Friday, 2 June 2023

कठोपनिषद - द्वितीय अध्याय, द्वितीय वल्ली

 

प्रथम अध्याय

तृतीय वल्ली

 

 

पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः ।

अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते । एतद्वै तत् ॥ १॥

 

सरल, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप अजन्मा परमेश्वर का ग्यारह द्वारों वाला (मनुष्य-शरीररूप) पुर (नगर) है (इसके रहते हुए ही) साधन करके (परमेश्वर का ध्यान आदि) मनुष्य कभी शोक नहीं करता और जीवन्मुक्त -वही है वह (परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा था ) ॥१॥

 

हँसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्-

    होता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् ।

नृषद्वरसदृतसद्व्योमसद्

    अब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २॥

 

सम्बन्ध - अब उस परमेश्वरकी सर्वरूपता का स्पष्टीकरण करते हैं-

 

जो विशुद्ध परमधाम में रहनेवाला हंस अर्थात स्वयं प्रकाश (पुरुषोत्तम) है (वही) अन्तरिक्ष में निवास करने वाला वसु है, घरों में उपस्थित होने वाला अतिथि है (और) यज्ञ की वेदी पर स्थापित अग्निस्वरूप तथा उसमें आहुति डालनेवाला 'होता' है (तथा) समस्त मनुष्यों में रहने वाला, मनुष्यों से श्रेष्ठ देवताओं में रहने वाला सत्य में रहने वाला (और) आकाश में रहने वाला (है तथा) जलों में नाना रूपों से प्रकट होने वाला, पृथिवी में नाना रूपों से प्रकट होने वाला, सत्कर्मों में प्रकट होने वाला (और), पर्वतों में नाना रूप से प्रकट होने वाला (है), वही सबसे बड़ा परम सत्य है ॥ २ ॥

 

ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति ।

मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३॥

 

(जो) प्राण को ऊपर की ओर उठाता है (और) अपान को नीचे ढकेलता है; शरीर के मध्य (हृदय) में बैठे हुए (उस) सर्वश्रेष्ठ भजने योग्य परमात्मा की सभी देवता उपासना करते हैं ॥ ३ ॥

 

अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः ।

देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ४॥

 

इस शरीर में स्थित, एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने वाले, जीवात्मा के शरीर से निकल जाने पर यहाँ (इस शरीर में) क्या शेष रहता है यही हैं वह (परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा था ) ॥ ४ ॥

 

सम्बन्ध - अब निम्राङ्कित दो मन्त्रों में यमराज नचिकेता के पूछे हुए तत्त्व को पुनः दूसरे प्रकार से वर्णन करने की प्रतिज्ञा करते हैं -

 

न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन ।

इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५॥

 

कोई भी न मरणशील प्राणी न प्राण से, न अपान से जीवित रहता है किन्तु जिसमें ये दोनों (वास्तव में पाँचों प्राणवायु) उपाश्रित हैं, अन्य से ही जीवित रहते हैं।

 

हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ।

यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ ६॥

 

हे गौतमवंशीय नचिकेता! (वह) रहस्यमय सनातन ब्रह्म और जीवात्मा मरण को प्राप्त करके जैसे होता है- यह तुम्हें निश्चय ही बताऊँगा।

 

 

योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः ।

स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७॥

 

जिसका जैसा कर्म होता है और शास्त्रादि के श्रवण द्वारा जिसको जैसा भाव प्राप्त हुआ है (उन्ही के अनुसार) शरीर धारण करने के लिए कितने ही जीवात्मा तो (नाना प्रकार की जङ्गम ) योनियों को प्राप्त हो जाते हैं और दूसरे (कितने ही) स्थाणु (स्थावर) भाव का अनुसरण करते हैं ||||

 

सम्बन्ध - यमराज ने जीवात्मा की गति और परमात्मा का स्वरूप- इन दो को बतलाने की प्रतिज्ञा की थी; इनमें मरने के बाद जीवात्मा की क्या गति होती है, बतलाकर अब वे दूसरी बात बतलाते हैं-

 

य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः ।

तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥

तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन ।

एतद् वै तत् ॥ ८ ॥

 

जो यह (जीवोंके कर्मानुसार) नाना प्रकार के भोगों का निर्माण करनेवाला, परमपुरुष परमेश्वर (प्रलयकाल में सब के सो जाने पर भी जागता रहता है, वही परम विशुद्ध तत्त्व है। वही ब्रह्म है। वही अमृत कहलाता है (तथा) उसी में सम्पूर्ण लोक आश्रय पाये हुए हैं। उसे कोई भी अतिक्रमण नहीं कर सकता। यही है वह (परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा था) ॥ ८ ॥

 

ये श्लोक मनुष्य के सोते हुए स्वरूप में जाग्रत अस्तित्व करने वाली अनन्त चेतना, जिसे परमात्मा या ब्रह्म कहा जाता है, के बारे में बताते हैं। इसका महत्वपूर्ण संकेत है कि यह अनन्त चेतना सभी इच्छाओं से परे होती है और सभी प्राणियों में स्थित होती है। यह श्लोक भी दर्शाता है कि यही सत्यता अमरत्व की स्रोत है और परम तत्व है।

 

सम्बन्ध- अब अग्नि के दृष्टान्त से उस परब्रह्म परमेश्वर की व्यापकता और निर्लेपता का वर्णन करते हैं-

 

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो

    रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा

    रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९॥

 

जिस प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट एक ही अग्नि नाना रूपों में, उनके समान रूपवाला हो रहा है, वैसे (ही); समस्त प्राणियों का अन्तरात्मा परब्रह्म एक होते हुए भी नाना रूपों में उन्हीं के जैसे रूपवाला (हो रहा है) और उनके बाहर भी है ॥ ९ ॥

 

यह श्लोक बताता है कि जैसे एक ही अग्नि एक ही भूमि में प्रविष्ट होकर अनेक रूपों में प्रकट होती है, उसी प्रकार एक ही चेतना सब भूतों के आंतरिक आत्मा में स्थित होकर अपने रूप को अनेक रूपों में प्रकट करती है। इससे यह समझना चाहिए कि सभी भूत और वस्तुएं स्वयं में एक ही आंतरिक आत्मा को धारण करती हैं, जिसे अनेक रूपों में प्रकट किया जाता है।

 


सम्बन्ध-वही बात वायु के दृष्टान्त से कहते हैं-

 

वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो

    रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा

    रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १०॥

 

जिस प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट एक (ही) वायु नाना रूपों में, उनके समान रूपवाला हो रहा है, वैसे (ही) सब प्राणियों का अन्तरात्मा परब्रह्म एक होते हुए भी नाना रूपों में उन्हीं के जैसे रूपवाला (हो रहा है) और उनके बाहर भी है ॥ १०॥

 

