desires, or the snares of greed,
Is a truly resolute person who conquers all three worlds.

जो व्यक्ति:

प्रिय के कामदेव जैसे कटाक्षों से विचलित नहीं होता,

क्रोध की अग्नि से दग्ध नहीं होता,

और लोभ के बंधनों में नहीं फंसता,
वह सच्चा धैर्यवान है और तीनों लोकों को जीत सकता है।

 

एकेनापि हि शूरेण पादाक्रान्तं महीतलम् ।

क्रियते भास्करेणेव स्फारस्फुरिततेजसा ॥ १०८॥

 

Even a single valiant person, with his radiant brilliance, can conquer and dominate the entire earth,
Just as the sun, through its immense energy, brightens the vast sky.

 

एक अकेला वीर भी अपने तेज और पराक्रम से पूरी पृथ्वी पर विजय प्राप्त कर सकता है,
जैसे सूर्य अपने तेज से समस्त आकाश को प्रकाशमय कर देता है।

 

वह्निस्तस्य जलायते जलनिधिः कुल्यायते तत्क्षणात्

मेरुः स्वल्पशिलायते मृगपतिः सद्यः कुरङ्गायते ।

व्यालो माल्यगुणायते विषरसः पीयूषवर्षायते

यस्याङ्गेऽखिललोकवल्लभतमं शीलं समुन्मीलति ॥ १०९॥

 

For the person whose conduct is supremely virtuous:

Fire turns cool like water,

The ocean becomes a small stream,

Mount Meru appears like a small stone,

A lion becomes as harmless as a deer,

Serpents turn into garlands, and

Poison transforms into nectar.
Such is the transformative power of noble character.

 

जिस व्यक्ति का आचरण अत्यंत श्रेष्ठ होता है:

अग्नि उसके लिए जल बन जाती है,

समुद्र एक छोटी धारा जैसा प्रतीत होता है,

पर्वत छोटे पत्थर जैसा और सिंह हिरण जैसा हो जाता है,

सांप फूलों की माला जैसा और विष अमृत में परिवर्तित हो जाता है।
श्रेष्ठ चरित्र व्यक्ति के चारों ओर सौम्यता और सकारात्मकता लाता है।

 

लज्जागुणौघजननीं जननीमिव स्वां

अत्यन्तशुद्धहृदयामनुवर्तमानाम् ।

तेजस्विनः सुखमसूनपि सन्त्यजन्ति

सत्यव्रतव्यसनिनो न पुनः प्रतिज्ञाम् ॥ ११०॥

 

For people of great valor and noble character:

Modesty is cherished like a mother who gives birth to virtues.

With pure hearts, they willingly sacrifice even their lives.
However, they never forsake their promises or their vow of truth, which they hold above all else.

 

तेजस्वी लोग अपने गुणों की जननी (लज्जा) को अपनी मां की तरह मानते हैं और उसका पालन करते हैं।
वे सत्यव्रत के पालन में अपने प्राण तक त्याग देते हैं, परंतु अपनी प्रतिज्ञा से कभी विचलित नहीं होते।

 

मुख्य बिन्दु:

श्लोक 106: परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, धैर्य का गुण अमिट रहता है।

श्लोक 107: क्रोध, काम, और लोभ पर विजय व्यक्ति को महान बनाती है।

श्लोक 108: अकेला वीर भी अपनी शक्ति से बड़े कार्य कर सकता है।

श्लोक 109 : अच्छे आचरण से संसार का व्यवहार बदल सकता है।

श्लोक 110: सत्य और व्रत के लिए प्राण त्याग देना ही सच्चा धर्म है।

 


सौन्दर्यलहरी Saundaryalahari



Saundaryalahari

सौन्दर्यलहरी

 

आनन्दलहरी (-४० )

शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं

न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।

अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि

प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति ॥ १॥

 

भावार्थ:
शिव तभी शक्तिशाली और सृजन करने में सक्षम होते हैं जब वे शक्ति (देवी) से संयुक्त होते हैं। यदि शक्ति साथ न हो, तो शिव एक साधारण स्पंदन (हरकत) तक करने में असमर्थ हैं। इसीलिए देवी की आराधना स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश द्वारा भी की जाती है। जो व्यक्ति पुण्य नहीं करता, वह देवी को न तो प्रणाम कर सकता है और न ही उनकी स्तुति कर सकता है।

 

तनीयांसं पांसुं तव चरणपङ्केरुहभवं

विरिञ्चिस्सञ्चिन्वन् विरचयति लोकानविकलम् ।

वहत्येनं शौरिः कथमपि सहस्रेण शिरसां

हरस्संक्षुद्यैनं भजति भसितोद्धूलनविधिम् ॥ २॥

 

भावार्थ:
देवी के चरणों से निकली धूल इतनी पवित्र है कि ब्रह्मा इसे लेकर संपूर्ण संसार का निर्माण करते हैं। विष्णु इसे अपने सहस्र सिरों पर धारण करते हैं, और शिव इसे अपने मस्तक पर भस्म की तरह धारण करते हैं। यह चरणधूलि समस्त जगत के संचालन में महत्वपूर्ण है।

 

अविद्यानामन्त -स्तिमिर -मिहिरद्वीपनगरी

जडानां चैतन्य -स्तबक -मकरन्द -स्रुतिझरी ।

दरिद्राणां चिन्तामणिगुणनिका जन्मजलधौ

निमग्नानां दंष्ट्रा मुररिपु -वराहस्य भवति ॥ ३॥

 

भावार्थ:
देवी ज्ञान का सूर्य हैं, जो अज्ञान के अंधकार को समाप्त करते हैं। वे जड़ प्राणियों में चेतना का संचार करती हैं और दरिद्रता को हरने वाली चिन्तामणि के समान हैं। जन्म-मरण के सागर में डूबे हुए प्राणियों के लिए वे वराह रूपी विष्णु की दांत के समान उद्धार करती हैं।

 

त्वदन्यः पाणिभ्यामभयवरदो दैवतगणः

त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया ।

भयात् त्रातुं दातुं फलमपि च वाञ्छासमधिकं

शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुणौ ॥ ४॥

 

भावार्थ:
अन्य देवता दोनों हाथों से केवल अभय और वर देते हैं, लेकिन देवी स्वयं केवल अपने कृपादृष्टि से ही भक्तों की इच्छाएं पूरी करती हैं। देवी के चरण लोकों के लिए पूर्ण शरण हैं, जो न केवल भय से बचाते हैं, बल्कि इच्छाओं से भी अधिक फल प्रदान करते हैं।

 

हरिस्त्वामाराध्य प्रणतजनसौभाग्यजननीं

पुरा नारी भूत्वा पुररिपुमपि क्षोभमनयत् ।

स्मरोऽपि त्वां नत्वा रतिनयनलेह्येन वपुषा

मुनीनामप्यन्तः प्रभवति हि मोहाय महताम् ॥ ५॥

 

भावार्थ:
देवी की आराधना करके विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया और शिव को मोहित कर दिया। यहां तक कि कामदेव ने भी देवी की उपासना करके ऐसा रूप पाया जो ऋषियों को भी मोह में डालने में सक्षम है। देवी सौंदर्य और शक्ति की आदिशक्ति हैं।

 

धनुः पौष्पं मौर्वी मधुकरमयी पञ्च विशिखाः

वसन्तः सामन्तो मलयमरुदायोधनरथः ।

तथाप्येकः सर्वं हिमगिरिसुते कामपि कृपाम्1

अपाङ्गात्ते लब्ध्वा जगदिद -मनङ्गो विजयते ॥ ६॥

 

भावार्थ:
कामदेव के पास पुष्पों का धनुष, मधुमक्खियों की डोरी और वसंत ऋतु का समर्थन है। फिर भी, वे केवल देवी के एक कृपा-दृष्टि (अपांग) से संपूर्ण संसार पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। यह उनकी शक्ति और कृपा का प्रभाव है।

 

क्वणत्काञ्चीदामा करिकलभकुम्भस्तननता

परिक्षीणा मध्ये परिणतशरच्चन्द्रवदना ।

धनुर्बाणान् पाशं सृणिमपि दधाना करतलैः

पुरस्तादास्तां नः पुरमथितुराहोपुरुषिका ॥ ७॥

 

भावार्थ:
देवी के रूप का वर्णन है—उनकी करधनी की मधुर ध्वनि, उनके सुडौल और पूर्ण स्तन, पतला मध्य भाग और पूर्ण चंद्रमा जैसा सुंदर मुख। वे धनुष, बाण, पाश और अंकुश धारण करती हैं। देवी का यह दिव्य रूप हमारे सामने प्रकट हो और हमें प्रेरणा दे।

 

सुधासिन्धोर्मध्ये सुरविटपिवाटीपरिवृते

मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे ।

शिवाकारे मञ्चे परमशिवपर्यङ्कनिलयां

भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्दलहरीम् ॥ ८॥

 

भावार्थ:
सुधा (अमृत) के सागर के मध्य, देव वृक्षों और मणिद्वीप से घिरे हुए नीप (पारिजात) वन में, चिंतामणि भवन में देवी निवास करती हैं। यहां वे शिव के साथ एक दिव्य आसन पर विराजमान होती हैं। केवल धन्य और पवित्र आत्माएं ही इस आनंदमय स्थिति का अनुभव कर सकती हैं।

