Friday, 17 January 2025

सौन्दर्यलहरी Saundaryalahari



Saundaryalahari

सौन्दर्यलहरी

 

आनन्दलहरी (-४० )

शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं

न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।

अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि

प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति ॥ १॥

 

भावार्थ:
शिव तभी शक्तिशाली और सृजन करने में सक्षम होते हैं जब वे शक्ति (देवी) से संयुक्त होते हैं। यदि शक्ति साथ न हो, तो शिव एक साधारण स्पंदन (हरकत) तक करने में असमर्थ हैं। इसीलिए देवी की आराधना स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश द्वारा भी की जाती है। जो व्यक्ति पुण्य नहीं करता, वह देवी को न तो प्रणाम कर सकता है और न ही उनकी स्तुति कर सकता है।

 

तनीयांसं पांसुं तव चरणपङ्केरुहभवं

विरिञ्चिस्सञ्चिन्वन् विरचयति लोकानविकलम् ।

वहत्येनं शौरिः कथमपि सहस्रेण शिरसां

हरस्संक्षुद्यैनं भजति भसितोद्धूलनविधिम् ॥ २॥

 

भावार्थ:
देवी के चरणों से निकली धूल इतनी पवित्र है कि ब्रह्मा इसे लेकर संपूर्ण संसार का निर्माण करते हैं। विष्णु इसे अपने सहस्र सिरों पर धारण करते हैं, और शिव इसे अपने मस्तक पर भस्म की तरह धारण करते हैं। यह चरणधूलि समस्त जगत के संचालन में महत्वपूर्ण है।

 

अविद्यानामन्त -स्तिमिर -मिहिरद्वीपनगरी

जडानां चैतन्य -स्तबक -मकरन्द -स्रुतिझरी ।

दरिद्राणां चिन्तामणिगुणनिका जन्मजलधौ

निमग्नानां दंष्ट्रा मुररिपु -वराहस्य भवति ॥ ३॥

 

भावार्थ:
देवी ज्ञान का सूर्य हैं, जो अज्ञान के अंधकार को समाप्त करते हैं। वे जड़ प्राणियों में चेतना का संचार करती हैं और दरिद्रता को हरने वाली चिन्तामणि के समान हैं। जन्म-मरण के सागर में डूबे हुए प्राणियों के लिए वे वराह रूपी विष्णु की दांत के समान उद्धार करती हैं।

 

त्वदन्यः पाणिभ्यामभयवरदो दैवतगणः

त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया ।

भयात् त्रातुं दातुं फलमपि च वाञ्छासमधिकं

शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुणौ ॥ ४॥

 

भावार्थ:
अन्य देवता दोनों हाथों से केवल अभय और वर देते हैं, लेकिन देवी स्वयं केवल अपने कृपादृष्टि से ही भक्तों की इच्छाएं पूरी करती हैं। देवी के चरण लोकों के लिए पूर्ण शरण हैं, जो न केवल भय से बचाते हैं, बल्कि इच्छाओं से भी अधिक फल प्रदान करते हैं।

 

हरिस्त्वामाराध्य प्रणतजनसौभाग्यजननीं

पुरा नारी भूत्वा पुररिपुमपि क्षोभमनयत् ।

स्मरोऽपि त्वां नत्वा रतिनयनलेह्येन वपुषा

मुनीनामप्यन्तः प्रभवति हि मोहाय महताम् ॥ ५॥

 

भावार्थ:
देवी की आराधना करके विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया और शिव को मोहित कर दिया। यहां तक कि कामदेव ने भी देवी की उपासना करके ऐसा रूप पाया जो ऋषियों को भी मोह में डालने में सक्षम है। देवी सौंदर्य और शक्ति की आदिशक्ति हैं।

 

धनुः पौष्पं मौर्वी मधुकरमयी पञ्च विशिखाः

वसन्तः सामन्तो मलयमरुदायोधनरथः ।

तथाप्येकः सर्वं हिमगिरिसुते कामपि कृपाम्1

अपाङ्गात्ते लब्ध्वा जगदिद -मनङ्गो विजयते ॥ ६॥

 

भावार्थ:
कामदेव के पास पुष्पों का धनुष, मधुमक्खियों की डोरी और वसंत ऋतु का समर्थन है। फिर भी, वे केवल देवी के एक कृपा-दृष्टि (अपांग) से संपूर्ण संसार पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। यह उनकी शक्ति और कृपा का प्रभाव है।

 

क्वणत्काञ्चीदामा करिकलभकुम्भस्तननता

परिक्षीणा मध्ये परिणतशरच्चन्द्रवदना ।

धनुर्बाणान् पाशं सृणिमपि दधाना करतलैः

पुरस्तादास्तां नः पुरमथितुराहोपुरुषिका ॥ ७॥

 

भावार्थ:
देवी के रूप का वर्णन है—उनकी करधनी की मधुर ध्वनि, उनके सुडौल और पूर्ण स्तन, पतला मध्य भाग और पूर्ण चंद्रमा जैसा सुंदर मुख। वे धनुष, बाण, पाश और अंकुश धारण करती हैं। देवी का यह दिव्य रूप हमारे सामने प्रकट हो और हमें प्रेरणा दे।

 

सुधासिन्धोर्मध्ये सुरविटपिवाटीपरिवृते

मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे ।

शिवाकारे मञ्चे परमशिवपर्यङ्कनिलयां

भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्दलहरीम् ॥ ८॥

 

भावार्थ:
सुधा (अमृत) के सागर के मध्य, देव वृक्षों और मणिद्वीप से घिरे हुए नीप (पारिजात) वन में, चिंतामणि भवन में देवी निवास करती हैं। यहां वे शिव के साथ एक दिव्य आसन पर विराजमान होती हैं। केवल धन्य और पवित्र आत्माएं ही इस आनंदमय स्थिति का अनुभव कर सकती हैं।

 

महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं

स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि ।

मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्वा कुलपथं

सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसे ॥ ९॥

 

भावार्थ:
देवी कुंडलिनी रूप में शरीर के विभिन्न चक्रों में निवास करती हैं—मूलाधार (पृथ्वी), मणिपुर (अग्नि), स्वाधिष्ठान (जल), हृदय (वायु) और आज्ञा चक्र (आकाश)। सहस्रार में जाकर वे शिव के साथ रमण करती हैं। यह कुंडलिनी का दिव्य मार्ग है।

 

सुधाधारासारैश्चरणयुगलान्तर्विगलितैः

प्रपञ्चं सिञ्चन्ती पुनरपि रसाम्नायमहसः ।

अवाप्य स्वां भूमिं भुजगनिभमध्युष्टवलयं

स्वमात्मानं कृत्वा स्वपिषि कुलकुण्डे कुहरिणि ॥ १०॥

 

भावार्थ:
देवी के चरणों से अमृत की धारा प्रवाहित होती है, जो पूरे संसार को पवित्र करती है। कुंडलिनी शक्ति अंततः अपनी स्थिति (मूलाधार) में लौटकर आत्मा के साथ विश्राम करती है। यह दिव्य ऊर्जा है जो जीवन का संचालन करती है।

 

चतुर्भिः श्रीकण्ठैः शिवयुवतिभिः पञ्चभिरपि

प्रभिन्नाभिः शम्भोर्नवभिरपि मूलप्रकृतिभिः ।

चतुश्चत्वारिंशद्वसुदलकलाश्रत्रिवलय - (त्रयश्चत्वारि )

त्रिरेखाभिः सार्धं तव शरणकोणाः परिणताः ॥ ११॥ (चरणकोणाः , भवनकिणाः )

 

भावार्थ:
देवी की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि उनके चरणकमल 44 स्थूल तत्वों (पंचमहाभूत, इंद्रियां आदि) से युक्त हैं। नौ मूल प्रकृतियां, पांच शिव तत्व, और त्रिवली (त्रिशक्ति) उनके चरणों में निहित हैं। इनके चरण शरणागतों के लिए परम आश्रयस्थल हैं।

 

त्वदीयं सौन्दर्यं तुहिनगिरिकन्ये तुलयितुं

कवीन्द्राः कल्पन्ते कथमपि विरिञ्चिप्रभृतयः ।

यदालोकौत्सुक्यादमरललना यान्ति मनसा

तपोभिर्दुष्प्रापामपि गिरिशसायुज्यपदवीम् ॥ १२॥

 

भावार्थ:
हे हिमालय-कन्या (पार्वती), आपके सौंदर्य की तुलना करने में ब्रह्मा जैसे महान कवि भी असमर्थ हैं। देवांगनाएं, आपके रूप के दर्शन की उत्सुकता में, कठिन तप करके शिव के समीप (सायुज्य) जाने का प्रयास करती हैं।

 

नरं वर्षीयांसं नयनविरसं नर्मसु जडं

तवापाङ्गालोके पतितमनुधावन्ति शतशः ।

गलद्वेणीबन्धाः कुचकलशविस्रस्तसिचया

हठात् त्रुट्यत्काञ्च्यो विगलितदुकूला युवतयः ॥ १३॥

 

भावार्थ:
आपकी एक अपांग दृष्टि (कृपा-दृष्टि) पड़ने मात्र से एक साधारण, वृद्ध या गंभीर पुरुष के पीछे असंख्य युवा स्त्रियां आकर्षित होकर दौड़ती हैं। उनकी वेणियां खुल जाती हैं, आभूषण गिर जाते हैं, और वे अपनी सुध-बुध खो देती हैं।

 

क्षितौ षट्पञ्चाशद् द्विसमधिकपञ्चाशदुदके

हुताशे द्वाषष्टिश्चतुरधिकपञ्चाशदनिले ।

दिवि द्विष्षट्त्रिंशन्मनसि च चतुष्षष्टिरिति ये

मयूखास्तेषामप्युपरि तव पादाम्बुजयुगम् ॥ १४॥

भावार्थ:
पृथ्वी पर 56, जल में 52, अग्नि में 62, वायु में 54 और आकाश में 72 कलाएं हैं। ये सभी देवी के चरणकमलों से प्रकट होती हैं और उनकी पवित्रता का वर्णन करती हैं। देवी का चरणकमल इन सभी कलाओं के ऊपर है।

 

शरज्ज्योत्स्नाशुद्धां शशियुतजटाजूटमकुटां

वरत्रासत्राणस्फटिकघटिकापुस्तककराम्।

सकृन्न त्वा नत्वा कथमिव सतां संन्निदधते

मधुक्षीरद्राक्षामधुरिमधुरीणाः भणितयः ॥ १५॥ var फणितयः

 

भावार्थ:
देवी का रूप शरद पूर्णिमा की चांदनी जैसा पवित्र है। वे चंद्रमा से सुशोभित जटाजूट धारण करती हैं। उनके हाथों में पुस्तक और माला है। एक बार उनकी वंदना करने से भक्तों के मुख से ऐसी मधुर वाणी निकलती है, जैसे शहद, दूध और अंगूर का स्वाद मिलकर घुला हो।

 

कवीन्द्राणां चेतःकमलवनबालातपरुचिं

भजन्ते ये सन्तः कतिचिदरुणामेव भवतीम् ।

विरिञ्चिप्रेयस्यास्तरुणतरशृङ्गारलहरी -

गभीराभिर्वाग्भिर्विदधति सतां रञ्जनममी ॥ १६॥

 

भावार्थ:
जो भक्त आपकी अरुण-रूपा शक्ति का ध्यान करते हैं, वे ब्रह्मा जैसे महान कवियों के समान हो जाते हैं। आपकी कृपा से उनकी वाणी गहरी और मधुर हो जाती है, जो सत्पुरुषों को प्रसन्न करती है और शृंगार रस से ओतप्रोत होती है।

 

सवित्रीभिर्वाचां शशिमणिशिलाभङ्गरुचिभिः

वशिन्याद्याभिस्त्वां सह जननि संचिन्तयति यः ।

स कर्ता काव्यानां भवति महतां भङ्गिरुचिभिः

वचोभिर्वाग्देवीवदनकमलामोदमधुरैः ॥ १७॥

 

भावार्थ:
जो भक्त वाग्देवी (सरस्वती) और अन्य देवियों के साथ आपकी आराधना करते हैं, वे अद्वितीय काव्य के रचयिता बनते हैं। उनकी वाणी सरस्वती की तरह सुगंधित और मधुर होती है, जिससे महान व्यक्तियों को आनंद मिलता है।

 

तनुच्छायाभिस्ते तरुणतरणिश्रीसरणिभिः

दिवं सर्वामुर्वीमरुणिमनि मग्नां स्मरति यः ।

भवन्त्यस्य त्रस्यद्वनहरिणशालीननयनाः

सहोर्वश्या वश्याः कति कति न गीर्वाणगणिकाः ॥ १८॥

 

भावार्थ:
देवी की आभा उगते हुए सूर्य की किरणों जैसी है। जो भक्त उनकी इस आभा का ध्यान करते हैं, वे इतने आकर्षक और प्रभावशाली हो जाते हैं कि स्वर्ग की अप्सराएं और देवांगनाएं भी उनके वश में हो जाती हैं।

 

मुखं बिन्दुं कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधो

हरार्धं ध्यायेद्यो हरमहिषि ते मन्मथकलाम् ।

स सद्यः संक्षोभं नयति वनिता इत्यतिलघु

त्रिलोकीमप्याशु भ्रमयति रवीन्दुस्तनयुगाम् ॥ १९॥

 

भावार्थ:
जो साधक देवी के श्रीचक्र का ध्यान करते हैं, जिसमें उनका मुख बिंदु और कुचयुग त्रिकोण है, वे तुरंत ही स्त्रियों के मन को आकर्षित कर लेते हैं। उनकी शक्ति इतनी अद्वितीय होती है कि वे संपूर्ण त्रिलोकी को मोहित कर सकते हैं।

 

किरन्तीमङ्गेभ्यः किरणनिकुरम्बामृतरसं

हृदि त्वामाधत्ते हिमकरशिलामूर्तिमिव यः ।

स सर्पाणां दर्पं शमयति शकुन्ताधिप इव

ज्वरप्लुष्टान् दृष्ट्या सुखयति सुधाधारसिरया ॥ २०॥

 

भावार्थ:
जो व्यक्ति देवी की अमृतमयी कृपा को अपने हृदय में धारण करता है, वह सर्पों के विष को शांत कर सकता है। उसकी दृष्टि मात्र से रोग और ज्वर दूर हो जाते हैं। देवी की कृपा उसे अमृतमयी शीतलता प्रदान करती है।