यह श्लोक बताता है कि जैसे एक ही वायु एक ही भूमि में प्रविष्ट होकर अनेक रूपों में प्रकट होती है, उसी प्रकार एक ही चेतना सब भूतों के आंतरिक आत्मा में स्थित होकर अपने रूप को अनेक रूपों में प्रकट करती है। इससे यह समझना चाहिए कि सभी भूत और वस्तुएं स्वयं में एक ही आंतरिक आत्मा को धारण करती हैं, जिसे अनेक रूपों में प्रकट किया जाता है।

 

सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुः

    न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा

    न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११॥

 

सम्बन्ध - इस मन्त्र में सूर्य के दृष्टान्त से परमात्मा की निर्लेपता दिखलाते हैं-

 

जिस प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड का प्रकाशक सूर्य (लोगों की) आँखों से होने वाले बाहर के दोषों से लिप्त नहीं होता तथा उसी प्रकार सब प्राणियों का एक अंतरात्मा (परब्रह्म परमात्मा) लोगों के दुःखों से लिप्त नहीं होता क्योंकि सब में रहता हुआ भी वह सबसे अलग है ॥ ११ ॥

 

इससे यह समझना चाहिए कि चेतना सर्वत्र स्थित होती है और उसे बाह्य दोषों या लोक के दुःख से प्रभावित नहीं किया जा सकता है।

 

एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा

    एकं रूपं बहुधा यः करोति ।

तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीराः

    तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२॥

 

सर्वभूतान्तरात्मा सब प्राणियों का अन्तर्यामी अद्वितीय एवं सबको वश में रखने वाला (परमात्मा) अपने एक ही रूप को बहुत प्रकार से बना लेता है, उस अपने अंदर रहने वाले (परमात्मा) को जो ज्ञानी पुरुष निरन्तर देखते रहते हैं, उन्हीं को सदा अटल रहने वाला परमानन्दस्वरूप वास्तविक सुख (मिलता है) दूसरों को नहीं ।। १२ ।।

 

इस श्लोक में कहा गया है कि वह चेतना एक ही है और सभी भूतों के आंतरिक आत्मा है, जो एक रूप को अनेक रूपों में प्रकट करती है। धीर पुरुषों को जो उसमे स्थित होते हैं, उनका शाश्वत सुख होता है, दूसरों का नहीं। यह श्लोक एकता के सिद्धांत को संकेत करता है और सुख का आधार अपने आत्मा में ढूंढने की प्रेरणा देता है।

 

नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानाम्

    एको बहूनां यो विदधाति कामान्।

तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीराः

    तेषां शान्तिः  शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १३॥

 

जो नित्यों का (भी) नित्य (है), चेतनों का (भी) चेतन है (और) अकेला ही इन अनेक (जीवों) के कर्मफलभोगों का विधान करता है उस अपने अंदर रहनेवाले (पुरुषोत्तम) को जो ज्ञानी निरन्तर देखते रहते हैं, उन्हीं को सदा अटल रहने वाली शान्ति (प्राप्त होती है), दूसरों को नहीं ॥१३॥

 

यह श्लोक बताता है कि जो नित्य, चेतन एकमात्र सत्ता है, वह एक ही है और बहुतों को उनके इच्छित भोगों का प्रदान करता है। धीर पुरुषों को जो उसमे स्थित होते हैं, उनकी शांति होती है, दूसरों की नहीं।

 

सम्बन्ध—जिज्ञासु नचिकेता इस प्रकार उस ब्रह्मप्राप्ति के आनन्द और शान्ति की महिमा सुनकर मन-ही-मन विचार करने लगा-

 

तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् ।

कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ॥ १४॥

 

वह अनिर्वचनीय परम सुख, यह (परमात्मा) ही है- यों (ज्ञानीजन) मानते हैं, उसको किस प्रकार से मैं भलीभाँति समझूँ? क्या (वह) प्रकाशित होता है या अनुभव में आता है? ॥१४॥

 

यह श्लोक उक्त ज्ञान की अद्वितीयता और प्रकट होने के सम्बन्ध में संदेह को प्रकट करता है।

 

सम्बन्ध – नचिकेता के आन्तरिक भाव को समझकर यमराज ने कहा-

 

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं

    नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।

तमेव भान्तमनुभाति सर्वं

    तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १५॥

 

वहाँ न (तो) सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा और तारों का समुदाय (ही प्रकाशित होता है) और न ये बिजलियाँ ही (वहाँ) प्रकाशित होती हैं। फिर यह (लौकिक) अग्नि कैसे (प्रकाशित हो सकता है क्योंकि) उसके प्रकाशित होने पर ही (उसी के प्रकाश से), (ऊपर बतलाये हुए सूर्यादि) सब प्रकाशित होते हैं। उसी के प्रकाश सेयह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है ॥ १५ ॥

 

  ॥ इति काठकोपनिषदि द्वितीयाध्याये द्वितीया वल्ली ॥

Thursday, 1 June 2023

कठोपनिषद - द्वितीय अध्याय, प्रथम वल्ली

 

द्वितीय अध्याय, प्रथम वल्ली

 

 

पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू-

    स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् ।

कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष-

    दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १॥

 

सम्बन्ध - तृतीय वल्ली में यमराज कहते हैं कि परब्रह्म सभी प्राणियों में स्थित है, परंतु सभी उनको देख नहीं पाते। कोई विरला ही अपनी सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा उन्हें देख सकता है। अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि जब वे ब्रह्म अपने ही हृदय में विराजमान हैं तो उन्हें सभी लोग अपनी बुद्धिरूपी  नेत्रों से क्यों नहीं देख पाते? कोई विरला ही क्यों देख पाता है?  इस का उत्तर आगे मिलता हैं-

 

स्वयंभूः (स्वयं प्रकट होने वाले) परमेश्वर ने समस्त इन्द्रियों के द्वार बाहर की ओर जाने वाले ही बनाये हैं, इसलिये (मनुष्य इन्द्रियों के द्वारा प्रायः बाहर की वस्तुओं को ही; पश्यति देखता है; अन्तरात्मा को नहीं। किसी (भाग्यशाली) बुद्धिमान् मनुष्य ने ही  अमृतत्वम् को जानने की इच्छा करके चक्षु आदि इन्द्रियों को बाह्य विषयों की ओर से लौटाकर अन्तरात्मा को देखा है॥१॥

 

पराचः कामाननुयन्ति बाला-

    स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् ।

अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा

    ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २॥

 

जो मूर्ख बाह्य भोगों का अनुसरण करते हैं (उन्हीं में अनुरक्त रहते हैं), वे सर्वत्र फैले हुए

मृत्यु के बन्धन में पड़ते हैं किंतु बुद्धिमान् मनुष्य नित्य अमृतत्व को विवेक द्वारा जानकर

इस जगत में अनित्य भोगों में से किसी को (भी) नहीं चाहते ॥ २ ॥

 

येन रूपं रसं गन्धं शब्दान् स्पर्शाꣳश्च मैथुनान् ।

एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३॥

 

