Wednesday, 29 March 2023

कठ उपनिषद प्रथम अध्याय तृतीय वल्ली

 

प्रथम अध्याय तृतीय वल्ली

 

ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके

    गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।

छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति

    पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ १॥

 

सम्बन्ध - द्वितीय वल्ली में जीवात्मा और परमात्मा के स्वरूप का वर्णन किया गया है। संक्षिप्त में यह भी बताया गया है कि जिसको परमात्मा स्वीकार करते हैं, वह ही उनको जान सकता है। अब परमात्मा को प्राप्त करने के साधनों का वर्णन करने के लिये तृतीय वल्ली का आरम्भ करते हुए यमराज पहले मन्त्र में जीवात्मा और परमात्मा का नित्य सम्बन्ध और निवास-स्थान बतलाते हैं-

 

शुभ कर्मों के फलस्वरूप मनुष्य शरीर में परब्रह्म के उत्तम निवास स्थान (हृदय-आकाश) में बुद्धिरूप गुफा में छिपे हुए सत्य का पान करनेवाले (दो हैं)। वे छाया और धूप की भाँति परस्पर भिन्न हैं। (यह बात) ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महापुरुष कहते हैं तथा जो तीन बार नाचिकेत-अग्नि का चयन कर लेने वाले (और) पञ्चाग्रि सम्पन्न गृहस्थ हैं]-वे भी यही बात कहते हैं ॥ १ ॥

 

यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत् परम् ।

अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतँ शकेमहि ॥ २॥

 

सम्बन्ध - परमात्मा को जानने और प्राप्त करने का जो सर्वोत्तम साधन ‘उन्हें जानने और पाने की शक्ति प्रदान करने के लिये उन्हीं से प्रार्थना करना है’-  इस बात को यमराज स्वयं प्रार्थना करते हुए बताते हैं-

 

यज्ञ करनेवालोंके लिये यः सेतु-जो दुःखसमुद्र पार पहुँचा देने योग्य सेतु है। उस नाचिकेत-अग्रि को और संसार-समुद्र से पार होने की इच्छा वालों के लिये - जो भयरहित पद है, उस अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तम को जानने और प्राप्त करने में भी हम समर्थ हों ॥ २ ॥

 

आत्मानँ रथितं विद्धि शरीरँ रथमेव तु ।

बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३॥

 

सम्बन्ध - अब, उस परब्रह्म पुरुषोत्तम के परमधाम में किन साधनों से सम्पन्न मनुष्य पहुँच सकता है, यह बात रथ और रथी के रूपक की कल्पना करके समझायी जाती है-

 

हे नचिकेता ! तुम जीवात्मा को तो रथ का स्वामी (उसमें बैठकर चलने वाला) समझो और शरीर को ही रथ समझो तथा बुद्धि को सारथि (रथ को चलाने वाला) समझो और मन को ही लगाम समझो ॥ ३ ॥

 

इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाँ स्तेषु गोचरान् ।

आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४॥

 

ज्ञानीजन (इस रूपक में) इन्द्रियों को घोड़े बतलाते हैं और विषयों को उन घोड़ों के विचरने का मार्ग बतलाते हैं तथा शरीर, इन्द्रिय और मन–इन सबके साथ रहने वाला जीवात्मा ही भोक्ता है- यों कहते हैं ॥ ४ ॥

 


यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।

तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५॥

 

सम्बन्ध - परमात्मा की ओर न जाकर उसकी इन्द्रियाँ लौकिक विषयों में क्यों लग गयीं, इसका कारण बतलाते हैं-

 

जो सदा विवेकहीन बुद्धिवाला और अवशीभूत (चञ्चल) मन से (युक्त) रहता है, उसकी इन्द्रियाँ असावधान सारथि के दुष्ट घोड़ों की भाँति वश में न रहनेवाली भवन्ति हो जाती हैं ॥ ५ ॥

 

यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा ।

तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६॥

 

सम्बन्ध - अब स्वयं सावधान रहकर अपनी बुद्धि को विवेकशील बनाने का लाभ बतलाते हैं-

 

परंतु जो सदा विवेकयुक्त बुद्धि वाला और वश में किये हुए मन से सम्पन्न रहता है उसकी इन्द्रियाँ सावधान सारथि के अच्छे घोड़ों की भाँति वश में रहती हैं ॥ ६ ॥

 

यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः ।

न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥ ७॥

 

सम्बन्ध–पाँचवें मन्त्र के अनुसार जिसके बुद्धि और मन आदि विवेक और संयम से हीन होते हैं, उसकी क्या गति होती है-इसे बतलाते हैं-

 

जो कोई सदा विवेकहीन बुद्धिवाला असंयतचित्त और अपवित्र रहता है, वह उस परमपद को नहीं पा सकता, वह बार- बार जन्म - मृत्युरूप संसार-चक्र में ही भटकता रहता है ॥ ७ ॥

 

यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः ।

स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८॥

 

परंतु जो सदा विवेकशील बुद्धि से युक्त, संयतचित्त और पवित्र रहता है। वह तो उस परमपद को प्राप्त कर लेता है। जहाँ से (लौटकर) जन्म नहीं लेता ॥ ८ ॥

 

विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः ।

सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९॥

 

सम्बन्ध - आठवें मन्त्र में कही हुई बात को फिर से स्पष्ट करते हुए रथ के रूपक का उपसंहार करते हैं-

 

जो कोई मनुष्य विवेकशील बुद्धिरूप सारथि से सम्पन्न (और) मनरूप लगाम को वश में रखनेवाला है। वह संसार मार्ग के पहुँचकर सर्वव्यापी परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान के -उस सुप्रसिद्ध परमपद को प्राप्त हो जाता है ।।९।।

 

इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः ।

मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥ १०॥

 

सम्बन्ध- उपर्युक्त वर्णन में रथ के रूपक की कल्पना करके भगवत्प्राप्ति के लिये जो साधन बतलाया गया, उसमें विवेकशील बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके, इन्द्रियों को विपरीत मार्ग से हटाकर, भगवत्प्राप्ति के मार्ग में लगाने की बात कही गयी। इस पर यह जिज्ञासा होती है कि स्वभाव से ही दुष्ट और बलवान् इन्द्रियों को उनके प्रिय और अभ्यस्त असत्-मार्ग से किस प्रकार हटाया जाय अतः इस बात का तात्त्विक विवेचन करके इन्द्रियों को असत्-मार्ग से रोककर भगवान्‌ की ओर लगाने का प्रकार बतलाते हैं-