 

तटिल्लेखातन्वीं तपनशशिवैश्वानरमयीं

निषण्णां षण्णामप्युपरि कमलानां तव कलाम् ।

महापद्माटव्यां मृदितमलमायेन मनसा

महान्तः पश्यन्तो दधति परमाह्लादलहरीम् ॥ २१॥

 

भावार्थ:
देवी का स्वरूप बिजली की चमक जैसा तेजस्वी और सूर्य, चंद्र तथा अग्नि का सम्मिश्रण है। वे छह कमल चक्रों के ऊपर स्थित हैं। जो महापुरुष अपने मन को पवित्र कर इस स्वरूप का ध्यान करते हैं, उन्हें परमानंद की अनुभूति होती है।

 

भवानि त्वं दासे मयि वितर दृष्टिं सकरुणा -

मिति स्तोतुं वाञ्छन् कथयति भवानि त्वमिति यः ।

तदैव त्वं तस्मै दिशसि निजसायुज्यपदवीं

मुकुन्दब्रह्मेन्द्रस्फुटमकुटनीराजितपदाम् ॥ २२॥

 

भावार्थ:
जो भक्त करुणा के साथ "भवानी, मैं आपका दास हूं" कहकर आपकी प्रार्थना करता है, उसे तुरंत ही आपकी कृपा प्राप्त होती है। उसे ऐसा सायुज्य (समीपता) प्राप्त होता है जो भगवान विष्णु, ब्रह्मा, और इंद्र के चरणों की शोभा से भी अधिक गौरवशाली है।

 

त्वया हृत्वा वामं वपुरपरितृप्तेन मनसा

शरीरार्धं शम्भोरपरमपि शङ्के हृतमभूत् ।

यदेतत्त्वद्रूपं सकलमरुणाभं त्रिनयनं

कुचाभ्यामानम्रं कुटिलशशिचूडालमकुटम् ॥ २३॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपने शिव के आधे शरीर को ग्रहण कर लिया, परंतु लगता है कि इससे भी आपका मन संतुष्ट नहीं हुआ। इसलिए, आपने शिव के रूप और गुणों को भी अपने भीतर समाहित कर लिया। आपके त्रिनेत्र, चंद्रमा की अलंकृति और लाल आभा यह दर्शाते हैं।

 

जगत्सूते धाता हरिरवति रुद्रः क्षपयते

तिरस्कुर्वन्नेतत्स्वमपि वपुरीशस्तिरयति ।

सदापूर्वः सर्वं तदिदमनुगृह्णाति च शिव -

स्तवाज्ञामालम्ब्य क्षणचलितयोर्भ्रूलतिकयोः ॥ २४॥

 

भावार्थ:
ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, विष्णु पालन करते हैं, और रुद्र संहार करते हैं। शिव आपकी भृकुटि के संकेत पर इन सबको नियंत्रित करते हैं। आपकी आज्ञा से ही यह सृष्टि चक्र चलता है।

त्रयाणां देवानां त्रिगुणजनितानां तव शिवे

भवेत् पूजा पूजा तव चरणयोर्या विरचिता ।

तथा हि त्वत्पादोद्वहनमणिपीठस्य निकटे

स्थिता ह्येते शश्वन्मुकुलितकरोत्तंसमकुटाः ॥ २५॥

 

भावार्थ:
त्रिगुण (सत्व, रज, तम) से उत्पन्न ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा तभी पूर्ण होती है जब वह आपके चरणों की पूजा के साथ हो। ये देव सदा आपके मणि पीठ के निकट सिर झुकाए खड़े रहते हैं।

विरिञ्चिः पञ्चत्वं व्रजति हरिराप्नोति विरतिं

विनाशं कीनाशो भजति धनदो याति निधनम् ।

वितन्द्री माहेन्द्री विततिरपि संमीलितदृशा

महासंहारेऽस्मिन् विहरति सति त्वत्पतिरसौ ॥ २६॥

 

भावार्थ:
सृष्टि के अंत में ब्रह्मा नष्ट हो जाते हैं, विष्णु लय में चले जाते हैं, यमराज और कुबेर का भी अंत हो जाता है। सभी शक्तियां विलीन हो जाती हैं, लेकिन उस समय भी आपके पति शिव परम शांत और आनंदित रहते हैं।

 

जपो जल्पः शिल्पं सकलमपि मुद्राविरचना

गतिः प्रादक्षिण्यक्रमणमशनाद्याहुतिविधिः ।

प्रणामस्संवेशस्सुखमखिलमात्मार्पणदृशा

सपर्यापर्यायस्तव भवतु यन्मे विलसितम् ॥ २७॥

 

भावार्थ:
देवी की सेवा का हर रूप – चाहे वह जप हो, शिल्प हो, मुद्राएं हों, परिक्रमा हो, भोजन का अर्पण हो, प्रणाम हो, या ध्यान – सब उनका पूजन ही है। हर कार्य उनके प्रति समर्पण हो।

 

सुधामप्यास्वाद्य प्रतिभयजरामृत्युहरिणीं

विपद्यन्ते विश्वे विधिशतमखाद्या दिविषदः ।

करालं यत्क्ष्वेलं कबलितवतः कालकलना

न शम्भोस्तन्मूलं तव जननि ताटङ्कमहिमा ॥ २८॥

 

भावार्थ:
आपके ताटंक (कुंडल) की महिमा इतनी बड़ी है कि वह अमृत का सेवन करने वाले देवताओं को भी प्रभावित करती है। काल के भय से मुक्ति पाने में सक्षम वह कुंडल शिव की शक्ति का स्रोत है।

 

किरीटं वैरिञ्चं परिहर पुरः कैटभभिदः

कठोरे कोटीरे स्खलसि जहि जम्भारिमुकुटम् ।

प्रणम्रेष्वेतेषु प्रसभमुपयातस्य भवनं

भवस्याभ्युत्थाने तव परिजनोक्तिर्विजयते ॥ २९॥

 

भावार्थ:
आपके महल में प्रवेश करते समय ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र अपने मुकुट उतारकर विनम्रतापूर्वक प्रणाम करते हैं। यह आपके दिव्य गौरव और परिजनों की विजय का प्रमाण है।

 

स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाद्याभिरभितो

निषेव्ये नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति यः।

किमाश्चर्यं तस्य त्रिनयनसमृद्धिं तृणयतो

महासंवर्ताग्निर्विरचयति नीराजनविधिम्॥

 

भावार्थ:
जो साधक देवी को अणिमा आदि आठ सिद्धियों से घिरी हुई मानकर उनकी उपासना करता है, वह महान शक्तियों को भी तुच्छ समझता है। संहार काल का अग्नि भी उसकी पूजा के लिए दीपक की तरह काम करता है।

 

चतुष्षष्ट्या तन्त्रैः सकलमतिसंधाय भुवनं

स्थितस्तत्तत्सिद्धिप्रसवपरतन्त्रैः पशुपतिः ।

पुनस्त्वन्निर्बन्धादखिलपुरुषार्थैकघटना -

स्वतन्त्रं ते तन्त्रं क्षितितलमवातीतरदिदम् ॥ ३१॥

 

भावार्थ:
पशुपति (शिव) 64 तंत्रों के माध्यम से संसार को बांधते और साधनाओं द्वारा सिद्धियों की प्राप्ति करवाते हैं। परंतु हे माता, आपके आग्रह के कारण यह तंत्र सब पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को साधने वाला और स्वतंत्र है, जो संपूर्ण पृथ्वी पर विद्यमान है।

 

शिवः शक्तिः कामः क्षितिरथ रविः शीतकिरणः

स्मरो हंसः शक्रस्तदनु च परामारहरयः ।

अमी हृल्लेखाभिस्तिसृभिरवसानेषु घटिता

भजन्ते वर्णास्ते तव जननि नामावयवताम् ॥ ३२॥

भावार्थ:
शिव, शक्ति, कामदेव, पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, विष्णु, और इंद्र – ये सभी मिलकर देवी के नाम के अक्षरों का निर्माण करते हैं। आपकी महिमा इन हृल्लेखाओं (मंत्र स्वरूपों) में प्रकट होती है।

 

स्मरं योनिं लक्ष्मीं त्रितयमिदमादौ तव मनो -

र्निधायैके नित्ये निरवधिमहाभोगरसिकाः ।

भजन्ति त्वां चिन्तामणिगुननिबद्धाक्षवलयाः

शिवाग्नौ जुह्वन्तः सुरभिघृतधाराहुतिशतैः ॥ ३३॥

 

भावार्थ:
कामदेव, योनि, और लक्ष्मी – इन तीनों को अपने मन में स्थापित कर, साधक आपकी पूजा करते हैं। वे ध्यान में आपके मंत्रों का जाप करते हुए शिव के अग्नि में गंधयुक्त घी की आहुति देते हैं और अनंत भोगों का अनुभव करते हैं।

 

शरीरं त्वं शम्भोः शशिमिहिरवक्षोरुहयुगं

तवात्मानं मन्ये भगवति नवात्मानमनघम् ।

अतश्शेषश्शेषीत्ययमुभयसाधारणतयास्थितः

संबन्धो वां समरसपरानन्दपरयोः ॥ ३४॥

 

भावार्थ:
हे भगवती, आपका शरीर शिव का ही है। सूर्य और चंद्रमा उनके वक्षस्थल के प्रतीक हैं। आप दोनों का संबंध समान आनंद और समान सत्ता में स्थित है। यह संबंध समरसता और परमानंद का द्योतक है।

मनस्त्वं व्योम त्वं मरुदसि मरुत्सारथिरसि

त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि परिणतायां न हि परम् ।

त्वमेव स्वात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा

चिदानन्दाकारं शिवयुवति भावेन बिभृषे ॥ ३५॥

 

भावार्थ:
आप मन, आकाश, वायु, अग्नि, जल, और पृथ्वी – सब कुछ हैं। इन तत्वों में आपका ही विस्तार है। आप स्वयं को सृष्टि के रूप में प्रकट करती हैं और चिदानंद स्वरूप होकर शिव और शक्ति के मिलन का आदर्श प्रस्तुत करती हैं।

तवाज्ञाचक्रस्थं तपनशशिकोटिद्युतिधरं

परं शम्भुं वन्दे परिमिलितपार्श्वं परचिता ।

यमाराध्यन् भक्त्या रविशशिशुचीनामविषये

निरालोकेऽलोके निवसति हि भालोकभुवने ॥ ३६॥

 

भावार्थ:
आज्ञा चक्र में स्थित शिव, सूर्य और चंद्र की आभा से दमकते हैं। जो भक्त उन्हें भक्ति के साथ आराधना करते हैं, वे तीनों लोकों से परे, ब्रह्मलोक में निवास करते हैं।

विशुद्धौ ते शुद्धस्फटिकविशदं व्योमजनकं

शिवं सेवे देवीमपि शिवसमानव्यवसिताम् ।

ययोः कान्त्या यान्त्याः शशिकिरणसारूप्यसरणे -

विधूतान्तर्ध्वान्ता विलसति चकोरीव जगती ॥ ३७॥

 

भावार्थ:
विशुद्ध चक्र में स्फटिक के समान शुद्ध शिव और समान शक्ति का वास है। उनकी ज्योति से अंधकार नष्ट होता है और यह जगत चकोरी पक्षी की तरह उनकी चंद्रकिरणों का आनंद लेता है।

समुन्मीलत् संवित् कमलमकरन्दैकरसिकं

भजे हंसद्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम् ।

यदालापादष्टादशगुणितविद्यापरिणति -

र्यदादत्ते दोषाद् गुणमखिलमद्भ्यः पय इव ॥ ३८॥

 

भावार्थ:
मैं हंस रूपी शिव और शक्ति का ध्यान करता हूं, जो ज्ञान के कमल में वास करते हैं। उनके संवाद से 18 विद्याओं का विकास होता है। वे दोषों को गुणों में परिवर्तित कर लेते हैं, जैसे जल से अमृत निकाल लिया जाता है।

 

तव स्वाधिष्ठाने हुतवहमधिष्ठाय निरतं

तमीडे संवर्तं जननि महतीं तां च समयाम् ।

यदालोके लोकान् दहति महति क्रोधकलिते

दयार्द्रा या दृष्टिः शिशिरमुपचारं रचयति ॥ ३९॥

 

भावार्थ:
स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित अग्नि को मैं प्रणाम करता हूं। यह अग्नि क्रोध से संसार को जला देती है, लेकिन आपकी करुणा से वह शीतल हो जाती है और सभी को शांति प्रदान करती है।

 

तटित्त्वन्तं शक्त्या तिमिरपरिपन्थिस्फुरणया

स्फुरन्नानारत्नाभरणपरिणद्धेन्द्रधनुषम् ।

तव श्यामं मेघं कमपि मणिपूरैकशरणं

निषेवे वर्षन्तं हरमिहिरतप्तं त्रिभुवनम् ॥ ४०॥

 

भावार्थ:
मणिपूर चक्र में स्थित देवी का स्वरूप काले मेघ की तरह है, जो बिजली के समान चमकता है। वह इंद्रधनुष और रत्नाभूषणों से सुशोभित है। यह मेघ तीनों लोकों की तपन को शांत करता है और शीतलता प्रदान करता है।

 

तवाधारे मूले सह समयया लास्यपरया

नवात्मानं मन्ये नवरसमहाताण्डवनटम् ।

उभाभ्यामेताभ्यामुदयविधिमुद्दिश्य दयया

सनाथाभ्यां जज्ञे जनकजननीमज्जगदिदम् ॥ ४१॥

 

भावार्थ:
मूलाधार चक्र में, जहां देवी समय (कुंडलिनी शक्ति) के साथ लास्य नृत्य करती हैं, मैं शिव को नव रसों के महा तांडव नृत्य के रूप में देखता हूं। शिव और शक्ति, दोनों अपनी दया से इस संसार को जन्म देते हैं और इसे सजीव बनाते हैं।

 

सौन्दर्यलहरीगतैर्माणिक्यत्वं

गगनमणिभिः सान्द्रघटितं

किरीटं ते हैमं हिमगिरिसुते कीर्तयति यः ।

स नीडेयच्छायाच्छुरणशबलं चन्द्रशकलं

धनुः शौनासीरं किमिति न निबध्नाति धिषणाम् ॥ ४२॥

 