जिसके अनुग्रह से (मनुष्य) शब्दों को , स्पर्शो को, रूप-समुदाय को, रस-समुदाय को, गन्ध समुदाय को और मैथुन आदि के सुखों को अनुभव करता है उसी के अनुग्रह से (यह भी जानता है कि) यहाँ क्या शेष रह जाता है। यह ही हैं - वह परमात्मा (जिसके विषय में तुमने पूछा था ॥ ३ ॥

 

स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति ।

महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४॥

 

स्वप्न के दृश्यों को और जाग्रत्-अवस्था के दृश्यों को - इन दोनों अवस्थाओं के दृश्यों को (मनुष्य) जिससे बार-बार देखता है; उस सर्वश्रेष्ठ, सर्वव्यापी, सबके आत्मा को जानकर बुद्धिमान् मनुष्य शोक नहीं करता ॥ ४ ॥

 

य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात् ।

ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ ५॥

 

जो मनुष्य कर्मफलदाता, सबको जीवन प्रदान करनेवाले तथा भू (वर्तमान) और भविष्य का शासन करने वाले इस परमात्मा को (अपने) समीप जानता है, उसके बाद वह (कभी) किसी की निन्दा नहीं करता है। (नचिकेता !) यह ही (है)-वह (तुमने जिस ब्रह्म के विषय में पूछा था) ॥ ५ ॥

 

*यहाँ 'जीव' शब्द परमात्मा के लिये ही प्रयुक्त हुआ है; क्योंकि भूत, भविष्य और वर्तमान का शासक जीव नहीं हो सकता। प्रसंग भी यहाँ परमात्मा का है, जीव का नहीं ।

 


यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत ।

गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत । एतद्वै तत् ॥ ६॥

 

सम्बन्ध - अब यमराज यह बतलाते हैं कि ब्रह्मा से लेकर स्थावर पर्यन्त सृष्टि के समस्त प्राणी उन परब्रह्म परमेश्वर से ही उत्पन्न हुए हैं। अतः जो कुछ भी है, सब उन्हीं का रूप विशेष है। उनसे भिन्न यहाँ कुछ भी नहीं है; क्योंकि इस सम्पूर्ण जगत के अभिन्न निमित्तोपादान कारण एकमात्र परमेश्वर ही हैं, वे एक ही अनेक रूपों में स्थित हैं।

 

जो पहले जल से (हिरण्यगर्भ ब्रह्मा) रूप में प्रकट हुआ था, उस सबसे पहले तप से उत्पन्न हृदय-गुफा में प्रवेश करके जीवात्माओं के साथ स्थित रहने वाले परमेश्वर को जो पुरुष देखता है (वही ठीक देखता है), -यह ही है वह (परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा था) ॥ ६ ॥

 

 

या प्राणेन संभवत्यदितिर्देवतामयी ।

गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत । एतद्वै तत् ॥ ७॥

 

सम्बन्ध - उन्हीं परब्रह्म का अब अदितिदेवी के रूप से वर्णन करते हैं-

 

जो देवतामयी अदिति प्राणों के सहित उत्पन्न होती है या जो प्राणियों के सहित उत्पन्न हुई है (तथा जो ) हृदयरूपी गुफा में प्रवेश करके वहीं रहनेवाली है उसे (जो पुरुष देखता है वही यथार्थ देखता है) -यही है -वह (परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा था ) ॥ ७ ॥

 

जननीरूपमें  समस्त देवताओं का सृजन करने वाली होने के कारण जो सर्वदेवतामयी हैं, शब्दादि समस्त भोगसमूह का अदन-भक्षण करने वाली होने से भी जिनका नाम अदिति है, जो हिरण्यगर्भरूप प्राणों के सहित प्रकट होती हैं और समस्त भूतप्राणियों के साथ ही जिनका प्रादुर्भाव होता है तथा जो सम्पूर्ण भूतप्राणियों की हृदय-गुफा में प्रविष्ट होकर वहाँ स्थित रहती हैं, वे परमेश्वर की महाशक्ति वस्तुतः उनका प्रतीक ही हैं। स्वयं परमेश्वर ही इसरूप में अपने को प्रकट करते हैं। ये ही वह ब्रह्म हैं, जिनके सम्बन्ध में  नचिकेता ! तुमने पूछा था ॥ ७ ॥

 

अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः ।

दिवे दिवे ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः । एतद्वै तत् ॥ ८॥

 

जो सर्वज्ञ अग्रिदेवता गर्भिणी स्त्रियों द्वारा भली प्रकार धारण किये हुए गर्भ की भाँति दो अरणियों में सुरक्षित है अर्थात छिपा है (तथा जो) सावधान (और) हवन करने योग्य सामग्रियों से युक्त मनुष्यों द्वारा प्रतिदिन स्तुति करने योग्य (है) - यही है वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था ॥ ८ ॥

 

 

यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति ।

तं देवाः सर्वेऽर्पितास्तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ ९॥

 

जिन परमेश्वर से सूर्यदेव प्रकट होते हैं और जिनमें जाकर विलीन हो जाते हैं, जिनकी महिमा में ही यह सूर्यदेवता की उदय-अस्तलीला नियमपूर्वक चलती है; उन परब्रह्म में ही सम्पूर्ण देवता प्रविष्ट हैं-सब उन्हीं में ठहरे हैं। उस परमेश्वर को कोई नहीं लाँघ सकता अर्थात उनकी महिमा और व्यवस्था का उल्लंघन नहीं कर सकता -यही है वह (परमात्मा, जिनके विषय में तुमने पूछा था ॥ ९॥

 

यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह ।

मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १०॥

 

जो परब्रह्म यहाँ (है) वही वहाँ (परलोक में भी है), जो वहाँ (है) वही यहाँ (इस लोक में) भी है। वह मनुष्य मृत्यु से मृत्यु को (अर्थात् बारंबार जन्म-मरण को) प्राप्त होता है, जो इस जगत्‌ में (उस परमात्मा को) अनेक की भाँति देखता है ॥ १० ॥

 

जो उन एक ही परब्रह्म को लीला से नाना नामों और रूपों में प्रकाशित देखकर मोहवश उनमें नानात्व की कल्पना करता है, उसे पुनः-पुनः मृत्यु के अधीन होना पड़ता है, उसके जन्म- मरण का चक्र सहज ही नहीं छूटता। अतः दृढ़तापूर्वक यही समझना चाहिये कि वे एक ही परब्रह्म परमेश्वर अपनी अचिन्त्य शक्ति के सहित नाना रूपों में प्रकट हैं और यह सारा जगत् बाहर-भीतर उन एक परमात्मा से ही व्याप्त होने के कारण उन्हीं का स्वरूप है।

 

मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानाऽस्ति किंचन ।

मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११॥

 

शुद्ध मन से ही यह परमात्मतत्त्व प्राप्त किये जाने योग्य है। इस जगत में (एक परमात्मा के अतिरिक्त) नाना (भिन्न-भिन्न भाव) कुछ भी नहीं है (इसलिये) जो इस जगत में नाना की भाँति देखता है वह मनुष्य मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है अर्थात् बार-बार जन्मता-मरता रहता है ॥ ११ ॥