 

क्योंकि इन्द्रियों से शब्दादि विषय बलवान् हैं और शब्दादि विषयों से मन प्रबल है और मन से भी बुद्धि बलवती है तथा बुद्धि से महान् आत्मा (उन सब का स्वामी होने के कारण) अत्यन्त श्रेष्ठ और बलवान् है ॥ १० ॥

 

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः ।

पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११॥

 

उस जीवात्मा से बलवती है भगवान्‌ की अव्यक्त माया शक्ति। अव्यक्त माया से भी श्रेष्ठ है परमपुरुष (स्वयं परमेश्वर)। परमपुरुष भगवान्‌ से श्रेष्ठ और बलवान् किञ्चित् कुछ भी नहीं है। वही सबकी परम अवधि (और) वही परम गति है ॥ ११ ॥

 

एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽऽत्मा न प्रकाशते ।

दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२॥

 

सम्बन्ध - यही भाव अगले मन्त्रमें स्पष्ट करते हैं-

 

आत्मा- यह सबका आत्मरूप समस्त प्राणियों में रहता हुआ भी माया के परदे में छिपा रहने के कारण सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, केवल सूक्ष्मतत्त्वों को समझने वाले पुरुषों द्वारा ही अति सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धि से दृश्यते देखा जाता है ॥ १२ ॥

 

यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।

ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३॥

 

सम्बन्ध - विवेकशील मनुष्य को भगवान्‌ के शरण होकर किस प्रकार भगवान की प्राप्ति के लिये साधन करना चाहिये ? - इस जिज्ञासा पर कहते हैं-

 

बुद्धिमान् साधक को चाहिये कि (पहले) वाक् आदि (समस्त इन्द्रियों) को मन में निरुद्ध करे। उस मन को ज्ञानस्वरूप बुद्धि में विलीन करे। ज्ञानस्वरूप बुद्धि को महान् आत्मा में विलीन करे (और) उसको शान्तस्वरूप परमपुरुष परमात्मा में विलीन करे ॥ १३ ॥

 

उत्तिष्ठत जाग्रत

    प्राप्य वरान्निबोधत ।

क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया

    दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४॥

 

सम्बन्ध — इस प्रकार परमात्मा के स्वरूप का वर्णन करके तथा उसकी प्राप्ति का महत्त्व और साधन बतलाकर अब श्रुति मनुष्यों को सावधान करती हुई कहती है-

 

(हे मनुष्यो!) उठो, (सावधान हो जाओ और) श्रेष्ठ महापुरुषों को पाकर उनके पास जाकर (उनके द्वारा) उस परब्रह्म परमेश्वरको जान लो (क्योंकि) त्रिकालज्ञ ज्ञानीजन उस तत्त्वज्ञान के मार्ग को छूरे की तीक्ष्ण की हुई दुस्तर धार के सदृश दुर्गम (अत्यन्त कठिन)बतलाते हैं॥ १४ ॥

 

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं

    तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।

अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं

    निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ १५॥

 

सम्बन्ध - ब्रह्मप्राप्ति का मार्ग इतना दुस्तर क्यों है ? इस जिज्ञासा पर परमात्मा के स्वरूप का वर्णन करते हुए उसको जानने का फल बतलाते हैं-

 

जो शब्दरहित, स्पर्शरहित, रूपरहित, रसरहित और बिना गन्धवाला है तथा (जो) अविनाशी, नित्य, अनादि, अनंत (असीम), महान् आत्मा से श्रेष्ठ (एवं) ध्रुव (सर्वथा सत्य तत्त्व) है, उस परमात्मा को जानकर (मनुष्य) मृत्यु के मुखसे सदा के लिये छूट जाता है ॥ १५ ॥

 

नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तँ सनातनम् ।

उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६॥

 

सम्बन्ध - यहाँ तक एक अध्यायके उपदेशको पूर्ण करके अब इस आख्यानके श्रवण और वर्णनका माहात्म्य बतलाते हैं-

 

बुद्धिमान् मनुष्य यमराज के द्वारा कहे हुए नचिकेता के (इस) सनातन उपाख्यान का वर्णन करके और श्रवण करके ब्रहालोक में महिमान्वित होता है (प्रतिष्ठित होता है) ।। १६ ।।

 

य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि ।

प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते ।

तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७॥

 

जो मनुष्य सर्वथा शुद्ध होकर इस परम गुह्य रहस्यमय प्रसङ्ग को ब्राह्मणों की सभा में सुनाता है अथवा श्राद्धकाल में (भोजन करने वालों को) सुनाता है (उसका) वह श्रवण करानारूप कर्म अनन्त होने में (अविनाशी फल देने में) समर्थ होता है, वह अनन्त होनेमें समर्थ होता है ॥ १७ ॥

 

 ॥ इति काठकोपनिषदि प्रथमाध्याये तृतीया वल्ली ॥

 

Monday, 20 March 2023

कठोपनिषद - प्रथम अध्याय, द्वितीय वल्ली

प्रथम अध्याय – द्वितीय वल्ली   Part 1  Canto 2

 

अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेय-

    स्ते उभे नानार्थे पुरुषँ सिनीतः ।

तयोः श्रेय आददानस्य साधु

    भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १॥

 

कल्याण का साधन अलग है और प्रिय लगने वाले भोग का साधन अलग ही है। वे भिन्न-भिन्न फल देने वाले दोनों साधन मनुष्य को बाँधते हैं—अपनी-अपनी ओर आकर्षित करते हैं। उन दोनों में से कल्याण के साधन को ग्रहण करने वाले का कल्याण होता है परंतु जो सांसारिक भोगों के साधन को स्वीकार करता है वह यथार्थ लाभ से भ्रष्ट हो जाता है ॥ १ ॥

 

श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः

    तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।

श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते

    प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते ॥ २॥

 

श्रेय और प्रेय - ये दोनों ही मनुष्य के सामने आते हैं। धीर (बुद्धिमान् मनुष्य) उन दोनों के स्वरूप पर भलीभाँति विचार करके उनको पृथक्-पृथक् समझ लेता है और वह श्रेष्ठबुद्धिमनुष्य परम कल्याण के साधन को ही भोग-साधन की अपेक्षा श्रेष्ठ समझकर ग्रहण करता है परंतु मन्दबुद्धिवाला मनुष्य लौकिक योगक्षेम की इच्छा से भोगों के साधनरूप प्रेय को अपनाता है ॥ २ ॥

 