 

महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं

स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि ।

मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्वा कुलपथं

सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसे ॥ ९॥

 

भावार्थ:
देवी कुंडलिनी रूप में शरीर के विभिन्न चक्रों में निवास करती हैं—मूलाधार (पृथ्वी), मणिपुर (अग्नि), स्वाधिष्ठान (जल), हृदय (वायु) और आज्ञा चक्र (आकाश)। सहस्रार में जाकर वे शिव के साथ रमण करती हैं। यह कुंडलिनी का दिव्य मार्ग है।

 

सुधाधारासारैश्चरणयुगलान्तर्विगलितैः

प्रपञ्चं सिञ्चन्ती पुनरपि रसाम्नायमहसः ।

अवाप्य स्वां भूमिं भुजगनिभमध्युष्टवलयं

स्वमात्मानं कृत्वा स्वपिषि कुलकुण्डे कुहरिणि ॥ १०॥

 

भावार्थ:
देवी के चरणों से अमृत की धारा प्रवाहित होती है, जो पूरे संसार को पवित्र करती है। कुंडलिनी शक्ति अंततः अपनी स्थिति (मूलाधार) में लौटकर आत्मा के साथ विश्राम करती है। यह दिव्य ऊर्जा है जो जीवन का संचालन करती है।

 

चतुर्भिः श्रीकण्ठैः शिवयुवतिभिः पञ्चभिरपि

प्रभिन्नाभिः शम्भोर्नवभिरपि मूलप्रकृतिभिः ।

चतुश्चत्वारिंशद्वसुदलकलाश्रत्रिवलय - (त्रयश्चत्वारि )

त्रिरेखाभिः सार्धं तव शरणकोणाः परिणताः ॥ ११॥ (चरणकोणाः , भवनकिणाः )

 

भावार्थ:
देवी की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि उनके चरणकमल 44 स्थूल तत्वों (पंचमहाभूत, इंद्रियां आदि) से युक्त हैं। नौ मूल प्रकृतियां, पांच शिव तत्व, और त्रिवली (त्रिशक्ति) उनके चरणों में निहित हैं। इनके चरण शरणागतों के लिए परम आश्रयस्थल हैं।

 

त्वदीयं सौन्दर्यं तुहिनगिरिकन्ये तुलयितुं

कवीन्द्राः कल्पन्ते कथमपि विरिञ्चिप्रभृतयः ।

यदालोकौत्सुक्यादमरललना यान्ति मनसा

तपोभिर्दुष्प्रापामपि गिरिशसायुज्यपदवीम् ॥ १२॥

 

भावार्थ:
हे हिमालय-कन्या (पार्वती), आपके सौंदर्य की तुलना करने में ब्रह्मा जैसे महान कवि भी असमर्थ हैं। देवांगनाएं, आपके रूप के दर्शन की उत्सुकता में, कठिन तप करके शिव के समीप (सायुज्य) जाने का प्रयास करती हैं।

 

नरं वर्षीयांसं नयनविरसं नर्मसु जडं

तवापाङ्गालोके पतितमनुधावन्ति शतशः ।

गलद्वेणीबन्धाः कुचकलशविस्रस्तसिचया

हठात् त्रुट्यत्काञ्च्यो विगलितदुकूला युवतयः ॥ १३॥

 

भावार्थ:
आपकी एक अपांग दृष्टि (कृपा-दृष्टि) पड़ने मात्र से एक साधारण, वृद्ध या गंभीर पुरुष के पीछे असंख्य युवा स्त्रियां आकर्षित होकर दौड़ती हैं। उनकी वेणियां खुल जाती हैं, आभूषण गिर जाते हैं, और वे अपनी सुध-बुध खो देती हैं।

 

क्षितौ षट्पञ्चाशद् द्विसमधिकपञ्चाशदुदके

हुताशे द्वाषष्टिश्चतुरधिकपञ्चाशदनिले ।

दिवि द्विष्षट्त्रिंशन्मनसि च चतुष्षष्टिरिति ये

मयूखास्तेषामप्युपरि तव पादाम्बुजयुगम् ॥ १४॥

भावार्थ:
पृथ्वी पर 56, जल में 52, अग्नि में 62, वायु में 54 और आकाश में 72 कलाएं हैं। ये सभी देवी के चरणकमलों से प्रकट होती हैं और उनकी पवित्रता का वर्णन करती हैं। देवी का चरणकमल इन सभी कलाओं के ऊपर है।

 

शरज्ज्योत्स्नाशुद्धां शशियुतजटाजूटमकुटां

वरत्रासत्राणस्फटिकघटिकापुस्तककराम्।

सकृन्न त्वा नत्वा कथमिव सतां संन्निदधते

मधुक्षीरद्राक्षामधुरिमधुरीणाः भणितयः ॥ १५॥ var फणितयः

 

भावार्थ:
देवी का रूप शरद पूर्णिमा की चांदनी जैसा पवित्र है। वे चंद्रमा से सुशोभित जटाजूट धारण करती हैं। उनके हाथों में पुस्तक और माला है। एक बार उनकी वंदना करने से भक्तों के मुख से ऐसी मधुर वाणी निकलती है, जैसे शहद, दूध और अंगूर का स्वाद मिलकर घुला हो।

 

कवीन्द्राणां चेतःकमलवनबालातपरुचिं

भजन्ते ये सन्तः कतिचिदरुणामेव भवतीम् ।

विरिञ्चिप्रेयस्यास्तरुणतरशृङ्गारलहरी -

गभीराभिर्वाग्भिर्विदधति सतां रञ्जनममी ॥ १६॥

 

भावार्थ:
जो भक्त आपकी अरुण-रूपा शक्ति का ध्यान करते हैं, वे ब्रह्मा जैसे महान कवियों के समान हो जाते हैं। आपकी कृपा से उनकी वाणी गहरी और मधुर हो जाती है, जो सत्पुरुषों को प्रसन्न करती है और शृंगार रस से ओतप्रोत होती है।

 

सवित्रीभिर्वाचां शशिमणिशिलाभङ्गरुचिभिः

वशिन्याद्याभिस्त्वां सह जननि संचिन्तयति यः ।

स कर्ता काव्यानां भवति महतां भङ्गिरुचिभिः

वचोभिर्वाग्देवीवदनकमलामोदमधुरैः ॥ १७॥

 

भावार्थ:
जो भक्त वाग्देवी (सरस्वती) और अन्य देवियों के साथ आपकी आराधना करते हैं, वे अद्वितीय काव्य के रचयिता बनते हैं। उनकी वाणी सरस्वती की तरह सुगंधित और मधुर होती है, जिससे महान व्यक्तियों को आनंद मिलता है।

 

तनुच्छायाभिस्ते तरुणतरणिश्रीसरणिभिः

दिवं सर्वामुर्वीमरुणिमनि मग्नां स्मरति यः ।

भवन्त्यस्य त्रस्यद्वनहरिणशालीननयनाः

सहोर्वश्या वश्याः कति कति न गीर्वाणगणिकाः ॥ १८॥

 

भावार्थ:
देवी की आभा उगते हुए सूर्य की किरणों जैसी है। जो भक्त उनकी इस आभा का ध्यान करते हैं, वे इतने आकर्षक और प्रभावशाली हो जाते हैं कि स्वर्ग की अप्सराएं और देवांगनाएं भी उनके वश में हो जाती हैं।

 

मुखं बिन्दुं कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधो

हरार्धं ध्यायेद्यो हरमहिषि ते मन्मथकलाम् ।

स सद्यः संक्षोभं नयति वनिता इत्यतिलघु

त्रिलोकीमप्याशु भ्रमयति रवीन्दुस्तनयुगाम् ॥ १९॥

 

भावार्थ:
जो साधक देवी के श्रीचक्र का ध्यान करते हैं, जिसमें उनका मुख बिंदु और कुचयुग त्रिकोण है, वे तुरंत ही स्त्रियों के मन को आकर्षित कर लेते हैं। उनकी शक्ति इतनी अद्वितीय होती है कि वे संपूर्ण त्रिलोकी को मोहित कर सकते हैं।

 

किरन्तीमङ्गेभ्यः किरणनिकुरम्बामृतरसं

हृदि त्वामाधत्ते हिमकरशिलामूर्तिमिव यः ।

स सर्पाणां दर्पं शमयति शकुन्ताधिप इव

ज्वरप्लुष्टान् दृष्ट्या सुखयति सुधाधारसिरया ॥ २०॥

 

भावार्थ:
जो व्यक्ति देवी की अमृतमयी कृपा को अपने हृदय में धारण करता है, वह सर्पों के विष को शांत कर सकता है। उसकी दृष्टि मात्र से रोग और ज्वर दूर हो जाते हैं। देवी की कृपा उसे अमृतमयी शीतलता प्रदान करती है।

 

तटिल्लेखातन्वीं तपनशशिवैश्वानरमयीं

निषण्णां षण्णामप्युपरि कमलानां तव कलाम् ।

महापद्माटव्यां मृदितमलमायेन मनसा

महान्तः पश्यन्तो दधति परमाह्लादलहरीम् ॥ २१॥

 