 

व्याख्या – यह जगत् में एकमात्र पूर्णब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण हैं। सब कुछ उन्हीं का स्वरूप है। यहाँ परमात्मा से भिन्न कुछ भी नहीं है। जो यहाँ विभिन्नता की झलक देखता वह मनुष्य मृत्यु से मृत्युको प्राप्त होता है अर्थात् बार-बार जन्मता-मरता रहता है ॥ ११ ॥

 

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ।

ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ १२॥

 

अङ्गुष्ठमात्र (परिमाणवाला) परम पुरुष (परमात्मा) शरीर के मध्यभाग- हृदयाकाश में स्थित है,  जो कि भूत, (वर्तमान) और भविष्य का शासन करनेवाला (है), उसे जान लेने के बाद (वह) वह किसी भी प्रकार से छिपाने या अपहरण करने को नहीं जाता है। - यही है -वह परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा था ॥ १२ ॥

 

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ।

ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः । एतद्वै तत् ॥ १३॥

 

अङ्गुष्ठमात्र परिमाण वाला परमपुरुष परमात्मा धूमरहित ज्योति की भाँति है। भूत, (वर्तमान और) भविष्य पर शासन करने वाला वह परमात्मा ही आज है; वही कल भी है (अर्थात् वह नित्य सनातन है)- वही है वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ १३ ॥

 

 

यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।

एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥ १४॥

 

जिस प्रकार ऊँचे शिखर पर बरसा हुआ जल पहाड़ के नाना स्थलों में चारों ओर चला जाता है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न धर्मों (स्वभावों) से युक्त देव, असुर, मनुष्य आदि को परमात्मा से पृथक् देखकर (उनका सेवन करने वाला मनुष्य) उन्हीं के पीछे दौड़ता रहता है (उन्हीं के शुभाशुभ लोकों में और नाना उच्च-नीच योनियों में भटकता रहता है) ॥१४॥

 

व्याख्या–वर्षा का जल एक ही है; पर वह जब ऊँचे पर्वत की ऊबड़खाबड़ चोटी पर बरसता है तो वहाँ ठहरता नहीं, तुरंत ही नीचे की ओर बहकर विभिन्न वर्ण, आकार और गन्ध को धारण करके पर्वत में चारों ओर बिखर जाता है। इसी प्रकार एक ही परमात्मा से उत्पन्न हुए विभिन्न स्वभाववाले देव- असुर – मनुष्यादि को जो परमात्मा से पृथक् मानता है और पृथक् मानकर ही उनकी उपासना, पूजा आदि करता है, उसे भी बिखरे हुए जल की भाँति ही विभिन्न देव-असुरादि के लोकों में एवं नाना प्रकार की योनियों में भटकना पड़ता है (गीता ९ । २३ - २५ ) । वह ब्रह्म को प्राप्त नहीं हो सकता ॥ १४ ॥

 

यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।

एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ १५॥

 

(परंतु) जिस प्रकार निर्मल जल में (मेघोंद्वारा) सब ओर से बरसाया हुआ निर्मल जल वैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार हे गौतमवंशी नचिकेता (एकमात्र परब्रह्म पुरुषोत्तम ही सब कुछ है, इस प्रकार) जानने वाले मुनि का (संसार से उपरत हुए महापुरुष का) आत्मा

(ब्रह्म को प्राप्त) हो जाता है ॥ १५ ॥

 

व्याख्या- परंतु वर्षा का निर्मल जल यदि निर्मल जल में ही बरसता है तो वह उसी क्षण निर्मल जल ही हो जाता है। उसमें न तो कोई विकार उत्पन्न होता है और न वह कहीं बिखरता ही है। इसी प्रकार, हे गौतमवंशीय नचिकेता! जो इस बातको भलीभाँति जान गया है कि जो कुछ है, वह सब परब्रह्म पुरुषोत्तम ही है, उस मननशील-संसार के बाहरी स्वरूप से उपरत पुरुष का आत्मा परब्रह्म में मिलकर उसके साथ तादात्म्यभाव को प्राप्त हो जाता है ॥ १५ ॥

  

॥ इति काठकोपनिषदि द्वितीयाध्याये प्रथमा वल्ली ॥

 

 

Wednesday, 29 March 2023

कठ उपनिषद प्रथम अध्याय तृतीय वल्ली

 

प्रथम अध्याय तृतीय वल्ली

 

ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके

    गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।

छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति

    पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ १॥

 

सम्बन्ध - द्वितीय वल्ली में जीवात्मा और परमात्मा के स्वरूप का वर्णन किया गया है। संक्षिप्त में यह भी बताया गया है कि जिसको परमात्मा स्वीकार करते हैं, वह ही उनको जान सकता है। अब परमात्मा को प्राप्त करने के साधनों का वर्णन करने के लिये तृतीय वल्ली का आरम्भ करते हुए यमराज पहले मन्त्र में जीवात्मा और परमात्मा का नित्य सम्बन्ध और निवास-स्थान बतलाते हैं-

 

शुभ कर्मों के फलस्वरूप मनुष्य शरीर में परब्रह्म के उत्तम निवास स्थान (हृदय-आकाश) में बुद्धिरूप गुफा में छिपे हुए सत्य का पान करनेवाले (दो हैं)। वे छाया और धूप की भाँति परस्पर भिन्न हैं। (यह बात) ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महापुरुष कहते हैं तथा जो तीन बार नाचिकेत-अग्नि का चयन कर लेने वाले (और) पञ्चाग्रि सम्पन्न गृहस्थ हैं]-वे भी यही बात कहते हैं ॥ १ ॥

 

यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत् परम् ।

अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतँ शकेमहि ॥ २॥

 

सम्बन्ध - परमात्मा को जानने और प्राप्त करने का जो सर्वोत्तम साधन ‘उन्हें जानने और पाने की शक्ति प्रदान करने के लिये उन्हीं से प्रार्थना करना है’-  इस बात को यमराज स्वयं प्रार्थना करते हुए बताते हैं-

 

यज्ञ करनेवालोंके लिये यः सेतु-जो दुःखसमुद्र पार पहुँचा देने योग्य सेतु है। उस नाचिकेत-अग्रि को और संसार-समुद्र से पार होने की इच्छा वालों के लिये - जो भयरहित पद है, उस अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तम को जानने और प्राप्त करने में भी हम समर्थ हों ॥ २ ॥

 

आत्मानँ रथितं विद्धि शरीरँ रथमेव तु ।

बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३॥

 

सम्बन्ध - अब, उस परब्रह्म पुरुषोत्तम के परमधाम में किन साधनों से सम्पन्न मनुष्य पहुँच सकता है, यह बात रथ और रथी के रूपक की कल्पना करके समझायी जाती है-

 

हे नचिकेता ! तुम जीवात्मा को तो रथ का स्वामी (उसमें बैठकर चलने वाला) समझो और शरीर को ही रथ समझो तथा बुद्धि को सारथि (रथ को चलाने वाला) समझो और मन को ही लगाम समझो ॥ ३ ॥