स त्वं प्रियान्प्रियरूपांश्च कामान्

    अभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ।

नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो

    यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३॥

 

सम्बन्ध— परमात्मा की प्राप्ति के साधनरूप श्रेय की प्रशंसा करके अब यमराज साधारण मनुष्यों को नचिकेता की विशेषता दिखलाते हुए उसके वैराग्य की प्रशंसा करते हैं-

 

हे नचिकेता! उन्हीं मनुष्यों में तुम ऐसे नि:स्पृह हो कि प्रिय लगने वाले और अत्यन्त सुन्दर रूप वाले इस लोक और परलोक के समस्त भोगों को भलीभाँति सोच-समझकर तुमने छोड़ दिया। इस सम्पत्तिरूप बेड़ी को तुम नहीं प्राप्त हुए अर्थात इसके बन्धन में नहीं फँसे, जिसमें बहुत-से मनुष्यः फँस जाते हैं ।। ३ ॥

 

दूरमेते विपरीते विषूची

    अविद्या या च विद्येति ज्ञाता ।

विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये

    न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४॥

 

जो कि अविद्या और विद्या नाम से विख्यात हैं, ये दोनों परस्पर अत्यन्त विपरीत और भिन्न-भिन्न फल देने वाली हैं। तुम नचिकेता को विद्या का ही अभिलाषी मानता हूँ क्योंकि तुमको बहुत-से भोग न किसी प्रकार भी नहीं लुभा सके ॥ ४ ॥

 

व्याख्या—ये अविद्या और विद्या नाम से प्रसिद्ध दो साधन पृथक्-पृथक् फल देने वाले हैं और परस्पर अत्यन्त विरुद्ध हैं। जिसकी भोगों में आसक्ति है, वह कल्याण-साधन में आगे नहीं बढ़ सकता और जो कल्याणमार्ग का पथिक हैं, वह भोगों की ओर दृष्टि नहीं डालता। वह सब प्रकार के भोगों को दुःखरूप मानकर उनका परित्याग कर देता है। हे नचिकेता ! मैं मानता हूँ कि तुम विद्या के ही अभिलाषी हो, क्योंकि बहुत-से बड़े-बड़े भोग भी तुम्हारे मन में किञ्चिन्मात्र भी लोभ नहीं उत्पन्न कर सके ॥ ४ ॥

 

अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः

    स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।

दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा

    अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५॥

 

अविद्या के भीतर रहते हुए (भी) अपने-आपको बुद्धिमान् और विद्वान् मानने वाले, भोग की इच्छा करने वाले वे मूर्ख लोग नाना योनियों में चारों ओर भटकते हुए अंधे मनुष्य की भाँति ही ठोकरें खाते रहते हैं। (अपने लक्ष्य तक न पहुँचकर इधर-उधर भटकते और कष्ट भोगते हैं) ॥ ५ ॥

 

न साम्परायः प्रतिभाति बालं

    प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।

अयं लोको नास्ति पर इति मानी

    पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६॥

 

इस प्रकार सम्पत्ति के मोह से मोहित निरन्तर प्रमाद करने वाले अज्ञानी को परलोक नहीं सूझता। वह समझता है कि यह प्रत्यक्ष दीखने वाला लोक ही सत्य है इसके सिवा दूसरा कुछ भी नहीं है। इस प्रकार मानने वाला अभिमानी मनुष्य बार- बार मेरे (यमराज के) वश में आता है ॥ ६ ॥

 

श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः

    श‍ृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः ।

आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा

    आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७॥

 

अब यमराज विषयासक्त, प्रत्यक्षवादी मूर्खों की निंदा करके अब उस आत्मतत्व की और उसको जानने, समझने तथा वर्णन करने वाले पुरुषों की दुर्लभता का वर्णन करते हैं -

 

जो (आत्मतत्त्व) बहुतों को तो सुनने के लिये भी नहीं मिलता, जिसको बहुत-से लोग सुनकर भी नहीं समझ सकते; ऐसे इस गूढ़ आत्मतत्त्व का वर्णन करनेवाला महापुरुष आश्चर्यमय है (बड़ा दुर्लभ है)। उसे प्राप्त करने वाला भी बड़ा कुशल (सफल जीवन) कोई एक ही होता है और जिसे तत्त्वकी उपलब्धि हो गयी है, ऐसे ज्ञानी महापुरुष के द्वारा शिक्षा प्राप्त किया हुआ आत्मतत्त्व का ज्ञाता भी आश्चर्यमय है (परम दुर्लभ है) ॥ ७ ॥

 

न नरेणावरेण प्रोक्त एष

    सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः ।

अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति

    अणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥ ८॥

 

यमराज आत्मज्ञान की दुर्लभता का कारण बताते हैं -

अल्पज्ञ मनुष्य के द्वारा बतलाये जाने पर और बहुत प्रकार से चिन्तन किये जाने पर भी यह आत्मतत्त्व सहज ही समझ में आ जाय, ऐसा नहीं है। किसी दूसरे ज्ञानी पुरुष के द्वारा उपदेश न किये जाने पर इस विषय में मनुष्य का प्रवेश नहीं होता क्योंकि यह अत्यन्त सूक्ष्म वस्तु से भी अधिक सूक्ष्म है इसलिये तर्क से अतीत है ॥ ८ ॥

 

नैषा तर्केण मतिरापनेया

    प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ ।

यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि

    त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९॥

 

हे प्रियतम! जिसको तुमने पाया है, यह बुद्धि तर्क से नहीं मिल सकती (यह तो ) दूसरेके द्वारा कही हुई ही आत्मज्ञान में निमित्त होती है। सचमुच ही तुम उत्तम धैर्यवाले हो। हे नचिकेता! हम चाहते हैं कि तुम्हारे जैसे ही पूछने वाले हमें मिला करें ॥ ९ ॥

 

जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यं

    न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् ।

ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्निः

    अनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १०॥

 

संबंध - अब यमराज अपने स्वयं के उदाहरण से निष्काम भाव की प्रशंसा करते हुए कहते हैं -

मैं जानता हूँ कि कर्मफल रूपी निधि अनित्य है क्योंकि अनित्य (विनाशशील) वस्तुओं से वह नित्य पदार्थ (परमात्मा) नहीं मिल सकता। , इसलिये मेरे द्वारा (कर्तव्यबुद्धि से) अनित्य पदार्थों के द्वारा नाचिकेत नामक अग्नि का चयन किया गया (अनित्य भोगों की प्राप्ति के लिये नहीं), अतः उस निष्कामभाव की अपूर्व शक्ति से मैं नित्य वस्तु परमात्मा को प्राप्त हो गया हूँ ॥ १० ॥