भावार्थ:
हे हिमगिरि की पुत्री, आपके स्वर्ण मुकुट को जो कोई गगनमणि (रत्नों) से युक्त वर्णन करता है, वह समझ सकता है कि वह मुकुट चंद्रमा के आकार का धनुष भी है, जो ज्ञान और सौंदर्य को संजोकर रखता है।

 

धुनोतु ध्वान्तं नस्तुलितदलितेन्दीवरवनं

घनस्निग्धश्लक्ष्णं चिकुरनिकुरुम्बं तव शिवे ।

यदीयं सौरभ्यं सहजमुपलब्धुं सुमनसो

वसन्त्यस्मिन् मन्ये वलमथनवाटीविटपिनाम् ॥ ४३॥

 

भावार्थ:
हे शिवे, आपके काले घने और कोमल केशराशि, जो दलित नीलकमल के वन के समान हैं, हमारे अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट करें। इन केशों से जो सुगंध निकलती है, उसे अनुभव करने के लिए देवगण उसमें वास करते हैं।

 

तनोतु क्षेमं नस्तव वदनसौन्दर्यलहरी -

परीवाहस्रोतःसरणिरिव सीमन्तसरणिः ।

वहन्ती सिन्दूरं प्रबलकबरीभारतिमिर -

द्विषां वृन्दैर्बन्दीकृतमिव नवीनार्ककिरणम् ॥ ४४॥

 

भावार्थ:
आपके सौंदर्य का प्रवाह, आपके सिर की मांग (सिंदूर युक्त रेखा) के समान, सूर्य की किरणों जैसा तेजस्वी और अंधकार को नष्ट करने वाला है। यह हमें शुभ और कल्याण प्रदान करे।

 

अरालैः स्वाभाव्यादलिकलभसश्रीभिरलकैः

परीतं ते वक्त्रं परिहसति पङ्केरुहरुचिम् ।

दरस्मेरे यस्मिन् दशनरुचिकिञ्जल्करुचिरे

सुगन्धौ माद्यन्ति स्मरदहनचक्षुर्मधुलिहः ॥ ४५॥

 

भावार्थ:
आपके घुंघराले केशों की शोभा आपके मुख को इस प्रकार सुशोभित करती है कि वह कमल के सौंदर्य को भी परिहास करता है। आपके दांतों की सुंदरता और मुख की सुगंध कामदेव के भ्रमर रूपी आंखों को भी मोहित कर देती है।

 

ललाटं लावण्यद्युतिविमलमाभाति तव य-

द्द्वितीयं तन्मन्ये मकुटघटितं चन्द्रशकलम् ।

विपर्यासन्यासादुभयमपि संभूय च मिथः

सुधालेपस्यूतिः परिणमति राकाहिमकरः ॥ ४६॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपका ललाट इतनी अद्भुत आभा से युक्त है कि वह चंद्रमा के समान प्रतीत होता है। आपका मुकुट और ललाट दोनों मिलकर पूर्णिमा के चंद्रमा की छवि प्रस्तुत करते हैं।

 

भ्रुवौ भुग्ने किंचिद्भुवनभयभङ्गव्यसनिनि

त्वदीये नेत्राभ्यां मधुकररुचिभ्यां धृतगुणम् ।

धनुर्मन्ये सव्येतरकरगृहीतं रतिपतेः

प्रकोष्ठे मुष्टौ च स्थगयति निगूढान्तरमुमे ॥ ४७॥

 

भावार्थ:
हे उमादेवी, आपके धनुष के समान भौंहें और मधुकर (भौंरों) के समान नेत्र, संसार के भय को नष्ट करने वाले हैं। ये भौंहें मानो कामदेव के धनुष का प्रतीक हैं, जो उनकी विजय का कारण बनती हैं।

 

अहः सूते सव्यं तव नयनमर्कात्मकतया

त्रियामां वामं ते सृजति रजनीनायकतया ।

तृतीया ते दृष्टिर्दरदलितहेमाम्बुजरुचिः

समाधत्ते संध्यां दिवसनिशयोरन्तरचरीम् ॥ ४८॥

 

भावार्थ:
आपका दाहिना नेत्र सूर्य के समान दिन की उत्पत्ति करता है, जबकि बायां नेत्र चंद्रमा के समान रात्रि की सृष्टि करता है। आपका तीसरा नेत्र, जो सोने के कमल की भांति है, संध्या का निर्माण करता है, जो दिन और रात के बीच संतुलन बनाता है।

 

विशाला कल्याणी स्फुटरुचिरयोध्या कुवलयैः

कृपाधाराधारा किमपि मधुराभोगवतिका ।

अवन्ती दृष्टिस्ते बहुनगरविस्तारविजया

ध्रुवं तत्तन्नामव्यवहरणयोग्या विजयते ॥ ४९॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपकी दृष्टि विशाल, कल्याणकारी और अत्यंत मधुर है। यह दृष्टि कृपा से भरपूर है और आपके नगरों (लोकों) की रक्षा करती है। आपकी दृष्टि की महिमा निश्चित ही सभी नामों और कार्यों में विजय दिलाती है।

 

कवीनां संदर्भस्तबकमकरन्दैकरसिकं

कटाक्षव्याक्षेपभ्रमरकलभौकर्णयुगलम् ।

अमुञ्चन्तौ दृष्ट्वा तव नवरसास्वादतरला -

वसूयासंसर्गादलिकनयनं किंचिदरुणम् ॥ ५०॥

 

भावार्थ:
आपके कटाक्ष भ्रमर के समान हैं, जो कवियों के भाव और रस में डूबे रहते हैं। आपकी नज़र की कोमलता और रसिकता को देखकर भी ये भ्रमर आपको छोड़ते नहीं। आपके नेत्रों में एक अद्भुत लाली है, जो ईर्ष्या का भी परिहार करती है।

 

शिवे शृङ्गारार्द्रा तदितरजने कुत्सनपरा

सरोषा गङ्गायां गिरिशचरिते विस्मयवती । (गिरिशनयने )

हराहिभ्यो भीता सरसिरुहसौभाग्यजननी (जयिनी )

सखीषु स्मेरा ते मयि जननी दृष्टिः सकरुणा ॥ ५१॥

भावार्थ:
हे शिवा, आपकी दृष्टि शिव के लिए प्रेममयी और दूसरों के लिए उपेक्षा से भरी है। गंगा को देखकर आप क्रोधित हो जाती हैं, पर शिव के कार्यों में विस्मित हो जाती हैं। आप हर (शिव) के नागों से डरती हैं और कमल के सौंदर्य की जननी हैं। सखियों के साथ आप हंसती हैं, परंतु मुझ पर आपकी दृष्टि हमेशा करुणा से भरी रहती है।

 

गते कर्णाभ्यर्णं गरुत इव पक्ष्माणि दधती

पुरां भेत्तुश्चित्तप्रशमरसविद्रावणफले ।

इमे नेत्रे गोत्राधरपतिकुलोत्तंसकलिके

तवाकर्णाकृष्टस्मरशरविलासं कलयतः ॥ ५२॥

भावार्थ:
हे देवी, आपके नेत्र पलकों को गरुड़ के पंखों के समान धारण करते हुए कामदेव के बाणों की ओर संकेत करते हैं। ये नेत्र शिव के हृदय को शांति प्रदान करते हैं और संसार में प्रेम व आनंद का प्रसार करते हैं।

विभक्तत्रैवर्ण्यं व्यतिकरितलीलाञ्जनतया

विभाति त्वन्नेत्रत्रितयमिदमीशानदयिते ।

पुनः स्रष्टुं देवान् द्रुहिणहरिरुद्रानुपरतान्

रजः सत्त्वं बिभ्रत्तम इति गुणानां त्रयमिव ॥ ५३॥

भावार्थ:
हे ईशान की प्रिया, आपके तीन नेत्र त्रिगुणों (रज, सत्व, तम) का प्रतीक हैं। रज गुण से ब्रह्मा की सृष्टि, सत्व से विष्णु का पालन और तम से शिव का संहार कार्य संपन्न होता है।

पवित्रीकर्तुं नः पशुपतिपराधीनहृदये

दयामित्रैर्नेत्रैररुणधवलश्यामरुचिभिः ।

नदः शोणो गङ्गा तपनतनयेति ध्रुवममुं

त्रयाणां तीर्थानामुपनयसि संभेदमनघम् ॥ ५४॥

 

भावार्थ:
हे पशुपति की अधीनता को दर्शाने वाली देवी, आपके नेत्रों का रंग (लाल, सफेद, और काला) गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का संगम है। यह संगम हमें पवित्र बनाता है और मोक्ष का मार्ग दिखाता है।

 

निमेषोन्मेषाभ्यां प्रलयमुदयं याति जगती

तवेत्याहुः सन्तो धरणिधरराजन्यतनये ।

त्वदुन्मेषाज्जातं जगदिदमशेषं प्रलयतः

परित्रातुं शङ्के परिहृतनिमेषास्तव दृशः ॥ ५५॥

 

भावार्थ:
हे हिमालय की पुत्री, आपके नेत्रों के खुलने से सृष्टि का उदय और बंद होने से प्रलय होता है। संत कहते हैं कि आपकी दृष्टि का बिना झपकना इस जगत की रक्षा के लिए है।

 

तवापर्णे कर्णेजपनयनपैशुन्यचकिता

निलीयन्ते तोये नियतमनिमेषाः शफरिकाः ।

इयं च श्रीर्बद्धच्छदपुटकवाटं कुवलयम्

जहाति प्रत्यूषे निशि च विघटय्य प्रविशति ॥ ५६॥

 

भावार्थ:
हे अपर्णा, आपकी कानों तक पहुंचने वाली दृष्टि को देखकर मछलियां (शफरिकाएं) पानी में छिप जाती हैं। लक्ष्मी, जो बंद कुमुदिनी (नील कमल) के समान है, रात में उसमें प्रवेश करती है और दिन में उसे छोड़ देती है।

 

दृशा द्राघीयस्या दरदलितनीलोत्पलरुचा

दवीयांसं दीनं स्नपय कृपया मामपि शिवे ।

अनेनायं धन्यो भवति न च ते हानिरियता

वने वा हर्म्ये वा समकरनिपातो हिमकरः ॥ ५७॥

भावार्थ:
हे शिवे, आपकी दृष्टि, जो नीले कमल की सुंदरता से भी श्रेष्ठ है, दीन-दुखियों पर कृपा करती है। इस कृपा से सभी धन्य हो जाते हैं, जैसे चंद्रमा की किरणें वनों और महलों में समान रूप से प्रकाश फैलाती हैं।

अरालं ते पालीयुगलमगराजन्यतनये

तिरश्चीनो यत्र श्रवणपथमुल्लङ्घ्य विलस -

न्नपाङ्गव्यासङ्गो दिशति शरसंधानधिषणाम् ॥ ५८॥

 

भावार्थ:
हे नागराज की पुत्री, आपकी भौंहें धनुष के समान सुंदर हैं। आपके कटाक्ष, कानों के मार्ग को पार करते हुए, कामदेव के बाण को लक्ष्य तक पहुंचाने में सहायक होते हैं।

 

स्फुरद्गण्डाभोगप्रतिफलितताटङ्कयुगलं

चतुश्चक्रं मन्ये तव मुखमिदं मन्मथरथम् ।

यमारुह्य द्रुह्यत्यवनिरथमर्केन्दुचरणं

महावीरो मारः प्रमथपतये सज्जितवते ॥ ५९॥

 

भावार्थ:
आपके गालों पर झिलमिलाते झुमके, आपके मुख को कामदेव के रथ के रूप में दिखाते हैं। इस रथ पर सवार होकर कामदेव, शिव के हृदय को जीतने का प्रयास करता है।

 

सरस्वत्याः सूक्तीरमृतलहरीकौशलहरीः

पिबन्त्याः शर्वाणि श्रवणचुलुकाभ्यामविरलम् ।

चमत्कारश्लाघाचलितशिरसः कुण्डलगणो

झणत्कारैस्तारैः प्रतिवचनमाचष्ट इव ते ॥ ६०॥

 

भावार्थ:
हे शर्वाणि, आपके कान सरस्वती के अमृतमयी वचनों को सुनते हैं। आपके झुमके, उनकी मधुर ध्वनि से झंकृत होते हुए, मानो उत्तर दे रहे हों।

 

असौ नासावंशस्तुहिनगिरिवंशध्वजपटि

त्वदीयो नेदीयः फलतु फलमस्माकमुचितम् ।

वहन्नन्तर्मुक्ताः शिशिरतरनिश्वासगलितं

समृद्ध्या यत्तासां बहिरपि च मुक्तामणिधरः ॥ ६१॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपकी नासिका हिमालय की ध्वजा जैसी है, जो मोतियों से भरी हुई है। यह नासिका आपकी शीतल सांसों से और अधिक सुंदर हो जाती है, जैसे बाहरी मोती आपकी दिव्यता को और भी अधिक बढ़ाते हैं।

 

प्रकृत्या रक्तायास्तव सुदति दन्तच्छदरुचेः

प्रवक्ष्ये सादृश्यं जनयतु फलं विद्रुमलता ।

न बिम्बं तद्बिम्बप्रतिफलनरागादरुणितं

तुलामध्यारोढुं कथमिव विलज्जेत कलया ॥ ६२॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपके दांतों की प्राकृतिक लाली प्रवाल (मूंगा) के समान है। वह बिम्ब (लाल फल) की सुंदरता को भी लज्जित कर देती है, क्योंकि आपकी मुस्कान का तेज उसमें परावर्तित होता है।

 

स्मितज्योत्स्नाजालं तव वदनचन्द्रस्य पिबतां

चकोराणामासीदतिरसतया चञ्चुजडिमा ।

अतस्ते शीतांशोरमृतलहरीमम्लरुचयः

पिबन्ति स्वच्छन्दं निशि निशि भृशं काञ्जिकधिया ॥ ६३॥

 

भावार्थ:
आपके मुखचंद्र की मुस्कान से निकलने वाली चांदनी को पीने वाले चकोर पक्षी अधिकता से अपने चोंच को थका लेते हैं। इसलिए वे चंद्रमा के अमृत को भी खटास भरे जल (काञ्जिक) की तरह मानते हैं और आपकी मुस्कान के आगे सब फीका लगता है।

 

अविश्रान्तं पत्युर्गुणगणकथाम्रेडनजपा

जपापुष्पच्छाया तव जननि जिह्वा जयति सा ।

यदग्रासीनायाः स्फटिकदृषदच्छच्छविमयी

सरस्वत्या मूर्तिः परिणमति माणिक्यवपुषा ॥ ६४॥

 