 

इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाँ स्तेषु गोचरान् ।

आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४॥

 

ज्ञानीजन (इस रूपक में) इन्द्रियों को घोड़े बतलाते हैं और विषयों को उन घोड़ों के विचरने का मार्ग बतलाते हैं तथा शरीर, इन्द्रिय और मन–इन सबके साथ रहने वाला जीवात्मा ही भोक्ता है- यों कहते हैं ॥ ४ ॥

 


यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।

तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५॥

 

सम्बन्ध - परमात्मा की ओर न जाकर उसकी इन्द्रियाँ लौकिक विषयों में क्यों लग गयीं, इसका कारण बतलाते हैं-

 

जो सदा विवेकहीन बुद्धिवाला और अवशीभूत (चञ्चल) मन से (युक्त) रहता है, उसकी इन्द्रियाँ असावधान सारथि के दुष्ट घोड़ों की भाँति वश में न रहनेवाली भवन्ति हो जाती हैं ॥ ५ ॥

 

यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा ।

तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६॥

 

सम्बन्ध - अब स्वयं सावधान रहकर अपनी बुद्धि को विवेकशील बनाने का लाभ बतलाते हैं-

 

परंतु जो सदा विवेकयुक्त बुद्धि वाला और वश में किये हुए मन से सम्पन्न रहता है उसकी इन्द्रियाँ सावधान सारथि के अच्छे घोड़ों की भाँति वश में रहती हैं ॥ ६ ॥

 

यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः ।

न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥ ७॥

 

सम्बन्ध–पाँचवें मन्त्र के अनुसार जिसके बुद्धि और मन आदि विवेक और संयम से हीन होते हैं, उसकी क्या गति होती है-इसे बतलाते हैं-

 

जो कोई सदा विवेकहीन बुद्धिवाला असंयतचित्त और अपवित्र रहता है, वह उस परमपद को नहीं पा सकता, वह बार- बार जन्म - मृत्युरूप संसार-चक्र में ही भटकता रहता है ॥ ७ ॥

 

यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः ।

स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८॥

 

परंतु जो सदा विवेकशील बुद्धि से युक्त, संयतचित्त और पवित्र रहता है। वह तो उस परमपद को प्राप्त कर लेता है। जहाँ से (लौटकर) जन्म नहीं लेता ॥ ८ ॥

 

विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः ।

सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९॥

 

सम्बन्ध - आठवें मन्त्र में कही हुई बात को फिर से स्पष्ट करते हुए रथ के रूपक का उपसंहार करते हैं-

 

जो कोई मनुष्य विवेकशील बुद्धिरूप सारथि से सम्पन्न (और) मनरूप लगाम को वश में रखनेवाला है। वह संसार मार्ग के पहुँचकर सर्वव्यापी परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान के -उस सुप्रसिद्ध परमपद को प्राप्त हो जाता है ।।९।।

 

इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः ।

मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥ १०॥

 

सम्बन्ध- उपर्युक्त वर्णन में रथ के रूपक की कल्पना करके भगवत्प्राप्ति के लिये जो साधन बतलाया गया, उसमें विवेकशील बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके, इन्द्रियों को विपरीत मार्ग से हटाकर, भगवत्प्राप्ति के मार्ग में लगाने की बात कही गयी। इस पर यह जिज्ञासा होती है कि स्वभाव से ही दुष्ट और बलवान् इन्द्रियों को उनके प्रिय और अभ्यस्त असत्-मार्ग से किस प्रकार हटाया जाय अतः इस बात का तात्त्विक विवेचन करके इन्द्रियों को असत्-मार्ग से रोककर भगवान्‌ की ओर लगाने का प्रकार बतलाते हैं-

 

क्योंकि इन्द्रियों से शब्दादि विषय बलवान् हैं और शब्दादि विषयों से मन प्रबल है और मन से भी बुद्धि बलवती है तथा बुद्धि से महान् आत्मा (उन सब का स्वामी होने के कारण) अत्यन्त श्रेष्ठ और बलवान् है ॥ १० ॥

 

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः ।

पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११॥

 

उस जीवात्मा से बलवती है भगवान्‌ की अव्यक्त माया शक्ति। अव्यक्त माया से भी श्रेष्ठ है परमपुरुष (स्वयं परमेश्वर)। परमपुरुष भगवान्‌ से श्रेष्ठ और बलवान् किञ्चित् कुछ भी नहीं है। वही सबकी परम अवधि (और) वही परम गति है ॥ ११ ॥

 

एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽऽत्मा न प्रकाशते ।

दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२॥

 

सम्बन्ध - यही भाव अगले मन्त्रमें स्पष्ट करते हैं-

 

आत्मा- यह सबका आत्मरूप समस्त प्राणियों में रहता हुआ भी माया के परदे में छिपा रहने के कारण सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, केवल सूक्ष्मतत्त्वों को समझने वाले पुरुषों द्वारा ही अति सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धि से दृश्यते देखा जाता है ॥ १२ ॥

 

यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।

ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३॥

 

सम्बन्ध - विवेकशील मनुष्य को भगवान्‌ के शरण होकर किस प्रकार भगवान की प्राप्ति के लिये साधन करना चाहिये ? - इस जिज्ञासा पर कहते हैं-

 

बुद्धिमान् साधक को चाहिये कि (पहले) वाक् आदि (समस्त इन्द्रियों) को मन में निरुद्ध करे। उस मन को ज्ञानस्वरूप बुद्धि में विलीन करे। ज्ञानस्वरूप बुद्धि को महान् आत्मा में विलीन करे (और) उसको शान्तस्वरूप परमपुरुष परमात्मा में विलीन करे ॥ १३ ॥

 

उत्तिष्ठत जाग्रत

    प्राप्य वरान्निबोधत ।

क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया

    दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४॥

 

सम्बन्ध — इस प्रकार परमात्मा के स्वरूप का वर्णन करके तथा उसकी प्राप्ति का महत्त्व और साधन बतलाकर अब श्रुति मनुष्यों को सावधान करती हुई कहती है-

 

(हे मनुष्यो!) उठो, (सावधान हो जाओ और) श्रेष्ठ महापुरुषों को पाकर उनके पास जाकर (उनके द्वारा) उस परब्रह्म परमेश्वरको जान लो (क्योंकि) त्रिकालज्ञ ज्ञानीजन उस तत्त्वज्ञान के मार्ग को छूरे की तीक्ष्ण की हुई दुस्तर धार के सदृश दुर्गम (अत्यन्त कठिन)बतलाते हैं॥ १४ ॥

 

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं

    तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।

अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं

    निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ १५॥

 

सम्बन्ध - ब्रह्मप्राप्ति का मार्ग इतना दुस्तर क्यों है ? इस जिज्ञासा पर परमात्मा के स्वरूप का वर्णन करते हुए उसको जानने का फल बतलाते हैं-

 