(निष्काम भाव की महिमा यह है कि अनित्य पदार्थों के द्वारा कर्तव्य-पालनरूप ईश्वर-पूजा करके मैंने नित्य सुख-रूप परमात्मा को प्राप्त कर लिया है)

 

कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां

    क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारम् ।

स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा

    धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥ ११॥

 

सम्बन्ध – नचिकेतामें वह निष्कामभाव पूर्णरूपसे है, इसलिये यमराज उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं-

हे नचिकेता ! जिसमें सब प्रकार के भोग मिल सकते हैं, जो जगत्‌ का आधार, यज्ञ का चिरस्थायी फल, निर्भयता की अवधि (अभय करने वाला), स्तुति करने योग्य एवं महत्त्वपूर्ण है तथा वेदों में जिसके गुण नाना प्रकारसे गाये गये हैं; जो दीर्घकाल तक की स्थिति से सम्पन्न है, ऐसे स्वर्गलोक को देखकर भी तुमने धैर्यपूर्वक उसका त्याग कर दिया इसलिये मैं समझता हूँ कि तुम बहुत ही बुद्धिमान् हो ॥ ११ ॥

 

 

तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं

    गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् ।

अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं

    मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२॥

 

जो योगमाया के पर्दे में छिपा हुआ, सर्वव्यापी, सबके हृदयरूप गुफा में स्थित (अतएव) संसाररूप गहन वन में रहने वाला, सनातन है। ऐसे उस कठिनता से देखे जाने वाले परमात्मदेव को शुद्ध-बुद्धि-युक्त साधक अध्यात्मयोग की प्राप्ति के द्वारा समझकर हर्ष और शोक को त्याग देता है ॥ १२ ॥

 

_नचिकेता के निष्काम भाव को देखकर यमराज ने निश्चय कर लिया कि यह परमात्मा के तत्वज्ञान का यथार्थ अधिकारी है; अत: उसके अंतःकरण में परब्रह्म पुरुषोत्तम के तत्व की जिज्ञासा उत्पन्न करने के लिए यमराज अब आगे के मंत्र में परब्रह्म परमात्मा की महिमा का वर्णन करते हैं_

 

एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः

    प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य ।

स मोदते मोदनीयँ हि लब्ध्वा

    विवृतँ सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३॥

 

मनुष्य जब इस धर्ममय (उपदेश) को सुनकर भलीभाँति ग्रहण करके और उस पर विवेकपूर्वक विचार करके इस सूक्ष्म आत्मतत्त्व को जानकर (अनुभव कर लेता है, तब) वह आनन्दस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तम को पाकर आनन्द में ही मग्र हो जाता है। तुम नचिकेता के लिये (मैं) परमधाम का द्वार खुला हुआ मानता हूँ ॥ १३ ॥

 

अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मा-

    दन्यत्रास्मात्कृताकृतात् ।

अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च

    यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥ १४॥

 

जिस उस परमेश्वर को, जो धर्म से अतीत, अधर्म से भी अतीत तथा इस कार्य और कारणरूप सम्पूर्ण जगत से भी अन्यत्र भिन्न और भूत, वर्तमान एवं भविष्यत् - तीनों कालों से तथा इनसे सम्बन्धित पदार्थों से भी अन्यत्र पृथक् (आप) जानते हैं; उसे बतलाइये ॥१४॥

 

सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति

    तपाꣳसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।

यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति

    तत्ते पदꣳ सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५॥

 

सम्बन्ध - नचिकेता के इस प्रकार पूछने पर यमराज उस ब्रह्मतत्त्व के वर्णन करने की प्रतिज्ञा करते हुए उपदेश आरम्भ करते हैं-

सम्पूर्ण वेद जिस परम पद का बारम्बार प्रतिपादन करते हैं और सम्पूर्ण तप जिस पद का लक्ष्य कराते हैं अर्थात् वे जिसके साधन है- जिसको चाहने वाले साधकगण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह पद तुम्हें (मैं) संक्षेप से बतलाता हूँ (वह है) ओम् - ऐसा यह (एक अक्षर) ॥ १५ ॥

 

एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् ।

एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६॥

 

सम्बन्ध - नामरहित होने पर भी परमात्मा अनेक नामों से पुकारे जाते हैं। उनके सब नामों में '' सर्वश्रेष्ठ माना गया है। अतः यहाँ नाम और नामी का अभेद मानकर 'प्रणव' को परब्रह्म पुरुषोत्तम के स्थान में वर्णन करते हुए यमराज कहते हैं-

 

यह अक्षर ही तो ब्रह्म है (और) यह अक्षर ही परब्रह्म है इसलिये इसी अक्षर को जानकर जो जिसको चाहता है, उसको तत्व ही (मिल जाता है) १६ ॥

 


एतदालम्बनँ श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।

एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७॥

 

यही अत्युत्तम आलम्बन है, यही (सबका) अन्तिम आत्रय है, इस आलम्बन को भलीभाँति जानकर (साधक) ब्रह्मलोक में महिमान्वित होता है ॥ १७ ॥

 

न जायते म्रियते वा विपश्चि-

    न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो

    न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८॥

 

सम्बन्ध - इस प्रकार ॐकार को ब्रह्म और परब्रह्म- इन दोनों का प्रतीक बताकर अब नचिकेता के प्रश्नानुसार यमराज पहले आत्मा के स्वरूप का वर्णन करते हैं-

 

नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा न तो जन्मता है और न मरता ही है। यह न तो स्वयं किसी से हुआ है, न इससे कोई भी हुआ है अर्थात् यह न तो किसी का कार्य है और न कारण ही है। यह अजन्मा नित्य सदा एकरस रहने वाला और पुरातन है अर्थात् क्षय और वृद्धि से रहित है। शरीर के नाश किये जाने पर भी (इसका) नाश नहीं किया जा सकता ॥ १८ ॥

 

हन्ता चेन्मन्यते हन्तुँ हतश्चेन्मन्यते हतम् ।

उभौ तौ न विजानीतो नायँ हन्ति न हन्यते ॥ १९॥

 

यदि कोई मारने वाला व्यक्ति अपने को मारने में समर्थ मानता है (और) यदि (कोई) मारा जाने वाला व्यक्ति अपने को मारा गया समझता है (तो) वे दोनों ही (आत्मस्वरूप को) नहीं जानते (क्योंकि) यह आत्मा न तो (किसी को) मारता है (और) न मारा ही जाता है| ॥ १९ ॥

