प्रथम अध्याय
तृतीय वल्ली
पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः ।
अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते । एतद्वै तत् ॥ १॥
सरल, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप अजन्मा परमेश्वर का
ग्यारह द्वारों वाला (मनुष्य-शरीररूप) पुर (नगर) है (इसके रहते हुए ही) साधन करके
(परमेश्वर का ध्यान आदि) मनुष्य कभी शोक नहीं करता और जीवन्मुक्त -वही है वह
(परमात्मा, जिसके विषय में
तुमने पूछा था ) ॥१॥
हँसः
शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्-
होता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् ।
नृषद्वरसदृतसद्व्योमसद्
अब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २॥
सम्बन्ध
- अब उस परमेश्वरकी सर्वरूपता का स्पष्टीकरण करते हैं-
जो विशुद्ध परमधाम
में रहनेवाला हंस अर्थात स्वयं प्रकाश (पुरुषोत्तम) है (वही) अन्तरिक्ष में निवास
करने वाला वसु है, घरों में
उपस्थित होने वाला अतिथि है (और) यज्ञ की वेदी पर स्थापित अग्निस्वरूप तथा उसमें
आहुति डालनेवाला 'होता'
है (तथा) समस्त मनुष्यों में रहने
वाला, मनुष्यों से श्रेष्ठ
देवताओं में रहने वाला सत्य में रहने वाला (और) आकाश में रहने वाला (है तथा) जलों
में नाना रूपों से प्रकट होने वाला, पृथिवी में नाना रूपों से प्रकट होने वाला, सत्कर्मों में प्रकट होने वाला (और), पर्वतों में नाना रूप से प्रकट होने वाला
(है), वही सबसे बड़ा परम सत्य
है ॥ २ ॥
ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति ।
मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३॥
(जो) प्राण को ऊपर
की ओर उठाता है (और) अपान को नीचे ढकेलता है; शरीर के मध्य (हृदय) में बैठे हुए (उस) सर्वश्रेष्ठ
भजने योग्य परमात्मा की सभी देवता उपासना करते हैं ॥ ३ ॥
अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः ।
देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ४॥
इस शरीर में स्थित,
एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने वाले,
जीवात्मा के शरीर से निकल जाने पर
यहाँ (इस शरीर में) क्या शेष रहता है यही हैं वह (परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा था ) ॥ ४ ॥
सम्बन्ध
- अब निम्राङ्कित दो मन्त्रों में यमराज नचिकेता के पूछे हुए तत्त्व को पुनः दूसरे
प्रकार से वर्णन करने की प्रतिज्ञा करते हैं -
न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन ।
इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५॥
कोई भी न मरणशील
प्राणी न प्राण से, न अपान से
जीवित रहता है किन्तु जिसमें ये दोनों (वास्तव में पाँचों प्राणवायु) उपाश्रित हैं,
अन्य से ही जीवित रहते हैं।
हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ।
यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ ६॥
हे गौतमवंशीय
नचिकेता! (वह) रहस्यमय सनातन ब्रह्म और जीवात्मा मरण को प्राप्त करके जैसे होता
है- यह तुम्हें निश्चय ही बताऊँगा।
योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः ।
स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७॥
जिसका जैसा कर्म
होता है और शास्त्रादि के श्रवण द्वारा जिसको जैसा भाव प्राप्त हुआ है (उन्ही के
अनुसार) शरीर धारण करने के लिए कितने ही जीवात्मा तो (नाना प्रकार की जङ्गम )