जो शब्दरहित, स्पर्शरहित, रूपरहित, रसरहित और बिना गन्धवाला है तथा (जो) अविनाशी, नित्य, अनादि, अनंत (असीम), महान् आत्मा से श्रेष्ठ (एवं) ध्रुव (सर्वथा सत्य तत्त्व) है, उस परमात्मा को जानकर (मनुष्य) मृत्यु के मुखसे सदा के लिये छूट जाता है ॥ १५ ॥

 

नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तँ सनातनम् ।

उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६॥

 

सम्बन्ध - यहाँ तक एक अध्यायके उपदेशको पूर्ण करके अब इस आख्यानके श्रवण और वर्णनका माहात्म्य बतलाते हैं-

 

बुद्धिमान् मनुष्य यमराज के द्वारा कहे हुए नचिकेता के (इस) सनातन उपाख्यान का वर्णन करके और श्रवण करके ब्रहालोक में महिमान्वित होता है (प्रतिष्ठित होता है) ।। १६ ।।

 

य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि ।

प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते ।

तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७॥

 

जो मनुष्य सर्वथा शुद्ध होकर इस परम गुह्य रहस्यमय प्रसङ्ग को ब्राह्मणों की सभा में सुनाता है अथवा श्राद्धकाल में (भोजन करने वालों को) सुनाता है (उसका) वह श्रवण करानारूप कर्म अनन्त होने में (अविनाशी फल देने में) समर्थ होता है, वह अनन्त होनेमें समर्थ होता है ॥ १७ ॥

 

 ॥ इति काठकोपनिषदि प्रथमाध्याये तृतीया वल्ली ॥

 

Monday, 20 March 2023

कठोपनिषद - प्रथम अध्याय, द्वितीय वल्ली

प्रथम अध्याय – द्वितीय वल्ली   Part 1  Canto 2

 

अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेय-

    स्ते उभे नानार्थे पुरुषँ सिनीतः ।

तयोः श्रेय आददानस्य साधु

    भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १॥

 

कल्याण का साधन अलग है और प्रिय लगने वाले भोग का साधन अलग ही है। वे भिन्न-भिन्न फल देने वाले दोनों साधन मनुष्य को बाँधते हैं—अपनी-अपनी ओर आकर्षित करते हैं। उन दोनों में से कल्याण के साधन को ग्रहण करने वाले का कल्याण होता है परंतु जो सांसारिक भोगों के साधन को स्वीकार करता है वह यथार्थ लाभ से भ्रष्ट हो जाता है ॥ १ ॥

 

श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः

    तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।

श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते

    प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते ॥ २॥

 

श्रेय और प्रेय - ये दोनों ही मनुष्य के सामने आते हैं। धीर (बुद्धिमान् मनुष्य) उन दोनों के स्वरूप पर भलीभाँति विचार करके उनको पृथक्-पृथक् समझ लेता है और वह श्रेष्ठबुद्धिमनुष्य परम कल्याण के साधन को ही भोग-साधन की अपेक्षा श्रेष्ठ समझकर ग्रहण करता है परंतु मन्दबुद्धिवाला मनुष्य लौकिक योगक्षेम की इच्छा से भोगों के साधनरूप प्रेय को अपनाता है ॥ २ ॥

 

स त्वं प्रियान्प्रियरूपांश्च कामान्

    अभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ।

नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो

    यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३॥

 

सम्बन्ध— परमात्मा की प्राप्ति के साधनरूप श्रेय की प्रशंसा करके अब यमराज साधारण मनुष्यों को नचिकेता की विशेषता दिखलाते हुए उसके वैराग्य की प्रशंसा करते हैं-

 

हे नचिकेता! उन्हीं मनुष्यों में तुम ऐसे नि:स्पृह हो कि प्रिय लगने वाले और अत्यन्त सुन्दर रूप वाले इस लोक और परलोक के समस्त भोगों को भलीभाँति सोच-समझकर तुमने छोड़ दिया। इस सम्पत्तिरूप बेड़ी को तुम नहीं प्राप्त हुए अर्थात इसके बन्धन में नहीं फँसे, जिसमें बहुत-से मनुष्यः फँस जाते हैं ।। ३ ॥

 

दूरमेते विपरीते विषूची

    अविद्या या च विद्येति ज्ञाता ।

विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये

    न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४॥

 

जो कि अविद्या और विद्या नाम से विख्यात हैं, ये दोनों परस्पर अत्यन्त विपरीत और भिन्न-भिन्न फल देने वाली हैं। तुम नचिकेता को विद्या का ही अभिलाषी मानता हूँ क्योंकि तुमको बहुत-से भोग न किसी प्रकार भी नहीं लुभा सके ॥ ४ ॥

 

व्याख्या—ये अविद्या और विद्या नाम से प्रसिद्ध दो साधन पृथक्-पृथक् फल देने वाले हैं और परस्पर अत्यन्त विरुद्ध हैं। जिसकी भोगों में आसक्ति है, वह कल्याण-साधन में आगे नहीं बढ़ सकता और जो कल्याणमार्ग का पथिक हैं, वह भोगों की ओर दृष्टि नहीं डालता। वह सब प्रकार के भोगों को दुःखरूप मानकर उनका परित्याग कर देता है। हे नचिकेता ! मैं मानता हूँ कि तुम विद्या के ही अभिलाषी हो, क्योंकि बहुत-से बड़े-बड़े भोग भी तुम्हारे मन में किञ्चिन्मात्र भी लोभ नहीं उत्पन्न कर सके ॥ ४ ॥

 

अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः

    स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।

दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा

    अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५॥

 

अविद्या के भीतर रहते हुए (भी) अपने-आपको बुद्धिमान् और विद्वान् मानने वाले, भोग की इच्छा करने वाले वे मूर्ख लोग नाना योनियों में चारों ओर भटकते हुए अंधे मनुष्य की भाँति ही ठोकरें खाते रहते हैं। (अपने लक्ष्य तक न पहुँचकर इधर-उधर भटकते और कष्ट भोगते हैं) ॥ ५ ॥

 

न साम्परायः प्रतिभाति बालं

    प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।

अयं लोको नास्ति पर इति मानी

    पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६॥

 

इस प्रकार सम्पत्ति के मोह से मोहित निरन्तर प्रमाद करने वाले अज्ञानी को परलोक नहीं सूझता। वह समझता है कि यह प्रत्यक्ष दीखने वाला लोक ही सत्य है इसके सिवा दूसरा कुछ भी नहीं है। इस प्रकार मानने वाला अभिमानी मनुष्य बार- बार मेरे (यमराज के) वश में आता है ॥ ६ ॥

 

श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः

    श‍ृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः ।

आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा

    आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७॥

 

अब यमराज विषयासक्त, प्रत्यक्षवादी मूर्खों की निंदा करके अब उस आत्मतत्व की और उसको जानने, समझने तथा वर्णन करने वाले पुरुषों की दुर्लभता का वर्णन करते हैं -

 