 

साधक को शरीर और भोगों की अनित्यता और अपने आत्मा की नित्यता पर विचार करके, इन अनित्य भोगों से सुख की आशा का त्याग करके सदा अपने साथ रहने वाले नित्य सुखस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तम को प्राप्त करने का अभिलाषी बनना चाहिये ॥ १८-१९ ॥

 

अणोरणीयान्महतो महीया-

    नात्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ।

तमक्रतुः पश्यति वीतशोको

    धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २०॥

 

सम्बन्ध - इस प्रकार आत्मतत्त्व के वर्णन द्वारा नचिकेता के अन्तःकरण में परब्रह्म पुरुषोत्तम के तत्त्व की जिज्ञासा उत्पन्न करके यमराज अब परमात्मा के स्वरूप का वर्णन करते हैं-

इस जीवात्मा के हृदयरूप गुफा में निहित रहने वाला आत्मा (परमात्मा) सूक्ष्म से अतिसूक्ष्म (और) महान् से भी महान् है। परमात्मा की उस महिमा को कामना रहित, चिन्तारहित (कोई विरला साधक) सर्वाधार और परब्रह्म परमेश्वर की कृपा से ही देख पाता है ॥ २० ॥

 

आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः ।

कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१॥

 

वह परमेश्वर बैठा हुआ ही दूर पहुँच जाता है, सोता हुआ भी सब ओर चलता रहता है, उस ऐश्वर्य के मद से उन्मत्त न होने वाले देव को मुझसे भिन्न दूसरा कौन जानने में समर्थ है ॥ २१ ॥

 

अशरीरँ शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् ।

महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२॥

 

सम्बन्ध - अब इस प्रकार उन परमेश्वरकी महिमाको समझानेवाले पुरुषकी पहचान बताते हैं-

जो स्थिर न रहनेवाले (विनाशशील) शरीरों में शरीररहित (एवं) अविचलभाव से स्थित है, उस महान् सर्वव्यापी परमात्मा को जानकर बुद्धिमान् महापुरुष (कभी किसी भी कारण से) शोक नहीं करता ॥ २२ ॥

 

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो

    न मेधया न बहुना श्रुतेन ।

यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः

    तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूꣳ स्वाम् ॥ २३॥

 

सम्बन्ध - अब यह बतलाते हैं कि वे परमात्मा अपने पुरुषार्थसे नहीं मिलते, वरं उसीको मिलते हैं, जिसको वे स्वीकार कर लेते हैं-

 

यह परब्रह्म परमात्मा न तो प्रवचन से, न बुद्धिसे (और) न बहुत सुनने से ही प्राप्त हो सकता है। जिसको यह स्वीकार कर लेता है, उसके द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है (क्योंकि) यह परमात्मा उसके लिये अपने यथार्थ स्वरूप को प्रकट कर देता है ॥ २३ ॥

 

नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः ।

नाशान्तमानसो वाऽपि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २४॥

 

सम्बन्ध - अब यह बतलाते हैं कि परमात्मा किसको प्राप्त नहीं होते-

सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा भी इस परमात्मा को न तो वह मनुष्य प्राप्त कर सकता है, जो बुरे आचरणों से निवृत्त नहीं हुआ है, न वह प्राप्त कर सकता है, जो अशान्त है, न वह कि जिसके मन, इन्द्रियाँ संयत नहीं हैं और न वही प्राप्त करता है, जिसका मन शान्त नहीं है ॥ २४ ॥

 

यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः ।

मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५॥

 

सम्बन्ध — उस परब्रह्म परमेश्वरके तत्त्व को सुनकर और बुद्धि द्वारा विचार करके भी मनुष्य उसे क्यों नहीं जान सकता ? इस जिज्ञासा पर कहते हैं-

(संहारकाल में) जिस परमेश्वर के ब्राह्मण और क्षत्रिय - ये दोनों ही अर्थात् सम्पूर्ण प्राणिमात्र भोजन बन जाते हैं (तथा) सबका संहार करने वाली मृत्यु (भी) जिसका उपसेचन (भोज्य वस्तु के साथ लगाकर खाने का व्यञ्जन, तरकारी आदि) बन जाता है। वह परमेश्वर जहाँ (और) जैसा है, यह ठीक-ठीक कौन जानता है ॥ २५ ॥

 

 इति काठकोपनिषदि प्रथमाध्याये द्वितीया वल्ली ॥

 


कठोपनिषद - प्रथम अध्याय, प्रथम वल्ली

कठोपनिषद

 

कठोपनिषद के रचयिता कठ नाम के तपस्वी आचार्य थे। वे मुनि वैशम्पायन के शिष्य तथा यजुर्वेद की कठशाखा के प्रवृर्त्तक थे। इसमें दो अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में तीन-तीन वल्लियां हैं, जिनमें वाजश्रवा-पुत्र नचिकेता और यमराज के बीच संवाद हैं।

 

    

  ॥ अथ कठोपनिषद् ॥

 

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सहवीर्यं करवावहै ।

तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ॥

 

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

 

पूर्णब्रह्म परमात्मन् आप हम दोनों गुरु-शिष्य की साथ-साथ रक्षा करें, हम दोनों का साथ-साथ पालन करें, हम दोनों साथ-साथ ही शक्ति प्राप्त करें। हम दोनों की पढ़ी हुई विद्या तेजोमयी हो, हम दोनों परस्पर द्वेष न करें।

 

प्रथम अध्याय, प्रथम वल्ली  Part I  Canto I

 

ॐ उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ ।

तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥ १॥

 

ॐ- इस सच्चिदानन्दघन परमात्मा के नाम का स्मरण करके उपनिषद् का आरम्भ करते हैं। प्रसिद्ध है कि यज्ञ का फल चाहने वाले वाजश्रवा के पुत्र उद्दालक ने विश्वजित् यज्ञ में अपना सारा धन ब्राह्मणों को दे दिया। उसका नचिकेता नाम से प्रसिद्ध एक पुत्र था ॥१॥

 

ग्रंथ का आरंभ ॐ कार का उच्चारण (परमात्मा का स्मरण करके) किया गया है। 

 

तँ ह कुमारँ सन्तं दक्षिणासु

नीयमानासु श्रद्धाविवेश सोऽमन्यत ॥ २॥

 