भावार्थ:
हे माँ, आपकी जिह्वा हमेशा शिव के गुणों का जाप करती रहती है। वह जपाकुसुम (लाल फूल) के समान सुंदर है। सरस्वती की सफेद मूर्ति, आपकी जिह्वा की संगति में, लाल माणिक्य के समान दिखने लगती है।

 

रणे जित्वा दैत्यानपहृतशिरस्त्रैः कवचिभिर् -

निवृत्तैश्चण्डांशत्रिपुरहरनिर्माल्यविमुखैः ।

विशाखेन्द्रोपेन्द्रैः शशिविशदकर्पूरशकला

विलीयन्ते मातस्तव वदनताम्बूलकबलाः ॥ ६५॥

 

भावार्थ:
हे माता, युद्ध में दैत्यों के सिरों को जीतने के बाद, विष्णु, इंद्र, और अन्य देवता आपके ताम्बूल (पान) के लिए लालायित रहते हैं। यह ताम्बूल चंद्रमा की शीतलता और कपूर की पवित्रता से परिपूर्ण है।

 

विपञ्च्या गायन्ती विविधमपदानं पशुपतेः

त्वयारब्धे वक्तुं चलितशिरसा साधुवचने ।

तदीयैर्माधुर्यैरपलपिततन्त्रीकलरवांनिजां

वीणां वाणी निचुलयति चोलेन निभृतम् ॥ ६६॥

भावार्थ:
जब आप शिव के गुणगान में विविध राग गाती हैं, तो सरस्वती अपनी वीणा को दबा देती हैं, क्योंकि आपकी मधुरता के सामने उनकी वीणा की ध्वनि फीकी पड़ जाती है।

कराग्रेण स्पृष्टं तुहिनगिरिणा वत्सलतया

गिरीशेनोदस्तं मुहुरधरपानाकुलतया ।

करग्राह्यं शम्भोर्मुखमुकुरवृन्तं गिरिसुते

कथङ्कारं ब्रूमस्तव चिबुकमौपम्यरहितम् ॥ ६७॥

 

भावार्थ:
हे पर्वतराजकुमारी, आपका ठुड्डी (चिबुक) अद्वितीय है। शिव इसे बार-बार अपने हाथों से स्पर्श करते हैं। यह ठुड्डी आपकी सुंदरता का ऐसा हिस्सा है जिसे किसी भी चीज़ से तुलना करना असंभव है।

 

भुजाश्लेषान्नित्यं पुरदमयितुः कण्टकवती

तव ग्रीवा धत्ते मुखकमलनालश्रियमियम् ।

स्वतः श्वेता कालागुरुबहुलजम्बालमलिना

मृणालीलालित्यम् वहति यदधो हारलतिका ॥ ६८॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपकी गर्दन हमेशा शिव के आलिंगन से सजी रहती है। यह गर्दन कमल के डंठल की सुंदरता को धारण करती है और आपके हार से सुशोभित होती है, जो इसकी शोभा को और बढ़ाता है।

 

गले रेखास्तिस्रो गतिगमकगीतैकनिपुणे

विवाहव्यानद्धप्रगुणगुणसंख्याप्रतिभुवः ।

विराजन्ते नानाविधमधुररागाकरभुवां

त्रयाणां ग्रामाणां स्थितिनियमसीमान इव ते ॥ ६९॥

 

भावार्थ:
आपकी गर्दन पर तीन रेखाएँ हैं, जो शिव और आपकी शादी की पवित्र गांठ का प्रतीक हैं। ये रेखाएँ संगीत के तीन सुरों (ग्रामों) की सीमाओं को दर्शाती हैं, जो मधुरता और सौंदर्य का आधार हैं।

 

मृणालीमृद्वीनां तव भुजलतानां चतसृणां

चतुर्भिः सौन्दर्यं सरसिजभवः स्तौति वदनैः ।

नखेभ्यः सन्त्रस्यन् प्रथममथनादन्धकरिपो -

श्चतुर्णां शीर्षाणां सममभयहस्तार्पणधिया ॥ ७०॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपकी चारों भुजाओं की कोमलता मृणाल (कमल के तने) के समान है। ब्रह्मा अपने चार मुखों से आपके इन भुजाओं के सौंदर्य की स्तुति करते हैं। कामदेव, शिव के क्रोध से भयभीत होकर, आपके हाथों में शरण लेते हैं।

 

नखानामुद्द्योतैर्नवनलिनरागं विहसतां

कराणां ते कान्तिं कथय कथयामः कथमुमे ।

कयाचिद्वा साम्यं भजतु कलया हन्त कमलं

यदि क्रीडल्लक्ष्मीचरणतललाक्षारुणदलम् ॥ ७१॥

 

भावार्थ:
हे उमा, आपके नाखूनों की चमक से आपके हाथ नव-विकसित कमल के समान दमकते हैं। हम आपकी हथेलियों की तुलना कैसे कर सकते हैं? कमल कुछ हद तक समानता रख सकता है, लेकिन केवल तभी जब वह लक्ष्मी के चरणों के लाल रंग (लाक्षा) से सजा हो।

 

समं देवि स्कन्दद्विपवदनपीतं स्तनयुगं

तवेदं नः खेदं हरतु सततं प्रस्नुतमुखम् ।

यदालोक्याशङ्काकुलितहृदयो हासजनकः

स्वकुम्भौ हेरम्बः परिमृशति हस्तेन झडिति ॥ ७२॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपका स्तनयुगल समान और परिपूर्ण है, जो सदैव अमृतधारा से परिपूर्ण रहता है। यह देखकर गणेशजी अपने हाथी जैसे मुख की कुंभाकार गालों को छूकर हंसते हैं, मानो उनका आकार आपके स्तनों से मिल रहा हो।

 

अमू ते वक्षोजावमृतरसमाणिक्यकुतुपौ

न संदेहस्पन्दो नगपतिपताके मनसि नः ।

पिबन्तौ तौ यस्मादविदितवधूसङ्गरसिकौ

कुमारावद्यापि द्विरदवदनक्रौञ्चदलनौ ॥ ७३॥

 

भावार्थ:
हे पर्वतराजकन्या, आपके स्तन अमृत के कुंभ और मणिक्य के पात्र जैसे हैं। इनका आनंद लेने वाले स्कंद (कार्तिकेय) और गणेशजी वधू-संग का अनुभव नहीं कर पाए, क्योंकि वे बचपन से ही ब्रह्मचारी हैं।

 

वहत्यम्ब स्तम्बेरमदनुजकुम्भप्रकृतिभिः

समारब्धां मुक्तामणिभिरमलां हारलतिकाम् ।

कुचाभोगो बिम्बाधररुचिभिरन्तः शबलितां

प्रतापव्यामिश्रां पुरदमयितुः कीर्तिमिव ते ॥ ७४॥

 

भावार्थ:
हे माँ, आपके स्तन हारों से सुशोभित हैं, जो मोतियों से सजे हुए हैं। उनकी आभा लाल बिम्ब फल जैसी है। शिव की महिमा की तरह वे सौंदर्य और प्रताप का अनोखा मिश्रण हैं।

 

तव स्तन्यं मन्ये धरणिधरकन्ये हृदयतः

पयःपारावारः परिवहति सारस्वतमिव ।

दयावत्या दत्तं द्रविडशिशुरास्वाद्य तव यत्

कवीनां प्रौढानामजनि कमनीयः कवयिता ॥ ७५॥

 

भावार्थ:
हे पार्वती, आपके स्तनों से प्रवाहित दूध मुझे ऐसा प्रतीत होता है, मानो वह ज्ञान का महासागर हो। जब आपने वह दूध तमिल बालक (आदि शंकराचार्य) को पिलाया, तब उनके अंदर महान कवि बनने का गुण उत्पन्न हुआ।

 

हरक्रोधज्वालावलिभिरवलीढेन वपुषा

गभीरे ते नाभीसरसि कृतसङ्गो मनसिजः ।

समुत्तस्थौ तस्मादचलतनये धूमलतिका

जनस्तां जानीते तव जननि रोमावलिरिति ॥ ७६॥

 

भावार्थ:
हे माता, आपकी गहरी नाभि में शिव के क्रोध की ज्वाला से जलता हुआ कामदेव प्रवेश करता है। वहां से एक धुएं की लता (रोमावली) के रूप में बाहर आता है, जो आपकी दिव्य सुन्दरता को और बढ़ाती है।

 

यदेतत् कालिन्दीतनुतरतरङ्गाकृति शिवे

कृशे मध्ये किंचिज्जननि तव यद्भाति सुधियाम् ।

विमर्दादन्योऽन्यं कुचकलशयोरन्तरगतं

तनूभूतं व्योम प्रविशदिव नाभिं कुहरिणीम् ॥ ७७॥

 

भावार्थ:
हे शिवे, आपकी पतली कमर यमुना के छोटे-छोटे तरंगों की तरह प्रतीत होती है। यह कमर आपके स्तनों और नाभि के बीच इतनी कोमल और क्षीण है कि लगता है जैसे आकाश भी उसमें समा सकता है।

 

स्थिरो गङ्गावर्तः स्तनमुकुलरोमावलिलता -

कलावालं कुण्डं कुसुमशरतेजोहुतभुजः ।

रतेर्लीलागारं किमपि तव नाभिर्गिरिसुते

बिलद्वारं सिद्धेर्गिरिशनयनानां विजयते ॥ ७८॥

 

भावार्थ:
हे गिरिसुते, आपकी नाभि स्थिर गंगा की धारा के समान है। यह कामदेव का खेलघर और सिद्धियों का द्वार है। शिव के नेत्र भी आपकी नाभि की अद्भुत सुंदरता का अनुभव करते हैं।

 

निसर्गक्षीणस्य स्तनतटभरेण क्लमजुषो

नमन्मूर्तेर्नारीतिलक शनकैस्त्रुट्यत इव ।

चिरं ते मध्यस्य त्रुटिततटिनीतीरतरुणा

समावस्थास्थेम्नो भवतु कुशलं शैलतनये ॥ ७९॥

भावार्थ:
हे शैलपुत्री, आपकी कमर पतली और कोमल है। स्तनों के भार को सहते हुए वह ऐसी प्रतीत होती है मानो टूटने वाली हो। कामना है कि आपकी यह दिव्य आकृति सदैव स्वस्थ और स्थिर रहे।

 

कुचौ सद्यःस्विद्यत्तटघटितकूर्पासभिदुरौ

कषन्तौ दोर्मूले कनककलशाभौ कलयता

तव त्रातुं भङ्गादलमिति वलग्नं तनुभुवा

त्रिधा नद्धं देवि त्रिवलि लवलीवल्लिभिरिव ॥ ८०॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपके स्तन सोने के कलश के समान चमकते हैं और आपकी तंग वक्षस्थली के कारण कमर पर तीन रेखाएँ (त्रिवलि) उभर आती हैं। ये रेखाएँ आपकी कमर को सहारा देती हुई प्रतीत होती हैं, जैसे बेल किसी स्तंभ से लिपटी हो।

 

गुरुत्वं विस्तारं क्षितिधरपतिः पार्वति निजा -

न्नितम्बादाच्छिद्य त्वयि हरणरूपेण निदधे ।

अतस्ते विस्तीर्णो गुरुरयमशेषां वसुमतीं

नितम्बप्राग्भारः स्थगयति लघुत्वं नयति च ॥ ८१॥

 

भावार्थ:
हे पार्वती, आपके नितम्ब (कमर) की व्यापकता और भारीपन को पर्वतराज हिमालय ने स्वयं अपनी स्थिरता और विस्तार से जोड़ा है। यही कारण है कि आपकी सुंदरता वसुंधरा (धरती) के गुरुत्व (गंभीरता) को भी पीछे छोड़ देती है और उसे लघु प्रतीत कराती है।

 

करीन्द्राणां शुण्डान् कनककदलीकाण्डपटली -

मुभाभ्यामूरुभ्यामुभयमपि निर्जित्य भवती ।

सुवृत्ताभ्यां पत्युः प्रणतिकठिनाभ्यां गिरिसुते

विजिग्ये जानुभ्यां विबुधकरिकुम्भद्वयमसि ॥ ८२॥

 

भावार्थ:
हे गिरिसुते, आपके सुवर्ण के केले के तनों जैसे गोल-मटोल और सुदृढ़ जांघें, हाथी की सूंड और कठोर पर्वत को भी परास्त कर देती हैं। आपके घुटने, जो शिव की प्रार्थना के लिए झुके रहते हैं, देवताओं के हाथियों के मस्तकों को भी जीत लेते हैं।

 

पराजेतुं रुद्रं द्विगुणशरगर्भौ गिरिसुते

निषङ्गौ जङ्घे ते विषमविशिखो बाढमकृत ।

यदग्रे दृश्यन्ते दशशरफलाः पादयुगली -

नखाग्रच्छद्मानः सुरमकुटशाणैकनिशिताः ॥ ८३॥

 

भावार्थ:
हे गिरिसुते, आपकी जांघें ऐसे प्रतीत होती हैं जैसे रुद्र को पराजित करने के लिए कामदेव ने अपने दो तीक्ष्ण बाणों को संधान किया हो। आपके चरण नखों से सुसज्जित हैं, जो स्वर्ग के मुकुटों को काटने वाले तीक्ष्ण पत्थरों की तरह चमकते हैं।

 

श्रुतीनां मूर्धानो दधति तव यौ शेखरतया

ममाप्येतौ मातः शिरसि दयया धेहि चरणौ ।

ययोः पाद्यं पाथः पशुपतिजटाजूटतटिनी

ययोर्लाक्षालक्ष्मीररुणहरिचूडामणिरुचिः ॥ ८४॥

 

भावार्थ:
हे माता, आपके चरणों को वेद भी अपने सिर पर धारण करते हैं। कृपया उन चरणों को मेरे सिर पर भी स्थान दें। आपके चरण, जिनका जल गंगा है और जिनकी लाली स्वर्ण और मणियों के समान चमकती है, मेरे लिए परम पूजनीय हैं।

 

नमोवाकं ब्रूमो नयनरमणीयाय पदयो -

स्तवास्मै द्वन्द्वाय स्फुटरुचिरसालक्तकवते ।

असूयत्यत्यन्तं यदभिहननाय स्पृहयते

पशूनामीशानः प्रमदवनकङ्केलितरवे ॥ ८५॥

 