जो (आत्मतत्त्व) बहुतों को तो सुनने के लिये भी नहीं मिलता, जिसको बहुत-से लोग सुनकर भी नहीं समझ सकते; ऐसे इस गूढ़ आत्मतत्त्व का वर्णन करनेवाला महापुरुष आश्चर्यमय है (बड़ा दुर्लभ है)। उसे प्राप्त करने वाला भी बड़ा कुशल (सफल जीवन) कोई एक ही होता है और जिसे तत्त्वकी उपलब्धि हो गयी है, ऐसे ज्ञानी महापुरुष के द्वारा शिक्षा प्राप्त किया हुआ आत्मतत्त्व का ज्ञाता भी आश्चर्यमय है (परम दुर्लभ है) ॥ ७ ॥

 

न नरेणावरेण प्रोक्त एष

    सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः ।

अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति

    अणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥ ८॥

 

यमराज आत्मज्ञान की दुर्लभता का कारण बताते हैं -

अल्पज्ञ मनुष्य के द्वारा बतलाये जाने पर और बहुत प्रकार से चिन्तन किये जाने पर भी यह आत्मतत्त्व सहज ही समझ में आ जाय, ऐसा नहीं है। किसी दूसरे ज्ञानी पुरुष के द्वारा उपदेश न किये जाने पर इस विषय में मनुष्य का प्रवेश नहीं होता क्योंकि यह अत्यन्त सूक्ष्म वस्तु से भी अधिक सूक्ष्म है इसलिये तर्क से अतीत है ॥ ८ ॥

 

नैषा तर्केण मतिरापनेया

    प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ ।

यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि

    त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९॥

 

हे प्रियतम! जिसको तुमने पाया है, यह बुद्धि तर्क से नहीं मिल सकती (यह तो ) दूसरेके द्वारा कही हुई ही आत्मज्ञान में निमित्त होती है। सचमुच ही तुम उत्तम धैर्यवाले हो। हे नचिकेता! हम चाहते हैं कि तुम्हारे जैसे ही पूछने वाले हमें मिला करें ॥ ९ ॥

 

जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यं

    न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् ।

ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्निः

    अनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १०॥

 

संबंध - अब यमराज अपने स्वयं के उदाहरण से निष्काम भाव की प्रशंसा करते हुए कहते हैं -

मैं जानता हूँ कि कर्मफल रूपी निधि अनित्य है क्योंकि अनित्य (विनाशशील) वस्तुओं से वह नित्य पदार्थ (परमात्मा) नहीं मिल सकता। , इसलिये मेरे द्वारा (कर्तव्यबुद्धि से) अनित्य पदार्थों के द्वारा नाचिकेत नामक अग्नि का चयन किया गया (अनित्य भोगों की प्राप्ति के लिये नहीं), अतः उस निष्कामभाव की अपूर्व शक्ति से मैं नित्य वस्तु परमात्मा को प्राप्त हो गया हूँ ॥ १० ॥

(निष्काम भाव की महिमा यह है कि अनित्य पदार्थों के द्वारा कर्तव्य-पालनरूप ईश्वर-पूजा करके मैंने नित्य सुख-रूप परमात्मा को प्राप्त कर लिया है)

 

कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां

    क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारम् ।

स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा

    धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥ ११॥

 

सम्बन्ध – नचिकेतामें वह निष्कामभाव पूर्णरूपसे है, इसलिये यमराज उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं-

हे नचिकेता ! जिसमें सब प्रकार के भोग मिल सकते हैं, जो जगत्‌ का आधार, यज्ञ का चिरस्थायी फल, निर्भयता की अवधि (अभय करने वाला), स्तुति करने योग्य एवं महत्त्वपूर्ण है तथा वेदों में जिसके गुण नाना प्रकारसे गाये गये हैं; जो दीर्घकाल तक की स्थिति से सम्पन्न है, ऐसे स्वर्गलोक को देखकर भी तुमने धैर्यपूर्वक उसका त्याग कर दिया इसलिये मैं समझता हूँ कि तुम बहुत ही बुद्धिमान् हो ॥ ११ ॥

 

 

तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं

    गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् ।

अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं

    मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२॥

 

जो योगमाया के पर्दे में छिपा हुआ, सर्वव्यापी, सबके हृदयरूप गुफा में स्थित (अतएव) संसाररूप गहन वन में रहने वाला, सनातन है। ऐसे उस कठिनता से देखे जाने वाले परमात्मदेव को शुद्ध-बुद्धि-युक्त साधक अध्यात्मयोग की प्राप्ति के द्वारा समझकर हर्ष और शोक को त्याग देता है ॥ १२ ॥

 

_नचिकेता के निष्काम भाव को देखकर यमराज ने निश्चय कर लिया कि यह परमात्मा के तत्वज्ञान का यथार्थ अधिकारी है; अत: उसके अंतःकरण में परब्रह्म पुरुषोत्तम के तत्व की जिज्ञासा उत्पन्न करने के लिए यमराज अब आगे के मंत्र में परब्रह्म परमात्मा की महिमा का वर्णन करते हैं_

 

एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः

    प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य ।

स मोदते मोदनीयँ हि लब्ध्वा

    विवृतँ सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३॥

 

मनुष्य जब इस धर्ममय (उपदेश) को सुनकर भलीभाँति ग्रहण करके और उस पर विवेकपूर्वक विचार करके इस सूक्ष्म आत्मतत्त्व को जानकर (अनुभव कर लेता है, तब) वह आनन्दस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तम को पाकर आनन्द में ही मग्र हो जाता है। तुम नचिकेता के लिये (मैं) परमधाम का द्वार खुला हुआ मानता हूँ ॥ १३ ॥

 

अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मा-

    दन्यत्रास्मात्कृताकृतात् ।

अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च

    यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥ १४॥

 

जिस उस परमेश्वर को, जो धर्म से अतीत, अधर्म से भी अतीत तथा इस कार्य और कारणरूप सम्पूर्ण जगत से भी अन्यत्र भिन्न और भूत, वर्तमान एवं भविष्यत् - तीनों कालों से तथा इनसे सम्बन्धित पदार्थों से भी अन्यत्र पृथक् (आप) जानते हैं; उसे बतलाइये ॥१४॥

 

सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति

    तपाꣳसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।

यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति

    तत्ते पदꣳ सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५॥

 

सम्बन्ध - नचिकेता के इस प्रकार पूछने पर यमराज उस ब्रह्मतत्त्व के वर्णन करने की प्रतिज्ञा करते हुए उपदेश आरम्भ करते हैं-

सम्पूर्ण वेद जिस परम पद का बारम्बार प्रतिपादन करते हैं और सम्पूर्ण तप जिस पद का लक्ष्य कराते हैं अर्थात् वे जिसके साधन है- जिसको चाहने वाले साधकगण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह पद तुम्हें (मैं) संक्षेप से बतलाता हूँ (वह है) ओम् - ऐसा यह (एक अक्षर) ॥ १५ ॥

 

एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् ।

एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६॥

 