जिस समय ब्राह्मणों को दक्षिणा के रूप में देने के लिये गौएँ लायी जा रही थीं, उस समय छोटा बालक होने पर भी उस नचिकेता में श्रद्धा आस्तिक बुद्धि का आवेश हो गया और उन जराजीर्ण गायोंको देखकर वह विचार करने लगा ॥ २ ॥

 

पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः ।

अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥ ३॥

 

जो अन्तिम बार जल पी चुकी हैं, जिनका घास खाना समाप्त हो गया है, जिनका दूध अन्तिम बार दुह लिया गया है, जिनकी इन्द्रियाँ नष्ट हो चुकी हैं, ऐसी (निरर्थक, मरणासन्न) गौओं को देने वाला, वह दाता तो शूकर- कूकरादि नीच योनियाँ और नरकादि जो सब प्रकार के सुखों से शून्य हैं, उनको प्राप्त होता है (अतः पिताजी को सावधान करना चाहिये) ॥ ३ ॥

 

स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति ।

द्वितीयं तृतीयं तँ होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥ ४॥

 

यह सोचकर वह अपने पिता से बोला कि हे प्यारे पिताजी! आप मुझे किसको देंगे ? उत्तर न मिलने पर उसने वही बात दुबारा, तिबारा कही । तब पिता ने उससे क्रोधपूर्वक इस प्रकार कहा- तुझे मैं मृत्यु को देता हूँ ॥ ४ ॥

 

बहूनामेमि प्रथमो  बहूनामेमि मध्यमः ।

किँ स्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाऽद्य करिष्यति ॥ ५॥

 

मैं बहुत-से शिष्यों में तो प्रथम श्रेणी के आचरण पर चलता आया हूँ और बहुतों में मध्यम श्रेणी के आचार पर चलता हूँ (कभी भी नीची श्रेणी के आचरण को मैंने नहीं अपनाया) फिर पिताजी ने ऐसा क्यों कहा! यम का ऐसा कौन-सा कार्य हो सकता है जिसे आज मेरे द्वारा (मुझे देकर) पिताजी पूरा करेंगे ॥ ५ ॥

 

व्याख्या - शिष्यों और पुत्रोंकी तीन श्रेणियाँ होती हैं—उत्तम, मध्यम और अधम । जो गुरु या पिताका मनोरथ समझकर उनकी आज्ञाकी प्रतीक्षा किये बिना ही उनकी रुचिके अनुसार कार्य करने लगते हैं, वे उत्तम हैं। जो आज्ञा पानेपर कार्य करते हैं, वे मध्यम हैं और जो मनोरथ जान लेने और स्पष्ट आदेश सुन लेनेपर भी तदनुसार कार्य नहीं करते, वे अधम हैं। मैं बहुत-से शिष्यों में तो प्रथम श्रेणीका हूँ, प्रथम श्रेणीके आचरणपर चलनेवाला हूँ; क्योंकि उनसे पहले ही मनोरथ समझकर कार्य कर देता हूँ; बहुत-से शिष्योंसे मध्यम श्रेणीका भी हूँ, मध्यम श्रेणीके आचारपर भी चलता आया हूँ, परंतु अधम श्रेणीका तो हूँ ही नहीं। आज्ञा मिले और सेवा न करूँ, ऐसा तो मैंने कभी किया ही नहीं। फिर, पता नहीं, पिताजीने मुझे ऐसा क्यों कहा? मृत्युदेवताका भी ऐसा कौन-सा प्रयोजन हैं, जिसको पिताजी आज मुझे उनको देकर पूरा करना चाहते हैं। 

 

अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथाऽपरे ।

सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६॥

 

 पूर्वज पितामह आदि जिस प्रकार का आचरण करते आये हैं, उस पर विचार कीजिये और वर्तमान में भी दूसरे श्रेष्ठ लोग जैसा आचरण कर रहे हैं तथा उस पर भी दृष्टिपात कर लीजिये (फिर आप अपने कर्तव्यका निश्चय कीजिये)। यह मरणधर्मा मनुष्य अनाज की तरह पकता है अर्थात् जराजीर्ण होकर मर जाता है तथा अनाज की भाँति ही फिर उत्पन्न हो जाता है ॥ ६ ॥

 

वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् ।

तस्यैताँ शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ७॥

 

यमराज के लौटने पर उनकी पत्नी ने कहा - 

 

हे सूर्यपुत्र! स्वयं अग्रिदेवता ही ब्राह्मण अतिथि के रूप में घरों में प्रवेश करते हैं। उनकी (ऐसे साधु पुरुषों की) ऐसी (अर्घ्य-पाद्य-आसन आदि के द्वारा) शान्ति किया करते हैं। अतः आप उनके पाद प्रक्षालनादि के लिये जल ले जाइये ॥ ७ ॥

 

आशाप्रतीक्षे संगतँ सूनृतां

    चेष्टापूर्ते पुत्रपशूँश्च सर्वान् ।

एतद्वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो

    यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ८॥

 

जिसके घर में ब्राह्मण अतिथि बिना भोजन किये निवास करता है, उस मन्दबुद्धि मनुष्य की नाना प्रकार की आशा और प्रतीक्षा उनकी पूर्ति से होने वाले सब प्रकार के सुख, सुन्दर भाषण के फल एवं यज्ञ, दान आदि शुभ कर्मों के और कुआँ, बगीचा, तालाब आदि निर्माण कराने के फल तथा समस्त पुत्र और पशु, इन सबको (वह) नष्ट कर देता है ॥८॥

 

तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे-

    ऽनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः ।

नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु

    तस्मात्प्रति त्रीन्वरान्वृणीष्व ॥ ९॥

 

पत्नी के वचन सुनकर धर्ममूर्ति यमराज नचिकेता के पास गए और कहा - 

 

हे ब्राह्मण देवता ! आप नमस्कार करने योग्य अतिथि हैं। आपको नमस्कार है। हे ब्राह्मण! मेरा कल्याण हो। आपने जो तीन रात्रियों तक मेरे घर पर बिना भोजन किये निवास किया है, इसलिये आप मुझसे प्रत्येक रात्रि के बदले एक-एक करके तीन वरदान माँग लीजिये ॥ ९ ॥

 

शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद्

    वीतमन्युर्गौतमो माऽभि मृत्यो ।

त्वत्प्रसृष्टं माऽभिवदेत्प्रतीत

    एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १०॥

 

पिता को सुख पहुँचाने की इच्छा से नचिकेता ने कहा- 

 