भावार्थ:
हे देवी, हम आपके उन सुंदर और लालिमायुक्त चरणों को प्रणाम करते हैं, जो देखने में अत्यंत मनोहर हैं। शिव, जो पशुपति हैं, भी इन चरणों को स्पर्श करने के लिए लालायित रहते हैं और ईर्ष्या करते हैं।

 

मृषा कृत्वा गोत्रस्खलनमथ वैलक्ष्यनमितं

ललाटे भर्तारं चरणकमले ताडयति ते ।

चिरादन्तःशल्यं दहनकृतमुन्मूलितवता

तुलाकोटिक्वाणैः किलिकिलितमीशानरिपुणा ॥ ८६॥

 

भावार्थ:
आपके चरणों ने शिव के ललाट को स्पर्श किया और उनके भीतर छिपे हुए कामदेव के तीरों को बाहर निकाल दिया। आपके इस चरण-स्पर्श ने उनके भीतर वर्षों से जल रही पीड़ा को शीतलता प्रदान की।

 

हिमानीहन्तव्यं हिमगिरिनिवासैकचतुरौ

निशायां निद्राणं निशि चरमभागे च विशदौ ।

वरं लक्ष्मीपात्रं श्रियमतिसृजन्तौ समयिनां

सरोजं त्वत्पादौ जननि जयतश्चित्रमिह किम् ॥ ८७॥

 

भावार्थ:
हे हिमालय की वासिनी, आपके चरण बर्फ से भी ठंडे और कमल के समान सौम्य हैं। ये रात में भी स्पष्ट और प्रकाशमान रहते हैं। ये चरण साधकों के लिए लक्ष्मी का वरदान और निर्धनों के लिए धन का स्रोत हैं।

 

पदं ते कीर्तीनां प्रपदमपदं देवि विपदां

कथं नीतं सद्भिः कठिनकमठीकर्परतुलाम् ।

कथं वा बाहुभ्यामुपयमनकाले पुरभिदा

यदादाय न्यस्तं दृषदि दयमानेन मनसा ॥ ८८॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपके चरण कीर्ति का स्थान हैं और विपत्तियों को दूर करते हैं। शिव ने इन्हें अपनी बाहुओं में धारण करके चट्टान पर स्थापित किया, जो उनकी अपार श्रद्धा और प्रेम को दर्शाता है।

 

नखैर्नाकस्त्रीणां करकमलसंकोचशशिभि -

स्तरूणां दिव्यानां हसत इव ते चण्डि चरणौ ।

फलानि स्वःस्थेभ्यः किसलयकराग्रेण ददतां

दरिद्रेभ्यो भद्रां श्रियमनिशमह्नाय ददतौ ॥ ८९॥

 

भावार्थ:
हे चंडी, आपके चरणों के नख चंद्रमा के समान चमकते हैं, जो स्वर्ग की स्त्रियों के कमल जैसे हाथों को भी लज्जित कर देते हैं। आपके चरण, जैसे पेड़ों को फल प्रदान करते हैं, वैसे ही निर्धनों को धन और कल्याण प्रदान करते हैं।

 

ददाने दीनेभ्यः श्रियमनिशमाशानुसदृशी -

ममन्दं सौन्दर्यप्रकरमकरन्दम् विकिरति ।

तवास्मिन् मन्दारस्तबकसुभगे यातु चरणे

निमज्जन्मज्जीवः करणचरणः षट्चरणताम् ॥ ९०॥

 

भावार्थ:
हे माता, आपके चरणों की सुगंध मंदर के पुष्पों के समान है। ये चरण निरंतर निर्धनों को धन और साधकों को आनंद प्रदान करते हैं। मेरी आत्मा (मक्खी के समान) इन चरणों में डूबकर सच्ची भक्ति और मुक्ति का अनुभव करे।

 

पदन्यासक्रीडापरिचयमिवारब्धुमनसःस्खलन्तस्ते

खेलं भवनकलहंसा न जहति ।

अतस्तेषां शिक्षां सुभगमणिमञ्जीररणित -

च्छलादाचक्षाणं चरणकमलं चारुचरिते ॥ ९१॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपके चरणों की नृत्य कला इतनी आकर्षक है कि वह मनुष्य के मन को आसक्त कर लेती है। आपके चरणों की नर्तन में बसी मणियों की झंकार से ज्ञान और भक्ति की सिख मिलती है। उनके प्रति कृतज्ञता और प्रेम के बिना कोई नहीं रह सकता।

गतास्ते मञ्चत्वं द्रुहिणहरिरुद्रेश्वरभृतः

शिवः स्वच्छच्छायाघटितकपटप्रच्छदपटः ।

त्वदीयानां भासां प्रतिफलनरागारुणतया

शरीरी शृङ्गारो रस इव दृशां दोग्धि कुतुकम् ॥ ९२॥

 

भावार्थ:
हे देवी, जब तक शिव अपने शरीर से इस सुंदरता को नहीं देखेंगे, तब तक उनका चित्त शांति नहीं पा सकता। आपकी सौंदर्य की लाली और आभा उनके हृदय में कुतुहल और प्रेम की नई लहरें उत्पन्न करती है।

 

अराला केशेषु प्रकृतिसरला मन्दहसिते

शिरीषाभा चित्ते दृषदुपलशोभा कुचतटे ।

भृशं तन्वी मध्ये पृथुरुरसिजारोहविषये

जगत्त्रातुं शम्भोर्जयति करुणा काचिदरुणा ॥ ९३॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपके सरल और सुंदर केशों में बसी मृदु हंसी और ललित रूप से वे खिल उठते हैं। आपकी हर शारीरिक विशेषता, जैसे कि आपके कुच और सुंदर चेहरा, दर्शकों के दिल को मोहित कर लेती है।

 

कलङ्कः कस्तूरी रजनिकरबिम्बं जलमयं

कलाभिः कर्पूरैर्मरकतकरण्डं निबिडितम् ।

अतस्त्वद्भोगेन प्रतिदिनमिदं रिक्तकुहरं

विधिर्भूयो भूयो निबिडयति नूनं तव कृते ॥ ९४॥

भावार्थ:
आपके सौंदर्य के स्पर्श से यह संसार हर दिन एक नई खूबसूरती में रंग जाता है। ताजगी और उल्लास से पूर्ण, यह दुनिया आपके सौंदर्य की आभा से फिर से जीवित होती है।

पुरारातेरन्तःपुरमसि ततस्त्वच्चरणयोः

सपर्यामर्यादा तरलकरणानामसुलभा ।

तथा ह्येते नीताः शतमखमुखाः सिद्धिमतुलां

तव द्वारोपान्तस्थितिभिरणिमाद्याभिरमराः ॥ ९५॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपके चरणों की पूजा के द्वारा वे सारे असंभव कार्य संभव हो जाते हैं। आपके चरणों के दर्शन से शास्त्रों और संतों के मार्ग पर चलने वाले असंख्य लोग सफल हो जाते हैं।

कलत्रं वैधात्रं कतिकति भजन्ते न कवयः

श्रियो देव्याः को वा न भवति पतिः कैरपि धनैः ।

महादेवं हित्वा तव सति सतीनामचरमे

कुचाभ्यामासङ्गः कुरवकतरोरप्यसुलभः ॥ ९६॥

 

भावार्थ:
आपकी पूजा से ही हर व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और आनंद आता है। महादेव की उपस्थिति के बिना भी आपके चरणों का स्पर्श भक्तों के जीवन में सुख और समृद्धि का कारण बनता है।

 

गिरामाहुर्देवीं द्रुहिणगृहिणीमागमविदो

हरेः पत्नीं पद्मां हरसहचरीमद्रितनयाम् ।

तुरीया कापि त्वं दुरधिगमनिःसीममहिमा

महामाया विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषि ॥ ९७॥

भावार्थ:
आपको देवी के रूप में स्वीकार किया गया है, जो संसार के कष्टों को समाप्त करने वाली हैं। आपकी शक्तियां न केवल मानवों, बल्कि परमात्मा की भी पवित्रता को प्रभावित करती हैं।

कदा काले मातः कथय कलितालक्तकरसं

पिबेयं विद्यार्थी तव चरणनिर्णेजनजलम् ।

प्रकृत्या मूकानामपि च कविताकारणतया

कदा धत्ते वाणीमुखकमलताम्बूलरसताम् ॥ ९८॥

 

भावार्थ:
हे माता, मैं कब तुम्हारे चरणों के पवित्र जल का पान करूंगा, जिससे मेरी बुद्धि और वाणी में निर्मलता और ज्ञान का संचार हो। तुम्हारे चरणों का स्पर्श ही मूक को भी वाणी और ज्ञान प्रदान करता है।

 

सरस्वत्या लक्ष्म्या विधिहरिसपत्नो विहरते

रतेः पातिव्रत्यं शिथिलयति रम्येण वपुषा ।

चिरं जीवन्नेव क्षपितपशुपाशव्यतिकरः

परानन्दाभिख्यम् रसयति रसं त्वद्भजनवान् ॥ ९९॥

 

भावार्थ:
जो व्यक्ति आपके भजन में नित्य रत रहता है, वह जीवन के सभी कष्टों से मुक्त हो जाता है। आपकी पूजा और भक्ति से उसकी आत्मा आनंद से सराबोर हो जाती है और वह परम सुख का अनुभव करता है।

 

प्रदीपज्वालाभिर्दिवसकरनीराजनविधिः

सुधासूतेश्चन्द्रोपलजललवैरर्घ्यरचना।

स्वकीयैरम्भोभिः सलिलनिधिसौहित्यकरणं

त्वदीयाभिर्वाग्भिस्तव जननि वाचां स्तुतिरियम् ॥ १००॥

 

भावार्थ:
हे देवी, आपके चरणों का नाममंत्र, जैसे दीप की ज्योति, दिन और रात की व्यवस्था, और चंद्रमा के जल में सृष्टि का सुख प्रदान करता है। आपके वाक्य अत्यंत शुद्ध और दिव्य हैं, जो भक्तों के हृदय में प्रसन्नता और संतुष्टि का संचार करते हैं।

 

॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य

श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य

श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ सौन्दर्यलहरी सम्पूर्णा ॥

॥ ॐ तत्सत् ॥

 

 

(अनुबन्धः Addendum

समानीतः पद्भ्यां मणिमुकुरतामम्बरमणि –

र्भयादास्यादन्तःस्तिमितकिरणश्रेणिमसृणः ।

(variations भयादास्य स्निग्धस्त्मित , भयादास्यस्यान्तःस्त्मित )

दधाति त्वद्वक्त्रंप्रतिफलनमश्रान्तविकचं

निरातङ्कं चन्द्रान्निजहृदयपङ्केरुहमिव ॥ १०१॥

समुद्भूतस्थूलस्तनभरमुरश्चारु हसितं

कटाक्षे कन्दर्पः कतिचन कदम्बद्युति वपुः ।

हरस्य त्वद्भ्रान्तिं मनसि जनयन्ति स्म विमलाः

variations जनयामास मदनो , जनयन्तः समतुलां , जनयन्ता सुवदने

भवत्या ये भक्ताः परिणतिरमीषामियमुमे ॥ १०२॥

निधे नित्यस्मेरे निरवधिगुणे नीतिनिपुणे

निराघातज्ञाने नियमपरचित्तैकनिलये ।

नियत्या निर्मुक्ते निखिलनिगमान्तस्तुतिपदे

निरातङ्के नित्ये निगमय ममापि स्तुतिमिमाम् ॥ १०३॥

 

भावार्थ:
यह भाग आपकी अनंत शक्ति और महिमा का आभार व्यक्त करता है। आपके चरणों की स्तुति से ही भक्तों के जीवन में परिवर्तन आता है, और वे परम आनंद की प्राप्ति करते हैं।

Friday, 20 October 2023

प्रश्नोपनिषद- चतुर्थ प्रश्न

 चतुर्थ प्रश्न

 

अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति कतर एष देवः स्वप्नान्पश्यति कस्यैतत्सुखं भवति कस्मिन्नु सर्वे सम्प्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥ १॥

 

तदनन्तर इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद मुनि) से गर्ग गोत्र में उत्पन्न सौर्यायणी ऋषि ने पूछा-भगवन् ! इस मनुष्य-शरीर में कौन-कौन सोते हैं; इसमें कौन-कौन जागते रहते हैं; यह कौन देवता स्वप्नों को देखता है, यह सुख किसको होता है (और) ये सब-के-सब किसमें निश्चितरूप से सम्पूर्णतया स्थित रहते हैं, यह (मेरा प्रश्न है) ॥ १ ॥

 

व्याख्या—यहाँ गार्ग्य मुनिने महात्मा पिप्पलाद से पाँच बातें पूछी हैं—

(१) गाढ़ी निद्रा के समय इस मनुष्य-शरीर में रहने वाले पूर्वोक्त देवताओं में से कौन-कौन सोते हैं?

(२) कौन-कौन जागते रहते हैं?

(३) स्वप्न अवस्था में इनमें से कौन देवता स्वप्न की घटनाओं को देखता रहता है ?

(४) निद्रा अवस्था में सुख का अनुभव किसको होता है? और

(५) ये सब-के-सब देवता सर्वभाव से किसमें स्थित हैं अर्थात् किसके आश्रित हैं?