भावार्थ:
देवी का स्वरूप बिजली की चमक जैसा तेजस्वी और सूर्य, चंद्र तथा अग्नि का सम्मिश्रण है। वे छह कमल चक्रों के ऊपर स्थित हैं। जो महापुरुष अपने मन को पवित्र कर इस स्वरूप का ध्यान करते हैं, उन्हें परमानंद की अनुभूति होती है।

 

भवानि त्वं दासे मयि वितर दृष्टिं सकरुणा -

मिति स्तोतुं वाञ्छन् कथयति भवानि त्वमिति यः ।

तदैव त्वं तस्मै दिशसि निजसायुज्यपदवीं

मुकुन्दब्रह्मेन्द्रस्फुटमकुटनीराजितपदाम् ॥ २२॥

 

भावार्थ:
जो भक्त करुणा के साथ "भवानी, मैं आपका दास हूं" कहकर आपकी प्रार्थना करता है, उसे तुरंत ही आपकी कृपा प्राप्त होती है। उसे ऐसा सायुज्य (समीपता) प्राप्त होता है जो भगवान विष्णु, ब्रह्मा, और इंद्र के चरणों की शोभा से भी अधिक गौरवशाली है।

 

त्वया हृत्वा वामं वपुरपरितृप्तेन मनसा

शरीरार्धं शम्भोरपरमपि शङ्के हृतमभूत् ।

यदेतत्त्वद्रूपं सकलमरुणाभं त्रिनयनं

कुचाभ्यामानम्रं कुटिलशशिचूडालमकुटम् ॥ २३॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपने शिव के आधे शरीर को ग्रहण कर लिया, परंतु लगता है कि इससे भी आपका मन संतुष्ट नहीं हुआ। इसलिए, आपने शिव के रूप और गुणों को भी अपने भीतर समाहित कर लिया। आपके त्रिनेत्र, चंद्रमा की अलंकृति और लाल आभा यह दर्शाते हैं।

 

जगत्सूते धाता हरिरवति रुद्रः क्षपयते

तिरस्कुर्वन्नेतत्स्वमपि वपुरीशस्तिरयति ।

सदापूर्वः सर्वं तदिदमनुगृह्णाति च शिव -

स्तवाज्ञामालम्ब्य क्षणचलितयोर्भ्रूलतिकयोः ॥ २४॥

 

भावार्थ:
ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, विष्णु पालन करते हैं, और रुद्र संहार करते हैं। शिव आपकी भृकुटि के संकेत पर इन सबको नियंत्रित करते हैं। आपकी आज्ञा से ही यह सृष्टि चक्र चलता है।

त्रयाणां देवानां त्रिगुणजनितानां तव शिवे

भवेत् पूजा पूजा तव चरणयोर्या विरचिता ।

तथा हि त्वत्पादोद्वहनमणिपीठस्य निकटे

स्थिता ह्येते शश्वन्मुकुलितकरोत्तंसमकुटाः ॥ २५॥

 

भावार्थ:
त्रिगुण (सत्व, रज, तम) से उत्पन्न ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा तभी पूर्ण होती है जब वह आपके चरणों की पूजा के साथ हो। ये देव सदा आपके मणि पीठ के निकट सिर झुकाए खड़े रहते हैं।

विरिञ्चिः पञ्चत्वं व्रजति हरिराप्नोति विरतिं

विनाशं कीनाशो भजति धनदो याति निधनम् ।

वितन्द्री माहेन्द्री विततिरपि संमीलितदृशा

महासंहारेऽस्मिन् विहरति सति त्वत्पतिरसौ ॥ २६॥

 

भावार्थ:
सृष्टि के अंत में ब्रह्मा नष्ट हो जाते हैं, विष्णु लय में चले जाते हैं, यमराज और कुबेर का भी अंत हो जाता है। सभी शक्तियां विलीन हो जाती हैं, लेकिन उस समय भी आपके पति शिव परम शांत और आनंदित रहते हैं।

 

जपो जल्पः शिल्पं सकलमपि मुद्राविरचना

गतिः प्रादक्षिण्यक्रमणमशनाद्याहुतिविधिः ।

प्रणामस्संवेशस्सुखमखिलमात्मार्पणदृशा

सपर्यापर्यायस्तव भवतु यन्मे विलसितम् ॥ २७॥

 

भावार्थ:
देवी की सेवा का हर रूप – चाहे वह जप हो, शिल्प हो, मुद्राएं हों, परिक्रमा हो, भोजन का अर्पण हो, प्रणाम हो, या ध्यान – सब उनका पूजन ही है। हर कार्य उनके प्रति समर्पण हो।

 

सुधामप्यास्वाद्य प्रतिभयजरामृत्युहरिणीं

विपद्यन्ते विश्वे विधिशतमखाद्या दिविषदः ।

करालं यत्क्ष्वेलं कबलितवतः कालकलना

न शम्भोस्तन्मूलं तव जननि ताटङ्कमहिमा ॥ २८॥

 

भावार्थ:
आपके ताटंक (कुंडल) की महिमा इतनी बड़ी है कि वह अमृत का सेवन करने वाले देवताओं को भी प्रभावित करती है। काल के भय से मुक्ति पाने में सक्षम वह कुंडल शिव की शक्ति का स्रोत है।

 

किरीटं वैरिञ्चं परिहर पुरः कैटभभिदः

कठोरे कोटीरे स्खलसि जहि जम्भारिमुकुटम् ।

प्रणम्रेष्वेतेषु प्रसभमुपयातस्य भवनं

भवस्याभ्युत्थाने तव परिजनोक्तिर्विजयते ॥ २९॥

 

भावार्थ:
आपके महल में प्रवेश करते समय ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र अपने मुकुट उतारकर विनम्रतापूर्वक प्रणाम करते हैं। यह आपके दिव्य गौरव और परिजनों की विजय का प्रमाण है।

 

स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाद्याभिरभितो

निषेव्ये नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति यः।

किमाश्चर्यं तस्य त्रिनयनसमृद्धिं तृणयतो

महासंवर्ताग्निर्विरचयति नीराजनविधिम्॥

 

भावार्थ:
जो साधक देवी को अणिमा आदि आठ सिद्धियों से घिरी हुई मानकर उनकी उपासना करता है, वह महान शक्तियों को भी तुच्छ समझता है। संहार काल का अग्नि भी उसकी पूजा के लिए दीपक की तरह काम करता है।

 

चतुष्षष्ट्या तन्त्रैः सकलमतिसंधाय भुवनं

स्थितस्तत्तत्सिद्धिप्रसवपरतन्त्रैः पशुपतिः ।

पुनस्त्वन्निर्बन्धादखिलपुरुषार्थैकघटना -

स्वतन्त्रं ते तन्त्रं क्षितितलमवातीतरदिदम् ॥ ३१॥

 

भावार्थ:
पशुपति (शिव) 64 तंत्रों के माध्यम से संसार को बांधते और साधनाओं द्वारा सिद्धियों की प्राप्ति करवाते हैं। परंतु हे माता, आपके आग्रह के कारण यह तंत्र सब पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को साधने वाला और स्वतंत्र है, जो संपूर्ण पृथ्वी पर विद्यमान है।

 

शिवः शक्तिः कामः क्षितिरथ रविः शीतकिरणः

स्मरो हंसः शक्रस्तदनु च परामारहरयः ।

अमी हृल्लेखाभिस्तिसृभिरवसानेषु घटिता

भजन्ते वर्णास्ते तव जननि नामावयवताम् ॥ ३२॥

भावार्थ:
शिव, शक्ति, कामदेव, पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, विष्णु, और इंद्र – ये सभी मिलकर देवी के नाम के अक्षरों का निर्माण करते हैं। आपकी महिमा इन हृल्लेखाओं (मंत्र स्वरूपों) में प्रकट होती है।

 

स्मरं योनिं लक्ष्मीं त्रितयमिदमादौ तव मनो -

र्निधायैके नित्ये निरवधिमहाभोगरसिकाः ।

भजन्ति त्वां चिन्तामणिगुननिबद्धाक्षवलयाः

शिवाग्नौ जुह्वन्तः सुरभिघृतधाराहुतिशतैः ॥ ३३॥

 

भावार्थ:
कामदेव, योनि, और लक्ष्मी – इन तीनों को अपने मन में स्थापित कर, साधक आपकी पूजा करते हैं। वे ध्यान में आपके मंत्रों का जाप करते हुए शिव के अग्नि में गंधयुक्त घी की आहुति देते हैं और अनंत भोगों का अनुभव करते हैं।

 

शरीरं त्वं शम्भोः शशिमिहिरवक्षोरुहयुगं

तवात्मानं मन्ये भगवति नवात्मानमनघम् ।

अतश्शेषश्शेषीत्ययमुभयसाधारणतयास्थितः

संबन्धो वां समरसपरानन्दपरयोः ॥ ३४॥

 

भावार्थ:
हे भगवती, आपका शरीर शिव का ही है। सूर्य और चंद्रमा उनके वक्षस्थल के प्रतीक हैं। आप दोनों का संबंध समान आनंद और समान सत्ता में स्थित है। यह संबंध समरसता और परमानंद का द्योतक है।