सम्बन्ध - नामरहित होने पर भी परमात्मा अनेक नामों से पुकारे जाते हैं। उनके सब नामों में '' सर्वश्रेष्ठ माना गया है। अतः यहाँ नाम और नामी का अभेद मानकर 'प्रणव' को परब्रह्म पुरुषोत्तम के स्थान में वर्णन करते हुए यमराज कहते हैं-

 

यह अक्षर ही तो ब्रह्म है (और) यह अक्षर ही परब्रह्म है इसलिये इसी अक्षर को जानकर जो जिसको चाहता है, उसको तत्व ही (मिल जाता है) १६ ॥

 


एतदालम्बनँ श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।

एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७॥

 

यही अत्युत्तम आलम्बन है, यही (सबका) अन्तिम आत्रय है, इस आलम्बन को भलीभाँति जानकर (साधक) ब्रह्मलोक में महिमान्वित होता है ॥ १७ ॥

 

न जायते म्रियते वा विपश्चि-

    न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो

    न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८॥

 

सम्बन्ध - इस प्रकार ॐकार को ब्रह्म और परब्रह्म- इन दोनों का प्रतीक बताकर अब नचिकेता के प्रश्नानुसार यमराज पहले आत्मा के स्वरूप का वर्णन करते हैं-

 

नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा न तो जन्मता है और न मरता ही है। यह न तो स्वयं किसी से हुआ है, न इससे कोई भी हुआ है अर्थात् यह न तो किसी का कार्य है और न कारण ही है। यह अजन्मा नित्य सदा एकरस रहने वाला और पुरातन है अर्थात् क्षय और वृद्धि से रहित है। शरीर के नाश किये जाने पर भी (इसका) नाश नहीं किया जा सकता ॥ १८ ॥

 

हन्ता चेन्मन्यते हन्तुँ हतश्चेन्मन्यते हतम् ।

उभौ तौ न विजानीतो नायँ हन्ति न हन्यते ॥ १९॥

 

यदि कोई मारने वाला व्यक्ति अपने को मारने में समर्थ मानता है (और) यदि (कोई) मारा जाने वाला व्यक्ति अपने को मारा गया समझता है (तो) वे दोनों ही (आत्मस्वरूप को) नहीं जानते (क्योंकि) यह आत्मा न तो (किसी को) मारता है (और) न मारा ही जाता है| ॥ १९ ॥

 

साधक को शरीर और भोगों की अनित्यता और अपने आत्मा की नित्यता पर विचार करके, इन अनित्य भोगों से सुख की आशा का त्याग करके सदा अपने साथ रहने वाले नित्य सुखस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तम को प्राप्त करने का अभिलाषी बनना चाहिये ॥ १८-१९ ॥

 

अणोरणीयान्महतो महीया-

    नात्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ।

तमक्रतुः पश्यति वीतशोको

    धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २०॥

 

सम्बन्ध - इस प्रकार आत्मतत्त्व के वर्णन द्वारा नचिकेता के अन्तःकरण में परब्रह्म पुरुषोत्तम के तत्त्व की जिज्ञासा उत्पन्न करके यमराज अब परमात्मा के स्वरूप का वर्णन करते हैं-

इस जीवात्मा के हृदयरूप गुफा में निहित रहने वाला आत्मा (परमात्मा) सूक्ष्म से अतिसूक्ष्म (और) महान् से भी महान् है। परमात्मा की उस महिमा को कामना रहित, चिन्तारहित (कोई विरला साधक) सर्वाधार और परब्रह्म परमेश्वर की कृपा से ही देख पाता है ॥ २० ॥

 

आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः ।

कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१॥

 

वह परमेश्वर बैठा हुआ ही दूर पहुँच जाता है, सोता हुआ भी सब ओर चलता रहता है, उस ऐश्वर्य के मद से उन्मत्त न होने वाले देव को मुझसे भिन्न दूसरा कौन जानने में समर्थ है ॥ २१ ॥

 

अशरीरँ शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् ।

महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२॥

 

सम्बन्ध - अब इस प्रकार उन परमेश्वरकी महिमाको समझानेवाले पुरुषकी पहचान बताते हैं-

जो स्थिर न रहनेवाले (विनाशशील) शरीरों में शरीररहित (एवं) अविचलभाव से स्थित है, उस महान् सर्वव्यापी परमात्मा को जानकर बुद्धिमान् महापुरुष (कभी किसी भी कारण से) शोक नहीं करता ॥ २२ ॥

 

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो

    न मेधया न बहुना श्रुतेन ।

यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः

    तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूꣳ स्वाम् ॥ २३॥

 

सम्बन्ध - अब यह बतलाते हैं कि वे परमात्मा अपने पुरुषार्थसे नहीं मिलते, वरं उसीको मिलते हैं, जिसको वे स्वीकार कर लेते हैं-

 

यह परब्रह्म परमात्मा न तो प्रवचन से, न बुद्धिसे (और) न बहुत सुनने से ही प्राप्त हो सकता है। जिसको यह स्वीकार कर लेता है, उसके द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है (क्योंकि) यह परमात्मा उसके लिये अपने यथार्थ स्वरूप को प्रकट कर देता है ॥ २३ ॥

 

नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः ।

नाशान्तमानसो वाऽपि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २४॥

 

सम्बन्ध - अब यह बतलाते हैं कि परमात्मा किसको प्राप्त नहीं होते-

सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा भी इस परमात्मा को न तो वह मनुष्य प्राप्त कर सकता है, जो बुरे आचरणों से निवृत्त नहीं हुआ है, न वह प्राप्त कर सकता है, जो अशान्त है, न वह कि जिसके मन, इन्द्रियाँ संयत नहीं हैं और न वही प्राप्त करता है, जिसका मन शान्त नहीं है ॥ २४ ॥

 

यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः ।

मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५॥

 

सम्बन्ध — उस परब्रह्म परमेश्वरके तत्त्व को सुनकर और बुद्धि द्वारा विचार करके भी मनुष्य उसे क्यों नहीं जान सकता ? इस जिज्ञासा पर कहते हैं-

(संहारकाल में) जिस परमेश्वर के ब्राह्मण और क्षत्रिय - ये दोनों ही अर्थात् सम्पूर्ण प्राणिमात्र भोजन बन जाते हैं (तथा) सबका संहार करने वाली मृत्यु (भी) जिसका उपसेचन (भोज्य वस्तु के साथ लगाकर खाने का व्यञ्जन, तरकारी आदि) बन जाता है। वह परमेश्वर जहाँ (और) जैसा है, यह ठीक-ठीक कौन जानता है ॥ २५ ॥

 

 इति काठकोपनिषदि प्रथमाध्याये द्वितीया वल्ली ॥

 


विदुर नीति (अध्याय 34): जीवन को सही दिशा देने वाले और संकट से बचाने वाले नीति-मंत्र

पिछले अध्याय में हमने जाना कि महात्मा विदुर ने महाराज धृतराष्ट्र को बुद्धिमान और मूर्ख व्यक्ति के लक्षण बताए थे। महाभारत के 'प्रजागर पर्...