इस प्रकार इस प्रश्न में गार्ग्य मुनि ने जीवात्मा और परमात्मा का पूरा-पूरा तत्त्व पूछ लिया॥ १ ॥

 

तस्मै स होवाच यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति । ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति। तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ २ ॥

 

उससे उन सुप्रसिद्ध महर्षि ने कहा, हे गार्ग्य ! जिस प्रकार अस्त होते हुए सूर्य सब-की-सब किरणें इस तेजोमण्डल में एक हो जाती हैं (फिर) उदय होनेपर वे (सब) पुनः-पुनः सब ओर फैलती रहती हैं, ठीक ऐसे ही (निद्रा के समय) वे सब इन्द्रियाँ (भी) परम देव मन में एक हो जाती हैं,  इस कारण उस समय यह जीवात्मा न (तो) सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न आनंदित होता है, न मल-मूत्रका त्याग करता है (और) न चलता है; उस समय 'वह सो रहा है' यों (लोग) कहते हैं ॥ २ ॥

 

सम्बन्ध - अब गार्ग्यके प्रश्नका संक्षेपमें उत्तर देकर दो मन्त्रोंद्वारा यह भी बतलाते हैं कि सब इन्द्रियोंके लय होनेपर मनकी कैसी स्थिति रहती है-

 

प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात् प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥

 

इस शरीर रूपी नगर में पाँच प्राणरूप अग्रियाँ ही जागती रहती हैं। यह प्रसिद्ध अपान ही गार्हपत्य अग्नि है, व्यान अन्वाहार्यपचन नामक अग्नि (दक्षिणाग्नि) है, गार्हपत्य अग्नि (householder’s fire) से जो उठाकर ले जायी जाती है (वह) आहवनीय अग्रि प्रणयन (उठाकर ले जाए जाने) के कारण ही प्राणरूप है ॥ ३ ॥

 

यहाँ निद्रा को यज्ञ का रूप देने के लिये पाँचों प्राणों को अग्रिरूप बतलाया है। शरीर में जो प्राण की अपान वृत्ति है, यही मानो उस यज्ञ की 'गार्हपत्य' अग्रि है; 'व्यान' दक्षिणाग्नि है, गार्हपत्य अग्निरूप अपान से प्राण उठते हैं, इस कारण मुख्य प्राण ही इस यज्ञ की कल्पना में आहवनीय अग्नि है; क्योंकि यज्ञ में आहवनीय अग्नि  गार्हपत्य से उठाकर लायी जाती है।

तीसरे प्रश्न के प्रसङ्ग में भी प्राण को 'अन्नरूप आहुति जिसमें हवन की जाती है' इस व्युत्पत्ति द्वारा आहवनीय अग्नि ही बताया है।

 

यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः । मनोह वाव यजमानः। इष्टफलमेवोदानः । स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥ ४ ॥

 

जो ऊर्ध्वश्वास और अधोश्वास हैं, ये दोनों मानो (अग्निहोत्र की) दो आहुतियाँ हैं। इनको जो समभाव से (सब ओर) पहुँचाता है इसलिये जो 'समान' कहलाता है, वही हवन करनेवाला ऋत्विक् है। यह प्रसिद्ध मन ही यजमान है, अभीष्ट फल ही उदान है। वह (उदान) ही इस यजमानम् मनरूप यजमान को प्रतिदिन (निद्रा के समय) ब्रह्मलोक में भेजता है अर्थात् हृदयगुहा में ले जाता है ॥ ४ ॥

 

उदानवायु मन को प्रतिदिन निद्राके समय उसके कर्मफलके भोगस्वरूप ब्रह्मलोक में परमात्मा के निवासस्थानरूप हृदयगुहा में ले जाता है। वहाँ इस मन के द्वारा जीवात्मा निद्राजनित विश्रामरूप सुख का अनुभव करता है।

 

सम्बन्ध - अब तीसरे प्रश्नका उत्तर देते हैं-

 

अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति । यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति । देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति ॥ ५ ॥

 

इस स्वप्न अवस्था में यह देव (जीवात्मा) अपनी विभूति का अनुभव करता है, जो बार-बार देखा हुआ है उसी को बार-बार देखता है, बार-बार सुनी हुई बातों को ही पुनः-पुनः सुनता है, नाना देश और दिशाओं में बार-बार अनुभव किये हुए विषयों को पुनः-पुनः अनुभव करता है, (इतना ही नहीं) देखे हुए और न देखे हुए को भी,सुने हुए और न सुने हुए को भी, अनुभव किये हुए और अनुभव न किये हुए को भी, विद्यमान और अविद्यमान को भी, (इस प्रकार) सारी घटनाओं को देखता है, (तथा) स्वयं सब कुछ बनकर देखता है ॥ ५ ॥

 

गार्ग्य मुनि ने जो यह तीसरा प्रश्न किया था कि कौन देवता स्वप्नों को देखता है? उसका उत्तर महर्षि पिप्पलाद यहाँ देते हैं। इस स्वप्न-अवस्था में जीवात्मा ही मन और सूक्ष्म इन्द्रियों द्वारा अपनी विभूति का अनुभव करता है। स्वप्न में यह स्वयं ही सब कुछ बनकर देखता है, उस समय जीवात्मा के अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं रहती ।

 

स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्शरीर एतत्सुखं भवति ॥ ६ ॥

 

वह (मन) जब तेज (उदान वायु) से अभिभूत हो जाता है अर्थात उस समय इन्द्रियों के सहित मन की किरणों का हृदयमें  उपसंहार हो जाता है, इस स्थिति में यह जीवात्मारूप देवता स्वप्नों को नहीं देखता। उस समय इस मनुष्य-शरीर में (जीवात्मा को) इस सुषुप्ति के सुख का अनुभव होता है ॥ ६ ॥

 

गार्ग्य मुनि ने चौथी बात यह पूछी थी कि 'निद्रा में सुखका अनुभव किसको होता है? उसका उत्तर महर्षि इस प्रकार देते हैं-जब निद्रा के समय यह मन उदानवायु के अधीन हो जाता है, अर्थात् जब उदान वायु इस मनको जीवात्मा के निवासस्थान हृदय में पहुँचाकर मोहित कर देता है, उस निद्रावस्था में यह जीवात्मा मन के द्वारा स्वप्न की घटनाओं को नहीं देखता । उस समय निद्राजनित सुखका अनुभव जीवात्मा को ही होता है। इस शरीर में सुख- दुःखों को भोगने वाला, प्रत्येक अवस्था में प्रकृतिस्थ पुरुष अर्थात् जीवात्मा ही है ।

 

स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं सम्प्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत् सर्वं पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥ ७ ॥

 

(पाँचवीं बात जो तुमने पूछी थी) वह (इस प्रकार समझनी चाहिये) हे सोम्य जिस प्रकार बहुत-से पक्षी (सायंकाल में) अपने निवासरूप वृक्ष पर (आकर) आराम से ठहरते हैं (बसेरा करते हैं)-ठीक वैसे ही वे (आगे बताये जाने वाले पृथिवी आदि तत्त्वों से लेकर प्राण तक) सब-के-सब परमात्मा में सुखपूर्वक आश्रय पाते हैं॥ ७ ॥

 

गार्ग्य मुनि ने जो यह पाँचवीं बात पूछी थी कि 'ये मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और प्राण - सब-के-सब किसमें स्थित हैं-किसके आश्रित हैं।' उसका उत्तर महर्षि इस प्रकार देते हैं- आकाश में उड़ने वाले पक्षीगण जिस प्रकार सायंकाल में लौटकर अपने निवास (वृक्ष) पर आराम से बसेरा लेते हैं, ठीक उसी प्रकार आगे बतलाये जाने वाले पृथ्वी से लेकर प्राण तक जितने तत्त्व हैं, वे सब-के-सब परब्रह्म पुरुषोत्तम में, जो कि सबके आत्मा हैं, आश्रय लेते हैं; क्योंकि वे ही इन सबके परम आश्रय हैं।

 

पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक्व स्पर्श- यितव्यं च वाक्च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च ॥ ८ ॥

 

पृथिवी और उसकी तन्मात्रा (सूक्ष्म गन्ध) भी, जल और रसतन्मात्रा भी, तेज और रूप- तन्मात्रा भी, वायु और स्पर्श - तन्मात्रा भी, आकाश और शब्द- तन्मात्रा भी, नेत्र-इन्द्रिय और देखने में आनेवाली वस्तु भी, श्रोत्र- इन्द्रिय और सुनने में आनेवाली वस्तु भी, घ्राणेन्द्रिय और सूँघने में आनेवाली वस्तु भी, रसना-इन्द्रिय और रसना के विषय भी, त्वक् - इन्द्रिय और स्पर्श में आने वाली वस्तु भी, वाक्-इन्द्रिय और बोलने में आनेवाला शब्द भी, दोनों हाथ और पकड़ने में आनेवाली वस्तु भी, उपस्थ-इन्द्रिय और उसका विषय भी, गुदा-इन्द्रिय और उसके द्वारा परित्यागयोग्य वस्तु भी, दोनों चरण और गन्तव्य स्थान भी, मन और मनन में आने वाली वस्तु भी, बुद्धि और जानने में आनेवाली वस्तु भी, अहंकार और उसका विषय भी, चित्त और चिन्तन में आनेवाली वस्तु भी, प्रभाव और उसका विषय भी, प्राण और प्राण के द्वारा धारण किये जाने वाले पदार्थ भी (ये सब-के-सब परमात्माके आश्रित हैं) ॥ ८ ॥

 

एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परेऽक्षर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥ ९ ॥

 

यह जो देखने वाला, स्पर्श करने वाला, सुननेवाला, सूँघनेवाला, स्वाद लेने वाला, मनन करने वाला, जानने वाला तथा कर्म करने वाला, विज्ञानस्वरूप पुरुष (जीवात्मा) है, वह भी अविनाशी परमात्मा में भलीभाँति स्थित है ॥ ९ ॥

 

परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य । स सर्वज्ञः सर्वो भवति । तदेष श्लोकः ॥ १० ॥

 

निश्चय ही जो कोई भी उस छायारहित, शरीररहित, लाल, पीले आदि रंगों से रहित, विशुद्ध अविनाशी पुरुष को जानता है, वह परम अविनाशी परमात्मा को ही प्राप्त हो जाता है। हे प्रिय ! जो कोई ऐसा है, वह सर्वज्ञ (और) सर्वरूप हो जाता है— उस विषयमें यह (अगला) श्लोक है ॥ १०॥

 

विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः

प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र ।

तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य

स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ ११ ॥

 

जिसमें समस्त प्राण (और पाँचों भूत) तथा सर्वैः देवैः सह सम्पूर्ण इन्द्रिय और अन्तः करण के सहित विज्ञानस्वरूप आत्मा आश्रय लेते हैं। हे प्रिय ! उस अविनाशी परमात्मा को जो कोई जान लेता है वह सर्वज्ञ है, (वह) सर्वस्वरूप परमेश्वर में प्रविष्ट हो जाता है —इस प्रकार (इस प्रश्नका उत्तर समाप्त हुआ) ॥ ११ ॥

 

॥ चतुर्थ प्रश्न समाप्त ४ ॥

 


 

 

चौथे प्रश्न का सारांश

 

इस अध्याय में, गार्ग्य मुनि ने महर्षि पिप्पलाद से मनुष्य शरीर में रहने वाले देवताओं के बारे में पाँच प्रश्न पूछे।

 

1.    गाढ़ी निद्रा के समय कौन-कौन सोते हैं?

2.     इसमें कौन-कौन जागते रहते हैं?

3.    यह कौन देवता स्वप्नों को देखता है?

4.    यह सुख किसको होता है?

5.    ये सब-के-सब किसमें निश्चितरूप से सम्पूर्णतया स्थित रहते हैं?

 

महर्षि पिप्पलाद ने इन सभी प्रश्नों का उत्तर दिया।

 

1.    गाढ़ी निद्रा के समय सभी इन्द्रियाँ मन में एक हो जाती हैं, इसलिए उस समय जीवात्मा न तो सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न आनंदित होता है, न मल-मूत्रका त्याग करता है, न चलता है।

2.    स्वप्न अवस्था में जीवात्मा ही मन और सूक्ष्म इन्द्रियों द्वारा अपनी विभूति का अनुभव करता है। जीवात्मा अपने पिछले अनुभवों या कल्पनाओं के आधार पर सपने देखता है।

3.    निद्राजनित सुख जीवात्मा को ही होता है। जागने की अवस्था में, सभी इंद्रियां और मन जीवात्मा को बाहरी दुनिया के साथ जोड़ती हैं। जीवात्मा सुख और दुख का अनुभव करता है।

4.    ये सभी देवता परमात्मा में स्थित हैं।

5.    महर्षि पिप्पलाद ने यह भी बताया कि परमात्मा ही सभी प्राणियों का आत्मा है। जो कोई भी परमात्मा को जान लेता है, वह सर्वज्ञ और सर्वरूप हो जाता है।

 

इस प्रकार, इस अध्याय में जीवात्मा और परमात्मा के संबंध के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है।

 

 

प्रश्नोपनिषद- तृतीय प्रश्न

 तृतीय प्रश्न

 

अथ हैनं कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ भगवन्कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्शरीर आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते केनोत्क्रमते कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति ॥ १ ॥

 

उसके बाद इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद) से कोसलदेशीय आश्वलायन ने भी पूछा-भगवन्! यह प्राण किससे उत्पन्न होता है; इस शरीर में कैसे आता है तथा अपने को विभाजित करके किस प्रकार स्थित होता है; किस ढंग से उत्क्रमण करता(शरीर से बाहर निकलता है); किस प्रकार बाह्य जगत को भलीभाँति धारण करता है और किस प्रकार मन और इन्द्रिय आदि शरीर के भीतर रहने वाले जगत को- यही (मेरा प्रश्न है) ॥ १ ॥

 

व्याख्या - इस मन्त्र में आश्वलायन मुनि ने महर्षि पिप्पलाद से कुल छः बातें पूछी हैं-

(१) जिस प्राण की महिमाका आपने वर्णन किया, वह प्राण किससे उत्पन्न होता है?

(२) वह इस मनुष्य-शरीर में कैसे प्रवेश करता है?

(३) अपने को विभाजित करके किस प्रकार शरीर में स्थित रहता है?

(४) एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में जाते समय पहले शरीर से किस प्रकार निकलता है ?

(५) इस बाह्य (पाञ्चभौतिक) जगत को किस प्रकार धारण करता है ?

(६) मन और इन्द्रिय आदि आध्यात्मिक (आन्तरिक) जगत्‌ को किस प्रकार धारण करता है?