मनस्त्वं व्योम त्वं मरुदसि मरुत्सारथिरसि

त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि परिणतायां न हि परम् ।

त्वमेव स्वात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा

चिदानन्दाकारं शिवयुवति भावेन बिभृषे ॥ ३५॥

 

भावार्थ:
आप मन, आकाश, वायु, अग्नि, जल, और पृथ्वी – सब कुछ हैं। इन तत्वों में आपका ही विस्तार है। आप स्वयं को सृष्टि के रूप में प्रकट करती हैं और चिदानंद स्वरूप होकर शिव और शक्ति के मिलन का आदर्श प्रस्तुत करती हैं।

तवाज्ञाचक्रस्थं तपनशशिकोटिद्युतिधरं

परं शम्भुं वन्दे परिमिलितपार्श्वं परचिता ।

यमाराध्यन् भक्त्या रविशशिशुचीनामविषये

निरालोकेऽलोके निवसति हि भालोकभुवने ॥ ३६॥

 

भावार्थ:
आज्ञा चक्र में स्थित शिव, सूर्य और चंद्र की आभा से दमकते हैं। जो भक्त उन्हें भक्ति के साथ आराधना करते हैं, वे तीनों लोकों से परे, ब्रह्मलोक में निवास करते हैं।

विशुद्धौ ते शुद्धस्फटिकविशदं व्योमजनकं

शिवं सेवे देवीमपि शिवसमानव्यवसिताम् ।

ययोः कान्त्या यान्त्याः शशिकिरणसारूप्यसरणे -

विधूतान्तर्ध्वान्ता विलसति चकोरीव जगती ॥ ३७॥

 

भावार्थ:
विशुद्ध चक्र में स्फटिक के समान शुद्ध शिव और समान शक्ति का वास है। उनकी ज्योति से अंधकार नष्ट होता है और यह जगत चकोरी पक्षी की तरह उनकी चंद्रकिरणों का आनंद लेता है।

समुन्मीलत् संवित् कमलमकरन्दैकरसिकं

भजे हंसद्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम् ।

यदालापादष्टादशगुणितविद्यापरिणति -

र्यदादत्ते दोषाद् गुणमखिलमद्भ्यः पय इव ॥ ३८॥

 

भावार्थ:
मैं हंस रूपी शिव और शक्ति का ध्यान करता हूं, जो ज्ञान के कमल में वास करते हैं। उनके संवाद से 18 विद्याओं का विकास होता है। वे दोषों को गुणों में परिवर्तित कर लेते हैं, जैसे जल से अमृत निकाल लिया जाता है।

 

तव स्वाधिष्ठाने हुतवहमधिष्ठाय निरतं

तमीडे संवर्तं जननि महतीं तां च समयाम् ।

यदालोके लोकान् दहति महति क्रोधकलिते

दयार्द्रा या दृष्टिः शिशिरमुपचारं रचयति ॥ ३९॥

 

भावार्थ:
स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित अग्नि को मैं प्रणाम करता हूं। यह अग्नि क्रोध से संसार को जला देती है, लेकिन आपकी करुणा से वह शीतल हो जाती है और सभी को शांति प्रदान करती है।

 

तटित्त्वन्तं शक्त्या तिमिरपरिपन्थिस्फुरणया

स्फुरन्नानारत्नाभरणपरिणद्धेन्द्रधनुषम् ।

तव श्यामं मेघं कमपि मणिपूरैकशरणं

निषेवे वर्षन्तं हरमिहिरतप्तं त्रिभुवनम् ॥ ४०॥

 

भावार्थ:
मणिपूर चक्र में स्थित देवी का स्वरूप काले मेघ की तरह है, जो बिजली के समान चमकता है। वह इंद्रधनुष और रत्नाभूषणों से सुशोभित है। यह मेघ तीनों लोकों की तपन को शांत करता है और शीतलता प्रदान करता है।

 

तवाधारे मूले सह समयया लास्यपरया

नवात्मानं मन्ये नवरसमहाताण्डवनटम् ।

उभाभ्यामेताभ्यामुदयविधिमुद्दिश्य दयया

सनाथाभ्यां जज्ञे जनकजननीमज्जगदिदम् ॥ ४१॥

 

भावार्थ:
मूलाधार चक्र में, जहां देवी समय (कुंडलिनी शक्ति) के साथ लास्य नृत्य करती हैं, मैं शिव को नव रसों के महा तांडव नृत्य के रूप में देखता हूं। शिव और शक्ति, दोनों अपनी दया से इस संसार को जन्म देते हैं और इसे सजीव बनाते हैं।

 

सौन्दर्यलहरीगतैर्माणिक्यत्वं

गगनमणिभिः सान्द्रघटितं

किरीटं ते हैमं हिमगिरिसुते कीर्तयति यः ।

स नीडेयच्छायाच्छुरणशबलं चन्द्रशकलं

धनुः शौनासीरं किमिति न निबध्नाति धिषणाम् ॥ ४२॥

 

भावार्थ:
हे हिमगिरि की पुत्री, आपके स्वर्ण मुकुट को जो कोई गगनमणि (रत्नों) से युक्त वर्णन करता है, वह समझ सकता है कि वह मुकुट चंद्रमा के आकार का धनुष भी है, जो ज्ञान और सौंदर्य को संजोकर रखता है।

 

धुनोतु ध्वान्तं नस्तुलितदलितेन्दीवरवनं

घनस्निग्धश्लक्ष्णं चिकुरनिकुरुम्बं तव शिवे ।

यदीयं सौरभ्यं सहजमुपलब्धुं सुमनसो

वसन्त्यस्मिन् मन्ये वलमथनवाटीविटपिनाम् ॥ ४३॥

 

भावार्थ:
हे शिवे, आपके काले घने और कोमल केशराशि, जो दलित नीलकमल के वन के समान हैं, हमारे अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट करें। इन केशों से जो सुगंध निकलती है, उसे अनुभव करने के लिए देवगण उसमें वास करते हैं।

 

तनोतु क्षेमं नस्तव वदनसौन्दर्यलहरी -

परीवाहस्रोतःसरणिरिव सीमन्तसरणिः ।

वहन्ती सिन्दूरं प्रबलकबरीभारतिमिर -

द्विषां वृन्दैर्बन्दीकृतमिव नवीनार्ककिरणम् ॥ ४४॥

 

भावार्थ:
आपके सौंदर्य का प्रवाह, आपके सिर की मांग (सिंदूर युक्त रेखा) के समान, सूर्य की किरणों जैसा तेजस्वी और अंधकार को नष्ट करने वाला है। यह हमें शुभ और कल्याण प्रदान करे।

 

अरालैः स्वाभाव्यादलिकलभसश्रीभिरलकैः

परीतं ते वक्त्रं परिहसति पङ्केरुहरुचिम् ।

दरस्मेरे यस्मिन् दशनरुचिकिञ्जल्करुचिरे

सुगन्धौ माद्यन्ति स्मरदहनचक्षुर्मधुलिहः ॥ ४५॥

 

भावार्थ:
आपके घुंघराले केशों की शोभा आपके मुख को इस प्रकार सुशोभित करती है कि वह कमल के सौंदर्य को भी परिहास करता है। आपके दांतों की सुंदरता और मुख की सुगंध कामदेव के भ्रमर रूपी आंखों को भी मोहित कर देती है।

 

ललाटं लावण्यद्युतिविमलमाभाति तव य-

द्द्वितीयं तन्मन्ये मकुटघटितं चन्द्रशकलम् ।

विपर्यासन्यासादुभयमपि संभूय च मिथः

सुधालेपस्यूतिः परिणमति राकाहिमकरः ॥ ४६॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपका ललाट इतनी अद्भुत आभा से युक्त है कि वह चंद्रमा के समान प्रतीत होता है। आपका मुकुट और ललाट दोनों मिलकर पूर्णिमा के चंद्रमा की छवि प्रस्तुत करते हैं।

 

भ्रुवौ भुग्ने किंचिद्भुवनभयभङ्गव्यसनिनि

त्वदीये नेत्राभ्यां मधुकररुचिभ्यां धृतगुणम् ।

धनुर्मन्ये सव्येतरकरगृहीतं रतिपतेः

प्रकोष्ठे मुष्टौ च स्थगयति निगूढान्तरमुमे ॥ ४७॥

 

भावार्थ:
हे उमादेवी, आपके धनुष के समान भौंहें और मधुकर (भौंरों) के समान नेत्र, संसार के भय को नष्ट करने वाले हैं। ये भौंहें मानो कामदेव के धनुष का प्रतीक हैं, जो उनकी विजय का कारण बनती हैं।

 

अहः सूते सव्यं तव नयनमर्कात्मकतया

त्रियामां वामं ते सृजति रजनीनायकतया ।

तृतीया ते दृष्टिर्दरदलितहेमाम्बुजरुचिः

समाधत्ते संध्यां दिवसनिशयोरन्तरचरीम् ॥ ४८॥

 

भावार्थ:
आपका दाहिना नेत्र सूर्य के समान दिन की उत्पत्ति करता है, जबकि बायां नेत्र चंद्रमा के समान रात्रि की सृष्टि करता है। आपका तीसरा नेत्र, जो सोने के कमल की भांति है, संध्या का निर्माण करता है, जो दिन और रात के बीच संतुलन बनाता है।

 

