सत्त्वगुण की सीमा और अद्वैत सत्ता
आइए, इस कथन को गहराई से समझते हैं: "सत्त्वगुण की सीमा यह है कि वह अभी भी एक गुण है, और जहाँ गुण हैं, वहाँ द्वैत (भेदभाव) है। ब्रह्मज्ञान या परमधाम वहाँ है जहाँ कोई गुण नहीं, कोई द्वैत नहीं, केवल अद्वैत सत्ता है।"
1. सत्त्वगुण क्यों एक सीमा है?
जैसा कि हमने पिछली कथा में देखा, सत्त्वगुण (सत्त्व, रज, तम में से एक) हमें ज्ञान, शांति, पवित्रता और शुभता की ओर ले जाता है। यह रजोगुण (कर्म और आसक्ति) और तमोगुण (अज्ञान और निष्क्रियता) की तुलना में कहीं बेहतर है। यह हमें आध्यात्मिक मार्ग पर चलने और बुराइयों से बचने में मदद करता है।
लेकिन, इसकी सीमा यह है कि सत्त्वगुण भी आखिर एक 'गुण' ही है। इसका मतलब है:
यह संसार का हिस्सा है: सत्त्वगुण प्रकृति (माया) का ही एक अंश है। यह प्रकृति के तीन मूलभूत घटकों में से एक है जिनसे यह पूरा ब्रह्मांड बना है।
यह बंधन का एक प्रकार है: भले ही यह एक 'सुनहरी बेड़ी' की तरह हो, लेकिन यह फिर भी एक बेड़ी है। यह हमें बांधे रखता है, भले ही वह बंधन सुखद या नैतिक रूप से अच्छा लगे। जैसे, अत्यधिक पवित्रता का अभिमान, या दूसरों से श्रेष्ठ होने का भाव भी एक सूक्ष्म बंधन बन सकता है।
यह परिवर्तनशील है: गुणों का स्वभाव ही परिवर्तनशील है। सत्त्वगुण कभी बढ़ सकता है, कभी घट सकता है। जो चीज़ परिवर्तनशील है, वह शाश्वत सत्य नहीं हो सकती।
2. जहाँ गुण हैं, वहाँ द्वैत (भेदभाव) है।
यह समझना महत्वपूर्ण है:
द्वैत का अर्थ: द्वैत का अर्थ है 'दो' या 'भेदभाव'। जब हम गुणों के स्तर पर होते हैं, तो हम हर चीज़ को अलग-अलग देखते हैं। हम देखते हैं:
मैं (आत्मा) और संसार (माया): हमें लगता है कि मैं अलग हूँ और यह दुनिया मुझसे अलग है।
शुभ और अशुभ: हम चीजों को 'अच्छा' और 'बुरा' में बांटते हैं।
ज्ञान और अज्ञान: हम मानते हैं कि मैं ज्ञान प्राप्त कर रहा हूँ, और अज्ञान मुझसे अलग है।
मैं और ईश्वर: हमें लगता है कि मैं एक सीमित जीव हूँ और ईश्वर मुझसे अलग, कहीं दूर बैठा है।
गुणों की भूमिका: गुण ही इस द्वैत को जन्म देते हैं। सत्त्वगुण हमें 'जानने वाला' बनाता है, रजोगुण 'कार्य करने वाला' बनाता है, और तमोगुण 'अज्ञानी' बनाता है। ये सब हमें अलग-अलग भूमिकाओं और पहचानों में बांटते हैं, जिससे भेद उत्पन्न होता है।
3. ब्रह्मज्ञान या परमधाम: गुणों से परे, केवल अद्वैत सत्ता
ब्रह्मज्ञान (आत्मज्ञान): यह वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति को परम सत्य का साक्षात्कार होता है। इस अवस्था में, उसे यह स्पष्ट हो जाता है कि आत्मा (स्वयं का सार) और ब्रह्म (परम सत्य) एक ही हैं, अविभाज्य हैं।
परमधाम: यह वह अंतिम गंतव्य है जहाँ पहुँचकर जीव को पूर्ण मुक्ति और शांति मिलती है।
गुणों से परे (निर्गुण): ब्रह्मज्ञान में कोई 'गुण' नहीं होते। ब्रह्म को 'निर्गुण' कहा जाता है, जिसका अर्थ है गुणों से रहित। जहाँ ब्रह्म का अनुभव होता है, वहाँ सत्त्व, रज, तम का कोई अस्तित्व नहीं होता, क्योंकि ये सब माया के स्तर पर कार्य करते हैं।
जैसे, जब आप गहरी नींद में होते हैं, तो आपको यह भी नहीं पता होता कि आप 'शुभ' हैं या 'अशुभ', 'कार्य कर रहे हैं' या 'निष्क्रिय' हैं। आप बस होते हैं। ब्रह्मज्ञान की अवस्था इससे भी परे है, जहाँ ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान का भेद भी मिट जाता है।
कोई द्वैत नहीं, केवल अद्वैत सत्ता: यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। ब्रह्मज्ञान की अवस्था में कोई भेद नहीं रहता।
'मैं' और 'ईश्वर' का भेद मिट जाता है।
'संसार' और 'ब्रह्म' का भेद मिट जाता है।
'ज्ञानी' और 'ज्ञान' का भेद मिट जाता है।
केवल एक अविभाज्य, निराकार, अनंत सत्ता का अनुभव होता है, जिसे अद्वैत सत्ता कहते हैं। यहाँ सब कुछ एक है, कोई दूसरा नहीं है, कोई द्वैत नहीं है।
निष्कर्ष
आध्यात्मिक मार्ग पर सत्त्वगुण बहुत सहायक है। यह हमें अज्ञान और कर्म के बंधनों से बचाता है, और हमें शुद्धता और ज्ञान की ओर ले जाता है। लेकिन, यह अंतिम पड़ाव नहीं है। हमें सत्त्वगुण के दायरे से भी ऊपर उठना होगा।
वास्तविक ब्रह्मज्ञान तब होता है जब हम इन सभी गुणों (और उनके द्वारा बनाए गए द्वैत) को पार कर जाते हैं। यह एक ऐसी अवस्था है जहाँ केवल अद्वैत सत्ता का अनुभव होता है – जहाँ सब कुछ एक है, कोई भेद नहीं, कोई बंधन नहीं। यह असीम स्वतंत्रता और पूर्ण शांति की अवस्था है। सत्त्वगुण हमें इस दहलीज तक तो पहुँचा देता है, लेकिन इस पार कदम हमें स्वयं ही रखना पड़ता है, गुणों के परे जाकर।
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