यहाँ प्राण के विषय में वे ही बातें पूछी गयी हैं, जिनका वर्णन पहले उत्तर में नहीं आया है और जो पहले प्रश्न के उत्तर को सुनकर ही स्फुरित हुई हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रश्नोत्तर के समय सुकेशादि छहों ऋषि वहाँ साथ-साथ बैठे सुन रहे थे ॥ १ ॥

 

तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥ २ ॥

 

उससे उन प्रसिद्ध महर्षि ने कहा- तू बड़े कठिन प्रश्न पूछ रहा है (किंतु) तू वेदों में निष्णात है अत: मैं तेरे प्रश्नों का उत्तर देता हूँ ॥ २ ॥

 

आत्मन एष प्राणो जायते यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे ॥३॥

 

यह प्राण आत्मन (परमात्मा) से उत्पन्न होता है। जिस प्रकार यह छाया पुरुष के होने पर ही होती है उसी प्रकार यह (प्राण) इस (परमात्मा/आत्मन) के ही आश्रित है (और) इस शरीर में मनोकृतेन (मन के किये हुए संकल्प से) आता है॥ ३ ॥

 

यहाँ महर्षि पिप्पलाद ने क्रम से आश्वलायन ऋषिके दो प्रश्नोंका उत्तर दिया है। पहले प्रश्नका उत्तर तो यह है कि जिसका प्रकरण चल रहा है, वह सर्वश्रेष्ठ प्राण परमात्मा से उत्पन्न हुआ है।

इसकी स्थिति उस सर्वात्मा महेश्वर के अधीन एवं उसी के आश्रित है-ठीक उसी प्रकार जैसे किसी मनुष्यकी छाया उसके अधीन रहती है।

दूसरे प्रश्न का उत्तर यह है कि मन द्वारा किये हुए संकल्प से वह शरीर में प्रवेश करता है। ॥ ३ ॥

 

सम्बन्ध - अब आश्वलायन के तीसरे प्रश्नका उत्तर विस्तारपूर्वक आरम्भ किया जाता है-

 

यथा सम्राडेवाधिकृतान्विनियुङ्क्ते एतान्ग्रामानेता-

न्ग्रामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान्पृथक्पृथगेव संनिधत्ते ॥ ४ ॥

 

जिस प्रकार सम्राट् एव चक्रवर्ती महाराज स्वयं ही इन गाँवों में तुम रहो, इन गाँवों में तुम रहो - इस प्रकार अधिकारियों को अलग-अलग नियुक्त करता है; उसी प्रकार यह मुख्य प्राण दूसरे प्राणों को पृथक्-पृथक् ही स्थापित करता है ॥ ४ ॥

  

सम्बन्ध - अब मुख्य प्राण, अपान और समान-इन तीनों का वासस्थान और कार्य बतलाया जाता है-

 

पायूपस्थेऽपानं चक्षुः श्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते मध्ये तु समानः । एष ह्येतद्भुतमन्नं समं नयति तस्मादेताः सप्तार्चिषो भवन्ति ॥ ५ ॥

 

(वह) प्राण गुदा और उपस्थ में अपान को नियुक्त करता है (मल-मूत्रको शरीरके बाहर निकाल देना है; रज, वीर्य और गर्भको बाहर करना भी इसीका काम है।)। स्वयं मुख और नासिका द्वारा (विचरता हुआ) नेत्र और श्रोत्र में स्थित रहता है और शरीर के मध्यभाग में समान रहता है। यह (समान वायु) ही इस प्राणाग्नि में हवन किये हुए अन्न (उदर में डाले हुए अन्न) को समस्त शरीर में यथायोग्य समभाव से पहुँचाता है। उससे ये सात ज्वालाएँ (विषयों को प्रकाशित करने वाले ऊपर के द्वार- दो नेत्र, दो कान, दो नासिकाएँ और एक मुख अर्थात रसना) उत्पन्न होती हैं ॥ ५ ॥

 

संबंध – अब व्यान की गति का वर्णन किया जाता है।

 

हृदि ह्येष आत्मा अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्त्राणि भवन्त्यासु  व्यानश्चरति ॥ ६ ॥

 

यह प्रसिद्ध आत्मा (जीवात्मा) हृदय देश में रहता है; इस (हृदय) में मूलरूप से एक सौ नाडियों का समुदाय है; उनमें से एक-एक नाडी में एक-एक सौ (शाखाएँ) हैं (प्रत्येक शाखा-नाडी की) बहत्तर- बहत्तर हजार प्रतिशाखानाडियाँ होती हैं; इनमें व्यान वायु विचरण करता है ॥ ६ ॥

 

व्याख्या - इस शरीरमें जो हृदयप्रदेश है, जो जीवात्माका निवासस्थान है, उसमें एक सौ मूलभूत नाडियाँ हैं; उनमेंसे प्रत्येक नाडी की एक-एक सौ शाखा - नाडियाँ हैं और प्रत्येक शाखा नाडीकी बहत्तर बहत्तर हजार प्रतिशाखा- नाडियाँ हैं। इस प्रकार इस शरीरमें कुल बहत्तर करोड़ नाडियाँ हैं; इन सब में व्यानवायु विचरण करता है ॥ ६ ॥

 

सम्बन्ध - अब उदानका स्थान और कार्य बतलाते हैं, साथ ही आश्वलायनके चौथे प्रश्नका उत्तर भी देते हैं-

 

अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥ ७ ॥

 

तथा जो एक नाडी और है, उसके द्वारा उदान वायु ऊपर की ओर विचरता है। वह पुण्य कर्मों के द्वारा [ मनुष्यम् ]मनुष्य को पुण्यलोकों में ले जाता है; पापकर्मों के कारण (उसे) पापयोनियों में ले जाता है (तथा) पाप और पुण्य दोनों प्रकार के कर्मों द्वारा (जीव को) मनुष्यलोकम् अर्थात मनुष्य-शरीर में ले जाता है ॥ ७ ॥

 

व्याख्या – इन ऊपर बतलायी हुई बहत्तर करोड़ नाड़ियों से भिन्न एक नाडी और है जिसको 'सुषुम्णा' कहते हैं, जो हृदयसे निकलकर ऊपर मस्तक में गयी है। उसके द्वारा उदानवायु शरीर में ऊपर की ओर विचरण करता है। (इस प्रकार आश्वलायन के तीसरे प्रश्न का समाधान करके अब महर्षि उसके चौथे प्रश्न का उत्तर संक्षेप में देते हैं— ) जो मनुष्य पुण्यशील होता है, जिसके शुभकर्मों के भोग उदय हो जाते हैं, उसे यह उदानवायु ही अन्य सब प्राण और इन्द्रियों के सहित वर्तमान शरीर से निकालकर पुण्यलोकों में अर्थात् स्वर्गादि उच्च लोकों में ले जाता है। पापकर्मों से युक्त मनुष्य को शूकर- कूकर आदि पाप -योनियों में और रौरवादि नरकों में ले जाता है तथा जो पाप और पुण्य- दोनों प्रकार के कर्मों का मिश्रित फल भोगने के लिये अभिमुख हुए रहते हैं, उनको मनुष्य-शरीर में ले जाता है * ॥ ७ ॥

* एक शरीर से निकलकर जब मुख्य प्राण उदान को साथ लेकर उसके द्वारा दूसरे शरीर में जाता है, तब अपने अङ्गभूत समान आदि प्राणों को तथा इन्द्रिय और मन को तो साथ ले ही जाता है, इन सबका स्वामी जीवात्मा भी उसी के साथ जाता है-यह बात यहाँ कहनी थी; इसीलिये पूर्वमन्त्रमें  जीवात्मा का स्थान हृदय बतलाया गया है।

 

सम्बन्ध - अब दो मन्त्रों में आश्वलायन के पाँचवें और छठे प्रश्न का उत्तर देते हुए जीवात्माके प्राण और इन्द्रियों सहित एक शरीर से दूसरे शरीर में जानेकी बात भी स्पष्ट करते हैं-

 

आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः । पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः ॥ ८ ॥

 

यह निश्चय है कि सूर्य ही बाह्य प्राण है; यही इस नेत्र सम्बन्धी प्राण पर अनुग्रह करता हुआ उदित होता है। पृथ्वी में जो (अपानवायु की शक्तिरूप) देवता है वही यह मनुष्य के अपान वायु को स्थिर किये रहता है। पृथ्वी और स्वर्ग के बीच जो आकाश (अन्तरिक्षलोक) है; वह समान है, वायु ही व्यान है ॥ ८ ॥

 

व्याख्या - यह निश्चयपूर्वक समझना चाहिये कि सूर्य ही सबका बाह्य प्राण है। यह मुख्य प्राण सूर्यरूप से उदय होकर इस शरीर के बाह्य अङ्ग- प्रत्यङ्गों को पुष्ट करता है और नेत्र-इन्द्रिय रूप आध्यात्मिक शरीर पर अनुग्रह करता है-उसे देखनेकी शक्ति अर्थात् प्रकाश देता है। पृथ्वी में जो देवता अर्थात् अपानवायु की शक्ति है, वह मनुष्य के भीतर रहने वाले अपानवायु को आश्रय देती है-टिकाये रखती है। यह इस अपानवायु की शक्ति गुदा और उपस्थ इन्द्रियों की सहायक है तथा इनके बाहरी स्थूल आकार को धारण करती है। पृथ्वी और स्वर्गलोक के बीच का जो आकाश है, वही समानवायु का बाह्य स्वरूप है। वह इस शरीर के बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्गों को अवकाश देकर इसकी रक्षा करता है और शरीर के भीतर रहनेवाले समानवायु को विचरने के लिये शरीर में अवकाश देता है; इसी की सहायता से श्रोत्र- इन्द्रिय शब्द सुन सकती है। आकाश में विचरने वाला प्रत्यक्ष वायु ही व्यान का बाह्य स्वरूप है, यह इस शरीर के बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्ग को चेष्टाशील करता है और शान्ति प्रदान करता है; भीतरी व्यानवायु को नाडियों में संचारित करने तथा त्वचा इन्द्रिय को स्पर्श का ज्ञान कराने में भी यह सहायक है ॥ ८ ॥

 

तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥ ९ ॥

 

प्रसिद्ध तेज (गर्मी) ही उदान है इसीलिये जिसके शरीर का तेज शान्त हो जाता है, वह (जीवात्मा) मन में विलीन हुई इन्द्रियों के साथ पुनर्जन्म को (प्राप्त होता है) ॥ ९ ॥

 

व्याख्या- सूर्य और अग्रि का जो बाहरी तेज अर्थात् उष्णत्व है, वही उदान का बाह्य स्वरूप है। वह शरीर के बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्गों को ठंडा नहीं होने देता और शरीर के भीतर की ऊष्मा को भी स्थिर रखता है। जिसके शरीर से उदानवायु निकल जाता है, उसका शरीर गरम नहीं रहता अतः शरीर की गर्मी शान्त हो जाते ही उसमें रहने वाला जीवात्मा मन में विलीन हुई इन्द्रियों को साथ लेकर उदानवायु के साथ-साथ दूसरे शरीर में चला जाता है (गीता १५ । ८) ॥ ९ ॥

 

शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्यत्क्रामतीश्वरः।

गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥8॥

 

जिस प्रकार से वायु सुगंध को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है उसी प्रकार से देहधारी आत्मा जब पुराने शरीर का त्याग करती है और नये शरीर में प्रवेश करती है उस समय वह अपने साथ मन और इन्द्रियों को भी ले जाती है।

 

सम्बन्ध - अब आश्वलायन के चौथे प्रश्न में आयी हुई एक शरीर से निकलकर दूसरे शरीर में या लोकों में प्रवेश करने की बात का पुनः स्पष्टीकरण किया जाता है-

 

यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति ॥ १० ॥

 

यह (जीवात्मा) जिस संकल्प वाला (चित्त वाला) होता है; उस संकल्प के साथ मुख्य प्राण में स्थित हो जाता है। मुख्य प्राण तेज (उदान) से युक्त हो अपने सहित (मन, इन्द्रियों से युक्त जीवात्मा को) उसके संकल्पानुसार भिन्न-भिन्न लोक अथवा योनि में ले जाता है ॥ १० ॥

 

व्याख्या -मरते समय इस आत्मा का जैसा संकल्प होता है, इसका मन अन्तिम क्षण में जिस भाव का चिन्तन करता है (गीता ८। ६), उस संकल्प के सहित मन, इन्द्रियों को साथ लिये हुए यह मुख्य प्राण में स्थित हो जाता है। वह मुख्य प्राण उदानवायु से मिलकर अपने सहित मन और इन्द्रियों से युक्त जीवात्मा को उस अन्तिम संकल्प के अनुसार यथायोग्य भिन्न-भिन्न लोक अथवा योनि में ले जाता है। अतः मनुष्य को उचित है कि अपने मन में निरन्तर एक भगवान का ही चिन्तन रखे, दूसरा संकल्प न आने दे, क्योंकि जीवन अल्प और अनित्य है, न जाने कब अचानक इस शरीरका अन्त हो जाय। यदि उस समय भगवान्‌ का चिन्तन न होकर कोई दूसरा संकल्प आ गया तो सदा की भाँति पुनः चौरासी लाख योनियों में भटकना पड़ेगा ॥ १० ॥

 

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भ‍ावभावित: ॥८_६ ॥

 

हे कुन्तीपुत्र! शरीर त्यागते समय मनुष्य जिस-जिस भाव का स्मरण करता है, वह उस उस भाव को निश्चित रूप से प्राप्त होता है।

 

 सम्बन्ध - अब प्राणविषयक ज्ञान का सांसारिक और पारलौकिक फल बतलाते हैं-

 

य एवं विद्वान्प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ११ ॥

 

जो कोई विद्वान् इस प्रकार प्राण (के रहस्य) को जानता है उसकी प्रजा (संतान परम्परा) कदापि नष्ट नहीं होती (वह) अमर हो जाता है- इस विषय का यह (अगला) श्लोक (है) ॥ ११ ॥

 

व्याख्या-जो कोई विद्वान् इस प्रकार इस प्राण के रहस्य को समझ लेता है, प्राण के महत्त्व को समझकर हर प्रकार से उसे सुरक्षित रखता है, उसकी अवहेलना नहीं करता, उसकी संतानपरम्परा कभी नष्ट नहीं होती, क्योंकि उसका वीर्य अमोघ और अद्भुत शक्तिसम्पन्न हो जाता है। और वह यदि उसके आध्यात्मिक रहस्य को समझकर अपने जीवन को सार्थक बना लेता है, एक क्षण भी भगवान् के चिन्तन से शून्य नहीं रहने देता, तो सदा के लिये अमर हो जाता है अर्थात् जन्म-मरणरूप संसार से मुक्त हो जाता है। इस विषय पर निम्नलिखित ऋचा है - ॥ ११ ॥

 

उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा ।

अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते विज्ञायामृतमश्नुत इति ॥ १२ ॥

 

प्राण की उत्पत्ति आगम स्थान और व्यापकता को भी तथा बाह्य एवं आध्यात्मिक पाँच भेदों को भी भलीभाँति जानकर (मनुष्य) अमृतका अनुभव करता है, जानकर अमृत का अनुभव करता है। यह पुनरुक्ति प्रश्न की समाप्ति सूचित करने के लिये है ॥ १२ ॥