विशाला कल्याणी स्फुटरुचिरयोध्या कुवलयैः

कृपाधाराधारा किमपि मधुराभोगवतिका ।

अवन्ती दृष्टिस्ते बहुनगरविस्तारविजया

ध्रुवं तत्तन्नामव्यवहरणयोग्या विजयते ॥ ४९॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपकी दृष्टि विशाल, कल्याणकारी और अत्यंत मधुर है। यह दृष्टि कृपा से भरपूर है और आपके नगरों (लोकों) की रक्षा करती है। आपकी दृष्टि की महिमा निश्चित ही सभी नामों और कार्यों में विजय दिलाती है।

 

कवीनां संदर्भस्तबकमकरन्दैकरसिकं

कटाक्षव्याक्षेपभ्रमरकलभौकर्णयुगलम् ।

अमुञ्चन्तौ दृष्ट्वा तव नवरसास्वादतरला -

वसूयासंसर्गादलिकनयनं किंचिदरुणम् ॥ ५०॥

 

भावार्थ:
आपके कटाक्ष भ्रमर के समान हैं, जो कवियों के भाव और रस में डूबे रहते हैं। आपकी नज़र की कोमलता और रसिकता को देखकर भी ये भ्रमर आपको छोड़ते नहीं। आपके नेत्रों में एक अद्भुत लाली है, जो ईर्ष्या का भी परिहार करती है।

 

शिवे शृङ्गारार्द्रा तदितरजने कुत्सनपरा

सरोषा गङ्गायां गिरिशचरिते विस्मयवती । (गिरिशनयने )

हराहिभ्यो भीता सरसिरुहसौभाग्यजननी (जयिनी )

सखीषु स्मेरा ते मयि जननी दृष्टिः सकरुणा ॥ ५१॥

भावार्थ:
हे शिवा, आपकी दृष्टि शिव के लिए प्रेममयी और दूसरों के लिए उपेक्षा से भरी है। गंगा को देखकर आप क्रोधित हो जाती हैं, पर शिव के कार्यों में विस्मित हो जाती हैं। आप हर (शिव) के नागों से डरती हैं और कमल के सौंदर्य की जननी हैं। सखियों के साथ आप हंसती हैं, परंतु मुझ पर आपकी दृष्टि हमेशा करुणा से भरी रहती है।

 

गते कर्णाभ्यर्णं गरुत इव पक्ष्माणि दधती

पुरां भेत्तुश्चित्तप्रशमरसविद्रावणफले ।

इमे नेत्रे गोत्राधरपतिकुलोत्तंसकलिके

तवाकर्णाकृष्टस्मरशरविलासं कलयतः ॥ ५२॥

भावार्थ:
हे देवी, आपके नेत्र पलकों को गरुड़ के पंखों के समान धारण करते हुए कामदेव के बाणों की ओर संकेत करते हैं। ये नेत्र शिव के हृदय को शांति प्रदान करते हैं और संसार में प्रेम व आनंद का प्रसार करते हैं।

विभक्तत्रैवर्ण्यं व्यतिकरितलीलाञ्जनतया

विभाति त्वन्नेत्रत्रितयमिदमीशानदयिते ।

पुनः स्रष्टुं देवान् द्रुहिणहरिरुद्रानुपरतान्

रजः सत्त्वं बिभ्रत्तम इति गुणानां त्रयमिव ॥ ५३॥

भावार्थ:
हे ईशान की प्रिया, आपके तीन नेत्र त्रिगुणों (रज, सत्व, तम) का प्रतीक हैं। रज गुण से ब्रह्मा की सृष्टि, सत्व से विष्णु का पालन और तम से शिव का संहार कार्य संपन्न होता है।

पवित्रीकर्तुं नः पशुपतिपराधीनहृदये

दयामित्रैर्नेत्रैररुणधवलश्यामरुचिभिः ।

नदः शोणो गङ्गा तपनतनयेति ध्रुवममुं

त्रयाणां तीर्थानामुपनयसि संभेदमनघम् ॥ ५४॥

 

भावार्थ:
हे पशुपति की अधीनता को दर्शाने वाली देवी, आपके नेत्रों का रंग (लाल, सफेद, और काला) गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का संगम है। यह संगम हमें पवित्र बनाता है और मोक्ष का मार्ग दिखाता है।

 

निमेषोन्मेषाभ्यां प्रलयमुदयं याति जगती

तवेत्याहुः सन्तो धरणिधरराजन्यतनये ।

त्वदुन्मेषाज्जातं जगदिदमशेषं प्रलयतः

परित्रातुं शङ्के परिहृतनिमेषास्तव दृशः ॥ ५५॥

 

भावार्थ:
हे हिमालय की पुत्री, आपके नेत्रों के खुलने से सृष्टि का उदय और बंद होने से प्रलय होता है। संत कहते हैं कि आपकी दृष्टि का बिना झपकना इस जगत की रक्षा के लिए है।

 

तवापर्णे कर्णेजपनयनपैशुन्यचकिता

निलीयन्ते तोये नियतमनिमेषाः शफरिकाः ।

इयं च श्रीर्बद्धच्छदपुटकवाटं कुवलयम्

जहाति प्रत्यूषे निशि च विघटय्य प्रविशति ॥ ५६॥

 

भावार्थ:
हे अपर्णा, आपकी कानों तक पहुंचने वाली दृष्टि को देखकर मछलियां (शफरिकाएं) पानी में छिप जाती हैं। लक्ष्मी, जो बंद कुमुदिनी (नील कमल) के समान है, रात में उसमें प्रवेश करती है और दिन में उसे छोड़ देती है।

 

दृशा द्राघीयस्या दरदलितनीलोत्पलरुचा

दवीयांसं दीनं स्नपय कृपया मामपि शिवे ।

अनेनायं धन्यो भवति न च ते हानिरियता

वने वा हर्म्ये वा समकरनिपातो हिमकरः ॥ ५७॥

भावार्थ:
हे शिवे, आपकी दृष्टि, जो नीले कमल की सुंदरता से भी श्रेष्ठ है, दीन-दुखियों पर कृपा करती है। इस कृपा से सभी धन्य हो जाते हैं, जैसे चंद्रमा की किरणें वनों और महलों में समान रूप से प्रकाश फैलाती हैं।

अरालं ते पालीयुगलमगराजन्यतनये

तिरश्चीनो यत्र श्रवणपथमुल्लङ्घ्य विलस -

न्नपाङ्गव्यासङ्गो दिशति शरसंधानधिषणाम् ॥ ५८॥

 

भावार्थ:
हे नागराज की पुत्री, आपकी भौंहें धनुष के समान सुंदर हैं। आपके कटाक्ष, कानों के मार्ग को पार करते हुए, कामदेव के बाण को लक्ष्य तक पहुंचाने में सहायक होते हैं।

 

स्फुरद्गण्डाभोगप्रतिफलितताटङ्कयुगलं

चतुश्चक्रं मन्ये तव मुखमिदं मन्मथरथम् ।

यमारुह्य द्रुह्यत्यवनिरथमर्केन्दुचरणं

महावीरो मारः प्रमथपतये सज्जितवते ॥ ५९॥

 

भावार्थ:
आपके गालों पर झिलमिलाते झुमके, आपके मुख को कामदेव के रथ के रूप में दिखाते हैं। इस रथ पर सवार होकर कामदेव, शिव के हृदय को जीतने का प्रयास करता है।

 

सरस्वत्याः सूक्तीरमृतलहरीकौशलहरीः

पिबन्त्याः शर्वाणि श्रवणचुलुकाभ्यामविरलम् ।

चमत्कारश्लाघाचलितशिरसः कुण्डलगणो

झणत्कारैस्तारैः प्रतिवचनमाचष्ट इव ते ॥ ६०॥

 

भावार्थ:
हे शर्वाणि, आपके कान सरस्वती के अमृतमयी वचनों को सुनते हैं। आपके झुमके, उनकी मधुर ध्वनि से झंकृत होते हुए, मानो उत्तर दे रहे हों।

 

असौ नासावंशस्तुहिनगिरिवंशध्वजपटि

त्वदीयो नेदीयः फलतु फलमस्माकमुचितम् ।

वहन्नन्तर्मुक्ताः शिशिरतरनिश्वासगलितं

समृद्ध्या यत्तासां बहिरपि च मुक्तामणिधरः ॥ ६१॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपकी नासिका हिमालय की ध्वजा जैसी है, जो मोतियों से भरी हुई है। यह नासिका आपकी शीतल सांसों से और अधिक सुंदर हो जाती है, जैसे बाहरी मोती आपकी दिव्यता को और भी अधिक बढ़ाते हैं।

 

प्रकृत्या रक्तायास्तव सुदति दन्तच्छदरुचेः

प्रवक्ष्ये सादृश्यं जनयतु फलं विद्रुमलता ।

न बिम्बं तद्बिम्बप्रतिफलनरागादरुणितं

तुलामध्यारोढुं कथमिव विलज्जेत कलया ॥ ६२॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपके दांतों की प्राकृतिक लाली प्रवाल (मूंगा) के समान है। वह बिम्ब (लाल फल) की सुंदरता को भी लज्जित कर देती है, क्योंकि आपकी मुस्कान का तेज उसमें परावर्तित होता है।