हे मृत्युदेव जिस प्रकार मेरे पिता गौतमवंशीय उद्दालक मेरे प्रति शान्त संकल्पवाले प्रसन्नचित्त और क्रोध एवं खेद से रहित हो जायँ तथा आपके द्वारा वापस भेजा जाने पर जब मैं उनके पास जाऊँ तो, वे मुझ पर विश्वास करके (यह वही मेरा पुत्र नचिकेता है, ऐसा भाव रखकर) मेरे साथ प्रेमपूर्वक बातचीत करें। यह मैं अपने तीनों वरों में से पहला वर माँगता हूँ ॥ १० ॥

 

यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीत

    औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।

सुखँ रात्रीः शयिता वीतमन्युः

    त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ॥ ११॥

 

यमराज ने कहा -

 

तुमको मृत्यु के मुख से छूटा हुआ देखकर मुझसे प्रेरित तुम्हारे पिता अरुण-पुत्र उद्दालक पहले की भाँति ही - यह मेरा पुत्र नचिकेता ही है, ऐसा विश्वास करके दुःख और क्रोध रहित हो जायेंगे और वे अपनी आयु की शेष रात्रियों में सुखपूर्वक शयन करेंगे ॥ ११ ॥

 

स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति

    न तत्र त्वं न जरया बिभेति ।

उभे तीर्त्वाऽशनायापिपासे

    शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२॥

 

स्वर्गलोक में किंचिन्मात्र भी भय नहीं है, वहाँ मृत्युरूप स्वयं आप भी नहीं हैं। वहाँ कोई बुढ़ापे से भी भय नहीं करता। स्वर्ग लोक के निवासी भूख और प्यास दोनों से पार होकर दु:खों से दूर रहकर आनन्द भोगते हैं ॥ १२ ॥

 

स त्वमग्निँ स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो

    प्रब्रूहि त्वँ श्रद्दधानाय मह्यम् ।

स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त

    एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १३॥

 

नचिकेता ने कहा - 

 

हे मृत्युदेव! वे आप उपर्युक्त स्वर्गकी प्राप्ति के साधनरूप अग्रि को जानते हैं अतः आप  मुझ श्रद्धालु को वह अग्निविद्या भलीभाँति समझाकर कहिये, स्वर्गलोक के निवासी अमरत्व को प्राप्त होते हैं इसलिये यह मैं दूसरे वर के रूप में माँगता हूँ ॥ १३॥ 

 

मर्त्यलोक में प्राणी भूख और प्यास दोनों की ज्वाला से जलते हैं, वैसे स्वर्ग में नहीं जलना पड़ता। मेरी उस अग्निविद्या में श्रद्धा है अतः मुझे उस विद्या का उपदेश दीजिए जिसे जानकर स्वर्गलोक के निवासी अमृतत्व भोगते हैं।  

 

प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध

    स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।

अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां

    विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १४॥

 

तब यमराज बोले - 

 

हे नचिकेता स्वर्गदायिनी अग्निविद्या को अच्छी तरह जाननेवाला मैं तुम्हारे लिये उसे भलीभाँति बतलाता हूँ। तुम उसे मुझसे भलीभाँति समझ लो, तुम इस विद्या को अविनाशी लोक की प्राप्ति कराने वाली -उसकी आधारस्वरूपा और बुद्धिरूप गुफा में छिपी हुई समझो ॥ १४ ॥

 

लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै

    या इष्टका यावतीर्वा यथा वा ।

स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तं

    अथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥ १५॥

 

उस स्वर्गलोक की कारणरूपा अग्निविद्या का उस नचिकेता को उपदेश दिया। उसमें कुण्ड निर्माण आदि के लिये जो-जो और जितनी ईंटें आदि आवश्यक होती हैं तथा जिस प्रकार उनका चयन किया जाता है, वे सब बातें भी बताई तथा उस नचिकेता ने भी वह जैसा सुना था, ठीक उसी प्रकार समझकर यमराज को पुनः सुना दिया। उसके बाद यमराज उस पर संतुष्ट होकर फिर बोले- ॥ १५ ॥

 

तमब्रवीत् प्रीयमाणो महात्मा

    वरं तवेहाद्य ददामि भूयः ।

तवैव नाम्ना भविताऽयमग्निः

    सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १६॥

 

उसकी अलौकिक बुद्धि देखकर प्रसन्न हुए महात्मा यमराज उस नचिकेता से बोले- अब मैं तुमको यहाँ पुनः यह अतिरिक्त वर देता हूँ कि यह अग्निविद्या तुम्हारे ही नाम से प्रसिद्ध होगी। इस अनेक रूपोंवाली रत्नों की माला को भी तुम स्वीकार करो ॥ १६ ॥

 

त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं

    त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू ।

ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा

    निचाय्येमाँ शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १७॥

 

इस अग्रि का शास्त्रोक्त रीति से तीन बार अनुष्ठान करनेवाला तीनों (ऋक्, साम, यजुर्वेद) के साथ सम्बन्ध जोड़कर यज्ञ, दान और तपरूप तीनों कर्मों को निष्काम भाव से करता रहने वाला मनुष्य जन्म-मृत्यु से तर जाता है। वह ब्रह्मा से उत्पन्न सृष्टि के जानने वाले इस अग्निदेव को जानकर तथा इसका निष्कामभाव से चयन करके इस अनन्त शान्ति को पा जाता है (जो मुझको प्राप्त है) ॥ १७ ॥

 

त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा

    य एवं विद्वाँश्चिनुते नाचिकेतम् ।

स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य

    शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८॥

 

ईंटों के स्वरूप, संख्या और अग्नि चयन-विधि-इन तीनों बातों को जानकर तीन बार नाचिकेत-अग्निविद्या का अनुष्ठान करने वाला तथा जो कोई भी इस प्रकार जानने वाला पुरुष (विद्वान)  इस नाचिकेत अग्रि का चयन करता है। वह मृत्यु के पाश को अपने सामने ही (मनुष्य-शरीर में ही) काटकर शोक से पार होकर स्वर्गलोक में आनन्द का अनुभव करता है ।। १८ ।।

 

एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो

    यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण ।

एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासः

    तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९॥

 

हे नचिकेता ! यह तुम्हें बतलायी हुई स्वर्ग प्रदान करनेवाली अग्रिविद्या है, जिसको तुमने दूसरे वर से माँगा था।  इस अग्नि को (अब से) लोग तुम्हारे ही नाम से कहा करेंगे। हे नचिकेता! अब तुम तीसरा वर माँगो ॥ १९ ॥

 

येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये-

    ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।

एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाऽहं

    वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ २०॥

 