 

व्याख्या - उपर्युक्त विवेचन के अनुसार जो मनुष्य प्राण की उत्पत्ति को अर्थात् यह जिससे और जिस प्रकार उत्पन्न होता है-इस रहस्य को जानता है, शरीर में उसके प्रवेश करने की प्रक्रिया का तथा इसकी व्यापकता का ज्ञान रखता है तथा जो प्राण की स्थिति को अर्थात् बाहर और भीतर-कहाँ-कहाँ वह रहता है, इस रहस्य को तथा इसके बाहरी और भीतरी अर्थात् आधिभौतिक और आध्यात्मिक पाँचों भेदों के रहस्य को भलीभाँति समझ लेता है, वह अमृतस्वरूप परमानन्दमय परब्रह्म परमेश्वर को प्राप्त कर लेता है तथा उस आनन्दमय के संयोग-सुख का निरन्तर अनुभव करता है ॥ १२ ॥

 

॥ तृतीय प्रश्न समाप्त ३ ॥


 

तीसरे प्रश्न का सारांश

यह अध्याय  महर्षि आश्वलायन और महर्षि पिप्पलाद के बीच एक वाद-विवाद है, जहाँ आश्वलायन प्राण के प्रकृति को समझने का प्रयास करते हैं। इस वाद में कुछ मुख्य बिंदुओं को खोलते हैं:

1.    प्राण का उत्पत्ति स्थान: यह प्राण परमात्मा या आत्मा (परमात्मा) से उत्पन्न होता है और इस परमात्मा के आश्रित होता है, जैसे कि एक व्यक्ति की छाया उसके परमात्मा के आश्रित होती है।

2.    शरीर में प्राण का प्रवेश: प्राण मानसिक संकल्प के माध्यम से शारीरिक शरीर में प्रवेश करता है और विभिन्न शारीरिक क्रियाओं के लिए जिम्मेदार होता है।

3.    प्राण की कार्य: प्राण शरीर में विभिन्न कार्यों को नियंत्रित करता है, जैसे श्वास की चालन, पाचन (अपान), और ऊर्जा का शरीर में प्रसारण। यह मन और इंद्रियों का भी निग्रह करता है।

4.    नाडियों की भूमिका: अध्याय  में शरीर में अनगिनत नाडियों की मौजूदगी का वर्णन है, जिनमें से एक मुख्य नाडी को 'सुषुम्णा' कहा जाता है। प्राण इन नाडियों के माध्यम से घूमता है, और सुषुम्णा हृदय से मस्तक तक जुड़ती है।

5.    कर्म और पुनर्जन्म: प्राण कर्म और पुनर्जन्म के चक्र में भी एक भूमिका निभाता है। यह कर्मों के आधार पर आत्मा को विभिन्न लोकों में ले जाता है, जिससे विभिन्न जीवन रूपों का अनुभव होता है।

6.    विभिन्न प्राणों की भूमिका: शरीर में विभिन्न प्राणों, जैसे कि उदान और व्यान, की विशेष भूमिकाएँ होती हैं, और इन्हें शरीर की विभिन्न भौतिकी प्रक्रियाओं में योगदान करने का काम होता है।

7.    प्राकृतिक तत्वों से संबंध: अध्याय  में प्राण और प्राकृतिक तत्वों, जैसे कि सूर्य, पृथ्वी, और आकाश के बीच संबंध का वर्णन भी है।

8.    मोक्ष: अध्याय यह बताता है कि जो व्यक्ति प्राण और इसके कार्यों के रहस्य को समझते हैं, वे मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं और अमर बन सकते हैं।

संक्षेप में, यह अध्याय  प्राण, उसकी उत्पत्ति, कार्यों, और जीवन और मृत्यु के चक्र में इसकी भूमिका को अन्वेषण करता है। इस अध्याय ने आध्यात्मिक विकास और अंतिम मोक्ष के लिए प्राण को समझने के महत्व को महत्वपूर्ण बताया है।

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Thursday, 19 October 2023

प्रश्नोपनिषद- द्वितीय प्रश्न

 द्वितीय प्रश्न

 

अथ हैनं भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ। भगवन्कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते कतर एतत्प्रकाशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥

 

इसके पश्चात् इन प्रसिद्ध (महात्मा पिप्पलाद) ऋषि से विदर्भदेशीय भार्गव ने पूछा; भगवन्! कुल कितने देवता प्रजा को धारण करते हैं; उनमें से कौन-कौन इसे प्रकाशित करते हैं फिर (यह भी बतलाइये कि ) इन सबमें कौन है; यही (मेरा प्रश्न है ) ॥ १ ॥

 

व्याख्या - इस मन्त्र में भार्गव ऋषि ने महर्षि पिप्पलादसे तीन बातें पूछी हैं-

(१) प्रजाको यानी प्राणियोंके शरीरको धारण करनेवाले कुल कितने देवता हैं?

(२) उनमें से कौन-कौन इसको प्रकाशित करनेवाले हैं?

(३) इन सबमें अत्यन्त श्रेष्ठ कौन है ? ॥ १ ॥

 

तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च । ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥

 

उन प्रसिद्ध महर्षि (पिप्पलाद) ने उन भार्गव से कहा; निश्चय ही वह प्रसिद्ध आकाश यह देवता है (तथा) वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, वाणी (कर्मेन्द्री), नेत्र और श्रोत्र (ज्ञानेन्द्री) तथा मन (अन्तःकरण) भी [देवता हैं]। वे सब अपनी-अपनी शक्ति प्रकट करते हुएअभिमानपूर्वक कहने लगे- हमने इस शरीर को आश्रय देकर धारण कर रखा है ॥ २ ॥

 

व्याख्या - यहाँ महर्षि पिप्पलाद दो प्रश्नों का उत्तर एक ही साथ दे दिया गया है। वे कहते हैं कि सबका आधार तो वैसे आकाशरूप देवता ही हैं; परन्तु उससे उत्पन्न होने वाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- ये चारों महाभूत भी शरीर को धारण किये रहते हैं। यह स्थूल शरीर इन्हीं से बना है। इसलिये ये धारक देवता हैं। वाणी आदि पाँच कर्मेन्द्रियाँ, नेत्र और कान आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन आदि चार अन्तःकरण-ये चौदह देवता इस शरीर के प्रकाशक हैं। ये देवता देह को धारण और प्रकाशित करते हैं, इसलिये ये धारक और प्रकाशक देवता कहलाते हैं। ये इस देह को प्रकाशित करके आपस में झगड़ पड़े और अभिमानपूर्वक परस्पर कहने लगे कि 'हमने शरीरको आश्रय देकर धारण कर रखा है' ॥ २ ॥

 

तान्वरिष्ठः प्राण उवाच। मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्चधाऽऽत्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामीति तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥ ३ ॥

 

उनसे वरिष्ठ प्राण बोला- (तुम लोग) मोह में न पड़ो; मैं ही अपने इस स्वरूप को पाँच भागों में विभक्त करके इस शरीर को आश्रय देकर धारण करता हूँ। यह (सुनकर भी) वे अविश्वासी ही बने रहे ॥ ३ ॥

 

सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिःश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रातिष्ठन्ते । तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्त एवं वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥ ४ ॥

 

वह प्राण अभिमानपूर्वक मानो (उस शरीर से) ऊपर की ओर बाहर निकलने लगा। उसके बाहर निकलने पर उसी के साथ-ही-साथ अन्य सब भी शरीर से बाहर निकलने लगे और उसके ठहर जाने पर दूसरे सब देवता भी ठहर गये- तब जैसे (मधु के छत्ते से) मधुमक्खियों के राजा के निकलने पर (उसी के साथ-साथ) सारी ही मक्षिका (मधुमक्खियाँ) बाहर निकल जाती हैं और उसके बैठ जाने पर सब-की-सब बैठ जाती हैं; ऐसी ही दशा ( इन सबकी हुई)- अतः वाणी, नेत्र, श्रोत्र और मन वे (सभी) प्राण की श्रेष्ठता का अनुभव करके प्रसन्न होकर प्राण की स्तुति करने लगे ॥ ४ ॥

 

एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः । एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥ ५ ॥

 

यह प्राण अग्निरूप से तपता है; यही सूर्य है; यही मेघ है; यही इन्द्र है; यही वायु है (तथा) यह प्राण रूप देव ही पृथ्वी (एवं) रयि है (तथा) जो कुछ सत् और असत् है तथा जो अमृत (सत् और असत्  से भी श्रेष्ठ, परमात्मा) कहा जाता है (वह भी प्राण ही है) ॥ ५ ॥

 

व्याख्या- वे वाणी आदि सब देवता स्तुति करते हुए बोले- यह प्राण ही अग्रिरूप धारण करके तपता है और यही सूर्य है, यही मेघ, इन्द्र और वायु है। यही देव, पृथ्वी और रयि (भूतसमुदाय) है तथा सत् और असत् एवं उससे भी श्रेष्ठ जो अमृतस्वरूप परमात्मा है, वह भी यह प्राण ही है ॥ ५ ॥

 

अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् । ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च॥६॥

 

जिस प्रकार रथ के पहिये की नाभि में लगे हुए अरे नाभि के ही आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार ऋग्वेद की सब ऋचाएँ, यजुर्वेद के समस्त मन्त्र, सामवेद, उनके द्वारा सिद्ध होने वाले यज्ञादि शुभकर्म और यज्ञादि शुभकर्म करने वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि अधिकारी वर्ग-ये सभी प्राण के आधार पर ही टिके हुए हैं; सभी का आश्रय प्राण ही है ॥ ६ ॥

 

 सम्बन्ध - इस प्रकार प्राण का महत्त्व बताकर अब उसकी स्तुति की जाती है-

 

प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे। तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥ ७ ॥

 

हे प्राण ! तू ही प्रजापति है, तू ही गर्भ में विचरता है, (और तू ही) माता-पिता के अनुरूप होकर जन्म लेता है, निश्चय ही ये सब प्राणी तुझे भेंट समर्पण करते हैं ( अर्थात तुम्हारी तृप्तिके लिये ही अन्न भक्षण आदि कर रहे हैं)। तू ही अपानादि सब प्राणोंके सहित सबके शरीर में स्थित हो रहा है ॥ ७ ॥

 

देवानामसि वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा ।

ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥ ८ ॥

 

हे प्राण ! तू ही देवताओंके लिये हवि पहुँचानेवाला उत्तम अनि है । पितरोंके लिये पहली स्वधा है। अथर्वाङ्गिरस आदि ऋषियोंके द्वारा आचरित (अनुभूत) सत्य भी तू ही है ॥ ८ ॥

 

इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता । त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥ ९ ॥

 

हे प्राण! तू तेज से ( सम्पन्न) इन्द्र, रुद्र (और) रक्षा करने वाला है। तू ही अन्तरिक्ष में विचरता है (और) तू ही समस्त ज्योतिर्गणों का स्वामी सूर्य है ॥ ९ ॥

 

यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः । आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥ १० ॥

 

हे प्राण! जब तू भलीभाँति वर्षा करता है, उस समय तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा अन्न उत्पन्न होगा-यह समझकर आनन्दमय हो जाती है ॥ १० ॥

 

व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः । वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥ ११ ॥

 

हे प्राण ! तू संस्काररहित (होते हुए भी) एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है (तात्पर्य यह कि तू स्वभावसे ही शुद्ध है, अतः तुझे संस्कारद्वारा शुद्धिकी आवश्यकता नहीं है) तथा हम लोग (सभी इन्द्रियाँ और मन आदि) तेरे लिये भोजन को देनेवाले हैं और तू भोक्ता है। विश्व का स्वामी तू ही है। हे आकाश में विचरने वाले प्राण (मातरिश्व)! तू हमारा पिता है; क्योंकि तुझीसे हम सबकी उत्पत्ति हुई है  ११ 

 

या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि । या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥ १२ ॥

 

(हे प्राण!) जो तेरा स्वरूप वाचि वाणी में प्रतिष्ठित है तथा जो श्रोत्र में या  जो चक्षु में और जो मन में व्याप्त हैउसको कल्याणमय बना ले, (तू) उत्क्रमण न कर अर्थात शरीरसे उठकर बाहर  जा  १२ 

 

प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम् । मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥ १३ ॥

यह प्रत्यक्ष दीखने वाला जगत् (और) जो कुछ त्रिदिव अर्थात स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित है, वह सब-का-सब प्राण के वश में है। (हे प्राण !) जैसे माता अपने पुत्रों की रक्षा करती है, उसी प्रकार (तू हमारी) रक्षा कर तथा हमें श्री अर्थात कान्ति और प्रज्ञा अर्थात बुद्धि प्रदान कर; इति- इस प्रकार यह दूसरा प्रश्न समाप्त हुआ  १३ 

 


सारांश - द्वितीय प्रश्न (गीता प्रेस की पुस्तक से) 

इस प्रकार इस प्रकरणमें भार्गव ऋषिद्वारा पूछे हुए तीन प्रश्नोंका उत्तर देते हुए महर्षि पिप्पलादने यह बात समझायी कि समस्त प्राणियोंके शरीरोंको अवकाश देकर बाहर और भीतरसे धारण करनेवाला आकाश-तत्त्व है। साथ ही इस शरीरके अवयवोंकी पूर्ति करनेवाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- ये चार तत्त्व हैं। दस इन्द्रियाँ और अन्तःकरण-ये इसको प्रकाश देकर क्रियाशील बनानेवाले हैं। इन सबसे श्रेष्ठ प्राण है। अतएव प्राण ही वास्तवमें इस शरीरको धारण करनेवाला है, प्राणके बिना शरीरको धारण करनेकी शक्ति किसीमें नहीं है। अन्य सब इन्द्रिय आदिमें इसीकी शक्ति अनुस्यूत है, इसीकी शक्ति पाकर वे शरीरको धारण करते हैं। इसी प्रकार प्राणकी श्रेष्ठताका वर्णन छान्दोग्य-उपनिषद्के पाँचवें अध्यायके आरम्भमें और बृहदारण्यक उपनिषद्के छठे अध्यायके आरम्भमें भी आया है। इस प्रकरणमें प्राणकी स्तुतिका प्रसङ्ग अधिक है ॥ १३ ॥

 

॥ द्वितीय प्रश्न समाप्त २ ॥

विदुर नीति (अध्याय 34): जीवन को सही दिशा देने वाले और संकट से बचाने वाले नीति-मंत्र

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