 

स्मितज्योत्स्नाजालं तव वदनचन्द्रस्य पिबतां

चकोराणामासीदतिरसतया चञ्चुजडिमा ।

अतस्ते शीतांशोरमृतलहरीमम्लरुचयः

पिबन्ति स्वच्छन्दं निशि निशि भृशं काञ्जिकधिया ॥ ६३॥

 

भावार्थ:
आपके मुखचंद्र की मुस्कान से निकलने वाली चांदनी को पीने वाले चकोर पक्षी अधिकता से अपने चोंच को थका लेते हैं। इसलिए वे चंद्रमा के अमृत को भी खटास भरे जल (काञ्जिक) की तरह मानते हैं और आपकी मुस्कान के आगे सब फीका लगता है।

 

अविश्रान्तं पत्युर्गुणगणकथाम्रेडनजपा

जपापुष्पच्छाया तव जननि जिह्वा जयति सा ।

यदग्रासीनायाः स्फटिकदृषदच्छच्छविमयी

सरस्वत्या मूर्तिः परिणमति माणिक्यवपुषा ॥ ६४॥

 

भावार्थ:
हे माँ, आपकी जिह्वा हमेशा शिव के गुणों का जाप करती रहती है। वह जपाकुसुम (लाल फूल) के समान सुंदर है। सरस्वती की सफेद मूर्ति, आपकी जिह्वा की संगति में, लाल माणिक्य के समान दिखने लगती है।

 

रणे जित्वा दैत्यानपहृतशिरस्त्रैः कवचिभिर् -

निवृत्तैश्चण्डांशत्रिपुरहरनिर्माल्यविमुखैः ।

विशाखेन्द्रोपेन्द्रैः शशिविशदकर्पूरशकला

विलीयन्ते मातस्तव वदनताम्बूलकबलाः ॥ ६५॥

 

भावार्थ:
हे माता, युद्ध में दैत्यों के सिरों को जीतने के बाद, विष्णु, इंद्र, और अन्य देवता आपके ताम्बूल (पान) के लिए लालायित रहते हैं। यह ताम्बूल चंद्रमा की शीतलता और कपूर की पवित्रता से परिपूर्ण है।

 

विपञ्च्या गायन्ती विविधमपदानं पशुपतेः

त्वयारब्धे वक्तुं चलितशिरसा साधुवचने ।

तदीयैर्माधुर्यैरपलपिततन्त्रीकलरवांनिजां

वीणां वाणी निचुलयति चोलेन निभृतम् ॥ ६६॥

भावार्थ:
जब आप शिव के गुणगान में विविध राग गाती हैं, तो सरस्वती अपनी वीणा को दबा देती हैं, क्योंकि आपकी मधुरता के सामने उनकी वीणा की ध्वनि फीकी पड़ जाती है।

कराग्रेण स्पृष्टं तुहिनगिरिणा वत्सलतया

गिरीशेनोदस्तं मुहुरधरपानाकुलतया ।

करग्राह्यं शम्भोर्मुखमुकुरवृन्तं गिरिसुते

कथङ्कारं ब्रूमस्तव चिबुकमौपम्यरहितम् ॥ ६७॥

 

भावार्थ:
हे पर्वतराजकुमारी, आपका ठुड्डी (चिबुक) अद्वितीय है। शिव इसे बार-बार अपने हाथों से स्पर्श करते हैं। यह ठुड्डी आपकी सुंदरता का ऐसा हिस्सा है जिसे किसी भी चीज़ से तुलना करना असंभव है।

 

भुजाश्लेषान्नित्यं पुरदमयितुः कण्टकवती

तव ग्रीवा धत्ते मुखकमलनालश्रियमियम् ।

स्वतः श्वेता कालागुरुबहुलजम्बालमलिना

मृणालीलालित्यम् वहति यदधो हारलतिका ॥ ६८॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपकी गर्दन हमेशा शिव के आलिंगन से सजी रहती है। यह गर्दन कमल के डंठल की सुंदरता को धारण करती है और आपके हार से सुशोभित होती है, जो इसकी शोभा को और बढ़ाता है।

 

गले रेखास्तिस्रो गतिगमकगीतैकनिपुणे

विवाहव्यानद्धप्रगुणगुणसंख्याप्रतिभुवः ।

विराजन्ते नानाविधमधुररागाकरभुवां

त्रयाणां ग्रामाणां स्थितिनियमसीमान इव ते ॥ ६९॥

 

भावार्थ:
आपकी गर्दन पर तीन रेखाएँ हैं, जो शिव और आपकी शादी की पवित्र गांठ का प्रतीक हैं। ये रेखाएँ संगीत के तीन सुरों (ग्रामों) की सीमाओं को दर्शाती हैं, जो मधुरता और सौंदर्य का आधार हैं।

 

मृणालीमृद्वीनां तव भुजलतानां चतसृणां

चतुर्भिः सौन्दर्यं सरसिजभवः स्तौति वदनैः ।

नखेभ्यः सन्त्रस्यन् प्रथममथनादन्धकरिपो -

श्चतुर्णां शीर्षाणां सममभयहस्तार्पणधिया ॥ ७०॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपकी चारों भुजाओं की कोमलता मृणाल (कमल के तने) के समान है। ब्रह्मा अपने चार मुखों से आपके इन भुजाओं के सौंदर्य की स्तुति करते हैं। कामदेव, शिव के क्रोध से भयभीत होकर, आपके हाथों में शरण लेते हैं।

 

नखानामुद्द्योतैर्नवनलिनरागं विहसतां

कराणां ते कान्तिं कथय कथयामः कथमुमे ।

कयाचिद्वा साम्यं भजतु कलया हन्त कमलं

यदि क्रीडल्लक्ष्मीचरणतललाक्षारुणदलम् ॥ ७१॥

 

भावार्थ:
हे उमा, आपके नाखूनों की चमक से आपके हाथ नव-विकसित कमल के समान दमकते हैं। हम आपकी हथेलियों की तुलना कैसे कर सकते हैं? कमल कुछ हद तक समानता रख सकता है, लेकिन केवल तभी जब वह लक्ष्मी के चरणों के लाल रंग (लाक्षा) से सजा हो।

 

समं देवि स्कन्दद्विपवदनपीतं स्तनयुगं

तवेदं नः खेदं हरतु सततं प्रस्नुतमुखम् ।

यदालोक्याशङ्काकुलितहृदयो हासजनकः

स्वकुम्भौ हेरम्बः परिमृशति हस्तेन झडिति ॥ ७२॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपका स्तनयुगल समान और परिपूर्ण है, जो सदैव अमृतधारा से परिपूर्ण रहता है। यह देखकर गणेशजी अपने हाथी जैसे मुख की कुंभाकार गालों को छूकर हंसते हैं, मानो उनका आकार आपके स्तनों से मिल रहा हो।

 

अमू ते वक्षोजावमृतरसमाणिक्यकुतुपौ

न संदेहस्पन्दो नगपतिपताके मनसि नः ।

पिबन्तौ तौ यस्मादविदितवधूसङ्गरसिकौ

कुमारावद्यापि द्विरदवदनक्रौञ्चदलनौ ॥ ७३॥

 

भावार्थ:
हे पर्वतराजकन्या, आपके स्तन अमृत के कुंभ और मणिक्य के पात्र जैसे हैं। इनका आनंद लेने वाले स्कंद (कार्तिकेय) और गणेशजी वधू-संग का अनुभव नहीं कर पाए, क्योंकि वे बचपन से ही ब्रह्मचारी हैं।

 

वहत्यम्ब स्तम्बेरमदनुजकुम्भप्रकृतिभिः

समारब्धां मुक्तामणिभिरमलां हारलतिकाम् ।

कुचाभोगो बिम्बाधररुचिभिरन्तः शबलितां

प्रतापव्यामिश्रां पुरदमयितुः कीर्तिमिव ते ॥ ७४॥

 

भावार्थ:
हे माँ, आपके स्तन हारों से सुशोभित हैं, जो मोतियों से सजे हुए हैं। उनकी आभा लाल बिम्ब फल जैसी है। शिव की महिमा की तरह वे सौंदर्य और प्रताप का अनोखा मिश्रण हैं।

 

तव स्तन्यं मन्ये धरणिधरकन्ये हृदयतः

पयःपारावारः परिवहति सारस्वतमिव ।

दयावत्या दत्तं द्रविडशिशुरास्वाद्य तव यत्

कवीनां प्रौढानामजनि कमनीयः कवयिता ॥ ७५॥

 

भावार्थ:
हे पार्वती, आपके स्तनों से प्रवाहित दूध मुझे ऐसा प्रतीत होता है, मानो वह ज्ञान का महासागर हो। जब आपने वह दूध तमिल बालक (आदि शंकराचार्य) को पिलाया, तब उनके अंदर महान कवि बनने का गुण उत्पन्न हुआ।

 

हरक्रोधज्वालावलिभिरवलीढेन वपुषा

गभीरे ते नाभीसरसि कृतसङ्गो मनसिजः ।

समुत्तस्थौ तस्मादचलतनये धूमलतिका

जनस्तां जानीते तव जननि रोमावलिरिति ॥ ७६॥

 