नचिकेता तीसरा वर माँगता है - 

 

मरे हुए मनुष्य के विषय में जो यह संशय है - कोई तो यों कहते हैं कि मरने के बाद यह आत्मा रहता है और कोई ऐसा कहते हैं कि नहीं रहता। आपके द्वारा उपदेश पाया हुआ मैं इसका निर्णय भलीभाँति समझ लूँ- यही तीनों वरों में से तीसरा वर है ॥ २० ॥

 

देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा

    न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः ।

अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व

    मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥ २१॥

 

हे नचिकेता ! इस विषय में पहले देवताओं ने भी संदेह किया था (परंतु उनकी भी समझ में नहीं आया) क्योंकि यह विषय बड़ा सूक्ष्म है, सहज ही समझ में आनेवाला नहीं है (इसलिये) तुम दूसरा वर माँग लो। मुझ पर दबाव मत डालो, इस आत्मज्ञानसम्बन्धी वर को मुझे लौटा दो ॥ २१ ॥

 

देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल

    त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ ।

वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो

    नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २२॥

 

नचिकेता ने दृढ़ता से कहा - 

 

हे यमराज ! आपने जो यह कहा कि सचमुच इस विषय पर देवताओं ने भी विचार किया था (परंतु वे निर्णय नहीं कर पाये) और वह सुविज्ञेय भी नहीं है (इतना ही नहीं) इसके सिवा इस विषय का कहने वाला भी आपके जैसा दूसरा नहीं मिल सकता अतः इसलिये मेरी समझ में तो इसके समान दूसरा कोई भी वर नहीं है २२ ॥

 

शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्वा

    बहून्पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान् ।

भूमेर्महदायतनं वृणीष्व

    स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २३॥

 

सैकड़ों वर्षों की आयु वाले बेटे और पोतों को तथा बहुत-से गौ आदि पशुओं को एवं हाथी, सुवर्ण और घोड़ों को माँग लो। भूमि के बड़े विस्तारवाले मण्डल (साम्राज्य) को माँग लो, तुम स्वयं भी जितने वर्षों तक चाहो जीते रहो ॥ २३ ॥

 

एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं

    वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च ।

महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि

    कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४॥

 

हे नचिकेता ! धन, सम्पत्ति और अनन्तकाल तक जीने के साधनों को यदि तुम इस आत्मज्ञान विषयक वरदान के समान वर मानते हो तो माँग लो और तुम इस पृथ्वीलोक में बड़े भारी सम्राट् बन जाओ। मैं तुम्हें सम्पूर्ण भोगों में से अति उत्तम भोगों को भोगनेवाला बना देता हूँ ॥ २४ ॥

 


ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके

    सर्वान् कामाँश्छन्दतः प्रार्थयस्व ।

इमा रामाः सरथाः सतूर्या

    न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः ।

आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व

    नचिकेतो मरणं माऽनुप्राक्षीः ॥ २५॥

 

ये जो-जो भोग मनुष्यलोक में दुर्लभ हैं, उन सम्पूर्ण भोगों को इच्छानुसार माँग लो और नाना प्रकार के बाजों के सहित इन स्वर्ग की अप्सराओं को (अपने साथ ले जाओ)। मनुष्यों को ऐसी स्त्रियाँ नि:संदेह अलभ्य हैं। मेरे द्वारा दी हुई इन स्त्रियों से तुम अपनी सेवा कराओ। हे नचिकेता ! मरने के बाद आत्मा का क्या होता है, इस बात को मत पूछो ॥ २५ ॥

 

श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्

    सर्वेंद्रियाणां जरयन्ति तेजः ।

अपि सर्वं जीवितमल्पमेव

    तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६॥

 

नचिकेता ने कहा - 

 

हे यमराज! (जिनका आपने वर्णन किया, वे ) क्षणभङ्गुर भोग (और उनसे प्राप्त होनेवाले सुख) मनुष्य के अन्तःकरण सहित सम्पूर्ण इन्द्रियों का जो तेज है, उसको क्षीण कर डालते हैं। इसके सिवा समस्त आयु (चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो) अल्प ही है इसलिये ये आपके रथ आदि वाहन और ये अप्सराओं के नाच-गानआपके ही पास रहें (मुझे नहीं चाहिये) ॥ २६ ॥

 

न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो

    लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा ।

जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं

    वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७॥

 

मनुष्य धन से कभी भी तृप्त नहीं किया जा सकता है। जब कि (हमने) आपके दर्शन पा लिये हैं (तब) धन को (तो हम) पा ही लेंगे (और) आप जब तक शासन करते रहेंगे (तब तक तो) हम जीते ही रहेंगे (इन सबको भी क्या माँगना है अतः) मेरे माँगने लायक वर तो वह (आत्मज्ञान) ही है ॥ २७ ॥

 

अजीर्यताममृतानामुपेत्य

    जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् ।

अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदान्

    अतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८॥

 

यह मनुष्य जीर्ण होने वाला और मरणधर्मा है -इस तत्त्व को भलीभाँति समझने वाला मनुष्यलोक का निवासी कौन ऐसा मनुष्य है जो कि बुढ़ापे से रहित न मरने वाले (आप-सदृश) महात्माओं का सङ्ग पाकर भी स्त्रियों के सौन्दर्य, क्रीडा और आमोद-प्रमोद का बार-बार चिन्तन करता हुआ, बहुत काल तक जीवित रहने में प्रेम करेगा ?॥२८॥

 

यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो

    यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।

योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो

    नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २९॥

 

हे यमराज ! जिस महान् आश्चर्यमय परलोक सम्बन्धी आत्मज्ञान के विषय में लोग यह शङ्का करते हैं कि यह आत्मा मरने के बाद रहता है या नहीं -उसमें जो निर्णय है, वह आप हमें बतलाइये - जो यह अत्यन्त गम्भीरता को प्राप्त हुआ वर है, इससे दूसरा वर नचिकेता नहीं माँगता ॥ २९ ॥

 

॥ इति काठकोपनिषदि प्रथमाध्याये प्रथमा वल्ली ॥

 


विदुर नीति (अध्याय 34): जीवन को सही दिशा देने वाले और संकट से बचाने वाले नीति-मंत्र

पिछले अध्याय में हमने जाना कि महात्मा विदुर ने महाराज धृतराष्ट्र को बुद्धिमान और मूर्ख व्यक्ति के लक्षण बताए थे। महाभारत के 'प्रजागर पर्...