योनियों को प्राप्त हो जाते हैं और दूसरे (कितने ही) स्थाणु (स्थावर) भाव का
अनुसरण करते हैं ||७||
सम्बन्ध
- यमराज ने जीवात्मा की गति और परमात्मा का स्वरूप- इन दो को बतलाने की प्रतिज्ञा
की थी; इनमें मरने के बाद जीवात्मा की क्या
गति होती है, बतलाकर अब वे दूसरी बात बतलाते हैं-
य
एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः ।
तदेव
शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥
तस्मिँल्लोकाः
श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन ।
एतद्
वै तत् ॥ ८ ॥
जो यह (जीवोंके
कर्मानुसार) नाना प्रकार के भोगों का निर्माण करनेवाला, परमपुरुष परमेश्वर (प्रलयकाल में सब के सो जाने पर
भी जागता रहता है, वही परम
विशुद्ध तत्त्व है। वही ब्रह्म है। वही अमृत कहलाता है (तथा) उसी में सम्पूर्ण लोक
आश्रय पाये हुए हैं। उसे कोई भी अतिक्रमण नहीं कर सकता। यही है वह (परमात्मा,
जिसके विषय में तुमने पूछा था) ॥ ८ ॥
ये श्लोक मनुष्य
के सोते हुए स्वरूप में जाग्रत अस्तित्व करने वाली अनन्त चेतना, जिसे परमात्मा या ब्रह्म कहा जाता है,
के बारे में बताते हैं। इसका
महत्वपूर्ण संकेत है कि यह अनन्त चेतना सभी इच्छाओं से परे होती है और सभी
प्राणियों में स्थित होती है। यह श्लोक भी दर्शाता है कि यही सत्यता अमरत्व की
स्रोत है और परम तत्व है।
सम्बन्ध-
अब अग्नि के दृष्टान्त से उस परब्रह्म परमेश्वर की व्यापकता और निर्लेपता का वर्णन
करते हैं-
अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९॥
जिस प्रकार समस्त
ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट एक ही अग्नि नाना रूपों में, उनके समान रूपवाला हो रहा है, वैसे (ही); समस्त प्राणियों का अन्तरात्मा परब्रह्म एक होते हुए भी नाना रूपों में उन्हीं
के जैसे रूपवाला (हो रहा है) और उनके बाहर भी है ॥ ९ ॥
यह श्लोक बताता है
कि जैसे एक ही अग्नि एक ही भूमि में प्रविष्ट होकर अनेक रूपों में प्रकट होती है,
उसी प्रकार एक ही चेतना सब भूतों के
आंतरिक आत्मा में स्थित होकर अपने रूप को अनेक रूपों में प्रकट करती है। इससे यह
समझना चाहिए कि सभी भूत और वस्तुएं स्वयं में एक ही आंतरिक आत्मा को धारण करती हैं,
जिसे अनेक रूपों में प्रकट किया जाता
है।
सम्बन्ध-वही
बात वायु के दृष्टान्त से कहते हैं-
वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १०॥
जिस प्रकार समस्त
ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट एक (ही) वायु नाना रूपों में, उनके समान रूपवाला हो रहा है, वैसे (ही) सब प्राणियों का अन्तरात्मा परब्रह्म एक
होते हुए भी नाना रूपों में उन्हीं के जैसे रूपवाला (हो रहा है) और उनके बाहर भी
है ॥ १०॥
यह श्लोक बताता है
कि जैसे एक ही वायु एक ही भूमि में प्रविष्ट होकर अनेक रूपों में प्रकट होती है,
उसी प्रकार एक ही चेतना सब भूतों के
आंतरिक आत्मा में स्थित होकर अपने रूप को अनेक रूपों में प्रकट करती है। इससे यह
समझना चाहिए कि सभी भूत और वस्तुएं स्वयं में एक ही आंतरिक आत्मा को धारण करती हैं,
जिसे अनेक रूपों में प्रकट किया जाता
है।
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुः
न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११॥
सम्बन्ध
- इस मन्त्र में सूर्य के दृष्टान्त से परमात्मा की निर्लेपता दिखलाते हैं-
जिस प्रकार समस्त
ब्रह्माण्ड का प्रकाशक सूर्य (लोगों की) आँखों से होने वाले बाहर के दोषों से