भावार्थ:
हे माता, आपकी गहरी नाभि में शिव के क्रोध की ज्वाला से जलता हुआ कामदेव प्रवेश करता है। वहां से एक धुएं की लता (रोमावली) के रूप में बाहर आता है, जो आपकी दिव्य सुन्दरता को और बढ़ाती है।

 

यदेतत् कालिन्दीतनुतरतरङ्गाकृति शिवे

कृशे मध्ये किंचिज्जननि तव यद्भाति सुधियाम् ।

विमर्दादन्योऽन्यं कुचकलशयोरन्तरगतं

तनूभूतं व्योम प्रविशदिव नाभिं कुहरिणीम् ॥ ७७॥

 

भावार्थ:
हे शिवे, आपकी पतली कमर यमुना के छोटे-छोटे तरंगों की तरह प्रतीत होती है। यह कमर आपके स्तनों और नाभि के बीच इतनी कोमल और क्षीण है कि लगता है जैसे आकाश भी उसमें समा सकता है।

 

स्थिरो गङ्गावर्तः स्तनमुकुलरोमावलिलता -

कलावालं कुण्डं कुसुमशरतेजोहुतभुजः ।

रतेर्लीलागारं किमपि तव नाभिर्गिरिसुते

बिलद्वारं सिद्धेर्गिरिशनयनानां विजयते ॥ ७८॥

 

भावार्थ:
हे गिरिसुते, आपकी नाभि स्थिर गंगा की धारा के समान है। यह कामदेव का खेलघर और सिद्धियों का द्वार है। शिव के नेत्र भी आपकी नाभि की अद्भुत सुंदरता का अनुभव करते हैं।

 

निसर्गक्षीणस्य स्तनतटभरेण क्लमजुषो

नमन्मूर्तेर्नारीतिलक शनकैस्त्रुट्यत इव ।

चिरं ते मध्यस्य त्रुटिततटिनीतीरतरुणा

समावस्थास्थेम्नो भवतु कुशलं शैलतनये ॥ ७९॥

भावार्थ:
हे शैलपुत्री, आपकी कमर पतली और कोमल है। स्तनों के भार को सहते हुए वह ऐसी प्रतीत होती है मानो टूटने वाली हो। कामना है कि आपकी यह दिव्य आकृति सदैव स्वस्थ और स्थिर रहे।

 

कुचौ सद्यःस्विद्यत्तटघटितकूर्पासभिदुरौ

कषन्तौ दोर्मूले कनककलशाभौ कलयता

तव त्रातुं भङ्गादलमिति वलग्नं तनुभुवा

त्रिधा नद्धं देवि त्रिवलि लवलीवल्लिभिरिव ॥ ८०॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपके स्तन सोने के कलश के समान चमकते हैं और आपकी तंग वक्षस्थली के कारण कमर पर तीन रेखाएँ (त्रिवलि) उभर आती हैं। ये रेखाएँ आपकी कमर को सहारा देती हुई प्रतीत होती हैं, जैसे बेल किसी स्तंभ से लिपटी हो।

 

गुरुत्वं विस्तारं क्षितिधरपतिः पार्वति निजा -

न्नितम्बादाच्छिद्य त्वयि हरणरूपेण निदधे ।

अतस्ते विस्तीर्णो गुरुरयमशेषां वसुमतीं

नितम्बप्राग्भारः स्थगयति लघुत्वं नयति च ॥ ८१॥

 

भावार्थ:
हे पार्वती, आपके नितम्ब (कमर) की व्यापकता और भारीपन को पर्वतराज हिमालय ने स्वयं अपनी स्थिरता और विस्तार से जोड़ा है। यही कारण है कि आपकी सुंदरता वसुंधरा (धरती) के गुरुत्व (गंभीरता) को भी पीछे छोड़ देती है और उसे लघु प्रतीत कराती है।

 

करीन्द्राणां शुण्डान् कनककदलीकाण्डपटली -

मुभाभ्यामूरुभ्यामुभयमपि निर्जित्य भवती ।

सुवृत्ताभ्यां पत्युः प्रणतिकठिनाभ्यां गिरिसुते

विजिग्ये जानुभ्यां विबुधकरिकुम्भद्वयमसि ॥ ८२॥

 

भावार्थ:
हे गिरिसुते, आपके सुवर्ण के केले के तनों जैसे गोल-मटोल और सुदृढ़ जांघें, हाथी की सूंड और कठोर पर्वत को भी परास्त कर देती हैं। आपके घुटने, जो शिव की प्रार्थना के लिए झुके रहते हैं, देवताओं के हाथियों के मस्तकों को भी जीत लेते हैं।

 

पराजेतुं रुद्रं द्विगुणशरगर्भौ गिरिसुते

निषङ्गौ जङ्घे ते विषमविशिखो बाढमकृत ।

यदग्रे दृश्यन्ते दशशरफलाः पादयुगली -

नखाग्रच्छद्मानः सुरमकुटशाणैकनिशिताः ॥ ८३॥

 

भावार्थ:
हे गिरिसुते, आपकी जांघें ऐसे प्रतीत होती हैं जैसे रुद्र को पराजित करने के लिए कामदेव ने अपने दो तीक्ष्ण बाणों को संधान किया हो। आपके चरण नखों से सुसज्जित हैं, जो स्वर्ग के मुकुटों को काटने वाले तीक्ष्ण पत्थरों की तरह चमकते हैं।

 

श्रुतीनां मूर्धानो दधति तव यौ शेखरतया

ममाप्येतौ मातः शिरसि दयया धेहि चरणौ ।

ययोः पाद्यं पाथः पशुपतिजटाजूटतटिनी

ययोर्लाक्षालक्ष्मीररुणहरिचूडामणिरुचिः ॥ ८४॥

 

भावार्थ:
हे माता, आपके चरणों को वेद भी अपने सिर पर धारण करते हैं। कृपया उन चरणों को मेरे सिर पर भी स्थान दें। आपके चरण, जिनका जल गंगा है और जिनकी लाली स्वर्ण और मणियों के समान चमकती है, मेरे लिए परम पूजनीय हैं।

 

नमोवाकं ब्रूमो नयनरमणीयाय पदयो -

स्तवास्मै द्वन्द्वाय स्फुटरुचिरसालक्तकवते ।

असूयत्यत्यन्तं यदभिहननाय स्पृहयते

पशूनामीशानः प्रमदवनकङ्केलितरवे ॥ ८५॥

 

भावार्थ:
हे देवी, हम आपके उन सुंदर और लालिमायुक्त चरणों को प्रणाम करते हैं, जो देखने में अत्यंत मनोहर हैं। शिव, जो पशुपति हैं, भी इन चरणों को स्पर्श करने के लिए लालायित रहते हैं और ईर्ष्या करते हैं।

 

मृषा कृत्वा गोत्रस्खलनमथ वैलक्ष्यनमितं

ललाटे भर्तारं चरणकमले ताडयति ते ।

चिरादन्तःशल्यं दहनकृतमुन्मूलितवता

तुलाकोटिक्वाणैः किलिकिलितमीशानरिपुणा ॥ ८६॥

 

भावार्थ:
आपके चरणों ने शिव के ललाट को स्पर्श किया और उनके भीतर छिपे हुए कामदेव के तीरों को बाहर निकाल दिया। आपके इस चरण-स्पर्श ने उनके भीतर वर्षों से जल रही पीड़ा को शीतलता प्रदान की।

 

हिमानीहन्तव्यं हिमगिरिनिवासैकचतुरौ

निशायां निद्राणं निशि चरमभागे च विशदौ ।

वरं लक्ष्मीपात्रं श्रियमतिसृजन्तौ समयिनां

सरोजं त्वत्पादौ जननि जयतश्चित्रमिह किम् ॥ ८७॥

 

भावार्थ:
हे हिमालय की वासिनी, आपके चरण बर्फ से भी ठंडे और कमल के समान सौम्य हैं। ये रात में भी स्पष्ट और प्रकाशमान रहते हैं। ये चरण साधकों के लिए लक्ष्मी का वरदान और निर्धनों के लिए धन का स्रोत हैं।

 

पदं ते कीर्तीनां प्रपदमपदं देवि विपदां

कथं नीतं सद्भिः कठिनकमठीकर्परतुलाम् ।

कथं वा बाहुभ्यामुपयमनकाले पुरभिदा

यदादाय न्यस्तं दृषदि दयमानेन मनसा ॥ ८८॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपके चरण कीर्ति का स्थान हैं और विपत्तियों को दूर करते हैं। शिव ने इन्हें अपनी बाहुओं में धारण करके चट्टान पर स्थापित किया, जो उनकी अपार श्रद्धा और प्रेम को दर्शाता है।

 

नखैर्नाकस्त्रीणां करकमलसंकोचशशिभि -

स्तरूणां दिव्यानां हसत इव ते चण्डि चरणौ ।

फलानि स्वःस्थेभ्यः किसलयकराग्रेण ददतां

दरिद्रेभ्यो भद्रां श्रियमनिशमह्नाय ददतौ ॥ ८९॥

 

भावार्थ:
हे चंडी, आपके चरणों के नख चंद्रमा के समान चमकते हैं, जो स्वर्ग की स्त्रियों के कमल जैसे हाथों को भी लज्जित कर देते हैं। आपके चरण, जैसे पेड़ों को फल प्रदान करते हैं, वैसे ही निर्धनों को धन और कल्याण प्रदान करते हैं।

 

ददाने दीनेभ्यः श्रियमनिशमाशानुसदृशी -

ममन्दं सौन्दर्यप्रकरमकरन्दम् विकिरति ।

तवास्मिन् मन्दारस्तबकसुभगे यातु चरणे

निमज्जन्मज्जीवः करणचरणः षट्चरणताम् ॥ ९०॥

 

भावार्थ:
हे माता, आपके चरणों की सुगंध मंदर के पुष्पों के समान है। ये चरण निरंतर निर्धनों को धन और साधकों को आनंद प्रदान करते हैं। मेरी आत्मा (मक्खी के समान) इन चरणों में डूबकर सच्ची भक्ति और मुक्ति का अनुभव करे।

 

पदन्यासक्रीडापरिचयमिवारब्धुमनसःस्खलन्तस्ते

खेलं भवनकलहंसा न जहति ।

अतस्तेषां शिक्षां सुभगमणिमञ्जीररणित -

च्छलादाचक्षाणं चरणकमलं चारुचरिते ॥ ९१॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपके चरणों की नृत्य कला इतनी आकर्षक है कि वह मनुष्य के मन को आसक्त कर लेती है। आपके चरणों की नर्तन में बसी मणियों की झंकार से ज्ञान और भक्ति की सिख मिलती है। उनके प्रति कृतज्ञता और प्रेम के बिना कोई नहीं रह सकता।

गतास्ते मञ्चत्वं द्रुहिणहरिरुद्रेश्वरभृतः

शिवः स्वच्छच्छायाघटितकपटप्रच्छदपटः ।

त्वदीयानां भासां प्रतिफलनरागारुणतया

शरीरी शृङ्गारो रस इव दृशां दोग्धि कुतुकम् ॥ ९२॥

 

भावार्थ:
हे देवी, जब तक शिव अपने शरीर से इस सुंदरता को नहीं देखेंगे, तब तक उनका चित्त शांति नहीं पा सकता। आपकी सौंदर्य की लाली और आभा उनके हृदय में कुतुहल और प्रेम की नई लहरें उत्पन्न करती है।

 

अराला केशेषु प्रकृतिसरला मन्दहसिते

शिरीषाभा चित्ते दृषदुपलशोभा कुचतटे ।

भृशं तन्वी मध्ये पृथुरुरसिजारोहविषये

जगत्त्रातुं शम्भोर्जयति करुणा काचिदरुणा ॥ ९३॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपके सरल और सुंदर केशों में बसी मृदु हंसी और ललित रूप से वे खिल उठते हैं। आपकी हर शारीरिक विशेषता, जैसे कि आपके कुच और सुंदर चेहरा, दर्शकों के दिल को मोहित कर लेती है।

 

कलङ्कः कस्तूरी रजनिकरबिम्बं जलमयं

कलाभिः कर्पूरैर्मरकतकरण्डं निबिडितम् ।

अतस्त्वद्भोगेन प्रतिदिनमिदं रिक्तकुहरं

विधिर्भूयो भूयो निबिडयति नूनं तव कृते ॥ ९४॥

भावार्थ:
आपके सौंदर्य के स्पर्श से यह संसार हर दिन एक नई खूबसूरती में रंग जाता है। ताजगी और उल्लास से पूर्ण, यह दुनिया आपके सौंदर्य की आभा से फिर से जीवित होती है।

पुरारातेरन्तःपुरमसि ततस्त्वच्चरणयोः

सपर्यामर्यादा तरलकरणानामसुलभा ।

तथा ह्येते नीताः शतमखमुखाः सिद्धिमतुलां

तव द्वारोपान्तस्थितिभिरणिमाद्याभिरमराः ॥ ९५॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपके चरणों की पूजा के द्वारा वे सारे असंभव कार्य संभव हो जाते हैं। आपके चरणों के दर्शन से शास्त्रों और संतों के मार्ग पर चलने वाले असंख्य लोग सफल हो जाते हैं।

कलत्रं वैधात्रं कतिकति भजन्ते न कवयः

श्रियो देव्याः को वा न भवति पतिः कैरपि धनैः ।

महादेवं हित्वा तव सति सतीनामचरमे

कुचाभ्यामासङ्गः कुरवकतरोरप्यसुलभः ॥ ९६॥

 

भावार्थ:
आपकी पूजा से ही हर व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और आनंद आता है। महादेव की उपस्थिति के बिना भी आपके चरणों का स्पर्श भक्तों के जीवन में सुख और समृद्धि का कारण बनता है।

 

गिरामाहुर्देवीं द्रुहिणगृहिणीमागमविदो

हरेः पत्नीं पद्मां हरसहचरीमद्रितनयाम् ।

तुरीया कापि त्वं दुरधिगमनिःसीममहिमा

महामाया विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषि ॥ ९७॥

भावार्थ:
आपको देवी के रूप में स्वीकार किया गया है, जो संसार के कष्टों को समाप्त करने वाली हैं। आपकी शक्तियां न केवल मानवों, बल्कि परमात्मा की भी पवित्रता को प्रभावित करती हैं।

कदा काले मातः कथय कलितालक्तकरसं

पिबेयं विद्यार्थी तव चरणनिर्णेजनजलम् ।

प्रकृत्या मूकानामपि च कविताकारणतया

कदा धत्ते वाणीमुखकमलताम्बूलरसताम् ॥ ९८॥

 

भावार्थ:
हे माता, मैं कब तुम्हारे चरणों के पवित्र जल का पान करूंगा, जिससे मेरी बुद्धि और वाणी में निर्मलता और ज्ञान का संचार हो। तुम्हारे चरणों का स्पर्श ही मूक को भी वाणी और ज्ञान प्रदान करता है।

 

सरस्वत्या लक्ष्म्या विधिहरिसपत्नो विहरते

रतेः पातिव्रत्यं शिथिलयति रम्येण वपुषा ।

चिरं जीवन्नेव क्षपितपशुपाशव्यतिकरः

परानन्दाभिख्यम् रसयति रसं त्वद्भजनवान् ॥ ९९॥

 

भावार्थ:
जो व्यक्ति आपके भजन में नित्य रत रहता है, वह जीवन के सभी कष्टों से मुक्त हो जाता है। आपकी पूजा और भक्ति से उसकी आत्मा आनंद से सराबोर हो जाती है और वह परम सुख का अनुभव करता है।

 

प्रदीपज्वालाभिर्दिवसकरनीराजनविधिः

सुधासूतेश्चन्द्रोपलजललवैरर्घ्यरचना।

स्वकीयैरम्भोभिः सलिलनिधिसौहित्यकरणं

त्वदीयाभिर्वाग्भिस्तव जननि वाचां स्तुतिरियम् ॥ १००॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपके चरणों का नाममंत्र, जैसे दीप की ज्योति, दिन और रात की व्यवस्था, और चंद्रमा के जल में सृष्टि का सुख प्रदान करता है। आपके वाक्य अत्यंत शुद्ध और दिव्य हैं, जो भक्तों के हृदय में प्रसन्नता और संतुष्टि का संचार करते हैं।

 

॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य

श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य

श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ सौन्दर्यलहरी सम्पूर्णा ॥

॥ ॐ तत्सत् ॥

 

 

(अनुबन्धः Addendum

समानीतः पद्भ्यां मणिमुकुरतामम्बरमणि –

र्भयादास्यादन्तःस्तिमितकिरणश्रेणिमसृणः ।

(variations भयादास्य स्निग्धस्त्मित , भयादास्यस्यान्तःस्त्मित )

दधाति त्वद्वक्त्रंप्रतिफलनमश्रान्तविकचं

निरातङ्कं चन्द्रान्निजहृदयपङ्केरुहमिव ॥ १०१॥

समुद्भूतस्थूलस्तनभरमुरश्चारु हसितं

कटाक्षे कन्दर्पः कतिचन कदम्बद्युति वपुः ।

हरस्य त्वद्भ्रान्तिं मनसि जनयन्ति स्म विमलाः

variations जनयामास मदनो , जनयन्तः समतुलां , जनयन्ता सुवदने

भवत्या ये भक्ताः परिणतिरमीषामियमुमे ॥ १०२॥

निधे नित्यस्मेरे निरवधिगुणे नीतिनिपुणे

निराघातज्ञाने नियमपरचित्तैकनिलये ।

नियत्या निर्मुक्ते निखिलनिगमान्तस्तुतिपदे

निरातङ्के नित्ये निगमय ममापि स्तुतिमिमाम् ॥ १०३॥

 

भावार्थ:
यह भाग आपकी अनंत शक्ति और महिमा का आभार व्यक्त करता है। आपके चरणों की स्तुति से ही भक्तों के जीवन में परिवर्तन आता है, और वे परम आनंद की प्राप्ति करते हैं।

विदुर नीति (अध्याय 34): जीवन को सही दिशा देने वाले और संकट से बचाने वाले नीति-मंत्र

पिछले अध्याय में हमने जाना कि महात्मा विदुर ने महाराज धृतराष्ट्र को बुद्धिमान और मूर्ख व्यक्ति के लक्षण बताए थे। महाभारत के 'प्रजागर पर्...