लिप्त नहीं होता तथा उसी प्रकार सब प्राणियों का एक अंतरात्मा (परब्रह्म परमात्मा)
लोगों के दुःखों से लिप्त नहीं होता क्योंकि सब में रहता हुआ भी वह सबसे अलग है ॥
११ ॥
इससे यह समझना
चाहिए कि चेतना सर्वत्र स्थित होती है और उसे बाह्य दोषों या लोक के दुःख से
प्रभावित नहीं किया जा सकता है।
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा
एकं रूपं बहुधा यः करोति ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीराः
तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥
१२॥
सर्वभूतान्तरात्मा
सब प्राणियों का अन्तर्यामी अद्वितीय एवं सबको वश में रखने वाला (परमात्मा) अपने
एक ही रूप को बहुत प्रकार से बना लेता है, उस अपने अंदर रहने वाले (परमात्मा) को जो ज्ञानी पुरुष निरन्तर देखते रहते हैं,
उन्हीं को सदा अटल रहने वाला
परमानन्दस्वरूप वास्तविक सुख (मिलता है) दूसरों को नहीं ।। १२ ।।
इस श्लोक में कहा
गया है कि वह चेतना एक ही है और सभी भूतों के आंतरिक आत्मा है, जो एक रूप को अनेक रूपों में प्रकट करती है।
धीर पुरुषों को जो उसमे स्थित होते हैं, उनका शाश्वत सुख होता है, दूसरों का नहीं। यह श्लोक एकता के सिद्धांत को संकेत करता है और सुख का आधार
अपने आत्मा में ढूंढने की प्रेरणा देता है।
नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानाम्
एको बहूनां यो विदधाति कामान्।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीराः
तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १३॥
जो नित्यों का
(भी) नित्य (है), चेतनों का
(भी) चेतन है (और) अकेला ही इन अनेक (जीवों) के कर्मफलभोगों का विधान करता है उस
अपने अंदर रहनेवाले (पुरुषोत्तम) को जो ज्ञानी निरन्तर देखते रहते हैं, उन्हीं को सदा अटल रहने वाली शान्ति
(प्राप्त होती है), दूसरों को
नहीं ॥१३॥
यह श्लोक बताता है
कि जो नित्य, चेतन एकमात्र
सत्ता है, वह एक ही है और
बहुतों को उनके इच्छित भोगों का प्रदान करता है। धीर पुरुषों को जो उसमे स्थित
होते हैं, उनकी शांति होती है,
दूसरों की नहीं।
सम्बन्ध—जिज्ञासु
नचिकेता इस प्रकार उस ब्रह्मप्राप्ति के आनन्द और शान्ति की महिमा सुनकर मन-ही-मन
विचार करने लगा-
तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् ।
कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ॥ १४॥
वह अनिर्वचनीय परम
सुख, यह (परमात्मा) ही है- यों
(ज्ञानीजन) मानते हैं, उसको
किस प्रकार से मैं भलीभाँति समझूँ? क्या (वह) प्रकाशित होता है या अनुभव में आता है? ॥१४॥
यह श्लोक उक्त
ज्ञान की अद्वितीयता और प्रकट होने के सम्बन्ध में संदेह को प्रकट करता है।
सम्बन्ध
– नचिकेता के आन्तरिक भाव को समझकर यमराज ने कहा-
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः
।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १५॥
वहाँ न (तो) सूर्य
प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा
और तारों का समुदाय (ही प्रकाशित होता है) और न ये बिजलियाँ ही (वहाँ) प्रकाशित
होती हैं। फिर यह (लौकिक) अग्नि कैसे (प्रकाशित हो सकता है क्योंकि) उसके प्रकाशित
होने पर ही (उसी के प्रकाश से), (ऊपर बतलाये हुए सूर्यादि) सब प्रकाशित होते हैं। उसी के प्रकाश सेयह सम्पूर्ण
जगत् प्रकाशित होता है ॥ १५ ॥
॥ इति काठकोपनिषदि द्वितीयाध्याये द्वितीया
वल्ली ॥



